एक जीवन यात्रा और उसमें कितनी यात्राएँ

अटक जाती है साँस कभी
कभी जीवन भी अटक जाता है


अटकी हुई बात कोई
घुटन हो  


कंठ में ही नहीं 

रोम-रोम जब रुदन हो  


ऐसे में
बस बेवजह कहीं भटक पाने की
सहूलियत दे ज़िन्दगी 


और इस बेवजह में
कोई वजह निकल आए
यात्रारत चेतना की आँखें सजल हो जाए 


फिर
और क्या चाहिए ही ज़िन्दगी से!


सफ़र हो
लौट आने को डगर हो 


यूँ हो जीवन
यूँ ही जीवन हो!

5 टिप्पणियाँ:

अनीता सैनी 18 जुलाई 2019 को 4:24 am बजे  

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" कल शुक्रवार 19 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Anita 18 जुलाई 2019 को 7:11 am बजे  

वाह ! एक पन्थ दो काज..बेवजह में वजह..यानि कर्म में अकर्म जो देख ले और अकर्म में कर्म...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 18 जुलाई 2019 को 8:11 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (19-07-2019) को "....दूषित परिवेश" (चर्चा अंक- 3401) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 18 जुलाई 2019 को 12:19 pm बजे  

बहुत सुन्दर

kuldeep thakur 19 जुलाई 2019 को 11:59 am बजे  


जय मां हाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
21/07/2019 को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में......
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
https://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद

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