अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम्हारे प्रताप से... !!

आस की नैया
बहुत चली है तूफ़ानों में
ये अब है कि थकी हारी बैठी है...


सुस्ता ले कुछ पल
क्या पता फिर से चल पड़ेगी 


ये सहज होता जाता है...
नाव का किनारों से भी कोई तो नाता है... 


हो सकता है ऐसा भी...
होता ही है--
कुछ देर के लिए,
जीवन नेपथ्य में चला जाता है...
कभी कभी मंचाशीन होती हैं,
केवल अनेकानेक यंत्रणायें...


जीवन को उन्हें झेलना ही होता है
उद्विग्न लहरों से खेलना ही होता है 


ऐसी विपरीत परिस्थितयों से
जब हारे होते हैं...
तब हम बस
तुम्हारे सहारे होते हैं...


तुम उबार लाते हो...
बिखरे टुकड़ों को पुनः सजाते हो...


पटरी पर ले आते हो मन...
फिर स्वयं हो जाते हो जीवन...


तुम्हारी करुणा का जल
जो हुआ प्रवाहित अंतस्तल में...
आस की नैया चल पड़ी फिर
उस पावन जल में...


दूर क्षितिज तक जाएगी...
तुम्हारे प्रताप से... !! 


सात वर्ष हुए, हमने शुरू किया था साथ चलना... !!

वैसे ये
बहुत पहले की
बात नहीं है
पर
अब लगता है
एक युग बीत गया है...


अनेकानेक
पलों को
संग जीते हुए भी
लगता है जैसे
हर क्षण
संगीत नया है...


कोई भी इम्तहान हो
कैसा भी जीवन का
घमाशान हो
जीत लेंगे हर मुश्किल
कि हमारे सारे सपने साझे हैं
और तुम्हारी आँखों में असीम करुणा धैर्य प्रीत दया है...


साथ रहे बस
तो शून्य से शुरू कर भी
नाप लेंगे क्षितिज
क्या हुआ जो
भरा हुआ पात्र हमारा
बूँद दर बूँद रीत गया है...


यात्रारत है जीवन
पूरी दुनिया
देखनी है संग
सपनों का ये मनभावन रंग
अभी अभी देखो
सभी अंधेरों से जीत गया है...


तो चलें...
लग जाएँ दौड़ती हुई राहों के गले... !!


वो अपने ही साये थे... !!

इंसानों की बस्ती
पूरी की पूरी खाली थी...
उस जमी हुई भीड़ में
सब पराये थे...


आज वो
सब अजनबी थे...
कल जिनके अपनेपन पर
हम भरमाये थे...



काँप गया मन
जिन आहटों से...
देखा तो जाना
वो अपने ही साये थे...



मोड़ आ गया
चलते चलते...
बादल
बेतहाशा छाये थे...



भींगे हुए थे भीतर से आकंठ
और क्या भींगते
उस अनमनी सी बारिश में...
इससे पहले की बरसता आकाश
हम अपनी छत के नीचे
लौट आये थे... !!

उस एकांत में... !!

वो एक पुल था
आंसुओं से निर्मित
उस से होकर
पहुंचा जा सकता था
उन प्रांतरों तक...


जहाँ तक पहुंचाना
किसी ठोस स्थूलता के
वश की बात नहीं... !


सूक्ष्म एहसासों तक
पहुँचते हुए
हम पीछे रह जाते हैं...
वहां पहुँचते हैं वही सार तत्व
जो रूह के
हिस्से आते हैं...


उस एकांत में
हर पहचान धुंधली है...
हमने मौन
आँखें मूँद ली है... !!


है नमी तो नहीं कोई कमी... !!

त्याग कैसे दे कोई
जीवन रहते
जीवन को...
आंसू बहते हैं
और समझा लेते हैं
मन को...


आँखों के भर आने से
कितना कुछ
धुल जाता है...
अनगिन बातों का बाँध
अनायास
खुल जाता है...


अब
बारिश के बाद की
इन्द्रधनुषी नीरवता है...
सब ठीक है
कि नमी है जब तक
तब तक कायम जीवन की सुन्दरता है... !!





तुम तक... !!

सजल आँखों से जलाया
देहरी पर एक दीप...


मन का आँगन
लिया पहले ही था लीप...


बड़े स्नेह से बुला रहे हैं
ज़िन्दगी ! आओ न समीप...


