अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते...!

एक रोज़ उठी
बात एक मन में,
जीवन को एक जगह पर रख..
कुछ ऊपर उठकर,
हवाओं में हम रहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

अपने आप से ही
परे जाकर,
लम्बी यात्रा के बाद..
अपनी ही आत्मा संग,
कुछ देर बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

लगता है जैसे
रोज़ पुनरावृति हो रही,
आगे कहाँ बढ़ते है..
बस एक खम्भा है और बीत रही है जिंदगी,
उसी पर चढ़ते और उतरते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

बाहर भटक रहा है मन
तब.., जब विधाता ने सहेज रखे हैं,
सारे मोती अन्दर..
बाहर की यात्रा चल रही है.. चले,
कितना अच्छा होता गर भीतर भी टहलने को मचलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

सूर्योदय की बेला में
फैला चहुँ ओर है हर्ष,
उषाकाल के माधुर्य में किसने जाना..?
जीवन में अभावों का चरमोत्कर्ष,
अपने-पराये कितने आंसुओं संग हैं हम प्रतिपल बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

जीवन में छिपने-छिपाने का दस्तूर है
छिपते हैं हम औरों के गम से,
और छिपाते हैं सबसे अपने गम..
यहीं अगर शुरू हो जाए बांटने की परिपाटी,
तो सोचो, कितना हो आनंद.. फिर मिल कर हम सारे गम सहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

अंधियारी रातों का एक किनारा पकड़ कर
सुबहों की देहरी तक का सफ़र,
रोज़ आसानी से तय होता..
जीवन इतना नहीं विषम होता,
गर बीते दिनों में आस्था के मौसम न यूँ बदलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

जो एक रिश्ता है इंसानियत का
वही अगर प्रार्थना होता.. गीत होता,
हर रूप में.. हर धूप में फिर संगीत होता..
ज़िन्दगी ख़ुशी ख़ुशी निकलती,
रोज़ मानवता के प्रतिमान न यूँ ढहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

चलो हमारे सपनों से कोई सरोकार नहीं
हमारी बातों पर ऐतबार नहीं,
पर फिर भी मेरी बातें गुननी ही होगी..
एक कविता तो आपको सुननी ही होगी
जिससे.. हम कह सकें, कोयल अमराई में गायी!
किसी ने सुनी.. और हमने कह सुनायी!!

हर हृदय की अबोली बात यही
संध्या बेला से यही अपेक्षा.. सपनों का प्रात यही
कि-
काश! बीतते न युग चुप ही चुप रहते,
जीवन को प्यार भरी दृष्टि से निरखते परखते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

ये सार्वभौम सी सच्चाई है
हमने सुनी,
आपके भी हृदय से..
अभी-अभी यही आवाज़ आई है
तिलमिलाती धूप में छाँव को न तरसते!
अगर होते अंतस्तल में बादल, ऐसे में खूब बरसते!!

खुल जाती सारी गांठे.. भावों में बहते बहते
मिल जाते सारे उत्तर.. प्रश्नों को कहते कहते
मौन का संवाद भी खुल जाता तब
सारा दर्द बातों में घुल जाता तब
फिर होती भोर.. हम मस्त पवन सम बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!!

31 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... 28 दिसंबर 2011 को 10:29 am  

आपने कहा हमने ध्यान से सुना ...
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति अनुपमा जी ... ...

Prakash Jain 28 दिसंबर 2011 को 10:31 am  

wah...bahut sundar...


www.poeticprakash.com

Anita 28 दिसंबर 2011 को 10:37 am  

कितनी प्यारी अभिलाषा है और कितने मनुहार से कही गयी है... अस्तित्त्व सुन रहा है...सुन रहा है भीतर वाला भी...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 28 दिसंबर 2011 को 10:48 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Deepak Shukla 28 दिसंबर 2011 को 10:57 am  

बहन जी...

खुद से खुद कि बातों में जो...
बातें निकली लगीं भली...
अगर सभी ऐसा सोचें तो...
दुनिया सत कि राह चली...

