भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
रौशनी को
ढूंढना चाहते हो
तो समझो
घेरे हुए तम को!
आत्मा के प्रकाश से
उज्जवल होगा परिवेश
तोड़ो इस
प्रतिपल बढ़ते
अन्धकार के भ्रम को!!
ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!
चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
आंसू चुनते किसी मोड़ पर मिलो कभी हमको!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
11 दिसंबर 2011

38 टिप्पणियाँ:
क्या कहने,
बहुत सुंदर
बहुत सुन्दर भाव...
कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
बहुत सुंदर सार्थक ...कोमल अभिव्यक्ति ...!!
कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
सुन्दर सटीक व सार्थक अभिव्यक्ति।
bahut sundar aadarshvaad ka put liye hue hai ye kavita bahut uttam.prerna dayak prastuti.
चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
kya baat hai.....
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 012-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ
आंसू चुनकर मुस्कराहट बिखेरना ही सार्थक जीवन है:) सुन्दर कथ्य आपकी कविता के माध्यम से:)
इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!
मानव धर्म की सुंदर व्याख्या इस कविता के माध्यम से की गयी है और सार्थक सन्देश जाता मानवता की ओर.
बहुत बधाई.
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
....बहुत उत्कृष्ट और प्रेरक प्रस्तुति..रचना के भाव मन को छू जाते हैं..
अपने आंसुओं की कीमत से पहले दूसरे के आंसुओं को समझ लें तो आत्मिक सुकून है
भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
Bahan ji...
Kalam anuthi tumne payi...
Door hua sab tam aur bhram...
Manavta ka paath padhaya..
Hame sikhaya Manav dharm...
Raah kathin, path main kantak hon...
Ya hon kasht, dard aur gam....
Duniya ke gam baant ke saare...
Safal janm ko kar len hum...
Aapki kavita ki ek ek pankti ko aatmsaat karna thoda mushkil to jarur hai, par asambhav nahi hai...
Apni koshish jaari hai..dekte hain hum kya kar paate hain....kya nahi..
Bahut hi bhavpoorn kavita...
Sadar...
Deepak Shukla..
सुन्दर बिम्ब से सजी अच्छी भाव की कविता।
Behtareen....Bahut sundar v satik bhav...
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
tumhaare dard samet lenge
thodee see hansee tumhein de denge
hamein to aadat hai sahne kee
kabhee milo to sahee hamko
दर्द का अहसास कराने एवं जीवन को सार्थक बनाने वाली कमाल की
रचना।
कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
सुंदर आव्हान लिए पंक्तियाँ.... उम्दा रचना
बेहद प्रभावशाली रचना.
बोझ ज़िंदगी का हल्का इस तरह होता अरुण
गैर की खुशियों की खातिर ,गम उठा कर देखिये.
बहुत ही शानदार कविता है...
मुझे तो पहली पंक्तियाँ बड़ी अच्छी और सही लगी
"भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!"
चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
बहुत सुन्दर रचना ..!
आभार !
ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
सचमुच अब जीवन से ह्रास जाना चाहिए, निर्माण की बात होनी चाहिए..नए आदर्शों और मूल्यों के निर्माण की बात...सुंदर कविता!
अनुपमा जी ..बेहद बेहद प्रभावशाली और ज्ञान के प्रकाश से भरी दिल को छू जाने वाली रचना ... बहुत ही सुन्दर कविता .. वाह !! आभार आपका..
हमेशा की तरह शशक्त और सार्थक रचना ..
चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
अपने दर्द को भूलने के लिए औरों के गम को अपनाने की सलाह कैसी! दर्द का सम्यक स्वीकार ही निवारक हो सकता है। गुरू भी वही शिष्य का दर्द ले सकता है,जो स्वयं दर्दरहित हो।
जिसके भीतर चैतन्य होगा,उसके कलम में खुद-ब-खुद तेज़ पैदा होता है- और वह अमरता की फ़िक़्र भी नहीं करता!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति.
सुंदर और गहरे अहसास।
वाह, बहुत सुंदर
बहुत गहरे अहसास। बहुत सुंदर..
इस जन्म को सफल बनाना ही पहला धर्म होना चाहिए .
ये लिख दें... वो लिख दें
मन में आता है सब लिख दें
जब न रहेंगे हम
रह जायेंगे अक्षर ही-
जीवन की गंगा में
बहती धारा पर रब लिख दें .....bahut hi sundar bhavana....aap se sab kuch likh bhi diya hai...
Bahut Subdar Rachna...aabhar
mere blog par aapka swagat hai :)
आपकी रचना बहुत सुन्दर है...
और एक बात कहना चाहती हूँ..अनुपमा जी आपका बहुत शुक्रिया मेरे ब्लॉग को फोलो करने के लिए...मुझे बहुत ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि आपने मेरी पुरानी कवितायेँ भी पढ़ने का वक्त निकाला...
आपको सादर नमन.
स्नेह बनाये रखियेगा.
ममता लिख दें... प्यार लिख दें
मुक़म्मल गीत दो चार लिख दें
गुनगुनाये जिसे हृदय भी
न केवल अधर ही-
आओ अपने दम पर
अन्धकार की हार लिख दें
बहुत सुंदर
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!
......
वाह ! दिव्यता का ऐसा आभाश...मन इन भावों में डूब कर प्रमुदित हो जाता है !
मिलो तो ऐसे मिलो वाह !
आपकी कविता मन को छू गई. काफी पहले पढ़ी एक कविता याद आ गई.
दुःख तुम्हे क्या तोड़ेगा, तुम दुःख को तोड़ दो. अपनी ऑंखें दूसरों के सपनो से जोड़ दो.
आपका पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट नकेनवाद पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।
सारे भाव सुंदर लिख दे ...और आप ने लिख दिए ! बधाई ..
ममता लिख दें... प्यार लिख दें
मुक़म्मल गीत दो चार लिख दें
गुनगुनाये जिसे हृदय भी
न केवल अधर ही-
आओ अपने दम पर
अन्धकार की हार लिख दें
खुश और स्वस्थ रहें !
खुशिया उस आँगन की चिड़िया होती है जहा गम का बटवारा होता है .....आशु चुनले औरों के वो दिलवाला होता है .....सुंदर और गहरे अहसास।
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