अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

साथ ही हैं...!

कश्तियाँ
जब लग रहीं हों किनारे
तब मझधार को याद कर
नहीं शोक मनाना...


हमें भूल जाना...


ज़िन्दगी जब मुस्कुरा रही हो
गीत सुहाने गा रही हो
साथ गाते जाना...


जीवन का गीत सुहाना...


जब कभी
दुःख की बदरी छाये
तुम्हें कोई नज़र न आये
बस नज़रें झुकाना
वहीँ हमें साथ खड़ा पाना... 


हमें भूल न जाना...


कुछ यूँ रखना
सहेज कर हमें 

जैसे,
आसमान की आँखों में
रहती है धूप...
धरती की नमी का एहसास ही
धरता है सहज स्वरुप...
और बिखर आती हैं किरणें
नमी को सोखने... 


जो नमी है
तो है--
खिली धूप का होना भी...
जीवन पाना है
तो जीवन है खोना भी... 


हँसना... साथ तुम्हारे दुनिया हँसेगी 


कहीं न कोई
गम हो...
कभी न आँख तुम्हारी
नम हो...


किसी मोड़ पर
जो गलती से नम हो जाए...
तुम्हें अनायास
रोने का मन हो जाए...


तो भी--
तुम कभी अकेले मत रोना...
अत्यावश्यक है
थोड़ी सी धूप का साथ तेरे होना...


देखना,
साथ ही होंगे...!


बस यूँ ही
याद दिला रहे हैं
हमारा काम है याद दिलाना...
साथ ही हैं...
देखो, भूल न जाना...!

18 टिप्पणियाँ:

Mukesh Pandey 13 जनवरी 2014 को 4:24 pm  

बहुत सुन्दर मैम...:)

संजय भास्‍कर 14 जनवरी 2014 को 7:09 am  

bahut khub...great!!!

राजेंद्र कुमार 14 जनवरी 2014 को 8:07 am  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Digvijay Agrawal 14 जनवरी 2014 को 9:21 am  

आपकी लिखी रचना बुधवार 15/01/2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

काजल कुमार Kajal Kumar 14 जनवरी 2014 को 3:35 pm  

किसी मोड़ पर
जो गलती से नम हो जाए...
तुम्हें अनायास
रोने का मन हो जाए..


वाह

Shekhar Suman 14 जनवरी 2014 को 3:52 pm  

भूलना आसान नहीं होता... कुछ लोगों के लिए तो बिलकुल भी नहीं.... दरअसल भूलने और याद रखने के गलियारे के बीच की सतह इतनी रुखड़ी होती है कि सब कुछ फंसा रह जाता है....
उम्मीद हैं कोई न भूले कुछ भी....

निहार रंजन 15 जनवरी 2014 को 4:45 am  

जब कभी
दुःख की बदरी छाये
तुम्हें कोई नज़र न आये
बस नज़रें झुकाना
वहीँ हमें साथ खड़ा पाना...


जो अपने होते हैं वो सच में कभी पृथक नहीं हो पाते हैं. सुन्दर कविता.

Yashwant Yash 15 जनवरी 2014 को 6:13 am  

जो नमी है
तो है--
खिली धूप का होना भी...
जीवन पाना है
तो जीवन है खोना भी...

खास अच्छी लगीं यह पंक्तियाँ।

सादर

रश्मि प्रभा... 15 जनवरी 2014 को 8:51 am  

कश्तियाँ
जब लग रहीं हों किनारे
तब मझधार को याद कर
नहीं शोक मनाना...

हमें भूल जाना...

किनारे जाकर भूल जाऊँ
कश्ती से उतर जाऊँ किनारे
सुख का ये नज़ारा दुःख में तुम्हें याद करे - नाइंसाफी होगी

Ankur Jain 15 जनवरी 2014 को 11:28 am  

सुंदर प्रस्तुति के लिये आभार आपका....

Mukesh 16 जनवरी 2014 को 10:25 am  

नेह और आत्मीयता के इस अनमोल धागे के एक सिरे को पकड़े...
ह्रदय को द्रवित करती...
समृद्ध करती...
रचना आपकी...

लिखती रहें आप सदा...

शुभकामनायें ...

प्रवीण पाण्डेय 19 जनवरी 2014 को 6:45 am  

हँसते, खेलें, नाचे, गायें,
जीवन का आनन्द मनायें।

Anju (Anu) Chaudhary 20 जनवरी 2014 को 1:48 pm  

खूबसूरत रचना

Anita 21 जनवरी 2014 को 9:29 am  

बहुत नेक सलाह..अनुपमा जी आपकी पंक्तियों को कोई निचोड़े तो उसमें से अनगिनत कतरे टपक जायेंगे..

Onkar 26 जनवरी 2014 को 7:00 am  

सुन्दर रचना

Anupama Tripathi 29 जनवरी 2014 को 8:21 pm  

साथ ही हैं...
देखो, भूल न जाना...!

सुंदर रचना ....अब हम याद दिला रहे हैं कुछ तो लिखिए अनुपमा ...आपके शब्दों के बिना सूना लगता है ...!!

rafat alam 19 मार्च 2014 को 5:03 pm  

तुम्हें जाते हुए देख हैं आँखें नम...
आस इतना ही पूछ रही है...
फिर मिलेंगे न हम...?....................बहुत आसानी के साथ दिल में उतरती कविता ....याद आयाया कभी पढ़ा हुआ गुड बाय इस नेसेसरी बेफोर वे मीत अगैन.

गीता पंडित 11 अप्रैल 2014 को 4:08 pm  

फिर मिलेंगे हम...
फिर मिलेंगे हम..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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