अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आधी धूप... आधी छाँव... !!












आधी धूप...
आधी छाँव...


मन का
आधा-अधूरा...
उजड़ा गाँव...


चल रहे हैं समेटते...
टुकड़े आस्था-विश्वास के...
इस रस्ते... हम सब खाली पाँव... !!

*** *** ***

रास्ते... जिनसे हम कई बार गुजरते हैं... कभी कभी तो एक ही दिन में कई बार और फिर भी कहीं नहीं पहुँचते... फिर भी जाने क्यूँ हारती हुई आस सजग हो चुन लेती है कोई टुकड़ा धूप का और बुन लेती है अगले दिन के लिए उत्साह... जीवन कभी रुकने नहीं देता किसी मोड़... विवशता कचोटती ज़रूर है... मन थकता भी है... पर फिर चल पड़ता है... जीवन के ताने बाने यूँ उलझाये रखते हैं और हम चलते चले जाते हैं... कि चलते जाना ही एकमात्र विकल्प है... 



आसमान देखते हुए... !!


वो चलते हुए गगन में
गगन का हो कर भी...
धरा का है...


आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है...


ऐसे कैसे अँधेरा बना रहेगा
आस का सन्देश, उसके आँचल से बंध, आएगा...
ये काम हवा का है...


विषमताओं से वो क्यूँ हो विचलित
जब दूर चमकते चाँद का सर्वस्व...
धरा का है...


आसमान तकते हुए
हम संभावनाएं तलाशते हैं...
ज़िन्दगी का सारा फ़लसफ़ा धुआं सा है...


आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है... !!


शायद... !!


शायद...

कभी-कभी
चले जाना श्रेयस्कर होता है 


कि लौट आने की सम्भावना सांस लेती रहे... 


कि जब लौटें
तो छूटा पड़ाव और सहज...
और ज़रा सुन्दर सा लगे...

सुख दुःख के
बिछड़े साथी सारे
हृदय से आ लगे... !


कभी-कभी
हम चुप हो जाते हैं...
इसलिए नहीं कि कहने को कुछ नहीं होता...


बल्कि शायद इसलिए...
कि जो यूँ ही नहीं हो रही है बात प्रेषित
वो कह देने पर भी समझी नहीं ही जाएगी...


मौन अगर अक्षम है
तो शब्द भी अनसुने ही रह जायेंगे...
इसके विपरीत तर्क-वितर्क की पूरी श्रृंखला के लिए
विकल्प खुल जायेंगे... 


इसलिए ही शायद
मौन बेहतर है...
समय वैसे भी समय आने पर
हर समस्या को लेता हर है... 


कि कुछ भी टिकता नहीं यहाँ-


न हमारे भ्रम...
न कटुताएं...
न दोस्तियाँ ही...


समय करवट लेता है
सब बदल जाता है 


कोई विरले ही ऐसा नाता है, जो हर मौसम मुस्काता है... !!

मन... !!

क्या क्या
सोचते हैं हम...
क्या क्या
चाहता है मन...


कितने ही स्वप्न
ढह जाते हैं...
किस्से पूरे होते होते
रह जाते हैं...


अनगिन अनचीन्हे अवशेषों से दग्ध


खंडहर सा
हो जाता है मन...
कितने ही
रूप बदलता है जीवन...


कितने ही क्षण
मूक विकल अतिरंजित...
टेढ़ी-मेढ़ी राह में
कितनी ही संवेदनाएं रक्तरंजित... 


सभी विडम्बनाएं बिसार
फिर स्वप्न सजाता है...
मन हारते हारते
फिर जीत जाता है... 



निर्निमेष
निहारता है राहें...
तुम देखना कभी
इंतज़ार की निगाहें... 


एक निर्विकार चमक
रच बस जाती है...
डूबती हुई आस बार-बार हार-हार
पुनः सज जाती है...


और चलते रहते हैं
मौन ही मौन उपक्रम...
कैसे बदलेगा, अभी जो है,
जीवन का आचरण... 


कैसे
परिवर्तित होंगे आयाम...
कोई तो होगा थामे
उज्जवल सिद्धांतों की कमान... 


ऐसे ऐसे मन अपने भीतर
कैसी कैसी दुनिया बसाता है...
उमड़ता घुमड़ता हुआ, कई बार तो
सचमुच बादल हो जाता है...


बरस कर फिर
धूप भी वही बनता है...
मन की
अद्भुत क्षमता है... 


रे मन! दृढ़ता से चल अपनी राह, तभी बात बनेगी
ज़िन्दगी, कहाँ जाएगी, अगले मोड़ साथ हो लेगी... !!



कितने बादल... कितनी बारिश... !!









खिड़कियों की उदासी
परदे से झांकते सपने
दूर अम्बर पर खिलती कविता... !


ज़िन्दगी की बेतरतीबी में
कुछ एक पलों का अवकाश बन
अनचीन्हे अनजाने मोड़ों पर मिलती कविता... !!


ये बादल
क्या आज बरसेंगे... ?
धरती की हरीतिमा में
समा कर हरसेंगे... ?? 


या यूँ ही
घिर कर... घेर कर...
छंट जायेंगे... ?
बादल
आज फिर
बिन बरसे ही सिमट जायेंगे... ?? 


जाने
क्या है ?
धरा-अम्बर के मन में...
क्या है ऐसा ?
इस रोज़ गुज़रते जीवन में... 


जो हम
हारे थके फिर सपने बुनते हैं... !
श्मशान से लौटते हुए भी जीवन ही गुनते हैं... !!


कितने बादल... कितनी बारिश... ?
ये गणित, जाने देते हैं...


चल रही है... साँसों की धुन...
उसे, राम नाम की धुन, गाने देते हैं... !!

कभी तो होगा, हे जीवन! तेरा आगमन... !!

कुछ न कुछ
घटित होता ही रहता है
हर पल...
कब
घटित होगा
जीवन...


कितने आंसू गिरे
कितना तो नम
हृदय तल...
और
कितना भींगेंगे
नयन... 


हम
प्रश्न ही तो सजाते जाते हैं
जाने कब ढूँढेंगे हल...
यहाँ वहाँ
विचरते हैं
कब थाहेंगे मन...


नदिया
बहती हुई भजन गाती है
पर्वत प्रार्थनारत अचल...
अपने अपने
तौर तरीके
अपना अपना चलन...


ज़िन्दगी
भाग रही है अपने रास्ते
आँखें लिए सजल...
कभी तो आएगी मंज़िल
कभी तो सिद्ध होंगे शुभ संकल्प
कभी तो होगा, हे जीवन! तेरा आगमन... !!



क वि ता


'क'रते रहे
'वि'रल अनुभूतियों की व्याख्या...


'ता'रते रहे...
पार उतारते रहे खुद को ही
भावों के, सागर में, डुबो कर...



लिखते रहे
कलम की नोक को
ओस में, भिगोकर...


कविता के तीनों अक्षरों और दोनों मात्राओं में ढूंढते रहे आकाश
बांधते रहे आकाश सा विस्तार... 


