आंसू चुनते किसी मोड़ पर मिलो कभी हमको!

भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

रौशनी को
ढूंढना चाहते हो
तो समझो
घेरे हुए तम को!
आत्मा के प्रकाश से
उज्जवल होगा परिवेश
तोड़ो इस
प्रतिपल बढ़ते
अन्धकार के भ्रम को!!

ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!

चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

38 टिप्पणियाँ:

महेन्द्र श्रीवास्तव 11 दिसंबर 2011 को 9:55 am बजे  

क्या कहने,
बहुत सुंदर

ऋता शेखर 'मधु' 11 दिसंबर 2011 को 10:42 am बजे  

बहुत सुन्दर भाव...

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!

Anupama Tripathi 11 दिसंबर 2011 को 10:59 am बजे  

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!

बहुत सुंदर सार्थक ...कोमल अभिव्यक्ति ...!!

vandana gupta 11 दिसंबर 2011 को 12:50 pm बजे  

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
सुन्दर सटीक व सार्थक अभिव्यक्ति।

Rajesh Kumari 11 दिसंबर 2011 को 1:20 pm बजे  

bahut sundar aadarshvaad ka put liye hue hai ye kavita bahut uttam.prerna dayak prastuti.

mridula pradhan 11 दिसंबर 2011 को 1:52 pm बजे  

चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
kya baat hai.....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 11 दिसंबर 2011 को 2:02 pm बजे  

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 012-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Udaya 11 दिसंबर 2011 को 2:39 pm बजे  

आंसू चुनकर मुस्कराहट बिखेरना ही सार्थक जीवन है:) सुन्दर कथ्य आपकी कविता के माध्यम से:)

रचना दीक्षित 11 दिसंबर 2011 को 3:14 pm बजे  

इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!

मानव धर्म की सुंदर व्याख्या इस कविता के माध्यम से की गयी है और सार्थक सन्देश जाता मानवता की ओर.

बहुत बधाई.

Kailash Sharma 11 दिसंबर 2011 को 3:14 pm बजे  

राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

....बहुत उत्कृष्ट और प्रेरक प्रस्तुति..रचना के भाव मन को छू जाते हैं..

रश्मि प्रभा... 11 दिसंबर 2011 को 3:42 pm बजे  

अपने आंसुओं की कीमत से पहले दूसरे के आंसुओं को समझ लें तो आत्मिक सुकून है

भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

Deepak 11 दिसंबर 2011 को 4:05 pm बजे  

Bahan ji...

Kalam anuthi tumne payi...
Door hua sab tam aur bhram...
Manavta ka paath padhaya..
Hame sikhaya Manav dharm...

Raah kathin, path main kantak hon...
Ya hon kasht, dard aur gam....
Duniya ke gam baant ke saare...
Safal janm ko kar len hum...

Aapki kavita ki ek ek pankti ko aatmsaat karna thoda mushkil to jarur hai, par asambhav nahi hai...
Apni koshish jaari hai..dekte hain hum kya kar paate hain....kya nahi..

Bahut hi bhavpoorn kavita...

Sadar...

Deepak Shukla..

मनोज कुमार 11 दिसंबर 2011 को 4:25 pm बजे  

सुन्दर बिम्ब से सजी अच्छी भाव की कविता।

Prakash Jain 11 दिसंबर 2011 को 5:38 pm बजे  

Behtareen....Bahut sundar v satik bhav...

Nirantar 11 दिसंबर 2011 को 7:16 pm बजे  

राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
tumhaare dard samet lenge
thodee see hansee tumhein de denge
hamein to aadat hai sahne kee
kabhee milo to sahee hamko

dinesh aggarwal 12 दिसंबर 2011 को 2:01 am बजे  

दर्द का अहसास कराने एवं जीवन को सार्थक बनाने वाली कमाल की
रचना।

डॉ. मोनिका शर्मा 12 दिसंबर 2011 को 3:52 am बजे  

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
सुंदर आव्हान लिए पंक्तियाँ.... उम्दा रचना

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 12 दिसंबर 2011 को 5:22 am बजे  

बेहद प्रभावशाली रचना.
बोझ ज़िंदगी का हल्का इस तरह होता अरुण
गैर की खुशियों की खातिर ,गम उठा कर देखिये.

abhi 12 दिसंबर 2011 को 5:45 am बजे  

बहुत ही शानदार कविता है...
मुझे तो पहली पंक्तियाँ बड़ी अच्छी और सही लगी
"भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!"

Jeevan Pushp 12 दिसंबर 2011 को 7:50 am बजे  

चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

बहुत सुन्दर रचना ..!
आभार !