हम भी तुम तक ही तो आ रहे हैं
चुनते हुए भावों के मोती सीप... !! 


जीवन ठिठका खड़ा है... !!

इन दिनों कुछ भी ठीक नहीं है...


विदा हो चुके पत्ते
अपने पीछे, पेड़ को, सिसकता तड़पता छोड़ गए हैं...


शीत लहर चलने लगी है...
ठिठुरन है माहौल में...


जीवन ठिठका खड़ा है...
अनहोनियों की आशंकाएं हवा में तैर रही हैं...


ये कैसा समय है... ??
मूलभूत इंसानी जज़्बात
अपनी प्रामाणिकता खो चुके हैं... ?!!


जिसपर टिकी हुई थी दुनिया
विश्वास जैसे शब्द
अब जैसे बीते दिन की बात हो चुके हैं... ?!!


ऐसे में जीवित हैं हम,
यही क्या कम है... !

फिर भी, संभावनाओं का आकाश, रीता नहीं है
कि आँखें अभी भी नम हैं... !!


कितना कुछ
कहते कहते रुक जाते हैं...
निराश माहौल में भी, ज़रा कविता में चलिए
आस विश्वास की ओर झुक जाते हैं...


और पूरी प्रतिबद्धता से कहते हैं--


कि...
ये क्षण भर की बात है...
परिवेश बदलेगा...


"कुछ भी ठीक नहीं है" कहना ठीक नहीं...
चलो कहते हैं--
हमारे साझे प्रयास से, जीवन सूर्य, अंधेरों से निकलेगा... !!



दूरियां मात्र आभास हैं... !!


मैंने अपने शहर की बारिश भेजी
तस्वीर में उतार कर
उसने उसे अपने शहर की बारिश सा पहचाना 


मैंने चाँद भेजा
अपने हिस्से के आकाश का
वही चाँद उसके यहाँ भी चमकता है उसके हिस्से के आकाश पर... 


मैंने उगता दिनमान भी भेजा
वो भी उसके यहाँ के सूरज सा ही था...
बल्कि वही था...


एक सी ही बूँदें हैं जो भिंगोती है हमें
एक ही वो सूरज है जिसे अर्घ्य देते हैं हम अपने अपने हिस्से की धरती से
एक ही है वो चाँद जिसपे नज़रें टिकाये आकाश का विस्तार निहारा करते हैं हम 


उसका मन उदास होता है
यहाँ पूरा हृदयाकाश बादलों से आच्छादित हताश होता है


अनायास नम हो जाता है हृदयतल
बूंदों ने कल भी भिंगोया था आज भी हैं भींगे हुए ही पल 


दूरियां
मात्र आभास हैं...
  

एक ही सिक्के के दो पहलू-- "सुख-दुःख" जैसे आपस में सगे हैं
वैसे ही, उतने ही हम भी सगे हैं, पास पास हैं... !!

जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!


आँखों में कुछ नहीं था...
सपने टूटे हुए थे...
गड़ते थे...


कितनी सुन्दर व्यवस्था की है प्रकृति ने...
आँसूओं में घुल गए सारे टुकड़े
बह गए...


आँखें अब खाली थीं...
किसी भी आशा किसी भी सपने से कहीं दूर
निस्तेज स्पन्दनहीन...


लगता था...


शायद अब नहीं उगेगी भोर
नहीं बसेगा वहां सपना कोई और 


फिर
एक क्षण ऐसा आया...
चमत्कृत हुई आँखें
सपनों को अनायास वहां पलता पाया...


उन्हें जाने कौन बो गया था...
जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!


आत्मसंवाद... ?!!


लेखनी!
जो लिखो तो...
बूंदें लिखना...
आँख का पानी लिखना...


और लिख कर
उस लिखे से मुक्त हो जाना...
हुनर ये पेड़ों से सीखना
क्या होता है जीवन कहलाना... !!


कभी निकलना निर्जन पथ पर...
तो एहसासों के सूखे पत्ते चुनते चलना...
कि फिर नहीं होगा इस राह से कभी गुजरना...



उस तक फिर लौट आने की बात बस एक छलावा है
है बस ये मन का बहलाना...
सींचती हुई चलती है ज़र्रे ज़र्रे को, नदिया से सीखना
क्या होता है जीवन कहलाना... !!


