अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तितली उड़ रही है बेपरवाह!

जीवन एक लम्बा रस्ता है, अनेकानेक संकेतों से युक्त एक ऐसी राह जिसपर चलते हुए हम अपनी अभीष्ट मंजिल तक आसानी से पहुँच सकते हैं, बस मार्ग में मिल रहे संकेतों को ठीक से पढ़ना है! अब संकेत तो संकेत होते हैं, उनके गूढ़ कथ्य को समझने का धैर्य होना चाहिए राही के पास. प्रकृति संकेतों में ही तो बात करती है हमसे, जिसने बूझ ली उसकी भाषा उसे आनंद ही आनंद कि मंजिल का पता तो हमेशा संकेतों में ही मिलता है!
ये लिखते हुए, तस्वीरें छाँटते हुए, हम देख रहे थे कि अम्बर झाँक रहा है हमारी खिड़की से भीतर…
कुछ समय पहले ही तो तारे थे  अम्बर पर, अभी अभी बादलों के ऊपर थोड़ी सी नारंगी रोशनी बिखरी, पंछियों का झुंड यहाँ से वहाँ करता हुआ दिखा और अभी इस क्षण देखते हैं तो उजले काले का कोई मिलाजुला रूप धरे अम्बर बादल की चादर ओढ़े सो रहा है, आँख लग गई है उसकी शायद! पल पल बदलते रूप का वर्णन असंभव है, अभी एक सिरा पकड़ते हैं कि पूरा रूप ही परिवर्तित…  ये आसमान बिलकुल मन जैसा है, छवि इसकी घड़ी  भर भी तो स्थिर नहीं रहती!
मन का आकाश भी तो यूँ ही सुख दुःख के बादलों से आच्छादित होता है… और अम्बर की ओर उड़ते आस विश्वास के खग से आबाद! सब संकेत ही हैं, बरस जाने वाले बादल भी, बूंदों का मिट जाना भी, और उन्हीं बूंदों से पुनः बादलों का सृजन भी. सब करते हैं इंगित एकमात्र जीवन की ओर. मिटते हुए भी जो होता है मेघ के होठों पर, वह जीवनगीत ही तो होता है! 
इस पथ पर चलते हुए जीवन जैसे साथ चल रहा था, मृत्यु की नीरवता में कैसे छोड़ देता हमें वो अकेला!
बाहें फैलाये सबका स्वागत है! मौत तू भी प्रतीक्षित ही है, ये बाहें तुम्हारे लिए भी खुली हुई हैं, जब आओगी, स्वागत है! कुछ ऐसा ही तो कह रही है यह आकृति. जीवन इस तरह जिया गया हो कि कोई संकोच न हो, आये जिस घड़ी मौत गले लगा ले, उसका स्वागत है. एक उज्जवल जीवन के मुख पर ही मौत का स्वागत करते हुए शांति का भाव परिलक्षित हो सकता है, वरना अधिकांशतः तो रोते-धोते, घसीटते, 'न जाने' की जिद करते हुए ही हम मौत की ओर बढ़ते हैं! स्कूल न जाने की जिद कितनी भी कर ले कोई, अभिभावक भेज ही देते हैं बहला फुसला कर! वैसे ही तो न जाने की कोई जिद काम नहीं आती, नियति ले ही जाती है बहला कर. जब जाना ही है, फिर क्या! मौत का ख्याल हर क्षण रहे तो जीवन संयत हो जाएगा. क्षणिकता का बोध रहे तो जाने-अनजाने हो रहे कितने ही पाप करने से हम बच जायेंगे… संचय का मोह नहीं रहेगा और संचय की मंशा से किये गए समस्त तिकड़म से भी हम निजात पा जायेंगे जीवन रहते ही.… नहीं?

