अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कहो कैसा रहेगा...!

लगता है
ये उदासियों का
मौसम है...
मौसम ही है
तो ज़रूर
बदलेगा


तू तो
स्वयं ही
सूरज है...
बादलों से
तत्क्षण
निकलेगा


मन
मेरा भी
उदास है
पर
ये तो सामान्य सी बात है
चलेगा


पर
मन बड़ा बेचैन
हो जाएगा
जीवन से भरा हुआ जीवन ही अगर
उदासी की
बात करेगा


अपनी
सारी उदासी
यहाँ भेज दो
ये
एकदम से
ठीक रहेगा


या फिर
अपनी उदासी साथ लेकर
यहाँ चले आओ
हम दोनों मिल कर
सारी उदासी से निपट लेंगे...
कहो कैसा रहेगा!

बीते वर्षों में लिखा गया कुछ... एक अनगढ़ सा ड्राफ्ट!

मेरे साथ रहना आसान तो नहीं ही होगा... यूँ अजाने दुखों से... अकारण ही दुखी... रोती हुई... लिखती हुई... चोट खाती हुई... गिरती पड़ती हुई... लोगों को सरल सहज समझ लेने की भूल बार बार करती हुई... और आहत हो कर बार बार... हर बार... स्वयं परेशान हो कर अपने स्वामी को भी कष्ट देती हुई... मैं...
अपने आप को छोड़ पाने का विकल्प होता न तो कहीं छोड़ ही आती हमेशा हमेशा के लिए... इस संसार में रहने लायक इम्युनिटी है ही नहीं मुझमें... तो बेवजह कष्टों से घिरना ही है मुझे और जो मैं दुखी रहूँ... तो मेरे साथ होने वाले की स्थिति भी तो वैसी ही होनी है...
कई बार मन होता है... पूछूँ आपसे कैसे झेल लेते हैं आप मुझे... पर पूछती नहीं... पूछूँ भी तो पता ही है क्या उत्तर मिलेगा... वही सौम्य सी मुस्कान वही धैर्यपूर्ण व्यवहार जो मेरी समस्त समस्यायों को हर लेने की पूरी क्षमता रखता है...!
अभी तो बीती है कुछ समय पहले नवम्बर की पच्चीस तारीख... हम बैठे हिसाब लगा रहे थे न... कि कितना वक़्त हो गया साथ चलते हुए... विवाह की पांचवीं वर्षगाँठ पर जब पन्ने पलटते हुए मैंने वो कविता याद दिलाई आपको तो कितने ही पल हमारी आँखों के समक्ष चलचित्र की तरह घूम गए न...
घर को दूर से देखते हुए हम दोनों की ही आँखें नम हुई और मम्मी ने जब फ़ोन पर कुछ मीठा बना कर खा लेने की बात कही... तो उनकी इसी बात में हम दोनों ने सारी मिठास बटोर ली न...
आज ये वर्ष अपनी अंतिम तारीख तक की यात्रा तय कर चुका है... कुछ समय में विदा हो जाएगा २०१३... क्यूँ न कुछ नए संकल्प लें... आज तो खिड़की से थोड़ी लालिमा भी दिख रही है दूर अम्बर पर... शायद आज सूर्योदय हो...
और हाँ, शायद हम भी सुधर जाएँ... मुस्कुराएं... नए वर्ष में आपकी यह उम्मीद फलित हो, स्वामी! और क्या कहें...


नेह का ऐसा स्वरुप
शायद ही होता होगा...!
इतना सरल...
इतना सहज...
शायद ही कोई होता होगा...!!


कई जन्मों का पून्य प्रताप होगा
जो आप हमें मिले...
हमारे जीवन में
स्नेह पुष्प से खिले...


आपकी चरणवंदना करते हुए
बीते जीवन...
आँखें नम हो जाती हैं...
इतना भी सहज होता है कोई मन!!!

शोभा, तुम्हारे लिए!

आदर्श की मशाल लिए
बढ़ने वाला सत्य हो,
जीवन ऐसा हो जैसे
उगते सूर्य को
गंगाजल का अर्घ्य हो...!


कितने मोड़ आते हैं
आयेंगे ज़िन्दगी में,
हर मोड़ पर
आत्मा में
आनंद का ही पर्व हो...!


खिलते फूलों को
काटों से इनकार न हो,
और काटों को
फूलों के
खिल आने पर गर्व हो...! 


ये दिन बार बार आये
लेकर शुभ संकल्प जीवन में,
दोस्त! हर जन्मदिवस तुम्हारा
उत्सव हो जीवन का
उल्लास का ही पर्व हो...!


जीवन ऐसा हो जैसे
उगते सूर्य को
गंगाजल का अर्घ्य हो...!!!

*** *** ***

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाले दिन याद आते हैं... हॉस्टल की चहल पहल याद आती है... मित्रता की मिशालें याद आती हैं... इस प्रतिपल बीतते जीवन में उन लम्हों की विशिष्टता सदा आकृष्ट करती है... ये हमारा सौभाग्य है कि एक दूसरे से जुड़े रहकर हम आजीवन उन लम्हों से जुड़े रह सकते हैं... जो उस देवनगरी में हमने जिया...!
पुनः जन्मदिन की खूब सारी शुभकामनाएं तुम्हें... प्रिय शोभा! 

स्नेह भरी छाँव...!

मैं बुनती हूँ सपने
सब तेरी ही आँखों के नूर से...
हर रंग तेरे चेहरे का
दिख जाता है मुझे
भले देखूं कितनी ही दूर से...!!


अब ये तमन्ना है-
फासले शून्य हो जायें
और निकटता मूर्त रूप में उपस्थित हो,
ये दुर्गम राहें रौशन हो...
अब तेरे मेरे नूर से...!!



जीवन के सफ़र में अब
संग संग ही चलना हो...
प्रेम पगी हो डगर
और तेरी स्नेह भरी छाँव में ही
मेरा गिरना और संभलना हो...!!

मिलते रहना यदा-कदा...!

