चुन लेते
कुछ ख़्वाब कहीं से
हम भी ख़्वाब बो लेते...
गीत छंद की दुनिया में
हम भी किसी कविता की
भूली बिसरी कोई पंक्ति हो लेते...
पर हमें तो
ठोकरों को जीने वाले पाँव
होना था...
कहीं दूर समंदर किनारे बसा
विस्मृत कोई गाँव
होना था...
सो हम वही हुए...
जो थे वही रहे... !!
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (09-08-2017) को "वृक्षारोपण कीजिए" (चर्चा अंक 2691) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 9 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह !!!!!!! कितनी सुंदर एकदम नयी सोच और अभिव्यक्ति!!!!!!!!
जवाब देंहटाएंवाह !! एकदम अलग सी बड़ी सुंदर रचना !!!!!!!
जवाब देंहटाएंउदासी भी सुंदर भावों को उभार देती है । अकेलापन भी खूबसूरत अनुभव है । सरल सहज तरीके से कही गई गहरी अभिव्यक्ति में ही कविता का सौंदर्य है । सादर ।
जवाब देंहटाएंवाह ! ,बेजोड़ पंक्तियाँ ,सुन्दर अभिव्यक्ति ,आभार।
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