अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चलते जाना...!

तो...
तय हुआ
चलते चलेंगे 


किसी ठोकर पर 

नहीं रुकेंगे... 


राह ख़त्म होती दिखेगी
हताश भी होगा मन 


पर चलते चलेंगे हम... 


वहीँ किसी मोड़ पर 

मिलेंगे अवश्य 

नयी राह के निशां... 


कि... 

अंतहीन हैं राहें,
और हमारे पास 

एक ही विकल्प है- 


चलते जाना...!!  

शायद...!

कई बार ऐसा होता है
हम आते हैं किसी दरवाज़े तक
और बिना दस्तक दिए 

लौट जाते हैं 


इस आस में
कि हमारी आहट को ही
दस्तक सा पहचान
खुल जाये दरवाज़ा...!


शायद ऐसे ही कई बार
आती है कविता 


ज़रूर ऐसे ही कई बार
आई होगी कविता...


और लौट गयी होगी 


कि उसकी आहट से
अनजान रहे हम
दूर रही हमसे
हमारी ही कलम...! 


इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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