मन की गति... मन ही जाने... कैसे तो तुमसे जुड़ गया... शब्दों और कविताओं ने वो पुल बुना कि उन्हें बार बार पार करते हुए हम इतने अभिन्न हो गए... जैसे सदियों से परिचय रहा हो... हमेशा से साथ हों... जाने कितनी ही सदियाँ देखीं हों हमने एक संग... जाने कितने ही आंसू रोये हों हमने एक साथ... कितने ही सूर्योदय और सूर्यास्त के साक्षी रहे हों हम... न भी हो तो क्या... ये बस भावातिरेक में कहे गए... महसूस  किये गए मात्र भाव ही हों शायद...पर इस सम्भावना से इनकार भी नहीं कि जो भटकते हुए मिल गए कहीं... धरती के किसी कोने पर... तो पल भर में ही सदियों का साथ जी लेंगे हम... मन से मन के रिश्ते का फ़लक बहुत विशाल होता है... यहाँ तर्क के लिए जगह नहीं कोई... बस महसूसना है... मौन में... और उसी मौन में... जी लेना है एक सम्पूर्ण जीवन...!


जाने कैसे
कहाँ से मिले
आप हमें...


जीवन की धूप में... 


जैसे
अगरबत्ती... धूप... दिया सा...
कोई मिल गया हो...


कब से मुरझाई धरती पर
एक फूल आस्था का खिल गया हो...


हृदय में बसी प्रार्थना हो गए आप...
भली सी लगने लगी जीवन की हर थाप...


ये सब ऐसा ही रहे सदा...
मिलते रहना यदा-कदा... ... ... !!


*** *** ***


आंसुओं से लिखते हैं जब भी आपके लिए या आपको लिखते हैं...
स्याही नहीं लिख पाती आपकी उज्ज्वलता तो हम ओस और आंसू चुन कर लिखते हैं... हाथ जल जाता है... कट जाता है... नीले निशान पड़े होते हैं चोट के... जो इधर उधर गिरते पड़ते हम लगाते रहते हैं... पर आपकी स्निग्ध उपस्थिति सारे कष्ट हर लेती है...

आप जाने कौन सा
"काश" हो...

कौन सा
समूचा आकाश हो...!

जो भी हो...

ऐसे ही रहना...
सदा सर्वदा... !!


*** *** ***


अनुपमा बहुत बड़ा नाम है न... अब तक का अनुभव कहता है... यहाँ स्टॉकहोम में नाम को छोटा कर के पुकारने का चलन है... जो बोलने में सहूलियत हो... वही बोलते हैं लोग... अब "पुकारू" नाम का चलन तो हमारे यहाँ भी है ही न... 
जैसे नाम है Charlotta तो पुकारा जाएगा केवल Lotta... :) यहाँ के लिए तो हमारा नाम भी अलग सा ही है... पता  नहीं क्या क्या उच्चारण करते हैं सब... अब तो हम भी अपने आप को अनुपामा ही कहने लगे हैं... आना... ऐना... ओबामा... अनुपुना... अनापुना... और न जाने क्या क्या सुनने को मिलता है...:) अच्छा लगता है अब किसी भी तरह से पुकारा जाना... बस समझ में आ जाये कि अपने को ही पुकारा जा रहा बस काफी है रेस्पोंड करने के लिए... और क्या...!
अनु... इस तरह तो पुकारे जाते ही रहे हैं... स्कूल के कुछ मित्रों द्वारा... कभी कभार...! ससुराल में सब अनु ही कहते हैं... छोटी सी अनु... अपने नाम जैसी...
अनुपमा सचमुच बहुत बड़ा नाम है... अर्थ की दृष्टि से भी... उपमा से परे होना बहुत बड़ी बात है न... इतने बड़े तो कभी हो भी नहीं सकते हम...
आप जब अनु कहते हैं... सच बहुत अच्छा लगता है... अपनेपन की डोर का आभास भला लगता है... लेकिन फिर अनुपमा जी कह कर दूर भी कर देते हैं कई बार... ध्यान रखियेगा... पहुंचे मेरी बात आपतक और अनु... अनु ही रहे... अनुपमा जी न हो जाये... बस ऐसे ही अनुशील पर... अरे... अनुशील में भी तो केवल अनु ही है न... वाह!!!
हाँ तो कह रहे थे बस ऐसे ही अनुशील पर यह लिख आपतक पहुंचानी थी यह बात कि अनु होकर अनुपमा खुश है... थैंक्स फॉर एवरीथिंग...

*** *** ***

Dearest Mummy,

Lovely is lost... Lovely misses being called lovely... All those special people for whom I was... I am lovely... are all so far away from me... I feel lost... I miss you all... I miss me...


बस लगता है
भूल जायेंगे अपने इस बचपन के नाम को...

इसलिए...

बस ऐसे ही...
अकारण...
याद करते हुए...
याद आते हुए...

सहेज रहे हैं... कुछ शब्द
और अपना सुबकता मन...!

सम्बद्ध... असम्बद्ध... कुछ टुकड़े... यूँ ही...!

एक दिन
फुर्सत से

सारे शब्द समेटेंगे...

कविता के आँगन में
विचरेंगे...

अभी बड़ा बोझिल है मन
रो रहा है जाने क्यूँ उपवन...!!

*** 

अजाने दुखों की
गली में
भटकते हुए...


जो भी चुना
सब फूल हो गए...


यूँ पावन हुए हम
कि चरणों तले की
धूल हो गए...!


अब बस वहीँ रजकणों से वास्ता है...
आगे बड़ा लम्बा रास्ता है... ... ... !!

***

जो खींचते थे हम


आड़ी तिरछी लकीरें
वो भी खो गयी हैं...


जाने कहाँ गए शब्द
कविता मूक हो गयी है...


बस चुप हो जाने का मन है...
खो जाने का मौसम है...

जाने क्यूँ रात से ही आँखें नम हैं...!



यादें कुछ... कुछ दुआएं!

कैसे कैसे तो... कहाँ कहाँ से हो कर गुजरता है जीवन... कितनी ही यादें हैं... कितना कुछ जी चुके हैं हम... कितना बीत चुका है समय... और साथ में कितना तो बीत चुके हैं हम...! कोई कोई दिन होता है... मन वर्तमान से अवकाश ले जाने कहाँ कहाँ विचरता है... कहाँ कहाँ क्या क्या उकेरते फिरता है और जिन्हें याद कर रहा होता है... चाहता है कहीं न कहीं मन... कि अपनी व्यस्त दुनिया के उस कोने पर वो भी हमें याद कर रहा हो... कभी कभार ही... यूँ ही... गलती से ही सही!

