एक अनदेखा क्षण!

जीवन चलता रहता है
और किसी क्षण चुपके से...
साँसे थम जाती हैं!
मृत्यु की ख़ामोशी में
जिंदगी की उलझनें...
पीछे रह जाती हैं!

केवल यादें छोड़ जाते हैं
जाने वाले
लौट कर नहीं आते हैं
मृत्यु छीन लेती है
जितने भी
जग से रिश्ते नाते हैं

जन्म मृत्यु के क्रम की
जाने है रहस्यमयी सच्चाई क्या...
आखें नम हो जाती हैं!
जीवन चलता रहता है
और किसी क्षण चुपके से...
साँसे थम जाती हैं!

20 टिप्पणियाँ:

Yashwant R. B. Mathur 28 जुलाई 2011 को 4:07 pm बजे  

केवल यादें छोड़ जाते हैं
जाने वाले
लौट कर नहीं आते हैं
मृत्यु छीन लेती है
जितने भी
जग से रिश्ते नाते हैं

बिलकुल सही बात कही है आपने।

सादर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 28 जुलाई 2011 को 6:12 pm बजे  

अच्छी रचना लिखी है आपने!

Rakesh Kumar 28 जुलाई 2011 को 6:28 pm बजे  

केवल यादें छोड़ जाते हैं
जाने वाले
लौट कर नहीं आते हैं
मृत्यु छीन लेती है
जितने भी
जग से रिश्ते नाते हैं

भगवद्गीता के अध्याय १५ में श्लोक १० में लिखा है.

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्जानं वा गुणान्वितम
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:

शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को
अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त
हुए को अज्ञानीजन नहीं जानते , केवल ज्ञानरूप नेत्रवाले विवेकशील
ज्ञानी ही तत्व से जानते हैं.

केवल स्थूल शरीर के नष्ट हो जाने से 'जीव' का मरण नहीं होता.
यादों के माध्यम से वह मस्तिष्क में जीवित रहता है.
जीवित मनुष्य को भी यदि भुला दिया जाये तो वह भी 'मृत' के
समान होजाता है.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

मनोज कुमार 28 जुलाई 2011 को 7:13 pm बजे  

अच्छी लगी यह रचना।

संजय भास्‍कर 28 जुलाई 2011 को 7:19 pm बजे  

वाह कितना सुन्दर लिखा है आपने, बहुत सुन्दर जवाब नहीं इस रचना का........ बहुत खूबसूरत.......

अनामिका की सदायें ...... 28 जुलाई 2011 को 7:59 pm बजे  

yahi shaswat saty hai.
sunder abhivyakti.

Unknown 29 जुलाई 2011 को 4:40 am बजे  

satya ko pusht karti rachna.. aabhar..

Dorothy 29 जुलाई 2011 को 4:43 am बजे  

बेहद खूबसूरती से पिरोई दिल को छू जाने वाली रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 29 जुलाई 2011 को 7:10 am बजे  

गहन बात कहती हुई अच्छी रचना ..

सदा 29 जुलाई 2011 को 7:48 am बजे  

बहुत ही गहन भावों का समावेश है इस अभिव्‍यक्ति में ।

Anita 29 जुलाई 2011 को 10:00 am बजे  

जीवन का सत्य है मृत्यु, लेकिन मृत्यु का सत्य भी है जीवन इसलिये एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता.... सुंदर रचना !

Anupama Tripathi 29 जुलाई 2011 को 7:39 pm बजे  

bahut sunder rachna ...
chupke se hi aati hai mrityu..

Yashwant R. B. Mathur 1 अगस्त 2011 को 7:12 am बजे  

आपकी एक पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

Shekhar Suman 2 अगस्त 2011 को 1:07 pm बजे  

BAHUT KHUBSURAT...

S.N SHUKLA 4 अगस्त 2011 को 5:47 am बजे  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति , सुन्दर भावाभिव्यक्ति

abhi 4 अगस्त 2011 को 11:31 am बजे  

निर्मल वर्मा ने एक कहानी में कहा था की "दूसरों के मरने पर हमें जो दुःख होता है, वह बहुत स्वार्थी किस्म का दुःख है.क्यूंकि हमें लगता है की उनके जाने के साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है....

वाणी गीत 10 अगस्त 2011 को 3:50 am बजे  

जीवन के होने न होने में सिर्फ एक सांस का ही तो फर्क है !

बेनामी 10 अगस्त 2011 को 1:43 pm बजे  

simple hai..par achha hai


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

Yashwant R. B. Mathur 15 अगस्त 2011 को 3:31 pm बजे  

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

सादर

nature7speaks.blogspot.com 19 अगस्त 2011 को 11:56 am बजे  

apne se mukhatib karatee kavita. sunder,bahut sunder. khud ko jankar chalo to sahee---manjil dur naheen

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