कभी गिर पड़ना जो अनजाने ही...
तो दोष अपने सर ही मढ़ना...
यहाँ जीवन के अरण्य में लिखा हुआ अभी कितना कुछ अनचाहा है पढना...


सब देखते, सुनते, समझते हुए
हृदय के चहुँ ओर एक सुरक्षात्मक घेरा बनाना...
कोई भी आहत कर जाए, ऐसा न हो मन, हतोत्साहित न हो, कि...
सीखते सीखते ही सीखेंगे क्या होता है जीवन कहलाना... !!


फासला उनमें कई सदी का... !

रिश्ता एक सागर
और नदी का... 


फासला उनमें कई सदी का... !


कितने अवरोध हैं मार्ग में... ?
जाने कितनी यात्रा शेष है... ??
आशाओं के बचे मात्र अवशेष हैं... !!


हतोत्साहित मन
और रीता हुआ पात्र है...
तभी गूंजता है एक स्वर--
समय एक इकाई मात्र है...


तय हो जायेंगे रास्ते
कि कायम रहेगा संघर्ष ज़िन्दगी का
भले, होने को हो, फासला उनमें कई सदी का... !!


भींगी हुई वसुंधरा है... !!

सुनो...
सर्दी के मौसम के लिए
भारी-भरकम कपड़ों के साथ
कुछ रौशनी भी निकाल लेना...


सहेजी है न... ???


बीते दिनों आँखों भर भर सूरज था...
आधी रात के सूरज का कैसा अद्भुत गौरव था...


सब सहेज रखा है न ???
इस मौसम के लिए--


जब बादलों से पटा अम्बर है...
रिमझिम जाड़े की बारिश है...
भींगी हुई वसुंधरा है...


जीवन सचेत ठिठका खड़ा है...


कि उसने
अभी-अभी विदा किया है
सूखे पत्तों को...
अभी अभी बीता है मुरझाना उपवन का,
गमले से अलग होते देखा है
अभी-अभी फूलों को...


सिमटे हुए अंधेरों में
दीप जलाती है कविता...
धीरे-धीरे बात सहज
दोहराती है कविता--


सुनो,
ज़रा सी रौशनी भी
निकाल लेना...
भींगा-भींगा मन भी है,
बाती एक भावों में भिंगो कर जला लेना... !!

याद एक बिसरी सी... !!

राम
मन मन्दिर विराजें,
मन के आँगन से
रावण निर्वासित हो जाये...
दीपों के
झिलमिल प्रताप से
दृष्ट-अदृष्ट हर कोना
सुवासित हो पाये... !!


यूँ जले
कि मन प्राण
रोशन कर जाये...
लौ की
महिमा के गीत
सृष्टि मुक्तकंठ गाये... !!


यादों के गलियारे से
कोई पुरानी
मनभावन सी
झालर झिलमिलाये...
सकल रचनात्मकता से सज्जित
बचपन का वो " दिवाली घर "
मन के धरातल पर
नवीन हो जाये... !!



अँधेरी रात में वो भोर हो लेता है... !!

प्रारब्ध ने
जो तय कर रखा है...
वो टलेगा नहीं...

पर ये कहाँ लिखा है
कि टूट गया
तो सपना फिर पलेगा नहीं...


सब कुछ खो कर भी
पुनः शून्य से प्रारंभ करने की
क्षमता रखता है जीवन...


कितने गूढ़ रहस्य समाये हुए है सृष्टि...
कितनी प्रगल्भता लिए हुए
निर्मित है मानव मन...


टूट बिखर जाने के बाद
पूरी सिद्दत से
खुद को बटोर लेता है...


मन की अद्भुत क्षमता है
अँधेरी रात में वो
भोर हो लेता है...


तो जितनी बार टूटेगा
उतनी ही बार संवरेगा...


खोता सा लगेगा हर सहारा
फिर दुगुने वेग से
वही विश्वास बन उभरेगा... !!



दीप, तुम्हारे संघर्ष के कितने वितान... !!

तम के प्रभाव में
दीये का वज़ूद... 


बाती जल रही है फिर भी वहां
कैसे ये अँधेरे मौज़ूद... ??


ऐसे कितने ही
द्वन्द से
जूझते हैं मन प्राण... 


दीप!
तुम्हारे संघर्ष के
कितने वितान... !!


लौ की आस को
धारण किये रखना...
कितना कठिन होता होगा
उजाले की राह तकना...