यह है नोर्रा कपेल्लेत जिसका निर्माण वर्ष १९०९ में हुआ. इस ईमारत के डिज़ाइनर थे गुस्ताव लिन्द्ग्रेन,  इस ईमारत का निर्माण १८८७ में निर्मित स्वीडन के पहले श्मशान के स्थान पर नोर्रा बेग्राव्निंगप्लात्सेन में किया गया. यहाँ दाह संस्कार की सुविधा उपलब्द्ध थी. १९३१ तक स्टॉक होम क्षेत्र में इस सुविधा से युक्त यह एकमात्र श्मशान था! १९८९ में श्मशान बंद कर दिया गया और अब इस ईमारत को उत्तरी चैपल के नाम से जाना जाता है. प्रार्थनास्थल के रूप में प्रयुक्त यह ईमारत बारोक शैली में बनायी गयी है! गगनचुम्बी गुम्बद और ताज मानों प्रार्थना के स्वर किसी दूसरी दुनिया तक पहुँचाने को उद्धत खड़े है और खड़े रहेंगे दिगदिगंत तक!
जिस रस्ते गए थे उसी रस्ते से बाहर निकल आये, बाहर पास के क्षेत्र में भी वही निर्जनता थी. जंगल है, पेड़ हैं, घास है, एक खाली बेंच है और उड़ती भागती कुछ एक तितलियाँ! तितलियों में उमंग है जीवन के प्रति… भले ही वो नियति के समक्ष उतनी ही असहाय और निरुपाय है जितने कि हम हैं. उसने अपने मसले जाने की चिंता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है तभी तो वो उड़ रही है बेपरवाह! उन बेपरवाह तितलियों के रंग नहीं कैद हो पाए क्लीक में, होते भी कैसे? रंग तो महसूस करने की चीज़ है… उमंग तो जीने की चीज़ है, उसे देखा या छुआ कहाँ जा सकता है! 
***
इस कब्रगाह में स्वीडन की महान हस्तियाँ विश्रामरत हैं. नोबेल पुरस्कार के प्रणेता अल्फ्रेड नोबेल की कब्र से हो कर गुजरते हुए सिटी हॉल पर लिखे गए आलेख याद हो आये, अभी एक कड़ी लिखनी शेष ही है, वह लिख जाए फिर नोबेल पुरष्कारों के प्रणेता के विषय में भी विस्तार से लिखेंगे… 
अभी याद हो आई है तो अल्फ्रेड नोबल से सम्बंधित नोबेल पुरष्कार के प्रारंभ की दिलचस्प कहानी लिख जाते हैं यहीं::
हुआ यूँ कि १८८८ में कान का दौरा करते वक़्त अल्फ्रेड के भाई लुडविग की मृत्यु हो गयी और एक फ़्रांसिसी अखबार ने गलती से अल्फ्रेड की निधन सूचना प्रकाशित कर दी. अखबार ने डायनामाइट के आविष्कार के लिए नोबेल की निंदा की थी. कहते हैं इस निंदा ने ही नोबेल को मृत्युपरांत एक बेहतर विरासत छोड़ने के लिए प्रेरित किया जिसके फलस्वरूप नोबेल पुरष्कारों की स्थापना हुई! अखबार ने लिखा था- Le marchand de la mort est mort ("The merchant of death is dead") और यह भी कि "Dr. Alfred Nobel, who became rich by finding ways to kill more people faster than ever before, died yesterday."
अल्फ्रेड यह पढ़कर अत्यंत निराश हुए और चिन्तित हो उठे कि क्या यूँ याद रखा जायेगा उन्हें? तत्क्षण ही जीवन रहते कुछ ठोस कर जाने का शुभ संकल्प उदित हुआ उनके मन में और २७ नवम्बर १८९५ को उन्होंने  स्वीडिश नार्वेजियन क्लब में अपने अंतिम विल पर हस्ताक्षर किये और अपनी चल-अचल संपत्ति का मुख्य हिस्सा नोबेल प्राइज की स्थापना हेतु दे दिया. बिना किसी राष्ट्रीयता के भेदभाव के दिए जाने वाला यह पुरष्कार नोबेल को सचमुच नोबल बना गया. 
अखबार में छपी एक गलत खबर ने एहसास करा दिए उसे जीवन के मायने, जब मृत्युपरांत इतनी निंदा  ही होनी है तो क्या है जीवन का हासिल? क्या है समृद्धि का मोल? इन्हीं मूलभूत प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए अल्फ्रेड ने तो जीवन के बाद जीने का एक रास्ता खोज लिया. 
समय रहते हम सबको यह एहसास हो, जैसे याद किये जाने की तमन्ना है, वैसा ही जीवन जियें हम!