स्वप्न सभी पूरे हों सबके...
तो वितृष्णा क्योंकर हो...
मृगतृष्णा सा जीवन सबका...
मिलना खुद से कभी न हो...

सुन्दर भाव...
दीपक शुक्ल...

रश्मि प्रभा... 28 दिसंबर 2011 को 11:31 am  

मैं हूँ न सुनने के लिए ... हवाएँ , घटायें , ख़ामोशी, नमी.... कहो तो सही

दिगम्बर नासवा 28 दिसंबर 2011 को 12:00 pm  

बाहर भटक रहा है मन
तब.., जब विधाता ने सहेज रखे हैं,
सारे मोती अन्दर..
बाहर की यात्रा चल रही है...

बस इंसान ये बात नहीं जान पाता ... बाहर की माया इतनी प्रबल होती है की वो अंदर झाँकने ही नहीं देती इंसान को ... सुन्दर लिखा है ...
आपको वन वर्ष की मंगल कामनाएं ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 28 दिसंबर 2011 को 12:23 pm  

सूर्योदय की बेला में
फैला चहुँ ओर है हर्ष,
उषाकाल के माधुर्य में किसने जाना..?
जीवन में अभावों का चरमोत्कर्ष,

बहुत ही बढ़िया।


सादर

अभिषेक मिश्र 28 दिसंबर 2011 को 1:24 pm  

Sach hai, Koi sunta to Hum bhi Kuch Kahte...

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" 28 दिसंबर 2011 को 1:53 pm  

बहुत
सह लिया
बहुत सुन लिया
जवाब नहीं देता था
चुपचाप रहता था
घुटन में जीता था
अब ना सहता हूँ,
ना सुनता हूँ
केवल लिखता हूँ
स्वच्छंद जीता हूँ
निरंतर मन की
बात कहता हूँ
जवाब कलम से
देता हूँ
जहन में सवाल खड़े
करता हूँ
साफ़ साफ़ पूंछता हूँ
कुछ को आनान्दित
कुछ को व्यथित
करता हूँ
चैन से सोता हूँ
सुकून से जीता
हूँ
10-01-2011

s.chandrasekhar.india 28 दिसंबर 2011 को 3:26 pm  

Anupama ji,
Excellent! Words coming straight from the core of heart, hence:
कुछ शब्द अगर हमारे पास होते तो हम भी कुछ कहते ..
इस सुन्दर रचना को पढ़ नि:शब्द हो गए,
अशेष जो रहे वह स्नेह प्रेषित कर आश्वस्त हो गए ..
With Best wishes & Regards ..

Rakesh Kumar 28 दिसंबर 2011 को 5:19 pm  

खुल जाती सारी गांठे.. भावों में बहते बहते
मिल जाते सारे उत्तर.. प्रश्नों को कहते कहते
मौन का संवाद भी खुल जाता तब
सारा दर्द बातों में घुल जाता तब
फिर होती भोर.. हम मस्त पवन सम बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!!

बेहतरीन,लाजबाब
मनमोहक प्रस्तुति
आभार.

dinesh aggarwal 28 दिसंबर 2011 को 5:42 pm  

कोई सुनता तो हम कहते,
नहीं सुने तो क्यों चुप रहते।
जो सच होता वह कह देना,
न कह पाया तो लिख देना।
पहले हमनें बहुत सहा था,
सोये थे कुछ नहीं कहा था।
चौंसठ साल बाद हम जागे,
अब हम भी आजादी माँगें।
अब तक बस आजाद है संसद,
माँगे अब जनता भी यह हक।

vidya 28 दिसंबर 2011 को 6:34 pm  

very very nice anupama ji...
bahut pyaari kavita.

thanks for the nice post.

abhinav yadav 28 दिसंबर 2011 को 7:11 pm  

nice one

Atul Shrivastava 29 दिसंबर 2011 को 4:02 am  

सुंदर रचना।
गहरी अभिव्‍यक्ति।

नए साल की शुभकामनाएं.....

Reena Maurya 29 दिसंबर 2011 को 9:12 am  

koi man se sune to sunane ko bhi man kare..
bahut hi sundar rachana hai....