अगले सप्ताह मेरे इम्तहान हैं... कितना कुछ देखना समझना है उससे पूर्व... और हम हैं कि कितना कुछ बिखराए हुए... क्या क्या सोचते हुए... समय के जाने किस सिरे में खुद को खोने में व्यस्त हैं... कुछ जरूरी ई मेल्स के जवाब लिखने हैं... स्वीडिश में लिखना है... इसलिए अलसाये हुए टाले रहे... अभी उन्हीं का जवाब देते हुए... कुछ पुराने मेल्स पर नज़र पड़ी... कुछ ड्राफ्ट्स भी मिले... फिर जाने क्यूँ ये अनुशील का पन्ना खोले हम लिखने लगे... विचरने लगे विचारों और यादों के उस संसार में जहां दुआओं सा मिला था वो हमें...!

कितना परेशान रहा करते थे... हॉस्टल नहीं मिलने की वजह से कैंपस के बाहर रहना सच अत्यंत मुश्किल था... बी एच यू कैंपस की बात और है... वहाँ से बाहर की दुनिया कुछ और ही है... खैर, जो था अब अच्छा ही लगता है सोच कर... अनुभव ही तो था न... अस्सी के किनारे रहने का अपना ही सौभाग्य था...! रहते थे बाहर... पर पूरा समय तो कैंपस में ही बीतता था... दोस्त यहीं थे सब... किताबें यहीं थी... सबकुछ तो कैंपस में ही था...! बॉटनी डिपार्टमेंट, लाइब्रेरी, विश्वनाथ मंदिर, त्रिवेणी हॉस्टल... यहीं सब जगह दिन भर भटकते हुए रात को घर जाया करते थे... वो भी क्या समय था...! खैर... लिखना तो कुछ और है... लाइब्रेरी में बहुत वक़्त गुजरता था... एक ही सीढ़ी पर शीश नवाते हुए कितने ही लोगों से पहचान हुई... कितने अभिन्न हो गए सब समय के साथ... और आज समय के साथ कितने दूर भी...!

आशीष, आपको याद होगा... आप उतना नहीं आते थे... पर गौतम और ईश्वर हमेशा होते थे... उनका बस नज़रों के आसपास होना आश्वस्त कर जाता था... लगता था जैसे कोई समस्या होगी तो दीदी उनसे कह पाएगी और वो मुस्कुराते हुए दीदी की समस्या का समाधान भी कर देंगे... कभी बात नहीं होती थी... कब नमस्ते करते करते पाँव छूने लगे आपलोग... ये भी अब याद नहीं... सच! बिना किसी बातचीत के बस एक अभिवादन से जुड़ा वो कितना स्नेहिल रिश्ता था... है... और हमेशा रहेगा! गौतम को जाना... उसके कारण ही ईश्वर से पहचान हुई और फिर आपको भी जाना... ! पता नहीं गौतम चंद्रा जी और ईश्वर स्वरुप सहाय जी को हम याद हो भी अब या नहीं... पर उन्हें धन्यवाद करने का मन है... उन्हीं की वजह से आपसे हुई पहचान और देखिये आपसे कभी संपर्क टूटा नहीं...! उन दिनों की यादों में आपलोगों का विशेष स्थान है... और हमेशा रहेगा... ये देख कर ये सुन कर कितना अच्छा लगता है कि आप सबने सपने पूरे किये... हमारे सपने... अपने सपने... अपने मात पिता के सपने... और आज हम सभी को गर्व है आप सबों की उपलब्धियों पर...!
जाने क्यूँ हम ये सब लिख रहे हैं... बस लिख रहे हैं कि याद रह जाए अंकित इन पन्नों पर... कल को कुछ न भी हो तो यादें यहाँ होंगी... और दुआएं भी सदा आप लोगों के लिए...
कितनी ही कवितायेँ लिखीं थी लाइब्रेरी में बैठ कर... यूँ ही... कभी उदास हुए तब... कभी रोये तब... कभी परेशान हुए तब... और कभी जब आपलोगों से स्नेहिल हौसला मिला तब... अगर बातें पहुँचती हैं तो पहुंचे उन तक भी... दीदी ने सभी प्रेरणाओं और श्रेयों के लिए नम आँखों से धन्यवाद कहा है...

कभी हम सब फिर मिलें वैसे ही बी एच यू कैंपस में और उन पुराने दिनों को याद करें... २००४ से २००७ का वह वक़्त बहुत सुनहरा था... ये वही वक़्त था जब हमने अपने अपने सपनों की खातिर खूब मेहनत की और देखिये आज आप सभी सफल हैं... ढ़ेरों शुभकामनाएं हमेशा...!

काश कुछ तस्वीरें भी होतीं... पर यादों में तो हैं न उस वक़्त की कितनी ही तस्वीरें... सब को पुनः जिया... लिख नहीं पाए सब... बस जो एक प्रवाह में आता गया... बिखर गया यहाँ... ख़ुशी बस इतनी है कि ये शब्द पहुंचेंगे आप तक... और उन तक भी जो संपर्क में नहीं हैं अब...! यादों में सब वैसे ही हैं... यथावत... अभिन्न... बिलकुल अपने... उन सभी किताबों की तरह जो अपनी नहीं थीं... पर अपनी ही लगती थीं... सभी किताबें वैसी ही होंगी... बस हम उन्हें छोड़ आगे निकल आये हैं... जीवन ने हमें बहुत दूर ला रखा है... पर लौटेंगे...
और लौट कर एक बार फिर अवश्य आयेंगे...! अब तो सुशील जी भी साथ हैं और ये कितना सुन्दर को-इन्सिडेन्स है कि ये भी यहीं से हैं... इसी विश्वविद्यालय से... दोनों पुनः जायेंगे कभी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और साथ घूम कर उन सभी स्थानों को देखेंगे जिसे कभी अलग अलग जिया होगा हमने...!


Returning back to the Alma mater and reliving memories will certainly be very rewarding... !


बस इतना ही...!


बस
इतना ही... 


कि जब लगे
दूर बहुत हैं...


समूचे आकाश सा
विस्तृत हो
टीस जगाये कोई "काश"


तो,
अपनी आँखें मूँद कर
नमी महसूसना 


और जो कुछ आंसू हों
उनमें ढलकता हुआ हमें पा लेना...! 



भाव भाषा में वहीँ 

तुम्हारी कलम
उकेर रही होगी हमें...


करना क्या फिर...


शब्द शब्द में ढाल कर
हृदय से हमें लगा लेना...!!



और जो कुछ आंसू हों
उनमें ढलकता हुआ हमें पा लेना...!!!

अनुशील के पन्नों से गुजरते हुए...!

