अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

'कलाम'... आपको सलाम...!!

३ मार्च २००६... वो एक विशेष दिन था... पूरा परिसर जैसे सिमट कर उस आसमान के नीचे समा गया था जिसके तले खड़े होकर हमें राष्ट्रपति को सुनने का सुअवसर मिलने वाला था... 
दुर्भाग्यवश अन्यान्य कारणों से हम नहीं प्रत्यक्ष सुन पाए थे उन्हें उस दिन और केन्द्रीय पुस्तकालय में अकेले बैठे रोज़ की तरह अपना दिन प्रारंभ कर रहे थे... पर ये कोई सामान्य दिन नहीं था... काशी की धरती पर प्रेरणाश्रोत कलाम साहब की उपस्थिति इस दिन को विशेष बना रही थी...
हमें आज भी स्पष्ट याद है वो चमकती आखें, वो बुलंद हौसले, वो अपरिमेय ख़ुशी जो हर उस चेहरे से झलक रही थी जो उन्हें सुन कर लौटा था...! ऐसा उत्साह... ऐसी उर्जा का संचार विरले ही होता है...! हर एक के पास कहानी थी... हर एक के पास अपने प्रेरणापूंज के विषय में कहने को कितना कुछ था... हमें आभास ही नहीं हुआ कि हमने कुछ खोया है... इतने लोगों से जो सुनने का अवसर मिला उस कथित भाषण को...; कितने वक़्त तक वो कुछ घंटे चर्चा का विषय रहे, वो कुछ घंटे... जब डॉक्टर कलाम उपस्थित थे हमारे विश्वविद्यालय परिसर में!
आज भी वही सन्नाटा महसूस कर पा रहे हैं जो उस दिन उस परिसर में महसूस किया था... उनकी उपस्थिति का सन्नाटा था वो... और आज यह उनकी अनुपस्थिति का सन्नाटा है... वो खालीपन जो नहीं भरेगा कभी...!
हमारे हृदय में प्रेरणा बनकर जीवित रहेंगे सदा वे और यह प्रेरणा ही हमें सपनों को पूरा करने का हौसला भी देगी...!
" उठा धरा से, बढ़ा, गगन आकाश बन गया 
धरा देखती रही... पुत्र इतिहास बन गया ! "

3 टिप्पणियाँ:

Tushar Rastogi 28 जुलाई 2015 को 9:24 am  

श्रद्धांजलि और नमन

Sound of Silence 28 जुलाई 2015 को 12:14 pm  

नम आँखों से नमन ...

संजय भास्‍कर 29 जुलाई 2015 को 2:54 pm  

श्रद्धांजलि और नमन

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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