अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक ही समय पर दोनों बात होती है!

लिख जाने पर सुकून मिलता है, कह जाने पर मन हल्का हो जाता है लेकिन एक वो भी बिंदु है जब इतना उद्विग्न होता है मन कि न लिखा जाता है न कुछ कह पाने की ही सम्भावना बनती है... बस महसूस हो सकती है हवा की तरह... कुछ उदासियाँ ऐसी भी होती हैं!


कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है,
एक ओर दिन खड़ा रहता है
सकुचाया सा...
और रात भी साथ होती है! 


दिन के पास ढ़ेरों काम हैं
रात अपनी है...
खुद अपने पास होने के ढ़ेरों पल देती है,
जीवन की पटरी पर
कोई जतन से लौट आये मन की रेल...
ये रात ही है जो हमें आने वाला कल देती है! 


वो जो एक चाँद है वहाँ पर
उसने नाव सा आकार लिया हुआ है...
कुछ क्षण में बादलों की लहर में ओझल हो जाएगा,
जाने किस राह पर है किस ठौर जाना है उसे
हमें पता है बीतते वक़्त के साथ...
उसके प्रति ये अनन्यता का भाव और प्रबल हो जाएगा! 


जो जोड़ती है डोर कहीं से
उसको देखने की जिद्द जाने देते हैं...
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!

दिन जब नहीं होता साथ, रात साथ होती है!

21 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय 28 सितंबर 2013 को 5:40 am  

सह लेता था, कहता हूँ अब,
तथ्यों की पीड़ा मर्मान्तक।

Ashok Saluja 28 सितंबर 2013 को 6:18 am  

एक ही समय पर दोनों बातें होती है और मन दोनों को नकार कर उदासी को
ओड़ लेता है ...? मन की थाह न जाने कोय ...
शुभकामनायें!

Anupama Tripathi 28 सितंबर 2013 को 6:28 am  

एक ओर दिन खड़ा रहता है
सकुचाया सा...
और रात भी साथ होती है!

संधिप्रकाश राग सा ....दिन और रात का ये संगम अत्यंत हृदयस्पर्शी बन पड़ा है .....!!

Darshan jangra 28 सितंबर 2013 को 9:58 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार - 29/09/2013 को
क्या बदला?
- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः25
पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


Kaushal Lal 28 सितंबर 2013 को 11:35 am  

कुछ-कुछ भूलने के प्रयास में बहुत कुछ याद आता है,
ये वाकई पीड़ा है जब ज्ञात अज्ञात होता है……… सुन्दर कविता .......

संध्या शर्मा 28 सितंबर 2013 को 11:55 am  

तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
मन की पीड़ा मन ही जाने...

डॉ. मोनिका शर्मा 28 सितंबर 2013 को 1:24 pm  

मर्मस्पर्शी हैं ये मन के भाव...बहुत सुंदर

ajay yadav 28 सितंबर 2013 को 3:20 pm  

बहुत खूब

निहार रंजन 28 सितंबर 2013 को 6:16 pm  

रात की बात ही यही है. एक चाँद, एक मन. स्वयं से तर्क,स्वयं से वितर्क.और उसी जद्दोजहद में पल बीतता, हो जाता सवेरा . सुन्दर रचना.

ई. प्रदीप कुमार साहनी 28 सितंबर 2013 को 9:19 pm  

दिन जब नहीं होता साथ, रात साथ होती है!
सुंदर भाव |

मेरी नई रचना :- जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 29 सितंबर 2013 को 2:53 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (29-09-2013) तुकबन्दी: चर्चामंच - 1383 में "मयंक का कोना" पर भी है!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद 29 सितंबर 2013 को 5:24 am  

तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!
जिनदगी में विरोधाभास है
नई पोस्ट अनुभूति : नई रौशनी !
नई पोस्ट साधू या शैतान

Yashwant Yash 29 सितंबर 2013 को 5:44 am  

बहुत ही बढ़िया


सादर

kavita verma 29 सितंबर 2013 को 9:32 am  

ये रात ही है जो हमें आने वाला कल देती है! sundar prastuti ..

राजीव कुमार झा 29 सितंबर 2013 को 1:22 pm  

मन के भाव ,मर्मस्पर्शी .
नई पोस्ट : भारतीय संस्कृति और कमल

Yashwant Yash 29 सितंबर 2013 को 5:31 pm  

कल 30/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Madhuresh 30 सितंबर 2013 को 1:57 am  

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति अनुपमा दीदी। गहन और दार्शनिक स्पर्श देती हुई रचना है.
मुझे खासकर ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं। :-

जो जोड़ती है डोर कहीं से
उसको देखने की जिद्द जाने देते हैं...
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!

सादर,
मधुरेश

दिगम्बर नासवा 30 सितंबर 2013 को 9:21 am  

उदासियाँ तो अक्सर ऐसी ही होती हैं ... न कहा जाता है ओर बिन कहे रहा भी नहीं जाता ...
गहरा एहसास लिए भावौक रचना ...

Maheshwari kaneri 30 सितंबर 2013 को 2:35 pm  

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ..

Kailash Sharma 30 सितंबर 2013 को 4:58 pm  

बहुत सुन्दर और गहन चिंतन...

sushma 'आहुति' 1 अक्तूबर 2013 को 2:51 pm  

खुबसूरत अभिवयक्ति......

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