हमारे पास कितनी निधियां हैं... कितने अनमोल मोती हैं... ये जीवन कितना बड़ा सौभाग्य है, ये अनुभूति कभी कभी ही होती है! किसी एक ऐसे दुर्लभ क्षण में घटित होता है कुछ कुछ चमत्कार सा... जब हम निराश हताश हों और कहीं से साहिल स्वयं चल कर आये और मझधार से उबार ले!

हमारे पास सहेजने का हुनर कभी नहीं था, जो कुछ भी लिखता गया विस्मृत होता गया... कुछ फेंक दिया कुछ खो दिया... कभी ये न जाना कि कुछ क्षण ऐसे भी होंगे जीवन में जब कविता ही एक मात्र संबल होगी... क्या पता था कि खो गयी व विस्मृत हो चुकी कवितायेँ पुनः याद आयेंगी और बेतरह याद आएँगी...! किसने सोचा था कि कलम दूर हो जायेगी और पेंसिल का जमाना लौट आएगा... मेरे पास विस्तृत गगन होगा, गगन पर बादल होंगे और वही कहीं हरे पेड़ की छाँव भी होगी... उड़ते हुए पंछी होंगे और एक विस्तार होगा जहां मेरे भाव और मेरी टूटी फूटी अभिव्यक्तियाँ अंकित हो जायेंगी और खोयेंगी नहीं...

६ अक्टूबर मेरा ही नहीं इस वेबसाइट का भी जन्मदिन है... ललित भईया ने हमें यह उपहार वेबसाइट के रूप में सजा कर अपने आशीषों के साथ मेरे जन्मदिन पर दिया था... आज उनके ही प्रताप से कितना कुछ समेट चुके हैं हम यहाँ...! भईया आपको धन्यवाद कहने को मेरे पास शब्द नहीं होते...! जिन अंधेरों में आपने रौशनी दिखाई है, हम आज उन अंधेरों का धन्यवाद करते हैं, अँधेरे न होते तो हमें कैसे पता होता कि अंधेरों से जीतने का हौसला भी होता है... ये कैसे पता होता हमें कि अन्धकार से विजय पाने को ललित प्रकाश सदैव विद्यमान है. हमसे कितनी गलतियाँ होती हैं, बिना बताये खो जाने की गलती... एक समय था कवितायेँ खो जातीं थी आज कभी कभी कविताओं के साथ हम भी खो जाते हैं... पर आपने हमेशा ढूंढ लिया हमें... हमेशा क्षमा किया... और कहीं न कहीं ये आप ही होते हैं वो आख़िरी  दरवाज़ा जिस पर दस्तक देते ही मेरी सारी आशंकाएं, हताशाएं और परेशानियाँ दूर हो जाती हैं...! बस हमेशा आपका स्नेह यूँ ही मिलता रहे...!

यूँ ही कुछ टुकड़े... कुछ विचार...!

भले नयी लिपियाँ सीख जाएँ
पारंगत हो जाएँ किसी विदेशी भाषा में
लेकिन जब सोचेंगे
तो जिस भाषा में प्रस्फुटित होंगे विचार
वो शर्तिया अपनी होगी

*****

लिखेंगे जब किसी अन्य भाषा में
तो वही अपनी भाषा में सोचा गया विचार
अनूदित होगा

और अपनी भाषा की ज़मीन से उठ कर अनूदित होते हुए
कुछ एक आवश्यक अंश
अवश्य खो चुका होगा

*****

मन के पृष्ठों से
कागज़ तक आते आते
कितना कुछ है... जो छूट जाता है
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच
सदा के लिए रूठ जाता है

*****

विचार की भाषा है यदि सादापन
तो उसे रंगों में परिवर्तित न किया जाए
जो भी भाषा हो मन की
वह स्वाभाविकता से व्यक्त हो जाए



स्वतः सवेरा खिल आता है...!

व्यक्त होते होते
कितना कुछ है जो
रह जाता है,
अनकहा कितना कुछ
अनायास ही
आँखों से बह जाता है...



हर सुबह उग आता है
सम्पूर्ण लालिमा के साथ
इठलाता सूरज,
रात्रि संग उसका
सदियों पुराना
दूर का कोई नाता है...


अँधेरे और किरण का
रिश्ता भी कितना
निराला है,
एक दूसरे के पूरक दोनों
बस बाहर से ही
विरोधाभास नज़र आता है... 


अँधेरे अपनी चरमसीमा
लांघ कर प्रकाश का ही
प्रतिविम्ब हो जाते हैं,
रात्रि के सबसे अँधेरे
पहर के बाद ही तो
स्वतः सवेरा खिल आता है... 



व्यक्त होते होते
कितना कुछ है जो
रह जाता है,
अनकहा कितना कुछ
अनायास ही
आँखों से बह जाता है...! 

खुशियों की साझी धूप...!

हम दोनों
एक दूसरे की
ख़ुशी चाहते हैं...


हम दोनों एक जैसे हैं...



हम दोनों
एक दूसरे के
कष्ट से रोते हैं...



हम दोनों की ही
आँख में
आंसू हैं...



हम दोनों
एक दूसरे की आवाज़ सुनने तो
तरसते हैं...



फिर जाने क्यूँ हम बात नहीं करते...



हम दोनों
एक दूसरे की
ख़ुशी चाहते हैं


और
ये नहीं जानते...
(जानते हैं तो मानना नहीं चाहते)
कि ख़ुश तभी रहेंगे हम
जब हममें बात होगी


बिना किसी हिचक के
सामान्य रूप से
आत्मीयता की गूँज साथ होगी



और होगी...
जब जी चाहे तब
एक दूसरे की आवाज़ तक पहुँचने की सहूलियत
और कही गयी कहलवाई गयी
ढ़ेर सारी कविता...
खुशियों की साझी धूप वही
वही होगी जीवन गीता...!

ऐसे ही रहना...!

बहुत कुछ लिखा
बहुत कुछ मिटाया


वो सारे पत्र 

जो नहीं भेजे गए किसी पते पर
सब जाने कैसे 

पहुँच गए तुम तक


कि तुम सब जानते हो
जो भी मैंने लिखा था
यहाँ तक कि 

जो लिख कर मिटाया भी
वो सब भी तुम तक यथावत पहुंचा था


जाने कैसे...?
तुम सब जानते थे...
कि शायद तुम भी वह ही कुछ जी रहे थे!

मन से 

मन का जुड़ाव
जाने कैसा था...!
तुम्हारा मेरे लिए
मेरा तुम्हारे प्रति
स्नेह...
एक जैसा था...!!


