अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कैसे तुझको पाएं...???


तुमने हमें विवेक तो दिया
पर विवशता भी दी


हमारी विवशता है...
हम जीवन के मोह पाश से
उबर नहीं पाते हैं...


हम आगत विगत की
परिक्रमाओं का
आजीवन बोझ उठाते हैं...


छूटता नहीं दुःख
दूर से स्वप्न सम निहारता है सुख 


आस विश्वास तिरोहित
भीतर कोलाहल समाहित 


ऐसे में
कैसे तुझ तक आयें


सच्चिदानंद प्रभु! दुखी जीव हम सारे
कहो, कैसे तुझको पाएं...???


11 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 1 जुलाई 2015 को 3:09 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 2 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2024 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Jitendra tayal 1 जुलाई 2015 को 3:57 pm  

sundar
shaandaar

Kavita Rawat 2 जुलाई 2015 को 9:11 am  

चिंतनशील रचना
तभी तो संत कबीर कह गए- माया महा ठगनी हम जानी।। तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरे बानी।

सु-मन (Suman Kapoor) 2 जुलाई 2015 को 1:26 pm  

बहुत सुंदर

रश्मि शर्मा 2 जुलाई 2015 को 5:35 pm  

बहुत बढ़ि‍या रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 2 जुलाई 2015 को 5:55 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-07-2015) को "जब बारिश आए तो..." (चर्चा अंक- 2025) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Tushar Rastogi 4 जुलाई 2015 को 9:13 am  

सुन्दर रचना

Onkar 5 जुलाई 2015 को 3:57 am  

बहुत सुन्दर

Mukesh Kumar Sinha 10 जुलाई 2015 को 9:58 am  

बेहतरीन.........

Rahul... 17 जुलाई 2015 को 4:32 am  

जीवन के मोहपाश से मुक्ति का मार्ग ही हमें वहां ले जाता है. सहज सरल बातों में समाहित है जीवन का सौंदर्य।

VIJAY KUMAR VERMA 17 जुलाई 2015 को 12:34 pm  

बहुत सुन्दर

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