लिख जाने पर सुकून मिलता है, कह जाने पर मन हल्का हो जाता है लेकिन एक वो भी बिंदु है जब इतना उद्विग्न होता है मन कि न लिखा जाता है न कुछ कह पाने की ही सम्भावना बनती है... बस महसूस हो सकती है हवा की तरह... कुछ उदासियाँ ऐसी भी होती हैं!
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है,
एक ओर दिन खड़ा रहता है
सकुचाया सा...
और रात भी साथ होती है!
दिन के पास ढ़ेरों काम हैं
रात अपनी है...
खुद अपने पास होने के ढ़ेरों पल देती है,
जीवन की पटरी पर
कोई जतन से लौट आये मन की रेल...
ये रात ही है जो हमें आने वाला कल देती है!
वो जो एक चाँद है वहाँ पर
उसने नाव सा आकार लिया हुआ है...
कुछ क्षण में बादलों की लहर में ओझल हो जाएगा,
जाने किस राह पर है किस ठौर जाना है उसे
हमें पता है बीतते वक़्त के साथ...
उसके प्रति ये अनन्यता का भाव और प्रबल हो जाएगा!
जो जोड़ती है डोर कहीं से
उसको देखने की जिद्द जाने देते हैं...
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!
दिन जब नहीं होता साथ, रात साथ होती है!
20 टिप्पणियाँ:
सह लेता था, कहता हूँ अब,
तथ्यों की पीड़ा मर्मान्तक।
एक ही समय पर दोनों बातें होती है और मन दोनों को नकार कर उदासी को
ओड़ लेता है ...? मन की थाह न जाने कोय ...
शुभकामनायें!
एक ओर दिन खड़ा रहता है
सकुचाया सा...
और रात भी साथ होती है!
संधिप्रकाश राग सा ....दिन और रात का ये संगम अत्यंत हृदयस्पर्शी बन पड़ा है .....!!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार - 29/09/2013 को
क्या बदला?
- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः25 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra
कुछ-कुछ भूलने के प्रयास में बहुत कुछ याद आता है,
ये वाकई पीड़ा है जब ज्ञात अज्ञात होता है……… सुन्दर कविता .......
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
मन की पीड़ा मन ही जाने...
मर्मस्पर्शी हैं ये मन के भाव...बहुत सुंदर
बहुत खूब
रात की बात ही यही है. एक चाँद, एक मन. स्वयं से तर्क,स्वयं से वितर्क.और उसी जद्दोजहद में पल बीतता, हो जाता सवेरा . सुन्दर रचना.
दिन जब नहीं होता साथ, रात साथ होती है!
सुंदर भाव |
मेरी नई रचना :- जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (29-09-2013) तुकबन्दी: चर्चामंच - 1383 में "मयंक का कोना" पर भी है!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!
जिनदगी में विरोधाभास है
नई पोस्ट अनुभूति : नई रौशनी !
नई पोस्ट साधू या शैतान
बहुत ही बढ़िया
सादर
ये रात ही है जो हमें आने वाला कल देती है! sundar prastuti ..
मन के भाव ,मर्मस्पर्शी .
नई पोस्ट : भारतीय संस्कृति और कमल
कल 30/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति अनुपमा दीदी। गहन और दार्शनिक स्पर्श देती हुई रचना है.
मुझे खासकर ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं। :-
जो जोड़ती है डोर कहीं से
उसको देखने की जिद्द जाने देते हैं...
तर्क-वितर्क की यहीं तो मात होती है,
कारण ज्ञात भी होता है
और अज्ञात भी...
एक ही समय पर दोनों बात होती है!
सादर,
मधुरेश
उदासियाँ तो अक्सर ऐसी ही होती हैं ... न कहा जाता है ओर बिन कहे रहा भी नहीं जाता ...
गहरा एहसास लिए भावौक रचना ...
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ..
बहुत सुन्दर और गहन चिंतन...
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