ऐसे ही कर लिए हमने कितने ही सागर पार...


अब जो तट पर बैठे हैं...



पत्थर चुन रहे हैं...
अनमने से हम, अपना ही मन बुन रहे हैं...


कविता के
'क','वि', और 'ता'
मेरे आसपास
विम्ब रच रहे हैं...

हम जो कहीं नहीं हैं,
मात्र कविताओं में बच रहे हैं... !!

"प्रबिसि नगर की जय सब काजा..."


इस्ताम्बुल पड़ाव था हमारी यात्रा का, मंज़िल थी अपने देश भारत की सरज़मीं ! १७ की रात इस्ताम्बुल से उड़े हम भारत के लिए... १८.०१.२०१४  की सुबह दिल्ली में हुई... !! क्या सुबह थी... इतने समय बाद अपने देश की हवाओं का छू कर जाना... अपनी धरती से मिलना और मिलना किसी अभिन्न से... !! कविता के आँगन में यूँ ही दृश्य जुड़ते हैं... जुदा जुदा राहियों को जोड़ती है कविता... !! सुरेश जी, उस दिन आपके दर्शण पाकर हम धन्य हुए... ये कृपा देखें फिर कब होती है... कब पुनः मिलते हैं हमलोग...
उस दिन का वृतांत तो लिखा ही जा चुका है... तो अब बढ़ते हैं अगले दिन की ओर...
[ १९.०१.२०१४ ]
रात को ट्रेन पकड़नी थी जमशेदपुर के लिए... बस दिन भर का समय था और बीसियों काम... लेकिन ये भी पता था कि अगर इस बार आज के दिन नहीं मिल पाए तो फिर शायद समय न मिले... तो ११ बजे के आसपास हमने निर्णय लिया कि जायेंगे महरौली... समय कैलकुलेट किया कि अभी निकले तो पांच बजे तक भी लौट पाए तो मैनेज़ हो जायेगा... फिर क्या था पापा से परमिशन लिया... भाई ने वहां पहुँचने का तरीका सुशील जी को समझाया और हम निकल पड़े ललित भैया के दर्शनार्थ... !!
गाज़ियाबाद से महरौली... लम्बी यात्रा... पर, यात्रा पर निकल पड़े हम "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." मन ही मन दोहरा कर...
मेट्रो, फिर ऑटो, फिर फ़ोन पर ललित भैया के लगातार मिल रहे इंस्ट्रकसन को फॉलो करते हुए, हम लोग बनारस सी गलियों को दिल्ली में पार करते हुए, ललित कुमार के निवास स्थल पर पहुंचे एक बजे के आसपास... !!
छत पर विराजमान थे ललित "महरौलवी" साहब, तो हमलोग छत पर पहुंचे... क़ुतुब मीनार वहीँ छत से देखा... कितने समय बाद घर का खाना खाया... आंटी के हाथ का प्यार से परोसा हुआ भोजन आज भी नहीं भूलता... !!
एक दिन पहले पाँव में कुछ चुभ गया था और भाग दौड़ में मौक़ा ही नहीं मिला कि उपचार किया जाए पाँव की तकलीफ का... वहां ललित भैया के घर की छत पर आराम से बैठे तो ये कष्ट भी ध्यान आ गया... तुरंत समाधान भी हुआ... स्टॉकहोम  से गिरते पड़ते पहुंचे थे हम उस मोमेंट तक... इतनी लम्बी यात्रा, मेरी बेतरतीबी और समय के अभाव ने तलुवों की वो स्थिति कर दी थी... कि धुले न होने के कारण कहाँ कहाँ की मिट्टी ढोए चल रहे थे पाँव... बैंड-ऐड लगाने से पहले, पहले तो धोने होंगे पाँव ठीक से... कि पता तो चले कि बैंड-ऐड लगानी किधर है... खैर, ये सब हुआ!
अब हम ललित भैया के कमरे में बैठे हैं... चाकलेट के रैपर पर लिखी स्वीडिश ट्रांसलेट करके उनको बता रहे थे... ऐसी ही कितनी छोटी मोटी बेतुकी बातें की हमने... पहली बार मिले हम लेकिन ऐसा लगा ही नहीं कि जैसे पहली बार मिलना हुआ है...
सामने वाले की सहजता आपको भी कब सहज कर देती है... ये आप खुद भी नहीं समझ पाते... व्यक्तित्व की महानता सहजता में ही तो है... और ये दोनों उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं...
करीब दो बजने को थे और निकलने की तैयारी करनी थी, पांच बजे तक वापस घर लौटना था स्टेशन निकलने के लिए... !! हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें... ये तो बस आने जाने जैसा था... पल में बीत गया समय... घर जाकर याद आएगा... "अरे! ये तो कहा ही नहीं... ये कहना था, ये पूछना था..."; "काहे चिंतित हो", ये पूछने पर, हम अपनी चिंता व्यक्त कर दिए... तो समाधान भी मिला... "फिर मिलेंगे न"... और ये भी कि शेष बकबक फ़ोन पर भी तो कर ही सकती हो... !! बात तो सही है पर ये "फिर" इतनी आसानी से थोड़े ही घटित होता है... और फ़ोन... ये तो और भी दुर्लभ... टाइमिंग, व्यस्तता, मेरा संकोच... ये सब भी तो आड़े आने हैं... तो ये विकल्प तो निल ही है... ! ज़िन्दगी सरपट दौड़ती है, हम सोचते हैं कि लौट जायेंगे... लौट पाएंगे... पर ऐसा होता कहाँ है... लौटना सुखद तो है पर आसान नहीं... !!

खैर, अचानक से मेरा मन हुआ कि "दो लाइन लिख दीजिये कुछ... हमको आपकी लिखावट में कुछ चाहिए..." शायद ऑटोग्राफ टाइप कुछ... अलमारी से हमने ही किताब निकाली... उसी को हस्ताक्षरित कर उन्होंने दिया हमको... !
अब विदाई की घड़ी आ गयी थी... पर इतना समय नहीं था कि विदाई के पहले वाला रोना धोना हम लोग विधिवत कर सकें... ! हँसते हँसते, मन में पावन संतोष लिए, हम वहां से चले तो ललित भैया फ़ोन पर रास्ता बताते हुए हमारे साथ ही रहे... ऑटो जहाँ मिलती है वहां पहुँचा कर फ़ोन रख दिया उन्होंने... !!
विरल अनुभव था, मेरे और सुशील जी, दोनों के लिए... वी वर ग्लैड दैट वी कुड एक्चुअली मेक इट टू हिज प्लेस, डेसपाईट द टाइट सेड्यूल !!
अब घर पर फ़ोन करके भाई से कन्फर्म किया कि हमलोग ठीक समय पर उधर पहुँच जायेंगे न... और ये भी कि उनलोगों ने सारी पैकिंग तो कर ली है ... बस हम पहुंचें और चल दें ऐसी भी स्थिति हो तो भी समस्या नहीं होगी... !
अब दिल्ली मेट्रो के सफ़र में हम इत्मीनान से कविता कोश पलट रहे थे और सुशील जी को भी कुछ कुछ दिखा रहे थे... इसी सबमें जाने रास्ते में हमने कैमरा कहाँ गिरा दिया... ख्याल ही नहीं रहा...! ये तस्वीरें होती ही नहीं... अगर ललित भैया ने ट्रांसफर नहीं कर लिया होता तस्वीरों को अपने पास... ! शायद कैमरे को खोना था, और क्लिक की गयी तस्वीरों को बचना लिखा था इसीलिए तो प्रेरणा हुई होगी न... कि "निकालो मेमोरी कार्ड, ट्रान्सफर कर लेता हूँ फ़ोटोज़...", फिर कभी तुरंत बाद ही इ मेल से मिली हमको भी ये तस्वीरें... यादें हैं, खो जातीं तो अफ़सोस ही रह जाता... ! खैर...
अब अगली पोस्ट में कविता कोश पुस्तक के बारे में लिखेंगे... उस यात्रा को पढना... टेक्निकालिटी को समझना इत्यादि इत्यादि... अभी हम थक गए हैं... मन में ही दिल्ली की यात्रा और ट्रैफिक को याद कर के... तो अभी बस विराम और विश्राम की मुद्रा में है मन और कलम भी... !!
*** *** ***
यहाँ अनुशील पर उन पलों को सहेजते हुए कितना वक़्त लग गया हमें... दशमलव पर भी अपडेट है... तब ही उन्होंने दर्ज़ कर दिया था अपने यहाँ... :)

