अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अनकहा सा कुछ

जो कहे जाने से रह गयीं
वे बातें अनमोल हैं   


अनकही रहीं
बचा रहा उनका आत्मिक स्पंदन 


उच्चरित होते ही शायद
गुम जाता अर्थ
कहीं कोलाहल में !


ठीक ही है
बहुत कुछ अनकहा रहना
आखर-आखर भावों को तहना 


कि किसी रोज़ मिलेंगे बिछड़े हुए रस्ते 

हो जायेगा सब अभिव्यक्त फिर आँखों के खारे जल में !
















6 टिप्पणियाँ:

Anita 27 अप्रैल 2017 को 11:45 am  

अनकहा अब कहा जायेगा..बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा हर्ष हुआ

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 29 अप्रैल 2017 को 7:51 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
"आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

सुनीता 30 अप्रैल 2017 को 4:43 pm  

bahut dino baad dikhi aap anupama .achhaa laga

Onkar 7 मई 2017 को 1:28 pm  

बहुत बढ़िया

रश्मि प्रभा... 14 मई 2017 को 11:10 am  

मिलेंगे, पूछेंगे हाल
अच्छा लगा तुमको देखकर
बहुत ढूँढा मैंने तुमको

Anupama Tripathi 17 मई 2017 को 10:43 am  

सुखद लगता है आपको पढ़ना !! लिखती रहें !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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