अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अगले मोड़ पर ही...!

किसी भी बात पर जब
मिथ्याभिमान होने लगे,
तो, याद रहे...
तुमसे भी कोई बड़ा है!

कितना भी
वृहद् हो गगन,
अपने मद में हो लें हम
कितने भी मगन;
वक़्त
सबको नाप लेता है,
सारे हिसाब देख लेने को
वो अगले मोड़ पर खड़ा है!

किनारे हैं तो बिना मिले भी
साथ चलना तो होगा ही,
मझधार का खेल
समझना तो होगा ही;
समझायेंगे तभी तो पंथी को
कि मिल जाती है मंज़िल,
राह में हैं ठोकरें तो क्या?
हौसला हर रोड़े से बड़ा है!

समस्या आती है तो सहारे सकल
छीन लेती है,
मन की शान्ति समस्त
लील लेती है;
ऐसे में
एक बार झांकना हृदय में,
हाथ थामने को
विधाता स्वयं खड़ा है!

मिट जाता है हर अक्स
उभर कर पानी में,
किसे पता?
क्या होगा घटित कहानी में;
छोटा सा मन
छोटा सा जीवन,
छोटे छोटे एहसासों का
मोल बड़ा है!

अकेला कभी नहीं होता इंसान
बस हौसला रखना,
देखना, अगले मोड़ पर ही...
कोई तेरे लिए खड़ा है!

स्याह या सफ़ेद...?

सफ़ेद होता है...
स्याह होता है
बीच में कई रंग
घुले-मिले होते हैं चरित्र में,
इंसान झूलता रहता है
दो किनारों के मध्य
और आकार
उभरते जाते हैं चित्र में...
मानों,
सब परिस्थितियां ही
निर्धारित करती हैं,
कुछ भी अपने वश में नहीं
ये तथ्य
साधिकार प्रचारित करती हैं

होगा ये भी एक सच
पर एक तथ्य और है,
भले उतना प्रचारित नहीं
पर बात यही सिरमौर है...
कि,
स्याह या सफ़ेद होने का
विवेक है हमारे पास,
प्रभु प्रदत्त नेयमत यह
प्रणम्य है,
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!

उस भविष्य तक...!

मन के पृष्ठों से
कागज़ तक आते आते,
कितना कुछ है... जो छूट जाता है...
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच,
सदा के लिए रूठ जाता है...

कांच से रिश्तों पर
जब बेरहम हवा की मार पड़ती है,
तो बचा-खुचा संतुलन टूट जाता है...
आजमाती है लगातार ज़िन्दगी
धर-धर रोज़ नए रूप,
किनारे तक आते ही समंदर छूट जाता है...

क्या खोजेंगे क्या पायेंगे खोये हुए लोग
नज़र के सामने ही,
संभावनाओं का घड़ा फूट जाता है...
यहाँ हम निराश होते हैं
और वहाँ रौशनी हो जाती है कुछ कम,
फ़लक पर सितारा कोई रूठ जाता है...

आस की सुनहरी किरण
नज़र से ओझल न होनी चाहिए कभी,
निराश दौर लौ की उर्जा लूट जाता है...
'वर्तमान' भले तबाह हो जाए विध्वंसात्मक उथल-पुथल में
पर 'भविष्य' तब भी सदा बचा रहेगा,
प्रलयी मंज़र
'अतीत' के पृष्ठों में ही कहीं छूट जाता है...

उस भविष्य तक जायेंगे हम
मौन धरे, अपने बल-बूते
टूटता है, टूटने दो, कांच टूट जाता है...
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच,
सदा के लिए रूठ जाता है!

फिर चल देना...!

हमेशा के लिए
कुछ भी तो नहीं होता यहाँ
इसलिए,
जो
देना हो, तो-
अपनों को अपने समय से
कुछ पल देना...

तट पर बालू से खेलती
नन्ही संभावनाओं
के
अटपटे प्रश्नों का,
जो दे सको, तो-
सुलझे हुए आसान से
हल देना...

संभव नहीं और शायद ज़रूरी भी
नहीं कि
जीवन को हमेशा
पकड़ा ही जाए,
अच्छा है...
बस
कुछ पल सुस्ताना छाँव में
फिर चल देना...!

एक अकेले छिद्र पर टिकी आस!

मन में निरंतर चल रही एक प्रार्थना के कुछ अंश यूँ लिख गए... सो बस सहेज ले रहे हैं यहाँ...!