ऐसे ही रहना
अनकहा भी समझना
और मुझसे जो चाहो वो कहना...!

ऐसा बहुत कम होता है न...!

हमने जीवन भर
पुराने सिक्के जमा किये,
उनकी खनक ने
आबाद रखा सूनापन...
शब्दों की खनक तो कुछ थी
पर वैसी नहीं,
हां! तुमने गुना उन्हें तो
बिसर गया बेगानापन...


कहते रहना सुनते रहना
मौन ही मौन सब गुनते रहना 


पुराने सिक्कों की
अनूठी खनक सी कोई खनक
मेरे शब्दों को भी मिल जाएगी...
गुन लेगा तुझ सा संवेदनशील मन उन्हें
बस फिर क्या... शब्द सरिता खिल जाएगी... ... ... !!



लिखते भले हम अपनी ही संतुष्टि के लिए हों, अपने आप को ही समझाने के लिए हों, पर कोई और भी शब्दों की आत्मा तक पहुँच जाए तो इससे अच्छा क्या हो सकता है... किसी भी लिखने वाले के लिए! जो कहा जाए वो बात समझ ली जाए वैसे ही... ऐसा बहुत कम होता है न...!

दो पंक्तियों का जादू था जिसने कभी ये लिखवाया होगा... उन पंक्तियों को भी सहेज लेते हैं यहाँ कि प्रेरणा के बिना सृजन कहाँ संभव है... प्रेरणा है तो सम्भावना है... सम्भावना है, तो सृजन है -- संभावनाओं का सृजन... सृजन की सम्भावना !!!

******

उस वक़्त के सिक्कों में, 'खनक है अलग' सी...
... उन सदियों में, 'मिलावट' नहीं थी... ... ... !! 

-सुरेश चंद्रा -



कविता के आँगन में...!

कैसे शुरू करें... कहाँ से शुरू करें... कौन सा सिरा पकड़ कर कौन से कोने तक पहुंचे... क्या करें...? फिर सोचा, थोड़ा रो लिया जाये... आंसुओं से लिखेंगे...! जो लिखेंगे आंसू... वही अंकित हो जायेगा यहाँ...! हम आंसुओं को कलम थमाए खुद को पीछे खींच ले रहे हैं... कि ऐसे भी लिखते वक़्त लिखने वाला वही होता है जो कलम उसे होने देना चाहती है... हमारा अपना आप तो बहुत पीछे रह जाता है... कोई विराट दुःख की रागिनी होती है... किसी सुख की भूली बिसरी कोई धुन होती है... जो स्याही से निकलती है... और रच जाता है एक संसार... हमेशा के लिए सहेजे जाने को तैयार... तत्पर! 

पिछले वर्ष घर गए थे... भारत... अपनी छोटी बहन के विवाह पर... बस कुछ ही दिनों के लिए... अभी उस समय की तस्वीरें देखते हुए पुनः जी रहे थे वही सब क्षण... अब सोच रहे हैं लिख जायें पिछली यात्रा के हर लम्हे को और जी लें पुनः अपने अपनों के बीच होने का एहसास...! 

एकदम शुरू से शुरू करते हैं... १६ जनवरी २०१४ को निकले थे हम लोग भारत के लिए... बीच में इस्ताम्बुल शहर में रुकना हुआ कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए... इस बीच शहर घूमने का आप्शन था... और खूब घूमे हम शहर... लेकिन आज इस्ताम्बुल के बारे में नहीं... वह फिर कभी! अभी हम १८ की सुबह की दहलीज़ पर ला रखें हैं मन को... जब फ्लाइट इंडिया लैंड हुई थी... 

बेहद ख़ास थी वह सुबह... बहुत समय बाद हम भारत भूमि पर थे... बहुत दिन बाद घर लौटने के एहसास को महसूस किया था... और इसलिए भी बेहद ख़ास था वह लम्हा कि कोई अनजाना सा बेहद ख़ास... बिलकुल अपना कोई... एअरपोर्ट पर हमारा इंतज़ार कर रहा था...! हम बाहर निकलते हुए ये नहीं जानते थे कि अनन्यता की झलक पाकर हम भावविभोर हो जाने वाले हैं... पहली बार देखते मिलते हुए भी ऐसा नहीं लगा जैसे पहली बार मिले हों... हमें अनामिका के यहाँ ड्राप करते हुए चले गए वो... बस कुछ ही क्षण थे... आत्मीयता के कुछ ही पल थे जो हमने साथ बिताये... आशा थी... विश्वास था... कि पुनः मिल पायेंगे... लेकिन फिर उनकी जो व्यस्तता रही कि मिलना तो दूर की बात फ़ोन पर भी संपर्क संभव नहीं हो पाया...! हम लोग २ फ़रवरी को वापस आ गए स्टॉकहोम ... आने से पूर्व पुनः एक बार न मिल पाने की टीस लिए... और फिर व्यस्तता ऐसी रही कि टूटा रहा संपर्क... लेकिन आज जब यह सब लिख रहे हैं करीब वर्ष भर से ऊपर बीत चुके समय के उपरान्त तब यह अनुभूति मन भिगोये हुए है कि प्रगाढ़ता समय के अंतराल से कम नहीं होती... बल्कि बढती ही है... अनन्य से अनन्यतम हो जाता है कोई अनायास ही... बिना किसी लम्बी पहचान के... 

... और कैसे नहीं है लम्बी पहचान... कितने लम्बे समय से तो जुड़े रहे हैं शब्दों से फ़ेसबुक पर... २०१० से शब्दों का यह संपर्क रहा ही तो है... आज भी अनुशील के पहले पन्ने पलटें तो वहाँ भी आहटें दर्ज हैं... कि हम शब्दों के माध्यम से जुड़े रहे हैं लम्बे समय से... और सिर्फ इतना ही क्यूँ... सदियों के रिश्ते होंगे... कौन जाने! कविताओं का... अक्षर का... ईश्वर का ... अस्तित्व तो हमारी कल्पना से परे की चीज़ है न... हम उतना ही जानते हैं जितना देखते हैं... पूर्वनिर्धारित घटनाक्रमों का आकाश हमारे लिए अनजाना होता है... कौन जाने शब्द शब्द लिखते हुए सदियों से हम साथ हों...! मिले भी तो यूँ अचानक स्वप्न की तरह बस एक झलक भर के लिए... कोई विशेष बातचीत भी नहीं... समय जो नहीं था... फिर वापस मिलना भी नहीं हुआ और एक लम्बे अंतराल के लिए कोई विशेष संपर्क भी नहीं रहा... फ़ेसबुक पर आना जो छूटा हुआ था मेरा... आज जब यहाँ हैं, उन लम्हों को याद कर रहे हैं... और अनुशील पर लिख रहे है तो यही सोच रहे हैं कि क्या आपको याद होगी वो मुलाक़ात... वो थोड़े से पल जब हम साथ थे... अगर विस्मृत हो गया हो तो दो एक तस्वीरें हैं उन्हें साझा कर रहे हैं... मन के कैनवास पर तो ढ़ेरों विम्ब हैं उन पलों के... ठीक ठीक उतने ही विम्ब जितने कि कविताओं में होते हैं या हो सकते हैं... है न, प्रिय कवि! पहचानिए तो यह स्वप्न जैसा कुछ घटित हुआ था वास्तव में या भ्रम ही है कोई... 


