अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

समय की शिला पर...!


मुरझाते हुए
खिलते हुए...


कोहरों में
मिलते हुए...
कोहरे से ही
निकलते हुए...
अजानी राहों के
राही हम... 



जुदा डगर पर
चलते हुए...
सपनों की तरह
नयनों में पलते हुए...
एक अरसे बाद
मिले हम...



दोनों की ही आँखें नम... 



ये अब हुआ शुरू
और...
और पलक झपकते ही
हो गया समापन
कहते हैं,
है चार दिन का जीवन 



तो...
इस गणित से तो
बीत ही चुका है न
लम्बा समय,
बीत ही चुके हैं
आधे हम... 



अब
जो आधे-अधूरे बचे हैं
वह न अपरिचय के अँधेरे में
जाए बीत... 



हे कविते! हे जीवन!
थाम लेने दे अपना दामन
कि समय की शिला पर
रच जाए कोई
सतत सम्भावनाओं का गीत...! 

14 टिप्पणियाँ:

Kaushal Lal 7 जनवरी 2014 को 2:51 am  

हे कविते! हे जीवन!
थाम लेने दे अपना दामन
कि समय की शिला पर
रच जाए कोई
सतत सम्भावनाओं का गीत...! .....बहुत सुन्दर ......

प्रवीण पाण्डेय 7 जनवरी 2014 को 3:35 am  

समय की शिला पर बस श्रम और लगन अंकित होती है।

ऋता शेखर मधु 7 जनवरी 2014 को 6:47 am  

समय कभी व्यर्थ न गँवाना...रच जाएगा गीत सुहाना

देवेन्द्र पाण्डेय 7 जनवरी 2014 को 9:55 am  

मुद्दतों के बाद हम मिलने लगे
संभावना के फूल भी खिलने लगे।

Maheshwari kaneri 7 जनवरी 2014 को 4:47 pm  

बहुत ही सुन्दर रचना..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7 जनवरी 2014 को 5:31 pm  

पूरी कविता पढने के बाद जो नया अर्थ सामने आया वह सचमुच बहुत प्यारा है.. हाथ उठाकर इसी दुआ में ख़ुद भी शामिल हो जाने को जी चाहता है!!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8 जनवरी 2014 को 1:19 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (08-01-2014) को "दिल का पैगाम " (चर्चा मंच:अंक 1486) पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 8 जनवरी 2014 को 6:49 am  

रचा ही जा रहा है हर पल कोई गीत सुहाना समय की शिला पर...हमें उसे पढ़ना है और उतारना है अपनी अनगढ़ सी लिखावट में...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 8 जनवरी 2014 को 8:13 am  

वाह जी वाह

Yashwant Yash 8 जनवरी 2014 को 9:32 am  

कल 09/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' 8 जनवरी 2014 को 2:27 pm  

भावो का सुन्दर समायोजन......

काजल कुमार Kajal Kumar 9 जनवरी 2014 को 5:46 am  

सम्भावना सा तो कुछ भी नहीं

Kailash Sharma 9 जनवरी 2014 को 4:38 pm  

जुदा डगर पर
चलते हुए...
सपनों की तरह
नयनों में पलते हुए...
एक अरसे बाद
मिले हम...
....लाज़वाब...बहुत उत्कृष्ट रचना....

Amrita Tanmay 11 जनवरी 2014 को 7:13 am  

आमीन!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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