सब समय की बात है

कई बार
कई-कई दिन कुछ नहीं लिखा जाता


उठते-गिरते हुए भी तो
कितनी बार कुछ नहीं सीखा जाता


कई-कई दिन उदास गुज़र जाते हैं
तब कहीं से कोई ज्योत टिमटिमाती है
फिर बुझ जाती है


उगते-डूबते
दिन निकलता है


ढल जाता है


कभी बड़ी महत्वपूर्ण रही कोई बात
फिर कोई मायने नहीं रखती


ऐसा भी पल आता है!

3 टिप्पणियाँ:

Onkar 19 मई 2019 को 6:19 am बजे  

वाह, बहुत सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 19 मई 2019 को 12:39 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (20-05-2019) को "चलो केदार-बदरी" (चर्चा अंक- 3341) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Swarajya karun 20 मई 2019 को 2:16 pm बजे  

हॄदय की गहराइयों से निकली भावनाओं की सराहनीय अभिव्यक्ति । हार्दिक आभार ।

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