कितने आकाश... !!

कैसी कैसी फ़िक्र,
कैसी कैसी चिंताएं...
ले कर आती हैं दूरियां !! 


मन का आकाश
कितने आकाशों की ओर तकता है...
क्या कुछ नहीं समाहित किये हुए धड़कता है...


जो जहाँ हैं
सब जुड़े ही हैं
कि मन वीणा के तार तरंगित हैं...
ये दूरियां आभास मात्र हैं
ज़िंदगियाँ सभी
इस "साथ" पर ही अवलंबित हैं...


दौड़ कर
देखने पहुँच जाता है मन...
घर का आँगन...


धूप तो तेज़ नहीं होगी न...


मम्मी! ज्यादा थकना मत...
आज प्रसाद बनाने में इतना भी मत लगना भीड़ना
ज्यादा देर आग के पास मत रहना...


वहां और यहाँ के समय में अंतर है न...
वहां तो अबतक धूप हो गयी होगी...
यहाँ अभी रात ही है...
पर मेरे लिए यह प्रभात ही है...
कि वहां भोर हो गयी है... !!


मेहँदी खिल आई होगी न...
ज़रा रंगों की तस्वीर भेजना...
घर द्वार से ज्यादा आज खुद को सहेजना...


हममें से कोई है नहीं वहां...
कल सुबह पारण कौन बनाएगा...


हमने कभी नहीं सोचा था
एक दिन ये सब बातों में सीमित हो कर रह जायेगा...


हाँ! बहना तुम भी
ख्याल रखना
पिछले साल की ही तरह
खूब सजना धजना 


दूसरी तीज यह तुम्हारी
पहली तीज वाले ही उत्साह के साथ बीत जाये...
सुख सौभाग्य का दीप
तुम्हारे आँगन मुस्कुराये...


ईश्वर मेरा भी कल्याण करें
वो तो सर्वव्याप्त हैं, मेरी कुटिया को भी अपना धाम करें... !!



*** *** ***

सभी को हरितालिका तीज व्रत की शुभकामनाएं... 

यात्रा, पड़ाव और उलझा मन: इस्ताम्बुल


आधी रात को बुरा स्वप्न जगा दे... रोते हुए उठ बैठे हों और कुछ भी समझ न आ रहा हो कि क्या करें... किसे उठाएं... किसे जगाएं फ़ोन घुमा कर... तब मन की कितनी अजीब  दशा होती है...
ओह! बारह बज  रहे हैं और रोते रोते उठ बैठे हैं हम, ये तसल्ली तो है कि चलो सपना ही था... पर... खैर, अभी खुद को समझा ही रहे हैं कि कुछ देर रुक जाओ... घंटे दो घंटे में तो भारत में सुबह हो हो जाएगी... फिर बात हो जाएगी मम्मी से... फ़ोन तो अभी भी कर लें पर वो ये आधी रात को की हुई रिंग उनको चिंता में डाल देगी न... :(
मन को हटाना है... और वो हटता ही नहीं... जहाँ अटक जाता है, वहीँ अटका रह जाता है... रे मन! चल अधूरी यात्रा ही पूरी कर ले... कैसे कैसे तो लिख ही डाले न तुमने इस्ताम्बुल के चार किश्त... अब डेढ़ साल पुरानी भारत यात्रा के इस अद्भुत पड़ाव की संभावित अंतिम कड़ी लिख ही डाल... कि तथ्यों और यादों में उलझेगा तो शायद सुबह तक का सफ़र तुम्हारे लिए कुछ कुछ सुलझ जायेगा...
चलते हैं इसी बहाने इस्ताम्बुल... वहीँ जहां पिछली कड़ी में विराम लिया था... !!
गिरे थे... दर्द से रोते हुए चल रहे थे... सुशील जी मेरी हर बदमाशी  का खूब रिकॉर्ड रखते हैं... उस समय भी वो क्लिक ही कर रहे थे मेरा रोना... याद आती है उनकी बात "अरे मत रो, गिरने पड़ने में तो तुम तेज़ हो और बहादुर भी... रोती हुई कैसी तस्वीर आएगी... बंद करो रोना... etc. etc. etc." वेल, कुछ समय तो लगा था चुप होने में... गिरने में हम माहिर हैं तो रोने धोने में भी कम कहाँ हैं... !! खैर... आगे बढ़ते हुए अब चलते हैं Hagia Sofia की ओर... 


मूलतः यह ईमारत एक चर्च थी, कालांतर में मस्ज़िद हुई और अब एक म्यूजियम है... छठी इसवी में यह Byzantine सम्राट Justinian the Great द्वारा बनवाई गयी थी... 



सुल्तान अहमद मस्ज़िद अपनी दीवारों के नीले रंग के कारण नीली मस्ज़िद भी कहा जाता है... यह तुर्की की एक मात्र मस्ज़िद हैं जिसमें छह मीनार हैं...

यूँ इन भव्यताओं से गुजरते हुए अब हम लगभग इस पड़ाव की यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे... यहाँ दो घंटे  का वक़्त था हमारे पास... अपने अपने तरीके से यात्री इस समय का उपयोग करें... इसी इंस्ट्रकसन के साथ हमारे गाइड ने हमसे विदा ली...!

हम खड़े थे बहुत ही व्यस्त इलाके में... खूब चहल पहल थी...