15 टिप्पणियाँ:

कालीपद प्रसाद 22 सितंबर 2013 को 3:42 pm  

बहुत सुन्दर चित्र के साथ ज्ञानवर्धक प्रस्तुति !
Latest post हे निराकार!
latest post कानून और दंड

निहार रंजन 22 सितंबर 2013 को 3:50 pm  

आपकी पोस्ट से नयी जानकारियाँ मिलती रही है. बिना श्रम के इतिहास का ज्ञान हो जाता है. सुन्दर पोस्ट.

Darshan jangra 22 सितंबर 2013 को 4:49 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार - 23/09/2013 को
जंगली बेल सी बढती है बेटियां , - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः22 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra





Yashwant Yash 23 सितंबर 2013 को 4:48 am  

नोर्रा कपेल्लेत के बारे मे जानकार बहुत अच्छा लगा।
आपका संस्मरण सिर्फ संस्मरण ही नहीं बल्कि जानकारियों का खजाना होता है।


सादर

Amrita Tanmay 23 सितंबर 2013 को 6:53 am  

जीवन को सुन्दर रास्ता दिखाया है..

rafat alam 23 सितंबर 2013 को 8:26 am  

अल्फ्रेड नोबेल जी के बारे में रोचक जानकारी मिली ......तितलियों में उमंग है जीवन के प्रति… भले ही वो नियति के समक्ष उतनी ही असहाय और निरुपाय है जितने कि हम हैं. उसने अपने मसले जाने की चिंता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है तभी तो वो उड़ रही है बेपरवाह......क्या ही अच्छा लिखा है आपने ...हाँ तितली २ पल में हमारे आगे रंगों का नूर बिखेर जाति है जिसकी तलाश मैं अक्सर हम बेरग जीवन गुज़ार जाते हैं ..बेहतरीन पोस्ट

डॉ. मोनिका शर्मा 23 सितंबर 2013 को 9:05 am  

अच्छी जानकार के साथ ही सुंदर अर्थपूर्ण आव्हान ...आभार

Anita 23 सितंबर 2013 को 10:08 am  

समय रहते हम सबको यह एहसास हो, जैसे याद किये जाने की तमन्ना है, वैसा ही जीवन जियें हम!

बहुत सुंदर बोध देती पोस्ट !

Rajesh Kumari 23 सितंबर 2013 को 6:53 pm  

आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आप का वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

abhi 24 सितंबर 2013 को 10:32 am  

ये आसमान बिलकुल मन जैसा है, छवि इसकी घड़ी भर भी तो स्थिर नहीं रहती! Loved this post!

Anupama Tripathi 24 सितंबर 2013 को 12:10 pm  

ये लिखते हुए, तस्वीरें छाँटते हुए, हम देख रहे थे कि अम्बर झाँक रहा है हमारी खिड़की से भीतर…
सुंदर और सुखद वर्णन....

Pallavi saxena 24 सितंबर 2013 को 6:14 pm  

एक नए नज़रिये को दर्शा रहा है आपका यह संस्मरण आभार ...

Manjula Saxena 25 सितंबर 2013 को 8:32 am  

जीवंत चित्रण साधुवाद अनुपमाजी

richa shukla 29 सितंबर 2013 को 6:47 am  

अच्छी जानकारी के साथ जीवन की सुंदर प्रतुति...
prathamprayaas.blogspot.in-

दिगम्बर नासवा 30 सितंबर 2013 को 9:22 am  

संस्मरण में भी संवेदनशीलता आपक खूबी है ... फोटो लाजवाब हैं सभी ...

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कुछ बातें अनूठी है!
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मेरे आँगन में...
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