सब पुरुषार्थ
अपनी नन्ही काया और
द्विगुणित माया से
सहज ही कर जाते हो...


दीप!
तुम मन के अँधेरे कोनों में
अपनी निश्छलता से
किरणें भर जाते हो... 


छोटा सा जीवन
और बड़े बड़े  इम्तहान...
दीप! तुम अपनी लघुता में ही
हर वृहद् सन्दर्भ से महान... !!






नमी के अनगिन टुकड़े और हम... !!

आधी रात के बीत जाने पर
सुबह से कुछ दूर
एक पहर ठिठका खड़ा था...


टप टप बूंदों की झड़ी लगी थी...
वो उसमें भींग रहा था...


खिड़की से
एक जोड़ी आँखों ने
बीतता हुआ एक अध्याय देखा...
नीरव अन्धकार के पार
बजते बूंदों के संगीत में
जीवन का पर्याय देखा...


अकेले क्यूँ भींगता वो पहर...
साथ हो लिए...
नमी के अनगिन टुकड़ों को आत्मसात कर...
उस अँधेरे में हम प्रात हो लिए... !!


 

नीर नयनों में भर आये... !!

नीर
नयनों में भर आये...
दीप जब
बुझने को आये...


कितने कितने बीते क्षण
गूँज उठे...
यादों के
कितने विम्ब छलछलाये...


अपने आयुष्य भर
जलता है...
फिर यादों में
रह जाता है...


लौ को
धारण करने वाली काया का
प्रस्थान निश्चित...
समय की धारा में
सब बह जाता है...


क्षणभंगुरता की महिमा के
शाश्वत कुछ अंश झिलमिलाये...
नीर
नयनों में भर आये... !!

हार की जीत... !!


हम हंस देते हैं रोते-रोते
हँसते-हँसते रो देते हैं 


कितने ऐसे पल हैं जो हम
बस उलझे हुए खो देते हैं 


आज ऐसे सारे पलों को गूंथ कर
हार सा एक विम्ब बनाना है

और बात जब रिश्तों की हो
फिर सारे तर्क-वितर्क परे रख
स्वेच्छा से हार जाना है 


ये हार ही
वस्तुतः जीत होगी...
ज़िन्दगी की आँखों में
फिर प्रीत ही प्रीत होगी...


तुम्हें मनाते हैं...
तुम जीते, चलो हम हार जाते हैं... !!


कितनी उदास शाम है... !!

कितनी उदास शाम है...


उदासी नयी बात नहीं है...
इसमें भी कुछ नया नहीं
कि खुद ही खुद को समझा कर
थोड़ा सा और मन को उलझा कर
लौट जाएगी
शाम...


नया कुछ भी नहीं...
फिर भी हर शाम
बीती  उदासी की पुनरावृत्ति होती हुई भी
हर बार अपने आप में मौलिक है...


और
ये भी एक सच है
कि हमारे बीच की दूरियां
मात्र भौगोलिक हैं...


कि मीलों दूर भी शाम वैसी ही उदास है...
वैसा ही उधर भी भावशून्य आकाश है...


समस्त रहस्य समेटे हुए शाम दिवस के पास है... !!

... कि, जब होकर भी सुबह नहीं होती... !!


होती हैं सुबहें ऐसी भी...
कि जब होकर भी सुबह नहीं होती...


खोया होता है किरणों का झुण्ड कहीं...
 

जैसे रात भर कहीं विचरते हुए
भटक गया हो रास्ता
और क्षितिज पर
अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना भूल गया हो...


चाँद भी
उदासी की चादर में लिपटा
झाँक रहा होता है...
थोड़ा भ्रमित सा--
"कि रहूँ या चलूँ दूसरे देस
पिछले पहर जो थी ठौर, अगले पहर वही परदेस"


होते हैं सफ़हे ऐसे भी...
जो रिक्त होकर भी रिक्त नहीं होते...


लिखा होता है सकल वृतांत...


बस वो नज़रें ही नहीं होती
जो पढ़ सके बिखरे अक्षरों को
जो गढ़ सके अर्थ अपने विन्यास में
और यूँ हो जाये सफ़हे की साध पूरी...


सुबहें...
यूँ ही नहीं आतीं...


जागना पड़ता है...
किरणों को साधना पड़ता है...
हर मौसम के संगीत से मन को बांधना पड़ता है...


