6 अप्रैल 2022

दूरी

मुझ तक नहीं आती है
कभी कोई ढाढ़स की आवाज़ 
अपना ढाढ़स होने को मुझे ही औरों का ढाढ़स होना पड़ता है


जिस जिस तक मैं पहुँची
वो सब मेरे खुद तक पहुँचने के ही उपक्रम थे


मेरा आसमान 
इतना भींगा था कि सूखे का भ्रम होता था 
पलकों में मीठी नींदों का सपना सोता था


और मैं जागती रह जाती थी


कि चैन की नींद सो पाऊँ 
ऐसा होने में आकाश भर आशंकाएं तैरती थीं 


मेरी खुद से अभी आकाश भर की दूरी थी।


-अनुपमा

"लौ दीये की" में संकलित

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पुस्तक का लिंक

https://shwetwarna.com/shop/books/lau-diye-ki-anupama/

8447540078 श्वेतवर्णा प्रकाशन के इस नंबर पर संपर्क करके भी पुस्तक मंगायी जा सकती है।




11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर कविता, खुद तक पहुँच कर भी खुद से दूरी है कि बनी ही रहती है, यह तलाश उम्र भर चलती ही रहती है

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०७-०४ -२०२२ ) को
    'नेह का बिरुआ'(चर्चा अंक-४३९३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ अप्रैल २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  4. अरे !! कितने समय बाद तुम्हारे ब्लॉग पर आना हुआ ।


    मेरा आसमान
    इतना भींगा था कि सूखे का भ्रम होता था
    पलकों में मीठी नींदों का सपना सोता था

    जैसे मेरा ही मन उतार कर रख दिया है ।
    पुस्तक के लिए बधाई ।

    हमेशा की तरह सुंदर रचना ।

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  5. मन का खुद से भावपूर्ण संवाद 👌👌👌🙏🙏

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