सफ़र की धूल

हो न हो
सफ़र की धूल ही
आँखों का सुकून है


जीवन
अहर्निश चलते चलने की
कोई अनाम धुन है.


3 टिप्पणियाँ:

शिवम् मिश्रा 18 मई 2019 को 4:46 pm बजे  

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 18/05/2019 की बुलेटिन, " मजबूत इरादों वाली अरुणा शानबाग जी को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

मन की वीणा 19 मई 2019 को 2:06 pm बजे  

वाह गजब।

संजय भास्‍कर 20 मई 2019 को 9:31 am बजे  

बेहद ख़ूबसूरत और प्रेरक

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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