अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उलझन सुलझन की दुविधा में...

कहते हो-
जीवन उलझा हुआ है...


जीवन ही क्या?
सृष्टि में कहाँ कुछ भी
सुलझा हुआ है...!


एक जगह सुलझती है
तो फिर कहीं उलझ जाती है...


गांठें कहाँ कभी खुल पाती हैं...


अन्यान्य धागों की भीड़ में
उलझन सुलझन की दुविधा में
ज़िन्दगी निकल जाती है...


समय नहीं रुका है
नहीं रुकेगा...


हो सके तो
इन्हीं व्यस्तताओं के बीच
कभी अवकाश निकालो...

आओ बैठो


उलझी बातें
सुलझायेंगे... 


मौन ही मौन
हम मौन की
महिमा गायेंगे...!!

एकाकी मन और बूँदें...!!

भींगे हम...
भींगा मन...
दोनों ही थे नम...


वो अकेला क्यूँ भींगता...?
उसके साथ हो गए हम...


बूंदों की थिरकन पर
मचल उठा अकेलापन...


दोनों ही फिर जम कर भींगे 


एक मेरा छाता और एक हम...!


बूँदें...
एकाकीपन...
और जीवन...


क्या साम्य है इनमें...?
क्यूँ इस जोड़ घटाओ में पड़ते हम...


बस भींगते रहे बूंदों संग
घुलता रहा कतरा कतरा उदास मन...


दोनों  ही फिर जम कर भींगे 


एक मेरी ज़िन्दगी और एक हम...! 




बेवजह... यूँ ही... !!

ज़िन्दगी अजीब राहों से गुजरती है... इतनी जल्दी सबकुछ बीत रहा है... किनारे छूटते हुए से दिख रहे हैं... मन बेहद उदास है... जाने कैसी स्थितियां परिस्थितियां बनी हैं कि शब्द शब्द को तरस गया है मन... आवाज़ तक पहुंचना स्वप्न हो गया है... सभी किनारे हमसे रूठे हुए हैं और मझधार में जो एक तिनका है वह भी हमसे दूर भागे जा रहा है...

इतना अकेला... इतना असहाय कभी नहीं महसूस किया हो शायद... या फिर ये भी एक दोहराव ही था उस सबका जो बीत चुका है... कितनी ही बार खुद को इतना अकेला पाया है जैसे कि पूरे संसार में अकेले बच  गए हों... कोई न हो जिससे हृदय की पीर कही जा सके... कोई न हो जो पोंछे आंसू... हो भी कैसे... जो भी हैं वे तो रुलाने वालों में शामिल हैं...; पर अनुभव कहता है... बीत जायेगा यह भी वक़्त... ये भयावह अकेलापन मेरा भ्रम ही हो शायद...! भ्रम और सत्य को विभाजित करती सीमारेखा जाने कहाँ है... लेकिन एक सत्य तो यह भी है कि हम सब अकेले हैं... ये साथ... सपने... प्रेम... सब भ्रम है..., अपना है... तो बस, ये एहसास कि अकेले ही आना हुआ है... अकेले ही जाना भी होगा और ये मध्य में केवल मोह ममत्व और भ्रम के फेरे हैं... सिवाय दुःख के जिससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला...!

***

जाने क्यूँ ऐसी उदासी है... जाने क्यूँ इतनी उलझनें हैं... जीवन सरल से इतना क्लिष्ट कब हो गया... आँखों का निर्झर रुकता क्यूँ नहीं... दूरियों ने यूँ अपनी जगह बना ली है कि सामीप्य के मानक अब मेरे लिए स्वप्न होते जा रहे हैं...

शायद ये दौर ही ऐसा है... ये बीतता समय सब छीनता जा रहा हो जैसे... "कुछ नहीं बचेगा... सब ध्वस्त हो जायेगा", ऐसी निराशा से जूझ रहा मन जाने क्या लिखे जा रहा है... चीखता हुआ एक मौन है... रोती हुई चेतना है और अकेला मन है...

***

लिखने को... पूरे करने को... कितने ही आधे अधूरे ड्राफ्ट्स पड़े हैं... कितनी ही यात्राओं की तस्वीरें पुकार रही हैं अपनी दास्ताँ बयां करवाने को... कलम भी उद्धत है लिखने को... पर जाने कहाँ है हम... कहाँ खोया हुआ है मन... ये आंसू लिखे जा रहे हैं... बेवजह... यूँ ही... जाने क्यूँ...!!!

***

...ऐसे ही शायद खुद को समझाते हुए नियंत्रित करना होगा... मन को सकारात्मकता की ओर मोड़ना होगा... कुछ जोड़ना होगा... टूटे हुए कांच को फेंकते हुए संभल कर निकलना होगा... जो चुभ गया है टुकड़ा उसे निकालना होगा... जरा सा उपचार भी जरूरी होगा फिर... हर चोट ठीक हो जाती है... हर घाव भर जाता है... आंसू जो बह जाये तो मन भी शीतल हो जाये यही सोच कर रोये जा रहे हैं...