रहती हैं
तो रहें
कुछ बातें अधूरी...
अभी बाक़ी है अन्धकार
तो जीवन भी तो बाक़ी है
सुबह अभी ही हो जाए, ये कहाँ ज़रूरी... !!




यूँ ही तो होगी न... !!


दुनिया है...
यूँ ही तो होगी न...


सतही ही होगा अधिकांश तत्व...
जो मिलेंगे वो सब नहीं होने हैं सागर...
स्वभावतः छलकेगा, छलकता ही है गागर...


इस उथले स्वभाव से
कैसी निराशा...
फिर कैसा क्रोध...


उचित है बस मुस्कुरा कर
कर लेना किनारा...
यहाँ तो पल पल चलना है विरोध...


कि...


दुनिया है...
यूँ ही तो होगी न...


लोग हैं...
ऐसे ही तो होंगे न...


समय का फेर है
सब अच्छा ही अच्छा हो, ये दुर्लभ है, आश्चर्य है...
बुराई तो अकड़ी बैठी ही है, इसमें क्या आश्चर्य है... !!



उस नीले एकांत में... !!



कभी तुम देखना समंदर...


समंदर देखती हुई
तुम्हारी आँखों की छवि
हम उकेरेंगे...


लहरों का आना-जाना थाहती
तुम्हारी नज़रों की नमी
लिखेंगे...


एकटक तकते हुए उस छोर का आसमान
तुम हो जाओगे उस नीले रंग में लीन...

वह आसमानी रंग
समंदर के नीलेपन में सिमटता हुआ
तट को खारा कर जायेगा...

शाम के ऐसे धुंधलके में
किनारों का उदास कोई संगीत
उभर आएगा...


फिर...
तट से टकराती लहरों के उस शोर में...
हम मौन की सीपियाँ चुनेंगे...


उस...
नीले एकांत में...
कविता के अर्थ गुनेंगे...


तुम देखते रहना समंदर...
निर्निमेष...
लहरों पर टिकी आँखें...
उन आँखों में यादें अशेष...


बसा हुआ दर्द का देश... !!


कि गला था रुंधा हुआ... !!


कहते कहते रुक गए...
कि गला था रुंधा हुआ...


कौन सा दर्द  ये...
आज यूँ ज़िन्दा हुआ...


चोटें लगती हैं अक्सर...
तो घाव भी भर जाते हैं...


जो  खो गए इस  मौसम में...
वो फूल यादों में मुस्कुराते हैं...


आँखों में
झिलमिल उदासी छाई है...
एक घटा सी
घिर आई है...


जो घिर आई है
तो बरसेगी उदासी...
कोई बड़ा सन्दर्भ नहीं
बात ये ज़रा सी... !!

अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर चिट्ठियां... !!

पतझड़ भी
अपनी सुषमा में...
वसंत सा प्रचुर...


उड़ते हुए सूखे पत्ते...
जैसे चिट्ठियां हों...
अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर...


रंग बिरंगे स्वरुप में...
संजोये हुए कितने ही सन्देश...
आकंठ समोये कहे-अनकहे कितने ही भाव...


यात्रारत...
क्षत विक्षत... !


कहाँ पहुंचेंगे... ?
क्या कोई पढ़ेगा भी लकीरें... ?


क्या होगी परिणति... ?


इन सब बातों को कर परे...
पत्ते आकाश नापने चले... !!


देखना!
दिखें तो उन्हें पढ़ लेना...


उन रंगों ने
अदृश्य लिपि में
भावों को श्रृंखलाबद्ध किया है...


अपने अनुरूप अर्थ कोई
हो सके तो
तुम भी गढ़ लेना... !!

हम सुनते रहे, गुनते रहे... !!

खिल आते हो...
नेह बढ़ाते हो...
फिर सब वीरान कर चले जाते हो...


कहो कैसा ये व्यवहार... ?


फूल बोल उठे :
यही जगत आधार !


बहती हो...
जाने क्या कहती हो...
लौ को कितनी बार बुझाती हो...


कहो ये तुम्हारे कैसे सरोकार... ?


हवा कह उठी :
मैं अपने प्राकृत स्वभाव से लाचार !


अटल खड़े हो...
कब से अड़े हो...
धरा के आँचल में कब से जड़े हो...


रास्ता देते नहीं, तेरे ये कैसे संस्कार... ?


