अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मरा-मरा कहते कहते... राम उच्चरित हो जाएगा!

जिस तरह कपड़े बुन लेता है
बड़ी महीनता से अनमोल सफल
वैसे रिश्ते नहीं बुने जाते
यहाँ नहीं होतीं राहें समतल

जुलाहे का हुनर
बुनता है सपनीले सुन्दर वस्त्र
इंसानी रिश्ते बुनने का
न कोई सिद्धांत न कोई अस्त्र

ये तरकीब क्या सिखलाएगा कोई जुलाहा
वो रिश्ते कहाँ बुनता है
पूछो दिल से अपने
ये दिल ही है जो विश्व वेदना की रागिनी सुनता है

झांको भीतर... सब जानता है मन
गांठें कैसे खुलती हैं
कुछ भ्रम हो तो हमसे जानो
संवेदनाओं की ज़िंदगियाँ मिलती जुलती हैं

हर रिश्ता जो बुन रहे हो
वो ईश्वर तक ले जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

जिस तरह से गीत बन जाते हैं
और कर जाते हैं नयन सजल
वैसे प्रार्थनाएं नहीं कही जातीं
यहाँ चाहिए ज़रा और हृदय विकल

गीतकार का हुनर
रचता है सुन्दर स्वर
प्रार्थनाएं नहीं रची जातीं मात्र हुनर से
यहाँ चाहिए कुछ और सच्चे पहर

ये तरकीब कोई सीखा नहीं सकता
क्यूंकि प्रार्थना में स्वर कहाँ होते हैं
हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठी चेतना के
मौन में संवाद छुपे होते हैं

हर सांस जब डूबकर
नाम उसका गाती है
ज़िन्दगी स्वार्थ के कारागार से
आज़ाद हुई जाती है

ऐसे में जीवन उद्देश्य ही
अभिराम बन जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

प्रार्थना जैसा ही निर्मल जो हर रिश्ता हो
तो जीवन ही एक यज्ञ होगा
होम होगा अहंकार
मूढ़ता तज हर इंसान विज्ञ होगा

मन की आखें खोल ज्यूँ
पूजा में शीश नवाते हैं
प्रार्थना के क्षणों में हम
बच्चों से भोले बन जाते हैं

यही आचरण जब जगत व्यवहार बन जाएगा
जीवन की कथा कुछ और होगी
अभी यूँ ही कट रहा है वक़्त
तब साँसों की निश्चित ठौर होगी

कोई बात निरुद्देश्य न कही जायेगी
पहचान सबकी होगी अनमोल
तब जियेंगे सब बन्दे
मन की सारी गिरहें खोल

प्रार्थना के क्षण जी लो
संकुचित मन की सीमाओं का विस्तार हो जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

14 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... 27 दिसंबर 2011 को 4:44 am  

प्रार्थना के क्षण जी लो
संकुचित मन की सीमाओं का विस्तार हो जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!
bahut sunder ..sarthak baat ..

Atul Shrivastava 27 दिसंबर 2011 को 5:44 am  

बेहतरीन प्रस्‍तुति.....
सुंदर रचना।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 27 दिसंबर 2011 को 6:11 am  

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 28-12-2011 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Poorviya 27 दिसंबर 2011 को 6:42 am  

ऐसे में जीवन उद्देश्य ही
अभिराम बन जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

jai baba banaras....

मनीष सिंह निराला 27 दिसंबर 2011 को 7:08 am  

परिज्ञान कराती प्रेरणादायक रचना ...!
आभार !

vikram7 27 दिसंबर 2011 को 8:07 am  

बेहतरीन प्रस्‍तुति

Anita 27 दिसंबर 2011 को 9:02 am  

प्रार्थना जैसा ही निर्मल जो हर रिश्ता हो
तो जीवन ही एक यज्ञ होगा
होम होगा अहंकार
मूढ़ता तज हर इंसान विज्ञ होगा

मन की आखें खोल ज्यूँ
पूजा में शीश नवाते हैं
प्रार्थना के क्षणों में हम
बच्चों से भोले बन जाते हैं
बहुत सुंदर कोमल भावों से ओतप्रोत रचना ! बधाई!

वन्दना 27 दिसंबर 2011 को 11:47 am  

बहुत सुन्दर प्रार्थनामयी प्रस्तुति।

vidya 27 दिसंबर 2011 को 6:17 pm  

बहुत सुन्दर...

प्रार्थना जैसा ही निर्मल जो हर रिश्ता हो
तो जीवन ही एक यज्ञ होगा
होम होगा अहंकार
मूढ़ता तज हर इंसान विज्ञ होगा

लाजवाब...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 28 दिसंबर 2011 को 6:58 am  

प्रार्थनाएं नहीं रची जातीं मात्र हुनर से
यहाँ चाहिए कुछ और सच्चे पहर

सुन्दर सन्देश ..अच्छी प्रस्तुति

veerubhai 28 दिसंबर 2011 को 10:38 am  

अनुपम प्रस्तुति .

सदा 28 दिसंबर 2011 को 10:58 am  

ऐसे में जीवन उद्देश्य ही
अभिराम बन जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!
बहुत बढि़या।

RITU 28 दिसंबर 2011 को 2:30 pm  

अति सुन्दर रचना !
kalamdaan.blogspot.com

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 28 दिसंबर 2011 को 6:42 pm  

बेहतरीन , बेमिसाल, वाह !!!

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