यह है ग्रैंड बाज़ार का दृश्य. यह दुनिया के मोस्ट विजिटेड पर्यटन स्थलों की सूची में पहले नंबर पर है... प्रतिदिन ढाई लाख से चार लाख लोग आते हैं... इस विशाल मार्किट में लगभग ६१ कवर्ड स्ट्रीट्स हैं और ३ हज़ार दुकानें... !! पूरा घूमना तो संभव नहीं था पर यहाँ काफ़ी समय बिताया था हमने... कुछ कुछ छोटी मोटी सौगातें भी लीं थीं... कुछ अपने लिए... कुछ अपने अपनों के लिए... !!

सागर का दृश्य... पुल और दो महाद्वीप के बीच बंटा एक शहर और कितने कितने महाद्वीपों में बंटा मन... यही सब जोड़ घटाव करते हुए हम समय का भी हिसाब लगा रहे थे... शाम हो चली थी और दौड़ते हुए पुल को कवर कर के वापस यथास्थान लौटना था... जहाँ से बस हमें वापस एअरपोर्ट पहुंचाने वाली थी...


अंतिम समय की भागा भागी याद है अब भी... बस छूट जाने की आशंका ने हमको उस दर्द में भी अच्छा खासा दौड़ लगाने की हिम्मत दे दी थी... सच ही है, परिस्थितियां अन्तःस्थितियों को दृढ करती हैं और हम हर हाल में सुबह से शाम तक का सफ़र तय कर ही लेते हैं... !!

इस्ताम्बुल: इतिहास के तहख़ाने से... !!


बहुत पुराना... बहुत बहुत पुराना था वह मंज़र... इतिहास के किन तहखानों से तथ्य निकाल कर जैसे सामने रखे जा रहे थे... ज्यादातर पहले से तथ्यों को पढ़कर ही पहुंचना सही होता है... कि यह सहजता और समझ दोनों देता है... नहीं तो तथ्यों के चक्कर में दृश्य छूट जाते है और दृश्य की ओर दृष्टि हो तो तथ्य मिस हो जाते हैं... खैर, लौट कर इत्मीनान से पढ़ा सब और अभी दोहराये कितना कुछ पहले का लिखा हुआ कि लिख सकें यहाँ कुछ कुछ वैसा ही जैसा उस वक़्त देखा समझा था... चुटके पुर्जे निश्चित काम आते हैं... इनकी उपयोगिता हमेशा सिद्ध हुई है... !!

Basilica Cistern की ओर चलते हैं... यह अद्भुत जगह थी... इतिहास भी इसका अनूठा ही है... ५३२ इसवी में निर्मित इस भूमिगत संरचना में ३३६ कॉलम प्रयुक्त हैं...

कहते हैं इस सिस्टर्न को ग्रेट पैलेस और आसपास के भवनों की सेवा हेतु बनाया गया था... ब्लैक सी के पास के जलाशय से २ ० किलोमीटर जलसेतु के माध्यम से जल पहुँचता था और लगभग ८० ००० क्यूबिक मीटर जल स्टोर करने में सक्षम थी यह संरचना! Byzantine सम्राटों के ग्रेट पैलेस से रीलोकेट होते ही इसे बंद कर दिया गया और कालांतर में लोग इसे भूल गए... !! Petrus Gyllius ने Byzantine पुरावशेषों  पर शोध के दौरान इसे १५४५ में ढूंढ निकाला... स्थानीय लोगों का कथन था कि वे तहखानों में बाल्टी डालकर चमत्कारिक रूप से जल प्राप्त करने में सक्षम थे... और कुछ ने तो मछलियाँ प्राप्त करने की बात की भी पुष्टि की... !! Gyllius ने बड़े परिश्रम से किसी एक तहखाने के भीतर इस तथाकथित रहस्यमय तालाब को ढूंढ तो लिया लेकिन इस संरचना को सम्मान नहीं दिला पाए... तुर्कों ने बहुत बाद तक इसे डंपिंग ग्राउंड की तरह इस्तमाल किया... कबाड़ भी और यहाँ तक की लाशें भी डंप की जाती रहीं...
१९८५ में तालाब को साफ़ किया गया... महानगर पालिका द्वारा पुनर्निर्मित किये जाने के बाद १९८७ में इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया और आज यह शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है... !

लकड़ी के उठे हुए प्लेटफार्म पर घूमना विरल अनुभव था... छत से पानी टपकता रहता है... इसी फिसलन में बहुत जोर से गिरे थे हम... आज भी काले निशान गए नहीं हैं... :( हाथ में छोटा कैमरा था... जो पानी में जाते जाते बचा था... :)

मछलियाँ तैरती हुईं दिख जाती हैं पानी में... ये एक तस्वीर उस अँधेरे की... चोट लगने के बाद तो धुंधली आँखों से ज्यादा कुछ दिखा नहीं... इंटरेस्ट भी जाता रहा... कुछ एक घंटे लग गए थे संयत होने में... फिर आगे बढ़ा सफ़र... रंग बिरंगे रस्तों पर... उसकी कहानी अगली बार...

चलता रहे सफ़र... !!

इतना खाली खाली लग रहा था... इतना अँधेरा था... अँधेरा तो अभी भी है... खैर, रात को यूँ ही वाटर कलर से खेलने का मन हुआ... कुछ छिलके बादाम के कब से संभाल रखे हैं... बार्सिलोना यात्रा के समय के... वाटर कलर के डब्बे में मौजूद बारह कलर्स से बारह छिलकों को रंगा... एक एक को रंगते हुए ब्रश में जो कलर बच जाता था उसे कागज़ पर ऐसे ही पोतते चले गए... यूँ बना ये... सहेज लें इसे भी... कि रंगों का खिलना इस उदास मौसम में दुर्लभ सा ही संयोग है... कागज़ पर उकेरे रंग जीवन के कैनवास को भी समृद्ध करें... ये सम्भावना घटित हो... इसकी प्रार्थना चलती रहे मन ही मन... कभी तो इंतज़ार समाप्त होगा... कभी तो लौटेगी मुस्कान... कि चक्रवत चल रहा है समय... कुछ भी स्थायी नहीं... ये समय बीतेगा और वो समय भी लौटेगा... ...... ... !!

एक एक रंग
आपस में मिल कर
अलग अलग पर्मुटेसन कॉम्बिनेसन में
रच सकते हैं अनेक रंग

अपना वजूद खोता है
"मैं" की रट टूटती है
तो घटित होता है कुछ अनूठा
यहीं है, बस ढूंढनी है हमें जीवन के उदास रंगों में उमंग

यहाँ छुट्टियों पर नहीं आयें हैं हम
कि बस खेल हो, मौज हो, पिकनिक हो
ये कर्मक्षेत्र है जहाँ अपने बूते जितनी है हमें बाज़ी
जीना है हर हाल में लड़ते हुए ज़िन्दगी की जंग

बस चलता रहे सफ़र
और ये सफ़र कभी तुम तक भी पहुंचाये
किसी मोड़ पर "ज़िन्दगी", ज़िन्दगी से मिल जाये
और दूर क्षितिज पर खिल आये सबसे अनूठा रंग... ... !!

जीवन बुनो... !!

ये
गर्मियों की शाम है...

लेकिन,

सुन्न है मन मस्तिष्क
वैसे ही
जैसी अनुभूति
बर्फ़ से घिरे होने पर होती है...