पर्वत बोल उठे :
अचलता मेरा श्रृंगार !


बहती जाती हो...
कौन से गीत गाती हो...
क्या लिए मन में सागर में समाती हो...


खो जाता है तुम्हारा संसार... ?


नदिया बोल उठी...
मेरी यात्रा का यही पारावार !

----------------------------------

हम सुनते रहे...
गुनते रहे...
कुछ यूँ ही  बुनते  रहे :


ये कितने प्रतिबद्ध हैं न
स्पष्ट, पारदर्शी, साकार...


इंसान ही है जो है इतना
दिगभ्रमित, छली, लाचार... ? !!

अब रंग श्वेत है... !!

आस की जलती लौ...
और आंसुओं के सहारे...
कितने मोड़ यूँ ही कर लिए गए पार...


हर बार
अदृश्य शक्तियों द्वारा
थाम ली गयी पतवार... !


हर बार लिखते हुए आंसू...
नम हुई जब नोक कलम की...


तो उस नमी से भी
रंगों की ही सम्भावना जन्मी 


ठीक वैसे ही
जैसे बूंदों के बीच से...
इन्द्रधनुष नज़र आता है...


श्वेत वर्ण
सात रंगों में...
विभक्त हो जाता है...


मिल गए फिर सब
अब रंग श्वेत है...
ऐसे कैसे रीत जाएगी
भले ज़िन्दगी हाथों से फिसलती हुई रेत है... !!

ये फ़लक भी मन जैसा है... !!


ये फ़लक भी
मन जैसा है...


कितने रंग बदलता है...


एक पल उजास
तो ठीक अगले क्षण कोहरा 


फिर, ये गति कितनी ही बार दिन में,
लेती है खुद को दोहरा 


ठहरता नहीं कुछ :
न लालिमा...
न ही कोहरा...


डोर
समय के हाथों है...
हम तो मात्र हैं मोहरा... !!


कोई बहुत बड़ा दर्शण नहीं...
ये आम सी बात है...


सूरज के उगने की आहट थी...
अब कोहरे में खोया गगन उदास है... !!


शायद,
कोई मुस्कान
खिल आये क्षितिज पर 


कौन जाने
कोहरे को भेद
इसी क्षण सूरज उग आये... !!

*** *** ***
अन्यान्य कार्यों में लगा... खिड़की से दिखने वाले आकाश को... देखता मन... कैसी कैसी बातों में साम्य ढूंढता है... दिन की भाग दौड़ के लिए ज़रा सी सुकून भरी रौशनी आँखों में ले निकलने का भोला सा उपक्रम...

बहते जाना है... !!

धाराओं का खेल था...
दो किनारों का क्षितिज पर मेल था...


जीवन चलता ही रहा...
सूरज नित निकलता नित ढलता ही रहा...


कि जलते जाना है बाती को...
नदिया को बहते जाना है...


पड़ाव होंगे राह में...
पर वो भी ठहर जाने के पक्षधर नहीं...
कि उद्देश्य बस चलते जाना है...


नदिया हो या हो जीवन...
उसे अनंत तक बहते जाना है... !!

अंततोगत्वा सब माटी है... !!

आना है
आकर फिर
चल देने की परिपाटी है...
माटी का दिया
माटी के इंसान
अंततोगत्वा सब माटी है...


कहते हैं, चलते रहने से
गंतव्य तक की दूरी
कम हो जाती है...
अंतिम बेला दिवस की
अवसान समीप  है
खुद से दूरियां भी कहाँ गयीं पाटी हैं...


निभ रही बस
आने और चल देने की परिपाटी है... !! 


मन के किसी कोने में... !!

गहन थी
उदासी...
मन के
किसी कोने में...


वही कोना
जो दिए हुए था समूचा संबल
जीवन को
जीवन होने में...


दीप जलाते
पर आंधियाँ बहुत थीं
बुझ ही जाता न
फिर और उदास कर देती ये रीत खोने की...


सो आँखों में आस लिए
अँधेरे को देखते रहे
सुकून है
यूँ चुप चाप रोने में...


थोड़ा समय लगेगा
उग आएगी रौशनी
आश्वस्त मन जुटा है
कुछ ऐसे दुर्लभ बीज बोने में...


कि
थोड़ी तो पीड़ा होगी...
ज़िन्दगी लग जाती है
जीवन के जीवन होने में... !!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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