अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

समंदर सी गहरी है पीड़ा...

पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...


मुट्ठी से
रेत की तरह
फिसलते दिख रहे हैं रिश्ते...


इतना दर्द
कि आंसू सूख जाए...


ऐसी बेचैनी
कि 'जीवन'
जीवन न रह जाए...


सोचा न था 

कि इतना दुरूह भी हो सकता है समय...
इतनी निर्मम भी हो सकती है नियति की क्रीड़ा...


ओह! पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...

1 टिप्पणियाँ:

Anita 18 मई 2017 को 10:38 am  

इन पहाड़ से दुखों को हमने ही रचा था फुर्सत में बैठकर एक दिन और ये गहरे समुन्द्र हमारे ही अश्रुओं से बने हैं, इस जगत में जो भी मिलता है वह एक न एक दिन हमने ही बोया होता है..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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