जीवन, यात्रा और हम

कभी राह में
छूट गये
कभी उसे छोड़ दिया


जीवन को
'यात्रा' नाम दिया
और अनिश्चितताओं से जोड़ दिया


चलते रहे जो अनवरत
उठते-गिरते, गिरते-उठते
राहों ने खुद-बखुद कभी यूं भी सुखद मोड़ लिया


पड़ाव के मोह से बन्धता तो था मन
पर बढ़ना ही था आगे, सो हमने
बिंधे मन को पड़ाव के मोह पाश से तोड़ लिया


कभी राह में छूट गए कभी उसे छोड़ दिया
जीवन को यात्रा नाम दिया और अनिश्चितताओं से जोड़ दिया !!

2 टिप्पणियाँ:

ब्लॉग बुलेटिन 5 सितंबर 2017 को 7:24 pm बजे  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ - शिक्षक दिवस की ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

दिगम्बर नासवा 6 सितंबर 2017 को 3:47 am बजे  

आने वाला पल भी तो अनिश्चित हाई तो है ... शायद ज़िंदगी यही माँगती है ...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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