ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था

खाली पाँव 

पैदल चलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 


खो गए पलों को
समय की चट्टानों से
टकराते देखा 


वो लौट आने को विकल थे
बादलों को
गहराते देखा 


मृत्यु के से क्षणों में
जीवन को
परचम सा लहराते देखा 


इन सबके बीच हमें 

दीपक-सा जलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 


बंद थे सब दरवाज़े जब
तब
थे कुछ झरोखे
जिनको अपने दर पर
आस-विश्वास के पूरे कुनबे को
ठहराते देखा


उसकी छवि
जल में तैरती हुई
धारा को
स्निग्ध कर रही थी
आसमान को धरती पर
उतर आते देखा 


शाश्वत होने के
दावे थे
सब के सब
बस छलावे थे
जो आये
सबको जाते देखा 


इन विडम्बनाओं को आत्मसात किये
हमें बर्फ़-सा पिघलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 








6 टिप्पणियाँ:

सदा 23 दिसंबर 2017 को 6:38 am बजे  

ठोकरों के साथ गिरना और सम्भलना एक सीख लेना... सहजता के साथ जीवन का परम सत्य कहती रचना

Parmeshwari Choudhary 24 दिसंबर 2017 को 6:07 am बजे  

बहुत सुन्दर. दिल छूने वाली

Ravindra Singh Yadav 31 दिसंबर 2017 को 4:54 pm बजे  

नमस्ते,
आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
गुरूवार 01-01-2018 को प्रकाशनार्थ 899 वें अंक ( नव वर्ष विशेषांक ) में सम्मिलित की गयी है।
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चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
सधन्यवाद।

Unknown 1 जनवरी 2018 को 1:01 am बजे  

अत्यंत प्रभावशाली रचना.
नव वर्ष की शुभकामनायें.

शुभा 1 जनवरी 2018 को 7:57 am बजे  

बहुत खूब!!नववर्ष की शुभकामनाएं।

Sudha Devrani 1 जनवरी 2018 को 6:45 pm बजे  

बहुत सुन्दर....
नववर्ष की शुभकामनाएं...

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