अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चलते जाना...!

तो...
तय हुआ
चलते चलेंगे 


किसी ठोकर पर 

नहीं रुकेंगे... 


राह ख़त्म होती दिखेगी
हताश भी होगा मन 


पर चलते चलेंगे हम... 


वहीँ किसी मोड़ पर 

मिलेंगे अवश्य 

नयी राह के निशां... 


कि... 

अंतहीन हैं राहें,
और हमारे पास 

एक ही विकल्प है- 


चलते जाना...!!  

8 टिप्पणियाँ:

Shalini Rastogi 27 मार्च 2015 को 5:45 pm  

चरैवेति चरैवेति ... सुन्दर सन्देश!

संजय भास्‍कर 28 मार्च 2015 को 3:30 am  

बड़े दिनों की अधीर प्रतीक्षा के बाद आज आपका आगमन हुआ है
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

Onkar 28 मार्च 2015 को 1:41 pm  

प्रेरक रचना

Digamber Naswa 30 मार्च 2015 को 2:20 pm  

यही तो जीवन है ...चलना चलना फिर रुक जाना हमेशा के लिए ...

निहार रंजन 30 मार्च 2015 को 5:47 pm  

हाँ यही तो सकरात्मक सोच है.

Ashok Saluja 31 मार्च 2015 को 6:52 am  

वहीँ किसी मोड़ पर
मिलेंगे अवश्य
नयी राह के निशां... पर चलते ..चलेंगे हम .......शुभकामनायें |

Yashwant Yash 4 अप्रैल 2015 को 12:15 pm  

चलते जाना ....जीवन पथ पर आगे बढ़ते जाना ही मनुष्य जीवन की पहचान है।
बेहद प्रेरक कविता।

सादर

abhi 6 अप्रैल 2015 को 5:41 am  

Exactly....:)
Lovely poem !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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