अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

साथ चलें...!

चलो ऐसा करें
साथ चलें...


इन हवाओं में बिखरे
जो संदेशें हैं,
उन्हें
एक एक कर बांचें...

और उनसे जुड़ते चले जाएँ...


चलो ऐसा करें
शाम ढले...


ढलते सूरज को
एकटक देखें,
गढ़ें
मन ही मन सुकून...

और उसमें डूबते चले जाएँ...


चलो ऐसा करें
साथ चलें...


कोहरे में जो उदासी है
उसमें कतरा कतरा सिमटते हुए,
समेटें
वहीँ से ख़ुशी का कोई राग...


और उससे जुड़ते चले जाएँ...


कि
जुड़ना
हमारी नियति है...
सहज प्रकृति है...
ज़िन्दगी! तू हर बार जीतती है...
तू हमेशा ही जीती है
तेरी मुझसे... मेरी तुझसे
अनन्य प्रीती है...!

15 टिप्पणियाँ:

Ideal thinker 13 जनवरी 2014 को 5:44 am  

bina saath cale chalega hi nahi!!

Anupama Tripathi 13 जनवरी 2014 को 6:42 am  

वाह जैसे मेरे ही मन के भाव ....!!जुड़ना सहज प्रकृती है ,हमारी नियति है ,यही अनन्य प्रीति ही तो जोड़ती है ...!!
सुंदर सहज हृदय के उद्गार ...!!
बहुत सुंदर रचना अनुपमा ।

संजय भास्‍कर 13 जनवरी 2014 को 9:19 am  

वाह बहुत ही खूबसूरत |

Mukesh Pandey 13 जनवरी 2014 को 10:17 am  

बहुत उम्दा बहुत सुन्दर मैम :)

राजेंद्र कुमार 13 जनवरी 2014 को 10:19 am  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,लोहड़ी कि हार्दिक शुभकामनाएँ।

कालीपद प्रसाद 13 जनवरी 2014 को 10:32 am  

बहुत सुन्दर
मकर संक्रांति की शुभकामनाएं !
नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
नई पोस्ट लघु कथा

Kaushal Lal 13 जनवरी 2014 को 10:39 am  

सहज सुंदर हृदय के उद्गार ......

रश्मि प्रभा... 13 जनवरी 2014 को 10:50 am  

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/01/blog-post_13.html

मिश्रा राहुल 13 जनवरी 2014 को 3:02 pm  

काफी उम्दा प्रस्तुति.....
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (14-01-2014) को "मकर संक्रांति...मंगलवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1492" पर भी रहेगी...!!!
- मिश्रा राहुल

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 13 जनवरी 2014 को 4:08 pm  

ज़िन्दगी! तू हर बार जीतती है...
तू हमेशा ही जीती है
तेरी मुझसे... मेरी तुझसे
अनन्य प्रीती है...!

शानदार,सुंदर प्रस्तुति...!

RECENT POST -: कुसुम-काय कामिनी दृगों में,

आशा जोगळेकर 14 जनवरी 2014 को 3:19 pm  

सचमुच बहुत मन हो रहा है ऐसा ही कुछ करने को। बहुत खूबसूरत रचना।

Mukesh 16 जनवरी 2014 को 10:34 am  

नियति और प्रकृति की...
जुड़ाव की कड़ियाँ...
ढूंढते...
दिखाते...
पिरोते...
सहेजते...

अत्यंत प्रीतिकर रचना...

बधाई...

Anita 21 जनवरी 2014 को 9:34 am  

जिन्दगी से जो करे प्यार ...आती है उसके जीवन में बहार !

rafat alam 19 मार्च 2014 को 5:07 pm  

तुम कभी अकेले मत रोना...
अत्यावश्यक है
थोड़ी सी धूप का साथ तेरे होना...

देखना,
साथ ही होंगे...!.....सुंदर अभिव्यक्ति ,बेहतरीन अहसास.अब्दुल हमीद अदम याद आये ...याद एक ज़ख्म बन गयी वरना/भूल जाने का कुछ ख्याल तो था.

Amit Harsh 24 मई 2014 को 1:08 pm  

~ सुंदर प्रस्तुति ~

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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