देखा है हमने
कई बार राहों में
"चेतना" खाली पाँव होती है... ...


फूल मुरझाने लगे हैं
पतझड़ करीब है...
मौसम का आना जाना एक बात है
एक स्थायी मौसम है जिसे कहते नसीब हैं...


जो लिख दिया नियति ने
वह तो होना ही है...
जीवन "पाना" जाने कितना है
हर क्षण तो ये बस "खोना" ही है... 


शायद,
सुन रहे हो तुम भी
कि हम तक भी तो आई ही है न
सन्नाटे को चीरती तुम्हारी आवाज़...


बूंदों ने जो गाया है
उस धुन में हैं जीवन के कई राज़...


सुनो...
मेरी बेतुकी बातें गुनो...

जीवन बुनो...!!


बेवजह... यूँ ही... !!


बहुत सारे काले बादल हैं... बारिश है... कांच पर बूँदें हैं... और मन में कितनी ही आशंकाएं उमड़ घुमड़ रहीं हैं... मेरे सामने कितने सारे अधूरे काम पड़े हैं... डेड लाइन्स हैं... फिर भी कुछ करने की इच्छा नहीं... ये जाने कैसी मनःस्थिति है...
ये भी सब... पता नहीं क्यूँ... हम लिखे जा रहे हैं, जैसे कहकर यूँ अपने आप से ही सबकुछ... कोई समाधान निकल जाने वाला है! इस्ताम्बुल वाली बाक़ी कड़ियाँ ही लिख पाते तो भी एक कार्य समाप्त होता... पर वो भी नहीं... !
आजकल ये बेमतलब रंगों से कुछ कुछ कागज़ पर उकेरने का शौक जागा है... उधर भी मन नहीं जा रहा... तबियत ठीक न हो... मन ठीक न हो... तो कुछ भी ठीक नहीं होता... और ऐसे में कोई नहीं जिसको फ़ोन करके ही सही, तंग कर सकें... नींद भी गायब है... लिखने का भी मन नहीं...
अरे तो ये क्या है... ??? ये... ये तो सब बेवजह की बकवास है... पर यही सही... कौन जाने, शायद ये बकवास ही कुछ सही करे... !!


प्रिय कलम!
कुछ करो...

स्याहियों!
आपस में मिल जाओ

कोई एक नया रंग सृजित हो
कुछ रचो अप्रतिम... !!


जब तक यूँ
खिट-पिट कर रहे हैं
यूँ ही हम
कीबोर्ड पर...

तब तक
मन बनाओ
कुछ लिखो
कुछ लिखवाओ...

कुछ ऐसा--


जो
रूठा मौसम
लौटा लाये... ...

ज़िन्दगी मुस्कुराये... !!

ये रिश्ता पुराना है... !!

ये रिश्ता
पुराना है...
आँखों में
बूंदों का
तराना है...


जब तब
बरसती हैं...
आँखें
हर मौसम में
ज़रा सी धूप को तरसती हैं...


ये यूँ ही चलने वाला
सिलसिला है...
ज़िन्दगी को
विधाता से मानों
नमी का वरदान मिला है...


बूंदों में
आशा है...
सात रंगों की
भोली सी
जिज्ञासा है...


यही जिज्ञासा
जिलाए रखती है...
हर मोड़ से गुजरती हुई ज़िन्दगी
भले  कितनी ही
हताश दिखती है... !!

अन्धकार और किरण... !!

ठहरते हुए
रह रह कर...
कितना कुछ
अनकहा ही रहा
कह कह कर... ... 


नदिया ने
नहीं छोड़ी अपनी जिद्द...
पत्थर पर
खींचती रही लकीर
निर्बाध बह बह कर... ...


उफ़ तक नहीं करती
कभी भी...
हो गयी है
धरती निस्तेज़
यूँ हमारे अत्याचार सह सह कर... ... 


कब मुड़ेंगे कदम ?
कब कुछ सार्थक बदलाव हेतु
नींव की ईंट बनेंगे हम... ?
या यूँ ही रह जाएँगी
सारी सैद्धांतिक इमारतें
ढह ढह कर... ... !!


मौन बोले
मुखर यूँ संवाद हों...
अब कितना कुछ जताया जाये
क्या कुछ बताया जाए
कह कह कर... ...


अन्धकार तो
असीम है...
लेकिन रौशनी भी है
कौंध जाती है आस विश्वास की शक्ल में
रह रह कर... ... !!

कितने विम्ब, कितनी स्मृतियाँ: इस्ताम्बुल


ये झुण्ड... ये पंछियों की श्रृंखला आकर्षित करती है...! इनकी दुनिया कितनी भिन्न होती होगी न...! हम इंसानों की तरह न संग्रह की चिंता, न भविष्य की फिक्र... बस मन से जीना ... उस एक पल को... जो अभी है... जो उपस्थित है - ये सीखना चाहिए हमें इनसे...! हमें पंछियों से सीखनी चाहिए ये निर्लिप्तता... ये दाने चुगना... उड़ जाना... और बंधन मुक्त होते हुए भी बंधन युक्त  होना... लौट आना शाम को उसी धरा पर जहाँ से सुबह आकाश की राह ली थी... !!
इस्ताम्बुल में तोते की जोड़ी भी दिखी थी... पेड़ की चोटी पर...

तस्वीरों में कितने गगन...
कहाँ कहाँ से होकर लौटता है मन...
ये बहुत ऊँचाई पर थे... जाने क्या बातें करते होंगे यूँ सुस्ताते हुए... यही सब सोचते हुए, इन्हें क्लिक करने की कोशिश में गिरे भी थे... चोट भी लगी पर संभल गए... उत्साह ही ऐसा था... मन घर की ओर भाग रहा था और पाँव ज़मीन पर... !!

बिल्लियाँ भी कहीं से निकल आती थी... यूँ सड़कों पर सरपट दौड़ रही थीं कि इनसे बचने में भी हम दो चार बार तो गिरे ही... !
अब तक तो केवल गिरने पड़ने की बात हुई... खैर, जो लिखे... जैसा लिखे कलम... चोटें तो याद रह ही जाती हैं न... समय की गति सब ठीक भी करती है पर कुछ तो रह जाता है... उसी "याद" शहर की सूखी भूली बिसरी पत्तियों से हम रचते हैं जीवन... बीत गए समय का स्पंदन... मूक पेड़ों की भाषा और भी कितना कुछ... सब कुछ... कि अंततः हमारे पास बचता है क्या... बस यादें ही तो... ! ये यादें ही हैं जहाँ हम न होने के बाद मुस्कुराते हैं... किसी के स्मृति पटल पर... ! समय सब कुछ छीन लेता है... यादें छोड़ देता है हमारे लिए... कि जीने का कोई तो संबल हो... !!
विशाल वृक्ष की कितनी ही टहनियां, कितने ही पत्ते, कितना ही बीता वर्ष सब याद की शक्ल में ही तो दर्ज़ है पेड़ की स्मृतियों में... कुछ भी खोता कहाँ है... मिटता है तो केवल भ्रम... जो था जैसे था सब यथावत रहता है स्मृतियों में... सब कुछ लूटते हुए भी समय की श्रृंखला कुछ तो दे ही जाती है हम श्रीहीन इंसानों को... !!
ये इतना कुछ यूँ ही लिखते हुए बहुत कुछ रह गया है... तथ्य एवं इतिहास... वो अगली कड़ी में कभी...
अब जैसी भी है सुबह हो ही गयी है तो अन्य कार्य भी आवाज़ दे रहे हैं... चलें उस पल से निकल कर इस पल में... कि यही जीवन है... कल और आज के बीच सामंजस्य बिठाता... डोलता हुआ दो सिरों के बीच पेंडुलम सा... आंसू और हंसी के बीच की कितनी ही तस्वीरें उकेरता... कितने ही रहस्य खोलता... तठस्थ जीवन!

