ये बुलबुले...!

ये बुलबुले...


बस क्षण भर का अस्तित्व...


मुस्कानें...
बस पल भर में अंतर्ध्यान...


देती हुई स्थान...
विराट व्यथा को...


शायद यही सही भी हो...


कि...
अजब है यह संसार...


यहाँ औरों को खुश देख
मुरझा जाते हैं लोग... ... ...


दिखावे की दुनिया है...
झूठे हैं हम...


तभी तो बुलबुले फूट जाते हैं...


सतरंगी आभा फैलाते हैं...
और अगले ही क्षण हमसे रूठ जाते हैं... ... ... !!


14 टिप्पणियाँ:

Jeevan Pushp 15 जुलाई 2015 को 12:30 pm बजे  

सचमुच मुस्कान और बुलबुले एक जैसे होते है !
बहुत सुन्दर !
आभार !

Maheshwari kaneri 15 जुलाई 2015 को 2:10 pm बजे  

बहुत सुन्दर रचना...अनुपमा जी

डॉ. दिलबागसिंह विर्क 15 जुलाई 2015 को 2:43 pm बजे  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 16 - 07 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2038 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Anupama Tripathi 15 जुलाई 2015 को 4:22 pm बजे  

गहन हृदयस्पर्शी भाव !!बहुत सुंदर रचना !!

Asha Lata Saxena 16 जुलाई 2015 को 3:20 am बजे  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति |सुन्दर तुलना मुस्कान और बुलबुले में |

Khatti mithee 16 जुलाई 2015 को 4:57 am बजे  

Bahut hi sunder rachna .

Harash Mahajan 16 जुलाई 2015 को 8:02 am बजे  

अति सुंदर !1

सु-मन (Suman Kapoor) 16 जुलाई 2015 को 9:27 am बजे  

बहुत बढ़िया

Rahul... 17 जुलाई 2015 को 4:26 am बजे  

दिखावे की दुनिया है...
झूठे हैं हम...

तभी तो बुलबुले फूट जाते हैं...
यही सच है और इसी के साथ जीना है। बढ़िया भाव।

VIJAY KUMAR VERMA 17 जुलाई 2015 को 9:04 am बजे  

wah....

रचना दीक्षित 19 जुलाई 2015 को 8:55 am बजे  

शायद आप ठीक ही कह रही है कि बुलबुले और जिंदगी में भी एक साम्य है.

Onkar 19 जुलाई 2015 को 1:35 pm बजे  

बहुत सुन्दर रचना

Smart Indian 21 जुलाई 2015 को 5:45 am बजे  

सब माया है।

संजय भास्‍कर 29 जुलाई 2015 को 2:53 pm बजे  

यही सच है और इसी के साथ जीना है। बढ़िया भाव।

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