तस्वीर आश्वस्त करती हुई कहती है... हाँ मिले थे, फिर मिलेंगे...! कविता के आँगन में परिचय के अनगिन पुष्प खिले हैं... और खिलते ही रहेंगे... समय की गति नहीं लील पायेगी कुछ भी... इतने लम्बे अंतराल के बाद भी सब यथावत ही है न... कविता... कविताओं का आना जाना... उनका अविरल गति से हमारे बीच बहना... बने रहना...!!! लिखने को बहुत कुछ है लिखते ही चले जायेंगे पर अब रुकते हैं... नम आँखों से निवेदित है प्रणाम... स्वीकार करना कवि!

अंत में आपकी ही पंक्तियाँ दोहराए लेते हैं...

'आँसू' के बहाने हैं, 'सपने' मनमाने हैं...
आँखों की डिबिया मे, कितने खजाने हैं... ... ... !! 

कितना बीत गए हम...!

लम्बे समय से छूटी कविताओं तक पुनः लौटते हुए... या यूँ कहें... लम्बे समय बाद कवितायेँ हम तक लौटती हुईं... ये ऐसे ही लिखा था... शायद पहली पोस्ट यही होती... पिछली फ़रवरी के बाद की... शायद से पुनः शुरू हुआ सफ़र देखें कब तक कहाँ तक चलता है... कविता के आँगन में होने के इस आशान्वित एहसास को भी सहेज लें आज यहाँ...

छूट गए शब्द, खो गयी कविता
हम भी नहीं रहे हम...
समय जाने कितना बीत गया
कितना बीत गए हम...


ये पन्ने फिर भी पहचान लेंगे
आँखें अब भी तो हैं नम...
जुड़ जाने के बाद
प्रगाढ़ता कभी नहीं होती कम... 


आशीषों का हाथ सर पर
हर लेगा सारे तम...
कविता की सन्निधि में
फिर से होंगे, कविता के आँगन में हम...!! 

राह निकलती है...!

हमारे आगे लम्बी राह होती है...
राह में कितने ही मोड़...
और हर मोड़ पर
अनिश्चितता...


शिथिल हो जाते हैं मन प्राण
हृदय से आह निकलती है 


अनिश्चितताओं के बीच से ही
फिर एक राह निकलती है...!

साथ रोना साथ होना ही है...!

मेरा मौन नहीं समझते तुम...
मेरे शब्द नहीं पहुँचते तुम तक...
मेरी हंसी खो जाती है बीच राह में
मेरे आंसू भी तो नहीं पहुँचते तुम तक...


कितना प्रिय है न तुम्हें अनमने रहना
और न कहते हुए ही सब कुछ कहना


देखो, तुम्हारे सारे दावे झूठे हैं
कि कुछ नहीं समझते हम
हम सब समझते हैं... और खूब समझते हैं
आखिर एक है न हमारा मन


नहीं तो अब तक कब का मुंह फेर लिया होता
आंसू न बहाए होते... दो टूक कह दिया होता
कि न करनी है तो न करो बात
हमें नहीं चाहिए तुमसे इतने आंसुओं की सौगात


पर ऐसा नहीं है न
हम वहीँ कहीं हैं न


देखो,
सारे गम में
तुम्हारे साथ हैं...
तुम्हारे आंसू न हर पाए
तो हमारी आँखें भी
नम दिन रात हैं...


साथ रोना
साथ होना ही है...
जीवन पाना तो है ही
खोना भी है...


सारे आंसू
खो देंगे...
फिर हम फिर से
एक बार रो देंगे...


ये आंसुओं का रिश्ता इतना प्रगाढ़ होगा देखना
मिट जाए बस कुछ जतन से ऐसा है यह लेख ना


फिर हम
शब्द सेतु बनायेंगे...
जिसने जोड़ा है हमें
उस कविता के समक्ष शीश नवायेंगे... ... ... !!

कविता यही तो करती आई है... यही तो रही है कविता हमेशा से मेरे लिए... बस जोड़ दिया अनायास और शब्दों का यह जुड़ाव शब्दों से परे अपनी गति स्वयं निर्दिष्ट करता रहा... ऐसा ही तो इस बार भी हुआ न... आपके शब्दों को गुनते बुनते कब हमने एक पुल बुन लिया... 
हे कविते! नमन तुम्हें.. हे कवि! धन्य आप... शब्दों का मान सम्मान और ऊँचा उठे और उससे भी ऊंचा हो भावों का आकाश...!


एक टुकड़ा भींगे मन का...!



आपकी दो पंक्तियाँ थी न... उन दो पंक्तियों ने भी कुछ लिखवाया था कभी डेढ़ वर्ष पूर्व... सहेज लेते हैं यहाँ आज... कि जिस तरह लिखने के मौसम होते हैं वैसे ही सहेजे जाने का भी एक मौसम होता है.. जब आता है तो कितने ही टुकड़े हम निधियों की तरह संभाल कर रख पाते हैं... हमेशा के लिए... वैसे, हमेशा के लिए तो कुछ नहीं होता... पर फिर भी...


आपकी सुन्दर पंक्तियाँ ::


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!  --सुरेश चंद्रा


इन दो पंक्तियों के आगे जो लिखते चले गए हम उसे सहेज लेते हैं... आज... कि आज भींगा भींगा सा "अनुशील" मन पन्नों पर उतर आना चाहता है...
फिर जाने कब अवकाश मिले यूँ बिखरे शब्द समेटने का...

*** *** ***


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!


जीवन जाने क्यूँ रह जाता है, हर बार जीवन होते होते
पूछती हैं नम आँखें, बड़ी उम्मीद से यह बात रोते रोते... ... ... !!


