अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अजाने फ़लक की तलाश में!

ज़िन्दगी ने
मुझे
अपना कहा...
फिर,
कुछ यूँ हुआ
वो मुझसे रूठ गयी...


अब हर क्षण
गुज़रता है विह्वल
तड़पते हुए...
सागर, अम्बर और
छू कर गुजरने वाली हवा से
उलझनें कहते हुए...


उससे
बात नहीं होती...
मैं अपने साथ हो कर भी
अपने साथ नहीं होती...


व्याकुल मन की
बेचैनियां
मन के फ़लक से कहीं अधिक
विस्तृत हो जाती हैं...
अजाने फ़लक की तलाश में
वही बेचैनियाँ
फिर अनगढ़ कविताओं का
अनछुआ वृत हो जाती हैं...


और मैं
एक विस्मृत बिंदु-
जिसे ज़िन्दगी ने
कभी अपना कहा था...!

16 टिप्पणियाँ:

Anita 2 जनवरी 2014 को 9:27 am  

यही विह्वलता...तो प्रेम है..और जिन्दगी प्रेम से भला रूठी है कभी..

Anupama Tripathi 2 जनवरी 2014 को 10:55 am  

विस्मृति से उमड़ती विहव्लता का शब्दों में सुंदर वर्णन ...प्रेम की पराकाष्ठा बता रहा है ....सच कहा अनीता जी ... जिन्दगी प्रेम से भला रूठी है कभी..!!बहुत सुंदर रचना अनुपमा ....नववर्ष की मंगलकामनाएं .....

Neeraj Kumar 2 जनवरी 2014 को 11:25 am  

व्याकुल मन की
बेचैनियां
मन के फ़लक से कहीं अधिक
विस्तृत हो जाती हैं...
अजाने फ़लक की तलाश में
वही बेचैनियाँ
फिर अनगढ़ कविताओं का
अनछुआ वृत हो जाती हैं...
बहुत सुन्दर, अभिव्यक्ति ..

सुशील कुमार जोशी 2 जनवरी 2014 को 2:47 pm  

सुंदर !
नववर्ष शुभ हो मंगलमय हो !

ऋता शेखर मधु 3 जनवरी 2014 को 4:54 am  

जिन्दगी रूठ जाए तो काम ही न चले अनुपमा...बस कभी कभी किनारे बैठ कर तमाशा देखती है मनुष्य की बेबसी काः)

Mukesh 3 जनवरी 2014 को 11:41 am  

ज़िन्दगी फिर वैसी नहीं होती
एक खारा मौन
बुझता मन
यंत्रवत जीवन

फिर भी
रह जाती है
एक सुगन्धि
गहरा मन
समृद्ध मौन
बेहतर जीवन

राजीव कुमार झा 3 जनवरी 2014 को 12:58 pm  

बहुत सुंदर.

राजीव कुमार झा 3 जनवरी 2014 को 1:02 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (4-1-2014) "क्यों मौन मानवता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1482 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

रश्मि प्रभा... 3 जनवरी 2014 को 3:58 pm  

व्याकुलता में निष्प्राण जीवन हाथ पैर मारता है
आत्मा शरीर की हरकतों के इंतज़ार में होती है

डॉ. जेन्नी शबनम 3 जनवरी 2014 को 4:04 pm  

ज़िंदगी जब रूठ जाती है तो कुछ यूँ ही... अतीत के निशाँ... बहुत सुन्दर.

Anju (Anu) Chaudhary 3 जनवरी 2014 को 5:16 pm  

व्याकुल मन की व्यथा

कालीपद प्रसाद 4 जनवरी 2014 को 5:24 am  

बेचैन मन की वृत्तियाँ अनेक है ,केंद्र विन्दु एक है ..सुन्दर प्रस्तुति !
नया वर्ष २०१४ मंगलमय हो |सुख ,शांति ,स्वास्थ्यकर हो |कल्याणकारी हो |
नई पोस्ट विचित्र प्रकृति
नई पोस्ट नया वर्ष !

Digvijay Agrawal 4 जनवरी 2014 को 7:56 am  

रुला दिया न

sushma 'आहुति' 4 जनवरी 2014 को 10:32 am  

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

Onkar 4 जनवरी 2014 को 2:40 pm  

सुन्दर रचना

Amrita Tanmay 11 जनवरी 2014 को 7:15 am  

बस बेचैनियाँ;

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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