Mamta Bajpai 29 दिसंबर 2011 को 9:58 am  

sachche sachche bhaw aabhar
के जिंदगी यूँ ही चलती है
याद आती है तो बात निकलती है
और पुरानी हुई बात भी नई हो जाती है

Mamta Bajpai 29 दिसंबर 2011 को 10:09 am  

कितना अच्छा होता गर भीतर भी टहलने को मचलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!
बहुत सुन्दर विचार मंथन है
नव वर्ष की शुभ कामनाये

दिलबाग विर्क 29 दिसंबर 2011 को 1:09 pm  

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-743:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 29 दिसंबर 2011 को 4:08 pm  

मनमोहक प्रस्तुति...
नव वर्ष की शुभ कामनाये

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 29 दिसंबर 2011 को 5:35 pm  

रोज़ पुनरावृति हो रही,
आगे कहाँ बढ़ते है..
बस एक खम्भा है और बीत रही है जिंदगी,
उसी पर चढ़ते और उतरते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

बाहर भटक रहा है मन
तब.., जब विधाता ने सहेज रखे हैं,
सारे मोती अन्दर..
बाहर की यात्रा चल रही है.. चले,
कितना अच्छा होता गर भीतर भी टहलने को मचलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!
..main to sirf itna hee kahoong kee is rachna kee tarif ke liye mere paas shabd nahi hain..behtarin behtarin

vikram7 29 दिसंबर 2011 को 6:33 pm  

लगता है जैसे
रोज़ पुनरावृति हो रही,
आगे कहाँ बढ़ते है..
बस एक खम्भा है और बीत रही है जिंदगी,
उसी पर चढ़ते और उतरते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!
अति सुंदर रचना

vikram7: आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें.....

मन के - मनके 30 दिसंबर 2011 को 3:33 pm  

आपको पढते गए और बहते गए,कभी-कभी हम अपने से इतने दूर हो जाते है कि अपने पास आना भी मुश्किल लगता है—कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते,काशः

sushma 'आहुति' 30 दिसंबर 2011 को 4:09 pm  

बेहतरीन........आपको नववर्ष की शुभकामनायें

vandana 31 दिसंबर 2011 को 2:09 am  

अपने आप से ही
परे जाकर,
लम्बी यात्रा के बाद..
अपनी ही आत्मा संग,
कुछ देर बहते!

bahut sundar kaha aapne aur sunne ke liye bloggers kii chupal hai na aap to bas yun hi kahti rahiye

Jogendra Singh 31 दिसंबर 2011 को 6:55 pm  

▬● अनु , अच्छा लगा आपकी पोस्ट को देखकर... यह पेज देखकर और भी अच्छा लगा... काफी मेहनत की गयी है इसमें...
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर आपके लिए सपरिवार शुभकामनायें...

मेरे ब्लॉग्स की तरफ भी आयें तो मुझे बेहद खुशी होगी...
[1] Gaane Anjaane | A Music Library (Bhoole Din, Bisri Yaaden..)
[2] Meri Lekhani, Mere Vichar..
.

प्रेम सरोवर 1 जनवरी 2012 को 8:54 am  

आपके पोस्ट पर आना अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । धन्यवाद ।

rafat 1 जनवरी 2012 को 3:42 pm  

मुद्दतें हो गई चुप रहते /कोई सुनता तो हम भी कहते -किसी का शेर नज़र इस सुदर रचना पर

Anand Dwivedi 10 जनवरी 2012 को 12:29 pm  

अपने आप से ही
परे जाकर,
लम्बी यात्रा के बाद..
अपनी ही आत्मा संग,
कुछ देर बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!
.........
ये बहना और ये कुछ देर टहलना ..स्थायी कब होगा ? उफ्फ फिर प्रश्न ..पहले इन प्रश्नों से तो पीछा छूटे !

प्रफुल्ल कोलख्यान 18 सितंबर 2013 को 8:07 am  

एक मासूम-सी चाहत है,....... जो कविता में उतर आई है...

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