आप  कहते तो हम साथ हो लेते
आपने कहा नहीं और हम संकोचवश, रह गए साथ होते होते... ... ... !!


बहुत अँधेरा है कहीं कोई किरण नहीं
भोर का इंतज़ार किया हमने खुली आँखों से, मन में सपने बोते बोते... ... ... !!


स्वप्न से वास्तविकता तक के सफ़र की राह रोशन हो
क्यूँ रह जाता है सपना, सपना ही... वास्तविकता के धरातल का कमल होते होते... ... ... !!


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!

चाभियाँ ही गुम हैं...!

भीड़ में है
फिर भी अकेली है...
सुलझती ही नहीं
ज़िन्दगी पहेली है...


आँखों में बसा इंतज़ार
छलकता रहता है...
ताले की अपनी मज़बूरी है
उदास लटकता रहता है...


चाभियाँ ही गुम हैं...!



हमें रोने देना...!

एक बात अक्सर होती है, हम यूँ ही रो रहे होते हैं... कभी कुछ तो कुछ बात को लेकर, ज्यादातर बिना किसी कारण के भी! ऐसे में सुशील जी का पूछना कि "क्या हुआ... क्यूँ रो रही हो", और रुलाता है... मेरे पास क्यूँ का कोई जवाब जो नहीं होता...! एक ही जवाब देते हैं हम, आज से नहीं बहुत पहले से, मम्मी भी पूछती थी तो यही कहते थे... "ऐसे ही रो रहे हैं", "मन है रोने का तो रो रहे हैं". अब ये जवाब सुन कर तो किसी का भी नाराज़ होना स्वाभाविक ही है... तो ऐसा होता रहता है!
कुछ दिन पहले हमने अपना प्रस्ताव पारित करवा ही लिया इनसे कि मेरा जब मन होगा रोयेंगे, बिना रोक टोक रोने की सहूलियत तो हमको मिलनी ही चाहिए...! क्या करते मेरे स्वामी "न-हाँ" करते हुए मान गए...!
कल जब रोये हम यूँ ही, तो चुप कराने ही वाले थे कि उन्हें हमारी "डील" याद हो आई... तो हमें रोने दिया गया... 
***
आज सुबह "कविता जैसा कुछ" लिख गयी कलम यूँ ही, जैसे यूँ ही रोते हैं हम...!
आँखें तो ख़ुशी में भी नम होती हैं न...


रो पड़े आँख जो
तो नम होने देना,
जब रोना चाहें हम
हमें रोने देना! 


कारण पूछोगे...
कह नहीं पायेंगे,
बिन मौसम की रिमझिम का...
भला हम क्या कारण बतलायेंगे?


कहीं 

अपना सा कुछ 

दिख जाता है...
आँखें भर आती हैं,
जीवन की राहों में...
अश्रुबून्दों के साथ 

कुछ ओस की बूंदें भी 

मुस्काती हैं! 


कल जब किसी ने बुरा कहा था

जी भर कर थे रोये हम,

आज जब किसी ने मान दिया  

आँख फिर भर आयी!
पहले ने रस्ते का था पता दिया,

दूजे से मिला 

चलते रहने का हौसला 

तो आँख फिर डबडबायी! 


हम गाहे-बगाहे 

ऐसे-वैसे

जब-तब
खूब रोते हैं...
आंसू 

मेरे अपने हैं
वो सदा 

साथ मेरे होते हैं... 


तुमसे हमें 

प्यार बहुत है
मेरे हमसफ़र!
तुम्हारे होने से 

हर क्षण
ख़ुशी की है एक लहर!

पर,
आंसू भी
हमको प्यारे हैं...
हम
अपनी समस्त खामियों संग
तुम्हारे हैं...

कुछ मांगे तुमसे आज
तो, दोगे न?
आंसुओं संग हमें पाया तो
पागल नहीं कहोगे न? 


देखो, बस इतना
होने देना...
जब रोना चाहें हम
हमें रोने देना! 

कौन जाने किस ठौर...!


कुछ कदम साथ चले...
फिर चल दे कहीं और,
कौन जाने किस ठौर...!


बहुत कुछ है जो समझ से परे है...
कब मिल जाए कब खो जाये,
अपना सा ही कोई और...!


जाने कैसा है यह जीवन पथ...
दूर से दीखता कुछ है,
जो पास जाओ तो है कुछ और...!


सुरेश जी, आपके लिए...

शब्द ब्रह्म होते हैं... तभी तो कैसे अनजाने लोग... सिर्फ शब्दों के माध्यम से इतनी गहरी डोर में बंध जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कभी वो समय भी रहा होगा जब पहचान नहीं रही होगी... एक ही मंदिर की सीढ़ियों पर शीश नवाने वालों के बीच प्रगाढ़ रिश्ता बन ही जाता है न... हम सब शब्द जीते हैं... भाव जीते हैं... व्यक्त करते हैं... एक दूसरे की सुनते हैं... एक दूसरे को गुनते हैं... और जुड़ जाते हैं अभिन्नता से...! कविता जोड़ती रही है... हमेशा जोड़ेगी... और हमारी यात्रा का आयाम बन कर सदा मुस्कुरायेगी... कि... कई ऐसे पल होते हैं, जब मृत्युतुल्य कष्ट हम बस इसलिए सह पाते हैं, क्यूंकि हमारे पास कोई एक होता है जिसके कंधे पर सर रख कर रोया जा सके... भाव रूप में भी ये साथ बिलकुल संभव है... और यही तो करती है कविता... हमारा संबल बनती है... किसी की कलम का उद्गार हमारे लिए इतना अपना हो जाता है कि वह लिखने वाले को भी हमारा अभिन्न बना जाता है... घटित हो रही कविता कितना कुछ जोड़ती है... कितना कुछ निर्मित करती जाती है हमारे लिए... ये हमारे अनुमान से परे का विषय है...!

क्यूँ लिख रहे हैं अभी ये सब हम...?? ये सब वही अदृश्य शक्ति लिखवा रही है... जिसने हमें आपसे... आपकी कविताओं से मिलवाया... और आज वो मेरी भी अपनी है... उतनी ही जितने अपने... आप हैं... प्रिय कवि! 

