रिश्तों के बियाबान में लहुलूहान चेतना
अभी शोक में हूँ।
हर रिश्ते की एक उम्र होती है
उसके बाद उसका मरना तय है
मैंने ऐसे कई मरे हुए रिश्तों का श्राद्ध किया है
अभी शोक में हूँ।
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शोक कैसा?!
हर रिश्ता
एक रोज मर ही जाता है
भले कितना ही अनन्य
क्यों न रहा हो
आख़िरी गति
अन्तिम परिणति यही है
अवश्यंभावी का शोक कैसा?!
यह
असमय मर गये रिश्तों का
मातम है।
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यह जीवन है
जीवन के बाद भी कुछ रिश्ते साँस लेते हैं
ये आभास हो
तो जीवन रहते टूटे रिश्तों का शोक न होगा
कि जो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं
एक रोज़ हम ही नहीं होने हैं इस संसार में
रिश्ते निभाने को
या रिश्तों से किनारा करने को
फिर कैसी कड़वाहट?!
जो जब तक चला ठीक था
अब जो खो चुका तो यह भी ठीक है
निश्चित रूप से एक दिन खो जाने वाले जीवन में
किसी भी टूटन-बिखरन के लिए
संताप की कहीं कोई जगह होने की गुंजाइश ही नहीं है
नहीं होनी चाहिए!
जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14 -07-2019) को "ज़ालिमों से पुकार मत करना" (चर्चा अंक- 3396) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
....
अनीता सैनी
एक दिन हम भी खो जाने वाले हैं...जीवन की असलियत यही है..सच्ची समझदारी भी इसी में है कि कोई संताप भीतर न रहे..
जवाब देंहटाएंबेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंसारगर्भित रचना
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत संवेदनशील ।
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जवाब देंहटाएंजी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना 17 जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
झकझोंर देती है आपकी लेखनी
जवाब देंहटाएंसारगर्भित संवेदनशील प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंजो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं ! :(
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