मुझ तक नहीं आती है
कभी कोई ढाढ़स की आवाज़
अपना ढाढ़स होने को मुझे ही औरों का ढाढ़स होना पड़ता है
जिस जिस तक मैं पहुँची
वो सब मेरे खुद तक पहुँचने के ही उपक्रम थे
मेरा आसमान
इतना भींगा था कि सूखे का भ्रम होता था
पलकों में मीठी नींदों का सपना सोता था
और मैं जागती रह जाती थी
कि चैन की नींद सो पाऊँ
ऐसा होने में आकाश भर आशंकाएं तैरती थीं
मेरी खुद से अभी आकाश भर की दूरी थी।
-अनुपमा
"लौ दीये की" में संकलित
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बहुत सुंदर कविता, खुद तक पहुँच कर भी खुद से दूरी है कि बनी ही रहती है, यह तलाश उम्र भर चलती ही रहती है
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०७-०४ -२०२२ ) को
'नेह का बिरुआ'(चर्चा अंक-४३९३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ अप्रैल २०२२ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत अच्छी कविता।सादर अभिवादन
जवाब देंहटाएंसुंदर भावप्रवण रचना।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंअरे !! कितने समय बाद तुम्हारे ब्लॉग पर आना हुआ ।
जवाब देंहटाएंमेरा आसमान
इतना भींगा था कि सूखे का भ्रम होता था
पलकों में मीठी नींदों का सपना सोता था
जैसे मेरा ही मन उतार कर रख दिया है ।
पुस्तक के लिए बधाई ।
हमेशा की तरह सुंदर रचना ।
मन का खुद से भावपूर्ण संवाद 👌👌👌🙏🙏
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंमनभावन कविता।
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