एक छेद भर रौशनी भीतर आती रहे
और ढूंढ़ ले खोया हुआ उत्साह

वो
उत्साह
जो चूक गया है
बीतते उम्र के साथ शायद कहीं दुबक गया है

बहुत देर तक यूँ दुबका रहा तो
हो जाएगा विनष्ट
और फिर नहीं उग पायेगा विश्वास
कभी भी...,
एक ज़रा से उत्साह के अभाव में

अँधेरी
बंद कोठरी के
एक अकेले छिद्र पर ही मेरी आस टिकी है;
प्रविष्ट करे रौशनी
और खोज निकाले खो चुके उत्साह को

पाए जाने के तुरंत बाद
धूल झाड़कर
खड़ी हो जाए उमंग

झूमे मन
और फिर से शुरू हो जीवन...!

हे जीवन!

हे जीवन!
तुम्हें लिखने के लिए,
अगर कई लिपियों का सहारा लेना पड़े...
कई भाषाओँ की दहलीजों से,
उपमाएं चुननी पड़े...
तो, दुनिया की किसी भी एक भाषा में
लिख देंगे तेरी मुस्कराहट;
किसी भी भाषा का दरवाज़ा खटखटा कर
चुन लेंगे,
तेरी भाव भंगिमाओं के लिए उपमाएं;
विश्वास है,
कोई भी भाषा में
पूरी सशक्तता के साथ लिख सकते हैं
तेरे हौसले को;
लेकिन,
लिखने होंगे जब आंसू
तो अपनी ही भाषा के द्वारे लौट आयेंगे...
इसलिए, नहीं कि
अन्य किसी भाषा में
आंसू लिखने को वैसे ही पाक़ शब्द नहीं...
बल्कि, इसलिए
क्यूंकि ये सच है, कि
किसी अन्य भाषा में हम
सहजता से रो नहीं पायेंगे...

तुम्हारे आंसू समझने के लिए हमें भी रोना होगा...!
और रोने के लिए हमें अपनी भाषा में होना होगा...!!

क्यूँ लिखते हैं हम...?

अपना ही मन पढ़ने के लिए
लिखते हैं हम...
खुद को समझने के लिए!

जब फिसल जाती है सकल रेत मुट्ठी से...
तब भी
कुछ एक रज कणों को
अपना कहने के लिए,
लिखते हैं हम...
दो सांसों के बीच का अंतराल जीने के लिए!

जब-जब मिलता है बाहें फैलाये जीवन...
तब-तब
उसके हर अंश को समेट
वापस आसपास बिखरा देने के लिए,
लिखते हैं हम...
खाद से ख़ुशबू लेकर लुटा देने के लिए!

जब भी होता है आसमान उदास...
तब उसमें
अपनी कल्पना से
अनगिन बादल बना देने के लिए,
लिखते हैं हम...
हवाओं का आँचल सोंधी महक से भींगा देने के लिए!

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

एक अनुभूति की तलाश!

मेरी एक बड़ी प्यारी दोस्त है... बहुत दूर हैं हम अभी जमशेदपुर से... वहीँ तो हमने साझा कितना कुछ जिया है स्कूल के दिनों में, और फिर कुछ एक वर्ष बनारस में भी बी.एच.यू वाले दिनों में; अंतिम मिले होंगे बी.एच.यू के त्रिवेणी हॉस्टल में ही कभी फिर तो जगह ही बदल गयी... और अब न जाने कब प्रत्यक्ष मिलाये ज़िन्दगी...! लेकिन, संतोष है कि बात होती रहती है... व्यस्तताओं के मध्य कुछ वक़्त यहाँ-वहाँ इधर-उधर की बातों के बीच कुछ एक बातें कविता भी बन जाती हैं...
कहते-कहते जब श्वेता ने 'खुद के समीप और दुविधाओं से दूर' होने की दुर्लभ सम्भावना वाली बात कही तो मेरे मन से भी अनायास निकल पड़ा... काश!
फिर इस सम्भावना ने... इस सम्भावना को साकार कर सकने की सक्षमता के अभाव ने... इस पंक्ति के आसपास उमड़-घुमड़ रही कविता ने..., जैसे मेरा हाथ थाम कर ये 'बेवजह' सा कुछ लिखवा दिया...!

खुद के समीप
और दुविधाओं से दूर-
है ऐसा भला क्या कोई स्थल
इस जहान में?
जहां संभव हो सके
इस स्थिति की अनुभूति...

अगर है कहीं, तो
हमें एक बार
जाना है वहाँ...
उन्मुक्त
मुस्कुराता
जीवन है जहाँ...

महसूस करनी है
वो शांति...
जो अपने निकट होने से
सृजित होती है,
चिंतन-मनन-प्रण
सब चल रहा है...
देखें, कब ये दुर्लभ बात
घटित होती है!

ख़ुशी थोड़ी कम है...!

बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने में,
ख़ुशी थोड़ी कम है...
सूखेपन से
जगह-जगह दरक गयी है धरती,
आँख कुछ नम है...