इस्ताम्बुल:"लोनली प्लानेट"... !!


आधी अधूरी यह पोस्ट भी उस दिन ही तैयार थी... सोचा था उसी दिन शाम तक पोस्ट भी हो जाएगी... पर टल गयी बात... और रात आ गयी... दो एक दिन मन यूँ ही डूबा रहा... खोया रहा बस ऐसे ही... फिर रात, चाँद और एक अकेले तारे को तकते हुए कुछ लिख गया... लिखी बात खुद को सांत्वना देने को ही लिख गयी... खुद को ही तो बहलाने समझाने को घटित होता है लेखन...
जाने कितना समझे हम... जाने कितना उबरा मन...
खैर, अब इन बातों को यहीं विराम दे कर लौटते हैं डेढ़ वर्ष पूर्व की गयी यात्रा के 'उस' पड़ाव तक... जिसे "लोनली प्लानेट" भी कहा जाता है...
*** *** ***
सुबह सुबह प्रारंभ हुई यात्रा सूर्य के विदा होने तक चलने वाली थी... फिर यात्री वापस एअरपोर्ट पहुंचा दिए जाने वाले थे... जहाँ से सब अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाने थे...!

एअरपोर्ट से ही एक परिचय यूँ ही हमारी निधि बन गया... दोस्त, तुम मिली तो यूँ गिरते पड़ते ठीक ठाक ही तय हो गया सफ़र... यूँ अचानक मिलने का शुक्रिया... जाने अब भी तुम स्टॉकहोम में हो या नहीं... फिर मिलना भी तो नहीं हुआ... हमारी सब प्लानिंग धरी की धरी रह गयी... !कितना कुछ बस सोच कर ही रह जाते हैं हम... वास्तविकता में बातें कभी आकार ले ही नहीं पातीं... खैर, याद कर रहे हैं वह संयोग... हम दोनों ही शोर्ट नोटिस पर यात्रा कर रहे थे... और उद्देश्य भी एक ही था... विवाह अटेंड करना...! ये भी एक संयोग ही था कि इस्ताम्बुल से कनेक्शन फ्लाईट थी... और दिन भर का अवकाश भी था भ्रमण के लिए... !

मित्र, ये तुम्हारी उपस्थिति ही थी कि इतनी तस्वीरें हैं आज मेरे पास जिसमें हम और सुशील जी एक साथ उपस्थित हैं... नहीं तो ऐसा होना अक्सर दुर्लभ ही होता है तस्वीरों में! तुम्हें याद कर पुनः मिलने की सम्भावना को मन में बचाए रखने की युक्ति लगा रहे हैं...


बढ़ते हैं अब इस्ताम्बुल की ओर... जहाँ बस पर बैठे फुहारों में भीगते हुए हम चले जा रहे थे... गाइड अपनी रफ़्तार में कई जानकारियां दिए चला जा रहा था... भीड़ को सभी बातों पर अमल करने की सलाह दी जा रही थी क्यूंकि लिमिटेड समय था और देखने को बहुत कुछ था... हर जगह उतरना इसलिए संभव नहीं था क्यूंकि पार्किंग की समस्या होती... और न भी होती तो इतना समय ही कहाँ था... सो सहमतियाँ बनती गयीं और ऐसे कुछ ही स्थान थे जहां हम उतरे... शेष अवलोकन सवारी पर से ही हुआ...!
जो जैसे याद आ रहा है लिखते चले जाएँ... है तो इतना कुछ कि मन कन्फ्यूज़ हो जाता है... तभी तो इतना वक़्त लगा... वक़्त ही नहीं मिला, इस बीच कितनी ही यात्राएं हो गयीं मन ही मन घर की... भारत की... !!!

अब जरा लौटते हैं पुनः उसी बस पर जहाँ गाइड की आवाज़ गूँज रही है... वह अपनी गति से बोले चला जा रहा है... रूटीन चीज़ ही ऐसी है... यंत्रवत हो जाता है इंसान... यात्रा इन सबसे मुक्त करती है... कि वह रूटीन का हिस्सा नहीं होती... वह कई अनिश्चितताएं साथ लाती है... कई बार सरप्राइज़ भी करती है और बहुत संभव है कभी कभार यात्रा यंत्रणा भी हो जाये पर यंत्रवत होने से बचाती भी है... आज़ाद करती है... अपनी परिधि से निकल कर देखने परखने समझने की दृष्टि देती है... !!
हम बस से उतर कर अब इस्ताम्बुल की सड़कों पर झम झम बारिश में इधर उधर टहलते हुए छतरी बेचने वालों से बचते हुए चलने का भरसक प्रयास कर रहे थे... एक एक को कम से कम दस छतरी वाले छतरी खरीद लेने की गुज़ारिश कर रहे थे... प्रयास करना उनका काम है कि हर कोई संभावित ग्राहक ही तो था... हमको तो छतरी लेनी ही नहीं थी कि भींगने का अपना ही मज़ा है... गाइड भी यूँ ही भींगते हुए यंत्रवत बोले चले जा रहा था...

अब तथ्यगत बातें अगली कड़ी में... कुछ एक स्थानों का विवरण... स्पंदित जीवन... सब अगली बार... सब कुछ लिखना तो शेष ही है अभी भी कि अब तक तो मन का भटकाव ही दर्ज हो पाया है... इस्ताम्बुल तो बाकी है अभी!

तेरी ख़ातिर... !!



चाँद
घटते हुए...
नाव के आकार का हो चला था...


आज एक तारा भी दिखा... !


अमूमन
तारे नहीं दीखते हैं,
खिड़की से झांकते हुए मेरे मुट्ठी भर आकाश में.

खैर,


हर क्षण रंग बदलता था अम्बर


लाली...
छा जाने को तत्पर थी,


चाँद
और वह तारा...
धीरे धीरे
ओझल होने की तैयारी में थे...


वस्तुतः
उन्हें स्वयं
कुछ नहीं करना 


सूर्य की किरणें वित्तीर्ण होंगी
तो...

रात के तारे
रात का चाँद

सब स्वमेव छिप जायेंगे... !!

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यही तो समझना है:

रात को बीतना ही होता है
वो बीतेगी...
बीतती ही है...