Anita 12 दिसंबर 2011 को 9:07 am बजे  

ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
सचमुच अब जीवन से ह्रास जाना चाहिए, निर्माण की बात होनी चाहिए..नए आदर्शों और मूल्यों के निर्माण की बात...सुंदर कविता!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 12 दिसंबर 2011 को 9:32 am बजे  

अनुपमा जी ..बेहद बेहद प्रभावशाली और ज्ञान के प्रकाश से भरी दिल को छू जाने वाली रचना ... बहुत ही सुन्दर कविता .. वाह !! आभार आपका..

निर्झर'नीर 12 दिसंबर 2011 को 10:10 am बजे  

हमेशा की तरह शशक्त और सार्थक रचना ..


चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

कुमार राधारमण 12 दिसंबर 2011 को 12:56 pm बजे  

अपने दर्द को भूलने के लिए औरों के गम को अपनाने की सलाह कैसी! दर्द का सम्यक स्वीकार ही निवारक हो सकता है। गुरू भी वही शिष्य का दर्द ले सकता है,जो स्वयं दर्दरहित हो।
जिसके भीतर चैतन्य होगा,उसके कलम में खुद-ब-खुद तेज़ पैदा होता है- और वह अमरता की फ़िक़्र भी नहीं करता!

आहुति 12 दिसंबर 2011 को 3:39 pm बजे  

राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति.

Atul Shrivastava 12 दिसंबर 2011 को 5:26 pm बजे  

सुंदर और गहरे अहसास।

महेन्द्र श्रीवास्तव 13 दिसंबर 2011 को 7:50 am बजे  

वाह, बहुत सुंदर

Maheshwari kaneri 13 दिसंबर 2011 को 8:31 am बजे  

बहुत गहरे अहसास। बहुत सुंदर..

Amrita Tanmay 13 दिसंबर 2011 को 9:05 am बजे  

इस जन्म को सफल बनाना ही पहला धर्म होना चाहिए .

avanti singh 13 दिसंबर 2011 को 9:31 am बजे  

ये लिख दें... वो लिख दें
मन में आता है सब लिख दें
जब न रहेंगे हम
रह जायेंगे अक्षर ही-
जीवन की गंगा में
बहती धारा पर रब लिख दें .....bahut hi sundar bhavana....aap se sab kuch likh bhi diya hai...

Monika Jain 13 दिसंबर 2011 को 12:11 pm बजे  

Bahut Subdar Rachna...aabhar
mere blog par aapka swagat hai :)

vidya 13 दिसंबर 2011 को 1:32 pm बजे  

आपकी रचना बहुत सुन्दर है...
और एक बात कहना चाहती हूँ..अनुपमा जी आपका बहुत शुक्रिया मेरे ब्लॉग को फोलो करने के लिए...मुझे बहुत ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि आपने मेरी पुरानी कवितायेँ भी पढ़ने का वक्त निकाला...
आपको सादर नमन.
स्नेह बनाये रखियेगा.

Unknown 13 दिसंबर 2011 को 2:27 pm बजे  

ममता लिख दें... प्यार लिख दें
मुक़म्मल गीत दो चार लिख दें
गुनगुनाये जिसे हृदय भी
न केवल अधर ही-
आओ अपने दम पर
अन्धकार की हार लिख दें

बहुत सुंदर

आनंद 13 दिसंबर 2011 को 3:14 pm बजे  

राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
......

वाह ! दिव्यता का ऐसा आभाश...मन इन भावों में डूब कर प्रमुदित हो जाता है !
मिलो तो ऐसे मिलो वाह !

संतोष पाण्डेय 13 दिसंबर 2011 को 7:50 pm बजे  

आपकी कविता मन को छू गई. काफी पहले पढ़ी एक कविता याद आ गई.
दुःख तुम्हे क्या तोड़ेगा, तुम दुःख को तोड़ दो. अपनी ऑंखें दूसरों के सपनो से जोड़ दो.

प्रेम सरोवर 14 दिसंबर 2011 को 1:30 am बजे  

आपका पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट नकेनवाद पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

अशोक सलूजा 14 दिसंबर 2011 को 8:41 am बजे  

सारे भाव सुंदर लिख दे ...और आप ने लिख दिए ! बधाई ..

ममता लिख दें... प्यार लिख दें
मुक़म्मल गीत दो चार लिख दें
गुनगुनाये जिसे हृदय भी
न केवल अधर ही-
आओ अपने दम पर
अन्धकार की हार लिख दें

खुश और स्वस्थ रहें !

ASHOK BIRLA 16 दिसंबर 2011 को 12:52 pm बजे  

खुशिया उस आँगन की चिड़िया होती है जहा गम का बटवारा होता है .....आशु चुनले औरों के वो दिलवाला होता है .....सुंदर और गहरे अहसास।

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