थमा हुआ प्रवाह














दृश्य थम जाते हैं 


जल का ठोस हो जाना
गति को
पुनः परिभाषित करता है 


कि
बर्फ़ीली सतह के नीचे भी
जीवन पूर्ववत साँस ले रहा होता है. 


सागर का विस्तार है
लहरें नहीं हैं 


लहरों का शोर नहीं है 


जीवन है. 






4 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 11 जनवरी 2018 को 11:52 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-01-2018) को "कुहरा चारों ओर" (चर्चा अंक-2846) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

VIJAY KUMAR VERMA 24 जनवरी 2018 को 7:07 pm बजे  

वाह
बहुत सुन्दर

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 23 जनवरी 2019 को 4:11 am बजे  

सागर का विस्तार है
लहरें नहीं हैं
लहरों का शोर नहीं है
जीवन है.
बहुत ही सुंदर लिखा है आपने । हैरान हूँ कि अब तक मै इसे पढ क्यूँ नही पाया। बहुत-बहुत बधाई आदरणीय अनुपमा जी।

'एकलव्य' 27 जनवरी 2019 को 4:09 pm बजे  

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