ऐसे में
बारिश की तस्वीर बना कर,
मन बस बहल जाता है...
कविता का अंतस
कोमलता लिखते हुए,
कई बार दहल जाता है...

अपने फूल से
बिछड़ी हुई कोई पंखुड़ी,
कुछ करुण सा गा देती है...
वहीँ से लेखनी
कोई तान चुन कर,
आपको सुना देती है...

हमारे सन्नाटों में
गूंजती है लगातार जो धुन,
मुखरित उसमे गम है...
बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने,
ख़ुशी थोड़ी कम है...!

स्मित मुस्कान लिए मुरझा जाना... यही तो चमत्कार है!

समृद्ध हो शब्दों की दुनिया
उन्हें बुनने का हुनर भी हो
मगर न हो कथ्य
तो सब बेकार है...
धारा का क्या? वो तो बीच में बहती है...
न इस पार... न उस पार है!

कहने को कुछ खरा हो तो
शब्दावलियाँ स्वयं चली आती हैं
भाव कर लेते हैं भाषा का आवाहन
भावों का शब्दों पर अधिकार है...
लेखनी का क्या? वो तो कहती रहती है...
कभी नीली... तो कभी काली उसकी धार है!

देखो, उनका हाव भाव ही
लिख जाता है स्वर्ण कलम से हवाओं में
खुशबू का काव्य
फूलों का अद्भुत संसार है...
मिट जाने का क्या? वादियाँ हर पल खुश रहती है...
स्मित मुस्कान लिए मुरझा जाना... यही तो चमत्कार है!

उनके पास सच्चे सन्देश हैं
खरा है उनका वक्तव्य
पढ़िए उन्हें... भाषा भी बड़ी ग्राह्य है उनकी
प्रकृति हमारी संवेदनाओं का ही विस्तार है...
व्यस्तताओं का क्या? वह तो आजीवन बनी रहती है...
जीवन की भागमभाग में... कहाँ कोई एतवार है!

लिख रहे हैं शब्द
और गुन रहे हैं अर्थ
जो खो जाती यूँ ही कहीं, वो छवि-
मन के किसी कोने में अब साकार है...
कविता का क्या? वो तो चलती रहती है...
कभी वह मुट्ठी भर रेत... तो कभी पर्वताकार है!

कब टूटेगी वो कारा?

बहना उसका धर्म है
बहता है पानी

बहती धारा ने सुनी जब
ठहराव की कहानी-
तो विचलित मन से मुड़ गयी
परिवर्तन की लहर आ रही थी
धारा सहर्ष उससे जुड़ गयी

अब बहते हुए वो कष्ट, कंटक, रोड़े
सब साफ़ करती है
सहनशील है...
हर बार हमें माफ़ करती है

अचल खड़े पर्वत के पाँव पखारते हुए
धारा सन्देश दे जाती है
सुविधानुसार ढ़लने वालों को
अटल अचल सिद्धांतों की याद दिलाती है

बहता पानी
अपना धर्म निभाता है
कुछ भी हो जाए पर्वत अपने स्वभाव के अनुरूप
अटल खड़ा रह जाता है

सिद्धांततः
जिसकी जैसी प्रकृति उसका वैसा कर्म...
मानव हो कर भी
क्यूँ नहीं निभ पाता फिर हमसे मानव धर्म?

बहते हुए
यह बड़ा प्रश्न छोड़ गयी है धारा
आत्मा जिसमें बंदी है...
कब टूटेगी वो कारा?

खाली जगह

जब मन
खाली खाली होता है
तो यादों से भर जाता है
जब भी
ज़रा सा अवकाश देती है ज़िन्दगी
कितना कुछ बीता हुआ याद आता है

लगता है ऐसा...
मानों जो पात्र लबालब भरे हुए हैं
उन्हें कुछ खाली होना चाहिए
कुछ यादों की तरलता भी हो वहाँ
और कुछ आँखों का पानी होना चाहिए

जिससे और कुछ हो हो
इतना तो होगा ही-
नमी बनी रहेगी
भरे होने पर भी जो रीतापन है पात्रों में
उसे यादों की कुछ एक बूँद ही भर देगी

यादें जिंदा रहे तो
रीते वर्तमान को
भविष्य की कड़ियाँ मिल जाती हैं
'आज' भी तो 'कल' मात्र याद बन कर रह जाएगा-
ये महसूसते ही 'आज' को जीने की तमन्ना
राहों में कलियाँ बन कर खिल जाती हैं

यादों...
जब भी देखना उदास हैं हम
आना और पल पल महका जाना...
पेड़ों की चोटियों पर खिले फूलों ने
जो छतरी का सा आकार ले लिया है
उनका रंग कुछ और दहका जाना...

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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