अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बात पुरानी हो गयी!

दो बूँदें गिरी आँखों से
और सारी कहानी हो गयी
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

फासले बढ़ते गए
जीवन चलता ही रहा
सूरज उदित हुआ रोज़
और रोज़ ढ़लता ही रहा

कहाँ से राहों में
इतने मोड़ आ गए
तुम मुड़ गए उन मोड़ों से
और हमें वही पुराने क्षण भा गए

उन्ही क्षणों की खातिर
कितना तरसते हैं
जब तब छाते हैं बदल
और खूब बरसते हैं

इन सब दायरों से फुर्सत पाकर
कभी घर आना
कई बातें होंगी
जितना चाहे बात बनाना

बर्फ की चट्टानें पिघल कर
बहता पानी हो गयीं
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

इस पुरानी बात को
फिर से जीना है
हमें लौट कर पीछे फिर से खुशियों को
प्याली में घोल कर पीना है

हो सके तो जल्दी लौटो
जीवन बीत रहा है
ये सामीप्य ज़रा ग्रहण के दौर में है
फासला जीत रहा है

तुम अपनी कहना
हम अपनी बात बोलेंगे
जितनी भी गांठें हैं
सब एक एक कर खोलेंगे

सबसे बड़ी बात
स्वयं को जानना है
जिस राह पर चल रहे हो
ज़रूरी उसको पहचानना है

ये अगर ज्ञात नहीं
फिर सारी सोच बेमानी हो गयी
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

27 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar 29 दिसंबर 2011 को 2:15 am  

वाह सुबह सुबह एक सुंदर रचना पढ़ने को मिली धन्यवाद

abhi 29 दिसंबर 2011 को 2:56 am  

आखिर में कितनी खूबसूरत बात कह दी आपने!! :)

Atul Shrivastava 29 दिसंबर 2011 को 4:51 am  

बेहतरीन.... बेमिसाल..... लाजवाब।
खासकर ये लाईनें,
'तुम अपनी कहना
हम अपनी बात बोलेंगे
जितनी भी गांठें हैं
सब एक एक कर खोलेंगे'

RITU 29 दिसंबर 2011 को 5:32 am  

सुन्दर रचना !
kalamdaan.blogspot.com

Anita 29 दिसंबर 2011 को 5:38 am  

वह तो घर में ही बैठा है हम ही दुनिया भर में घूमते हैं...सुंदर कविता !

रश्मि प्रभा... 29 दिसंबर 2011 को 6:43 am  

इस पुरानी बात को
फिर से जीना है
हमें लौट कर पीछे फिर से खुशियों को
प्याली में घोल कर पीना है...यही तो बस चाहिए, साथ चाय पीना तो एक बहाना है

mridula pradhan 29 दिसंबर 2011 को 7:40 am  

bahot pyara ehsaas......

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 29 दिसंबर 2011 को 7:45 am  

तुम अपनी कहना
हम अपनी बात बोलेंगे
जितनी भी गांठें हैं
सब एक एक कर खोलेंगे

sundar prastuti.

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" 29 दिसंबर 2011 को 7:50 am  

nice one
very positive

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 29 दिसंबर 2011 को 11:02 am  

सबसे बड़ी बात
स्वयं को जानना है
जिस राह पर चल रहे हो
ज़रूरी उसको पहचानना है

सार्थक रचना.... सादर बधाई...

ASHA BISHT 29 दिसंबर 2011 को 1:18 pm  

तुम अपनी कहना
हम अपनी बात बोलेंगे
जितनी भी गांठें हैं
सब एक एक कर खोलेंगे..SACHMUCH MAAN NA JANE KITNI BAATON KO SAMETE RAHTA HAI SIRF KAH DALNE KE LIYE UNSE...

धीरेन्द्र अस्थाना 29 दिसंबर 2011 को 6:09 pm  

आपका लेखन प्रभाव पूर्ण और भाव पूर्ण है !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 30 दिसंबर 2011 को 2:21 am  

सुन्दर, मधुर कविता, गम्भीर सन्देश!

M VERMA 30 दिसंबर 2011 को 3:51 am  

हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

सुन्दर और सुमधुर

यादें....ashok saluja . 30 दिसंबर 2011 को 10:45 am  

नव-वर्ष की शुभकामनाएँ !

sushma 'आहुति' 30 दिसंबर 2011 को 4:00 pm  

खुबसूरत रचना.....नववर्ष की शुभकामनायें.....

vikram7 30 दिसंबर 2011 को 5:04 pm  

दो बूँदें गिरी आँखों से
और सारी कहानी हो गयी
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!
क्या कहें,अंतरमन को छू गई ये पंक्तियाँ अति प्रभाव पूर्ण

नव वर्ष की शुभकामनायें

vikram7: आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें.....

मेरी इस रचना पर आप की राय का इंतज़ार रहेगा

dheerendra 30 दिसंबर 2011 को 5:58 pm  

बहुत सुंदर प्रस्तुती बेहतरीन रचना,.....
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाए..

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Onkar 31 दिसंबर 2011 को 1:35 pm  

bahut sundar rachna

mahendra verma 1 जनवरी 2012 को 4:53 am  

सबसे बड़ी बात
स्वयं को जानना है
जिस राह पर चल रहे हो
जरूरी उसको पहचानना है

स्वयं को पहचानने का संदेश देती हुई सुंदर रचना।
शुभ नववर्ष !

rafat 1 जनवरी 2012 को 3:36 pm  

हो सके तो जल्दी लौटो
जीवन बीत रहा है
ये सामीप्य ज़रा ग्रहण के दौर में है
फासला जीत रहा है..पूरी कविता भावपूर्ण ये लाइनें क्या कहने

rafat 1 जनवरी 2012 को 3:38 pm  

हो सके तो जल्दी लौटो
जीवन बीत रहा है
ये सामीप्य ज़रा ग्रहण के दौर में है
फासला जीत रहा है
पूरी कविता भावपूर्ण ये लाइनें क्या कहने

dheerendra 1 जनवरी 2012 को 4:23 pm  

नया साल सुखद एवं मंगलमय हो,..
आपके जीवन को प्रेम एवं विश्वास से महकाता रहे,

--"नये साल की खुशी मनाएं"--

VIJAY KUMAR VERMA 1 जनवरी 2012 को 4:33 pm  

नववर्ष की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ

Mamta Bajpai 2 जनवरी 2012 को 2:11 pm  

जीवन में
इतनी परते हैं
उन सबको खोलना है...
तह करना है
और संभालना है!
बिलकुल सही है

JHAROKHA 2 जनवरी 2012 को 2:56 pm  

जितना भी दर्द है
बिखरा यहाँ
समेट उन्हें भीतर,
दूर खिली
धूप को निहारना है!
badi hi khoobsurti ke saath jeevan ke har pahlu par gahri nazar rakkhi hai aapne
badhhai ke saath nav-varshh ki hardik shubh -kamnayen---
poonam

Anand Dwivedi 10 जनवरी 2012 को 12:34 pm  

कहाँ से राहों में
इतने मोड़ आ गए
तुम मुड़ गए उन मोड़ों से
और हमें वही पुराने क्षण भा गए
...
जिस राह पर चल रहे हो
ज़रूरी उसको पहचानना है
ये अगर ज्ञात नहीं
फिर सारी सोच बेमानी हो गयी
..
अनमोल ! बेमिसाल !!

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