उदित होगा

और आस का सूरज


समस्त
टिमटिमाती निराशाओं को
ढांप लेगा... !!


इसलिए
ज़रूरी है...


इस पल की निरर्थकता से
हताश हुए बिना 


अगले क्षण की राह तकनी है

ज़िन्दगी! हमको तेरी ख़ातिर
हौसलों की कमान थामे रखनी है... !!

*** *** ***

चाँद तारों से पटा अम्बर है... और बेतुकी बातों पर रीझता मन है... आस विश्वास के बीच टिमटिमाती लौ है... वही जीवन है... !!



इस्ताम्बुल... !!




घर जाना... घर हो जाने जैसा होता है... जैसे एकाकार होने जा रहा हो मन अपनी चिरपरिचित दुनिया से... अपने परिवेश से... अपनी जानी पहचानी हवा के आगोश में निश्चिंत हो चैन की नींद सोना जब दुर्लभ हो ऐसे में ऐसी संभावनाओं का जन्मना... पंछी बना देता  है मन को ही नहीं सम्पूर्ण अस्तित्व को भी... ऐसा लगता है जैसे दौड़ते हुए पहुँच जायें...!
दौड़ते हुए गिरते भी हैं... गिरे भी... पर धैर्य किसे है... आज भी डेढ़ साल पुराने चोट के काले निशान हैं... इस्ताम्बुल में उड़ते उड़ते चल रहे थे... गिरे और क्या और अच्छी खासी यादगारी मिल गयी... ये अच्छा है... टूटता फूटता कुछ नहीं है बस दर्द और काले नीले निशान हो कर ही रह जाते हैं, नहीं तो सुशील जी तो मेरी मरम्मत ही करवाते रह जाते आये दिन...!
खैर, ये बात हो रही है... २०१४ की... छोटी बहन की शादी थी... हम घर जा रहे थे... यात्रा का एक पड़ाव था... उस पड़ाव पर कुछ समय का अवकाश था हमारे पास और मेरे पास था एक चंचल मन... जो बार बार उस क्षितिज पर उड़ कर चला जाता था... वो क्षितिज जहां कोई मेरा इंतज़ार कर रहा हो...! ये ऐसा ही है... दूरी हो तो हो... पर जुड़े हुए जो है वो जुड़े ही रहते हैं मन... कारण, तर्क-वितर्क, सबसे परे... उनका साथ, कभी नहीं छूटता... कोई किसी से नहीं रूठता कभी भी... हाँ! भ्रम हो सकता है कि रूठा हुआ है समय... टूट गयी है अनन्यता...पर ऐसा होता नहीं है... बादल सूर्य को ढंकने का भ्रम पाल सकते हैं...
पर वास्तविकता तो कुछ और ही है...
रिश्तों के आकाश पर सदा दिव्य भोर ही है...!
अरे! ये तो राह भटक रहे हैं हम... क्या लिखना है और क्या क्या लिख रही है कलम... थोड़ा ठहरो भई, पता है तुम मेरे वश में नहीं... हम तुम्हारे वश में हैं... पर कभी सुन भी लिया करो... कितने समय से छूटा हुआ है... आज पूरा कर दो इसे... लेखनी! आज जरा लिख जाने दो इसे...!
*** *** ***
दो महाद्वीपों के बीच बंटा एक शहर... इस्ताम्बुल
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जाने कैसे तो ये रूट लिया हमने तब भारत तक पहुँचने हेतु... पड़ाव की सुन्दरता यात्रा को यादगार बनाती है... वो यात्रा तो ऐसे भी यादगार होने वाली थी... मंज़िल भारत जो था... !!
१६ जनवरी २०१४ की रात को स्टॉकहोम से चले थे हम... आधी रात के बाद कभी इस्ताम्बुल पहुंचे... सुबह होने तक इंतज़ार करना था... वही सोये बैठे समय बीता... सुबह हुई... बारिश हो रही थी... फिर भी हम बस की खुली छत पर बैठे... फुहारों के बीच गुजरते दृश्यों को आँखों में संजोया  और कैमरे में भी... ये तो तय ही था कि एक ही बार इस रास्ते से गुज़र रहे हैं हम... इस ओर लौटना न होगा फिर... !

यूँ लिखते हुए भी तो इस पोस्ट पर आज कितने समय बाद लौटे हैं... लौटना इतना मुश्किल क्यूँ होता है... हर सन्दर्भ में... !!! जाने क्यूँ? अब तक क्यूँ नहीं लिख पाई वह यात्रा...
शायद इसलिए कि हर बात के लिए एक वक़्त निर्धारित होता है... जब तक वह वक़्त नहीं आता तब तक अधूरी ही रहती है बात... मन में तो कितना कुछ उमड़ता घुमड़ता है... कहाँ प्रेषित हो पाता है सब... कि सब की नियति पूर्व निर्धारित है... !!
अब आज और लिखना न हो पाए शायद... पर पेंडिंग भी नहीं रखनी यह पोस्ट... आधी अधूरी ही सही... प्रकाशित हो... शेष अगली कड़ी में लिख जाये... कल ही... जल्द ही...

तब तक कुछ तस्वीरों के साथ लेते हैं विराम...
ज़िन्दगी लेकर आएगी फिर परिकथाओं वाली शाम...








सुदूर कहीं... !


द्वेष, दंभ, दंश के संसार से
कहीं दूर... सुदूर कहीं...



कश्ती!
ले चल हमें कहीं और,
कि ये अपना संसार नहीं... ... ... !!



यहाँ रोज़ बातें होती हैं,
दिल दुखाया जाता है...



अभी एक बार
बरस कर रुकी ही थी,
कि फिर आँख बही... ... ... !!



विडम्बनाओं का
बढ़ता ही जाता है आकार प्रकार...



कैसी क्षणिक है
ये ज़िन्दगी,
आज है, कल रही... न रही... ... ... !!



शुभता, स्नेह, परस्पर प्रेम से सींची,
होगी न कोई दुनिया कहीं...



कश्ती!
दी पतवार तुम्हारे हाथों में,
चल ले चल, हमें वहीँ... ... ... !!


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एक पंक्ति पर नज़र पड़ी... "द्वेष, दंभ, दंश के संसार से कहीं दूर... सुदूर कहीं... ! --सुरेश चंद्रा "


किसी प्रश्न का उत्तर थी शायद वह पंक्ति...
"कहाँ...?" इस प्रश्न का उत्तर बन कर प्रेषित हुई हो ऐसी सुन्दर संभावनापूर्ण पंक्ति तो उसे विस्तार तो मिलना ही चाहिए... पहली पंक्ति की प्रेरणा से जो जुड़ता गया सो लिख गयी कलम... सहेज ली जाये यहाँ... कि खो न जाये प्रेरणा का आकाश हमसे... लुप्त हो न जाए... टूटा फूटा जो भी विस्तार दे पायी मेरी कलम और कश्तियों को भी तो सहेजना है... कि कागज़ की कश्तियाँ है... और पल पल उनके खो जाने का डर भी... नष्ट हो जाने की आशंकाओं के बीच सांस लेते जीवन को सहेजना सरल लगता होगा, पर होता नहीं... कभी नहीं...
अब ये कागज़ की नाव बनाना सरल लगता हो पर मेरे लिए सरल कहाँ था... सुशील जी ने एक एक फोल्ड के साथ कई बार डेमोंसट्रेट किया तब जा कर हम ये कश्तियाँ बनाने में सफल हुए थे... 


