अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एकाकी मन और बूँदें...!!

भींगे हम...
भींगा मन...
दोनों ही थे नम...


वो अकेला क्यूँ भींगता...?
उसके साथ हो गए हम...


बूंदों की थिरकन पर
मचल उठा अकेलापन...


दोनों ही फिर जम कर भींगे 


एक मेरा छाता और एक हम...!


बूँदें...
एकाकीपन...
और जीवन...


क्या साम्य है इनमें...?
क्यूँ इस जोड़ घटाओ में पड़ते हम...


बस भींगते रहे बूंदों संग
घुलता रहा कतरा कतरा उदास मन...


दोनों  ही फिर जम कर भींगे 


एक मेरी ज़िन्दगी और एक हम...! 




7 टिप्पणियाँ:

Anita 29 जुलाई 2015 को 11:32 am  

छाता लगा कर भीगना भी कोई भीगना है..

अनुपमा पाठक 29 जुलाई 2015 को 12:39 pm  

छाता हाथों में था साथ...
और हम थे गगन तले... छतरी के तले नहीं...

इस तरह हम दोनों भींगे... छतरी भी और हम भी...!
क्या जाने ये भीगना भी भीगना हो या नहीं...

Dilbag Virk 29 जुलाई 2015 को 4:52 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 30-07-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2052 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Digvijay Agrawal 29 जुलाई 2015 को 5:33 pm  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 31 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Sound of Silence 30 जुलाई 2015 को 3:51 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rajeev Upadhyay 31 जुलाई 2015 को 9:57 am  

बहुत ही सुन्दर भाव है आपकी कविता में।
स्वयं शून्य

Reena Maurya 2 अगस्त 2015 को 12:34 pm  

सुन्दर भावपूर्ण ..

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