अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ज़िंदगी की तपती हुई ज़मीं पर...!

बोलने से
दूरियां बढ़ती हैं
निकटता में
शब्द बहुत कम होते हैं!

बिना कहे ही
समझ ली जाए बात
ऐसे रिश्ते
कम होते हैं!

ज़िंदगी की
तपती हुई ज़मीं पर
कुछ हिस्से ही
नम होते हैं!

मिटा नहीं सकती
समय की धार
ऐसे भी कुछ
गम होते हैं!

पहले कदम और
मंज़िल के बीच
जाने कहाँ
हम होते हैं!

प्रकाश के पार्श्व में
निर्भीक खड़े
ऐसे भी कुछ
तम होते हैं!

राह चुनने का
समुचित विकल्प मिले
ऐसे अवसर
कम होते हैं!

दूरी
बढ़ती ही जाती है
फासले कब
कम होते हैं!

6 टिप्पणियाँ:

Mamta Bajpai 18 दिसंबर 2011 को 5:21 pm  

बिना कहे ही
समझ ली जाए बात
ऐसे रिश्ते
कम होते हैं!

सच्चे रिश्तों मे ..जैसे माँ ..बिना कहे समझने कि क्षमता होती है
और लाख कहने पर बी नहीं समझी जाती हैं भावनाएं
अक्सर सार्थक रचना

ऋता शेखर 'मधु' 18 दिसंबर 2011 को 5:42 pm  

सभी बातें सार्थक हैं...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 18 दिसंबर 2011 को 7:28 pm  

ज़िंदगी की
तपती हुई ज़मीं पर
कुछ हिस्से ही
नम होते हैं!

भावपूर्ण रचना .. बिना कहे बात समझ ली जाए ऐसे रिश्ते कम होते हैं .. सटीक ..

Atul Shrivastava 19 दिसंबर 2011 को 5:57 am  

हर पंक्तियों में जीवन का सच छुपा है.....

बार बार पढने का मन कर रहा है....

सुंदर.... अदभुत.... बेमिसाल......

Anita 19 दिसंबर 2011 को 9:44 am  

वाह ! छोटे-छोटे अंतरों में छिपी जीवन की गहरी बातें... बहुत सुंदर कृति!

अरूण साथी 20 दिसंबर 2011 को 3:04 am  

ज़िंदगी की
तपती हुई ज़मीं पर
कुछ हिस्से ही
नम होते हैं!


साधु-साधु

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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