शायद...!

कई बार ऐसा होता है
हम आते हैं किसी दरवाज़े तक
और बिना दस्तक दिए 

लौट जाते हैं 


इस आस में
कि हमारी आहट को ही
दस्तक सा पहचान
खुल जाये दरवाज़ा...!


शायद ऐसे ही कई बार
आती है कविता 


ज़रूर ऐसे ही कई बार
आई होगी कविता...


और लौट गयी होगी 


कि उसकी आहट से
अनजान रहे हम
दूर रही हमसे
हमारी ही कलम...! 


12 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा 15 मार्च 2015 को 1:39 pm बजे  

होता है .. मन से कई बार बाहर नहीं आ पाती कविता ...
बहुत खूब ...

रश्मि प्रभा... 16 मार्च 2015 को 9:10 am बजे  

हम उम्मीद पालते हैं, उम्मीदों को समझते नहीं …

Anita 16 मार्च 2015 को 11:39 am बजे  

बहुत दिनों बाद आपकी सी कविता पढ़कर अच्छा लग रहा है

Anupama Tripathi 18 मार्च 2015 को 5:01 am बजे  

Welcome back likhati rahiye man ke bhav behte rahenge

Unknown 2 अप्रैल 2015 को 5:51 pm बजे  

लंबे समय बाद अनुशील के पट खुलना सुखद लग रहा है...बिल्कूल सही लिखा अनु....उम्मीद परिवर्तन की परछाई होती है....अब कविता सिरहाने आकर फिर बैठेगी...फिर लय में शब्द गुथ जायेंगे..कलम एकाकार हो चल पड़ेगी...ये हमलोगों की उम्मीदें है...

Dr.NISHA MAHARANA 2 अप्रैल 2015 को 6:08 pm बजे  

Sahi bat..

अशोक सलूजा 3 अप्रैल 2015 को 6:14 am बजे  

मैंने अनुपमा के आने के आहट भी सुन ली और उसकी कविता भी .....दोनों ही दिल को सुकून देती हैं ....
स्वस्थ रहें ......

Saurabh 3 अप्रैल 2015 को 9:33 am बजे  

दस्तक हुई .. दरवाज़ा खुला .. !
"सब कुशल मंगल न ?"

अनुपमा पाठक 3 अप्रैल 2015 को 12:34 pm बजे  

सौरभ जी, प्रणाम! सब कुशल है आपके आशीर्वाद से...!

अनुपमा पाठक 3 अप्रैल 2015 को 12:34 pm बजे  

प्रणाम अशोक जी, आपका आशीर्वाद बना रहे हमेशा...!

प्रियंका गुप्ता 3 अप्रैल 2015 को 7:16 pm बजे  

बहुत सही लिखा है आपने...आप सच में बहुत दिन बाद दिखी, पर बहुत सुखद पुनरागमन हुआ आपका...|
सुन्दर कविता...

Shekhar Suman 4 अप्रैल 2015 को 6:38 am बजे  

आपको दोबारा देख कर अच्छा लगा... :)

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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