सन्नाटा सा पसरा है

ज़िन्दगी से
उठापटक जारी है
साँस लेना भी
जैसे भारी है


संशयों के झुरमुट में
लम्हें बीत रहे हैं
हम बूँद-बूँद
पात्र से रीत रहे हैं 


अपना आप ही
खुद से खो रहा है
आँखें निस्तेज़ बेसुध पड़ी हैं
मन फूट-फूट कर रो रहा है 


शोर भरे जीवन में
सन्नाटा सा पसरा है
संवाद बचे नहीं किसकी ओर देखें
अब बस अपना ही आसरा है 


जो ओझल हो गयी
वो ज्योत हमारा सर्वस्व थी
ओझल हो मन-प्राण अँधेरा कर गयी 


इस रीतेपन में कैसे
अपना बिखराव समेटें
एकाकी मन को वह गमगीन बयार और अकेला कर गयी !

5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 27 मई 2019 को 8:13 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-05-2019) को "प्रतिपल उठती-गिरती साँसें" (चर्चा अंक- 3349) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 28 मई 2019 को 6:01 am बजे  

मन का संजीवन द्वीप तो सदा साथ है..

अनीता सैनी 29 मई 2019 को 2:30 am बजे  

बेहतरीन सृजन सखी
सादर

Anuradha chauhan 29 मई 2019 को 10:34 am बजे  

बहुत सुंदर रचना

मन की वीणा 1 जून 2019 को 1:10 pm बजे  

बहुत सुंदर सृजन निराशा वादी है पर काव्यात्मक पहलू बहुत दृढ़। रीते पात्र में आशा का मधु रस भरो ।

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