12 जुलाई 2019

रिश्तों के बियाबान में लहुलूहान चेतना

अभी शोक में हूँ।


हर रिश्ते की एक उम्र होती है
उसके बाद उसका मरना तय है
मैंने ऐसे कई मरे हुए रिश्तों का श्राद्ध किया है 


अभी शोक में हूँ।


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शोक कैसा?!


हर रिश्ता
एक रोज मर ही जाता है
भले कितना ही अनन्य
क्यों न रहा हो


आख़िरी गति
अन्तिम परिणति यही है
अवश्यंभावी का शोक कैसा?!


यह
असमय मर गये रिश्तों का
मातम है।


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यह जीवन है 


जीवन के बाद भी कुछ रिश्ते साँस लेते हैं
ये आभास हो
तो जीवन रहते टूटे रिश्तों का शोक न होगा
कि जो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं 



एक रोज़ हम ही नहीं होने हैं इस संसार में
रिश्ते निभाने को
या रिश्तों से किनारा करने को 


फिर कैसी कड़वाहट?!


जो जब तक चला ठीक था
अब जो खो चुका तो यह भी ठीक है


निश्चित रूप से एक दिन खो जाने वाले जीवन में
किसी भी टूटन-बिखरन के लिए
संताप की कहीं कोई जगह होने की गुंजाइश ही नहीं है


नहीं होनी चाहिए!




10 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14 -07-2019) को "ज़ालिमों से पुकार मत करना" (चर्चा अंक- 3396) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ....
    अनीता सैनी

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  2. एक दिन हम भी खो जाने वाले हैं...जीवन की असलियत यही है..सच्ची समझदारी भी इसी में है कि कोई संताप भीतर न रहे..

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 17 जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. सारगर्भित संवेदनशील प्रस्तुति।

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  5. जो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं ! :(

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