अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उलझन सुलझन की दुविधा में...

कहते हो-
जीवन उलझा हुआ है...


जीवन ही क्या?
सृष्टि में कहाँ कुछ भी
सुलझा हुआ है...!


एक जगह सुलझती है
तो फिर कहीं उलझ जाती है...


गांठें कहाँ कभी खुल पाती हैं...


अन्यान्य धागों की भीड़ में
उलझन सुलझन की दुविधा में
ज़िन्दगी निकल जाती है...


समय नहीं रुका है
नहीं रुकेगा...


हो सके तो
इन्हीं व्यस्तताओं के बीच
कभी अवकाश निकालो...

आओ बैठो


उलझी बातें
सुलझायेंगे... 


मौन ही मौन
हम मौन की
महिमा गायेंगे...!!

6 टिप्पणियाँ:

Anita 31 जुलाई 2015 को 9:55 am  

उलझन भरे अनेक पलों में बन कर आता है सुलझन
नाम तुम्हारा अधरों पर तो मिट जाती सारी उलझन

मौन ही तो नाम है तुम्हारा..

Rahul... 1 अगस्त 2015 को 4:23 am  

समय नहीं रुका है
नहीं रुकेगा...
complete words......

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 1 अगस्त 2015 को 3:08 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-08-2015) को "आशाएँ विश्वास जगाती" {चर्चा अंक-2055} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ई. प्रदीप कुमार साहनी 2 अगस्त 2015 को 8:23 am  

भावपूर्ण रचना ।

राजीव उपाध्याय 3 अगस्त 2015 को 10:53 am  

मौन ही मौन
हम मौन की
महिमा गायेंगे...!!
बहुत ही सुन्दर पक्तियाँ। मौन शायद यूँ करके ही है।
स्वयं शून्य

Anupama Tripathi 3 अगस्त 2015 को 1:45 pm  

समझ के चलना है ....बस और क्या है ज़िन्दगी ....!! बहुत सुंदर लिखा है अनुपमा !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
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इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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