आपका जन्मदिन है न आज...  क्या दें आपको उपहार हम... यही सब सोच रहे थे... तो फिर सोचा... आपके जन्मदिन पर हम स्वयं ही अपने आपको उपहार क्यूँ न दे दें...! इसलिए, लिख रहे हैं... ये सब... जाने क्या क्या... कि मेरे इस रचना संसार में अंकित हो जाये कुछ आपके लिए... आपके ही प्रताप से! मुड़ कर देखेंगे जितनी बार... उतनी बार अभिभूत होंगे... चमत्कृत होंगे... कि भावों को इतनी सिद्दत के साथ पिरोने वाले व्यक्तित्व से हमारी पहचान रही है... हम उसे अपना कहते रहे हैं... और उसके भी अपने रहे हैं... ... ... !!

कितने समय से आपको फ़ेसबुक पर पढ़ते रहे हैं... ये बात और है कि आपकी प्रोफाइल अंतर्ध्यान हो जाती रही है बीच बीच में... अभी जब हम फ़ेसबुक पर इतने दिन बाद लौटे... तो आपकी प्रोफाइल बदल चुकी थी... पर शेष कुछ नहीं बदला था... वही शब्दों एवं भावों का समंव्यय... वही आप... और सबकुछ वैसा ही...

याद है, दस जनवरी २०१४ को कुछ लिखा था आपके लिए आपकी कविताओं के लिए... फ़ेसबुक पर... आज वही भाव हम यहाँ सहेज लेते हैं पुनः... यहाँ लिख जाएगा तो खोएगा नहीं... इस सृजन संसार को ललित भैया का आशीर्वाद जो प्राप्त है...
फ़ेसबुक प्रोफाइल का क्या है... आज है शायद कल फिर बदल जाए... आज दिख रहे हैं हम वहाँ... कल शायद फिर खो जायें :) 


आपके लिए... आपकी कविताओं के लिए...!
*************************************

आपको पढ़ते हुए...
आपकी कविताओं से गुजरते हुए...
हमने जितने फूल चुने
सब मुस्कुराते हैं...


और वो रुला देने वाले गद्य,
उन्हें इतनी बार पढ़ा है
कि भीतर कहीं अंकुरित हो आया है एक बीज...
मिट्टी, नमी और खाद मिले होंगे अन्दर प्रस्तर प्राचीरों में,
तभी तो ये संभव हो पाया है...
हरापन अन्दर उग आया है... ... ...


दो पंक्तियों का चमत्कार
जिसमें निहित आत्मा की चीत्कार
सब मन में बसते हैं
सच, आंसू भी हँसते हैं 


उतनी समझ नहीं
कि मर्म सकल पढ़ पाएं...
शब्दों को जो सम्मान देती है आपकी लेखनी
कुछ वैसे ही प्रतिमान
उनके सम्मान में
शायद ही कभी हम गढ़ पाएं...


फिर भी
बस यूँ ही
आज आपके अनगिन शब्दों के लिए
अपनी टूटी फूटी भाषा में
कुछ कहने का मन है...
सच! आपकी कविता
कितने ही
मन प्राण का
कितनों के भाव संसार का
सहज दर्पण है...


अक्षर अक्षर का आपस में अनूठा प्यार है
और वहीँ से भाव सागर का विस्तार है 


यूँ ही लिखें आप
सूर्य... शशि... अम्बर...
स्वर... बांसुरी... पीताम्बर...


और रचते जाएँ
जीवन... ... ...
हे कविमना!
धन्य हैं आप... धन्य आपका कवि मन... ... ... !!


आपकी कविताओं के इस अकिंचन पाठक ने अपनी समझ से जो उकेरा है, उसे स्वीकार करना कवि!
इनमें सुशील जी की भी संवेदनाएं शामिल हैं... वो भी आपका लिखा सब सुनते हैं... हम सुनाते हैं उनको...! अनामिका को भी आपकी दो पंक्तियों का जादू बेहद पसंद है... तो मेरी इस अभिव्यक्ति में उसके भाव भी शामिल हैं...! मेरे ढ़ेर सारे दोस्त... स्कूल के समय के, बी.एच.यू के... और यहाँ स्टॉकहोम के भी दोस्त... आपकी पंक्तियों को... आपकी कविताओं को बहुत पसंद करते हैं... मेरी अभिव्यक्ति में भावरूप में वे सब भी शामिल हैं... और अंततः निश्चित ही आपके अन्य सभी पाठकों के हृदय के उद्गार भी प्रेरक रहे होंगे जो हम यह सब इतना लिख पाए...

हम सब की ओर से आपको जन्मदिन की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं... आपके सभी सपने पूरे हों... ढ़ेरों खुशियाँ मिलें... और हम सबको आपके और आपके शब्दों के सान्निध्य का सौभाग्य... और क्या चाहिए जीवन से...


Many many happy returns of the day!
Have a memorable birthday...
Choicest wishes,
Lots of love:)

होना और खोना केवल शब्द हैं...!

कोई जगह 

खाली नहीं होती...


हमारे होने से 

कुछ भरता नहीं,
हमारे खो जाने से 

कुछ कहीं भी 

खाली नहीं होता... 


होना और खोना 

केवल शब्द हैं...!


नित परिवर्तित होते समय का 

अंश मात्र है हम...!!

अनवरत...!

नहीं रहता कुछ भी एक सा
सब बदल जाता है...
चाहे वो समय हो
हो मौसम
जीवन
या फिर हम


अनवरत
चलता रहता है क्रम
हमें
बांधे रखते हैं अन्यान्य भ्रम


विदा की अंतिम घड़ी तक...!
साँसों की आख़िरी कड़ी तक...!!

जब खो जाते हैं शब्द...!

जब
खो जाते हैं शब्द...
तब भी
चलता ही है जीवन... 


जो कभी
टूट भी जाए
संवादों का पुल...
तब भी
जुड़े ही रहते हैं
जो जुड़े हुए थे मन...


कि...


यही जुड़ाव
बनाये रखता है
सांसों का तारतम्य 


और... 


उठते गिरते
चलते रहते हैं हम 


चलता रहता है जीवन! 

सब समेटे अंतस में...!

एक बित्ता अम्बर
और मुट्ठी भर धरा...
दौड़ती हुई ज़िन्दगी के हिस्से आया
हर घाव रहा हरा...


कितनी बार टूटा सपना
कितनी बार रूठा कोई अपना
कितने ही जगमग तारे टूटे
कितने लम्हे पीछे छूटे


सब समेटे अंतस में
सदा जीवन राग रहा खरा...


नीरव निस्तेज विकल समय में भी
गुनगुनाते रहे अविराम
अम्बर और धरा...!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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