आसमान में ढेर सारे बादल हैं... धरती पर ढेर सारी बारिश है... भीगते हुए हम हैं और एक हमारा मन है जो फुहारों के सानिध्य में अब आश्वस्त सा दिखाई पड़ रहा है... "सब ठीक हो जायेगा", ये सांत्वना खुद को ही देता हुआ मन, सुबकते हुए... संयत होने की कोशिश में लगा है...

बारिश के बाद वाली धुली धुली सुबह का इंतज़ार... सुखद लम्हों को याद करता मन... समय की विकटता के समक्ष अब तन कर खड़े होने की कोशिश में जरा जरा कामयाब होता प्रतीत होता है... यूँ बकवास बेवजह लिखते हुए एक किताब याद आती है... एक पंक्ति मेरा हाथ थाम लेती है बढ़कर और विराम तक बढ़ते हुए मन आसरा पाता है...

"I give myself a good cry if I need it, but then I concentrate on all good things still in my life..."
--
Mitch Albom [Tuesdays with Morrie]

***

सच है, हम अकेले नहीं हैं... हवा में तैरती कितनी ही तरंगे हैं जो हमारा संबल बनती हैं... उस इश्वरीय चेतना को नमन... उस शब्दशक्ति को नमन जो पोंछती है आंसू... भीषण नीरवता में जो दीप जलाती है... उस श्रद्धा को नमन... और नमन उस दृष्टि को... जो हम जैसे पर भी अपनी करुणा बरसाती है...
इस वीराने में बजे कोई धुन... पहुँच सके हम तक कोई आवाज़... हमारी आवाज़ दे दस्तक कहीं... ये बेवजह की बातें ले विराम अब कि हम अन्य बिखरे कामों को समेट सकें...!

'कलाम'... आपको सलाम...!!

३ मार्च २००६... वो एक विशेष दिन था... पूरा परिसर जैसे सिमट कर उस आसमान के नीचे समा गया था जिसके तले खड़े होकर हमें राष्ट्रपति को सुनने का सुअवसर मिलने वाला था... 
दुर्भाग्यवश अन्यान्य कारणों से हम नहीं प्रत्यक्ष सुन पाए थे उन्हें उस दिन और केन्द्रीय पुस्तकालय में अकेले बैठे रोज़ की तरह अपना दिन प्रारंभ कर रहे थे... पर ये कोई सामान्य दिन नहीं था... काशी की धरती पर प्रेरणाश्रोत कलाम साहब की उपस्थिति इस दिन को विशेष बना रही थी...
हमें आज भी स्पष्ट याद है वो चमकती आखें, वो बुलंद हौसले, वो अपरिमेय ख़ुशी जो हर उस चेहरे से झलक रही थी जो उन्हें सुन कर लौटा था...! ऐसा उत्साह... ऐसी उर्जा का संचार विरले ही होता है...! हर एक के पास कहानी थी... हर एक के पास अपने प्रेरणापूंज के विषय में कहने को कितना कुछ था... हमें आभास ही नहीं हुआ कि हमने कुछ खोया है... इतने लोगों से जो सुनने का अवसर मिला उस कथित भाषण को...; कितने वक़्त तक वो कुछ घंटे चर्चा का विषय रहे, वो कुछ घंटे... जब डॉक्टर कलाम उपस्थित थे हमारे विश्वविद्यालय परिसर में!
आज भी वही सन्नाटा महसूस कर पा रहे हैं जो उस दिन उस परिसर में महसूस किया था... उनकी उपस्थिति का सन्नाटा था वो... और आज यह उनकी अनुपस्थिति का सन्नाटा है... वो खालीपन जो नहीं भरेगा कभी...!
हमारे हृदय में प्रेरणा बनकर जीवित रहेंगे सदा वे और यह प्रेरणा ही हमें सपनों को पूरा करने का हौसला भी देगी...!
" उठा धरा से, बढ़ा, गगन आकाश बन गया 
धरा देखती रही... पुत्र इतिहास बन गया ! "

ये बुलबुले...!

ये बुलबुले...


बस क्षण भर का अस्तित्व...


मुस्कानें...
बस पल भर में अंतर्ध्यान...


देती हुई स्थान...
विराट व्यथा को...


शायद यही सही भी हो...


कि...
अजब है यह संसार...


यहाँ औरों को खुश देख
मुरझा जाते हैं लोग... ... ...


दिखावे की दुनिया है...
झूठे हैं हम...


तभी तो बुलबुले फूट जाते हैं...


सतरंगी आभा फैलाते हैं...
और अगले ही क्षण हमसे रूठ जाते हैं... ... ... !!


कैसे तुझको पाएं...???


तुमने हमें विवेक तो दिया
पर विवशता भी दी


हमारी विवशता है...
हम जीवन के मोह पाश से
उबर नहीं पाते हैं...


हम आगत विगत की
परिक्रमाओं का
आजीवन बोझ उठाते हैं...


छूटता नहीं दुःख
दूर से स्वप्न सम निहारता है सुख 


आस विश्वास तिरोहित
भीतर कोलाहल समाहित 


ऐसे में
कैसे तुझ तक आयें


सच्चिदानंद प्रभु! दुखी जीव हम सारे
कहो, कैसे तुझको पाएं...???


इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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