नाविक! प्रवाह की कैसी फिक्र...
हर क्षण है धारों के बीच तेरा ही एक ज़िक्र...





चलते चलते... !!


रात एग्यारह बजे के आसपास से ही बारिश हो रही है... मन अन्यान्य चिंताओं से घिरा बरस रहा है... ये बरस कर चिंतन तक की राह तय कैसे करे यही विचार रहे हैं कांच पर पड़ी बूंदों को एक टक ताकते हुए...  .... !
कृष्ण जन्म की रात के कितने ही विम्ब हैं मन में... पढ़ा हुआ... देखा हुआ... सुना हुआ... कैसी अँधेरी रात रही होगी न... मुसलाधार बारिश... कारागार में जन्म... देवकी माँ से यशोदा मैया तक की यात्रा... योगमाया का अवतार... !

लोककल्याण हेतु धरा पर जन्म लेने वाले प्रभु ने कितनी लीलाएं की... सभी लीलाओं से भक्तों को विभोर किया... गीता अवतरित हुई... हम धन्य हुए...!
अर्जुन सा समर्पण हो, कृष्ण आज भी हमारा रथ हांकने को खड़े है... सुदामा सा सखाभाव हो तो प्रभु की कृपा प्राप्त हो... गोपियों सी भक्ति हो तो प्रभु स्वयं प्रगट हो जायें... हममें आपमें से ही... किसी का रूप धर कर; ये सब क्या कहने लिखने की ही बातें हैं..., नहीं न... ??? ये अनुभूतियों के सत्य हैं... जिनकी कोई प्रामाणिकता नहीं, लेकिन जिनसे बड़ा सत्य भी , अन्य कुछ नहीं... !!
*** *** ***
रात का अँधेरा... नीरव शान्ति... बूंदों की आवाज़... कल्पना में कहीं बजती बांसुरी की कोई धुन... और क्षण क्षण सरकता जीवन... ! कब कहाँ कैसे किधर निकल जाये राह... कब किससे  जुड़ जाए मन... कब किससे टूट जाए मन... क्या परिस्थितियां उत्पन्न हो कि अन्तःस्थिति घुटने टेक दे... और जूझता मन अशांति से भर जाए... ये सब स्थितियां कब कैसे प्रकट होंगी कोई नहीं जानता... ! ठीक रहते रहते... सब अकस्मात् बिगड़ जाता है... फिर तकते रहते हैं हम आसमान... मुट्ठी भर शांति की तलाश में...!
कहते हैं खुद के भीतर ही ढूंढना है जो भी ढूंढना है... तो अगर शान्ति की तलाश है तो वह भी भीतर ढूँढने पर ही मिलेगी... हे आकश! हे आकाश सी संभावनाओं वाले कृत संकल्पों! हमें राह दिखाओ कि क्रोध और अशांति से जूझते हुए मन प्रांत में हम जरा सी रौशनी ढूंढ कर प्रत्यारोपित कर सकें... ज़रा सी आस बचाए रखना कि हम इन घोर अंधेरों में जीवन की ओर विश्वास भरी दृष्टि से देख सकें...
*** *** ***
यूँ लिखते सोचते जाने कब सुबह हो गयी...
सुबह आश्वस्त करती है... एक नए दिन का आगमन हमेशा नयी आशाएं लेकर आता है भले ही दिन कितना ही उदास क्यूँ न हो... गगन कितने ही काले बादलों से क्यूँ न आच्छादित हो... समय की एक यही प्रकृति कितनी बड़ी आशा है कि ये जो भी है, ये ऐसा नहीं रहेगा... नित परिवर्तनशील वक़्त इन काले बादलों को उड़ा ले जायेगा और लालिमा बिखरेगी... धरा मुस्कुराएगी......
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चलते चलते रात ने...
प्रभात पर
अपना जीवन वार दिया...

सवेरा
ऐसा भाव विह्वल हुआ

उसने
रात्रि की अंतिम बेला को
अंक लगा कर तार दिया... !!

मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्... !!


जीवन कितनी दूर ले आता है हमें... समय कहाँ कैसे कब क्या प्रस्तुत करेगा, कोई नहीं जानता... ऐसे में कुछ एक मंत्रोच्चार से भाव हमें हमारे बचपन से... हमारे घर से जोड़े हुए है...
बालसुलभ कुछ लकीरें खिंची... मन ही मन मधुराष्टकम गाया अपने भाई बहनों के साथ... 
ये यूँ मेरी तुच्छ कोशिशें अंकित हो जाये यहाँ भी... कि लौटना चाहता है मन... उन दिनों में... जब प्रसाद पाने के लिए आधी रात तक जागते थे हम और उत्साह में मम्मी के साथ निर्जला व्रत भी रख लेते थे...

*** *** ***
सभी को कृष्णाष्टमी की शुभकामनाएं!
हरि ॐ तत्सत्!

मीरा... !!

बुखार
खोयी सी संतुलन की धार


रोता सिसकता मन
तड़पता हुआ
जीवन


रो रो कर सारा घर सर पर उठाये हुए
जो परेशान हुए जा रहे थे...


किसे पुकारें इस बात की
थाह नहीं पा रहे थे...


तभी दूर से आवाज़ आई...



कुछ रचनात्मक करो सब भूल जाओ
मीरा बनाओ...!!

*** *** ***


यूँ ही शुरू किया... कुछ लकीरें खींचीं... और एक आकृति बन गयी... भक्ति में लीन मुख की सुषमा जाने कैसी होती होगी... इतनी क्षमता न पेंसिल में है, न शब्दों में कि उकेर सके, वह आभामंडल...
ईश्वर सब जानते हैं... उन्हें स्वीकार है हर एक प्रयत्न हमारा... बस भाव ही तो प्रमुख है, शेष सब गौण... !!

बाक़ी है सफ़र...

निरुद्धेश्य
पटरियों के आस पास चलते हुए
ट्रेन पर सवार हो गयी...



पन्ने पलटती हुई चेतना
कुछ दूर तक गयी...

फिर वापसी की राह ली



कि लौटना ज़रूरी था... !


दिन के ख़ाके में कितने ही ऐसे चाहे अनचाहे मोड़ थे
जिनसे गुज़रना नियति थी...



सो पन्नों के बीच बुकमार्क लगाया
बेचैनी को ज़रा फुसलाया 



और लौट आये घर...
कि अभी लम्बी है डगर...


बिना लक्ष्य के
निकले थे भटकने...
कि जुटा सकें कुछ धैर्य
और ज़रा सी हिम्मत...



निर्धारित गंतव्य की यात्रा हेतु!


कि अभी बाक़ी है सफ़र...
अनदेखे हैं कितने ही आनेवाले पहर... !!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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