अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हे ईश्वर!

आज एक पुरानी कविता मिल गयी... करीब बारह साल पहले लिखी हुई...; जाने किस मनोदशा में लिखा था यह सब... अखब़ार में छपी दिल दहलाने वाली ख़बरों से प्रभावित हो कर शायद...! आज देखते हैं तो लगता है... इतनी ही बुरी होती दुनिया तो अब तक समाप्त न हो गयी होती...
हैं मुट्ठी भर किरणें... हैं मुट्ठी भर लोग... जिनके प्रताप से चल रही है दुनिया और ईश्वर भी निश्चिंत है... क्यूंकि वह जानता है एक बूँद अच्छाई सागर भर बुराई पर शर्तिया विजय पा लेगी!

हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

चौपायों
में तो सिर्फ पशुता है,
दोपाये आसुरी हैं...

हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

बेचैन
हृदय...
श्रीहीन सी अन्तःपुरी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

मृत्यु
की सी कातरता
इंसानियत के सामने मुँह बाये खड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

लुटता
हुआ इंसान और लूटने वाला भी इंसान-
ये कैसी विडम्बना सम्मुख आन पड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

मानवता की शवयात्रा में
मूक दर्शक बन क्यूँ ये भीड़ खड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

*

हे
ईश्वर!
इतना विवेकशील बनाया इंसानों को,
फिर क्यूँ हमारा हमराह
स्वयं हरि है?
घटनाक्रम क्यूँ लिखवा रहा है चेतना से
कि... तेरी दुनिया बहुत बुरी है?

आदि
मध्य अंत... ये कैसी धुरी है!

अस्तित्व का भान!

मेरी कवितायेँ शीर्षक विहीन हुआ करती थीं... यूँ ही लिखते थे और कोई शीर्षक नहीं ढूंढ़ पाते थे... किसी शीर्षक की परिधि में भाव को बाँधने का अनुशाषण सीखना मेरे शब्दों के लिए सरल नहीं रहा है... एक बार एक शीर्षक मिला था नाता उसपर लिखी थी कविता... पहले भी यहाँ उसके विषय में लिख चुके हैं... एक और शीर्षक मिला था अलविदा उस पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं, अब इधर जब 'अस्तित्व' पर लिखने की बात आई तो 'नाता' और 'अलविदा' कविता याद हो आये... विश्वास नहीं था कि कुछ लिख पाएंगे क्यूंकि मेरे लिए लिखना बस ऐसे ही होता है बिना सोचे समझे.... अब ये मीता जी की प्रेरणा ही रही कि एक सुबह यह कविता 'अस्तित्व का भान' अस्तित्व में आ गयी! धन्यवाद चिरंतन, अपने अंक में मेरी कविता को स्थान देने के लिए...

झूठी इस दुनिया में
सत्य का अस्तित्व कहाँ है?
ये तलाशने को भटके मन
खामोश ताके ऊपर से नील गगन

सुबह से रात हो गयी
उलझनें कितनी साथ हो गयीं
फिर चाँद का मन पिघल गया
वह तुरंत बादलों से निकल गया

साथ चलते हुए कहता रहा
संग संग मानसिक हलचलों को झेलता रहा
अस्तित्व के प्रश्न पर मौन हो गया
एक रौशनी खिली और भटकाव सारा गौण हो गया

कहने लगा चाँद-

अंधकार का अस्तित्व है जबतक
रौशनी की पूजा है तबतक
झूठ जब तक हर मोड़ पर खड़ा है
सत्य वहीँ जीतने के लिए अड़ा है

मृत्यु जब तक मुस्कुरा रही है
जीवन की कलियाँ तब तक खिलखिला रही हैं
उदासी का आलम है जबतक
खुशियों का अस्तित्व है वहीँ कहीं तबतक

कोई अकेला नहीं आया है
प्रभु ने सबको जोड़ों में बनाया है
बारी बारी से सब हमारे जीवन में आते हैं
अस्तित्व में आता है जीवन तो मौत को भी हम एक दिन अपनाते हैं

अब देखो न, मेरी चांदनी का अस्तित्व सूरज से है
उधार की रौशनी से चमकता हूँ
लेकिन दिवस भर जो नहीं कर पाया सूरज
उसी की रौशनी से उसका ही काम करता हूँ-
दर्द तुम्हारे हरता हूँ
नीरव रात्रि में बातें तुमसे करता हूँ
तर्क सारे रखकर मौन हो जाता हूँ
यहाँ बात मेरी नहीं तुम्हारी है, मैं गौण हो जाता हूँ

अस्तित्व का प्रश्न है
तो मन ही मन गुनता हूँ
धड़कनें तेरे हृदय की
साफ़ साफ़ सुनता हूँ

सुन! ध्यान धर
और इस बात का सम्मान कर
कि तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है
जीवन झूठा नहीं वह सत्य का संधान है
अंतिम छोर पर मृत्यु की गोद है
जीवन की इन टेढ़ी मेढ़ी राहों पर ही कहीं मुक्ति का बोध है

चल, कि उसे तलाशना है तुझे
अपने 'अस्तित्व का भान' तराशना है तुझे
इतना कहते ही खिल उठा चाँद का मन
आ गए थे दिनमान अब खामोश नहीं था गगन!

बर्फ़ीली बारिश को देखते हुए...!

आज मौसम ही ऐसा है, अभी अभी सूरज देवता झांके खिड़की से... उन्हें प्रणाम किया और कुछ कार्य में व्यस्त हो गए... तीन दिन की छुट्टी के बाद आज पुनः वही भागदौड़ वाली दिनचर्या... इसी सब में उलझे थे कि देखा बर्फ़ गिर रही है... इतनी जल्दी कहीं बदलता है आसमान का परिदृश्य... सूर्य देव गायब और हर तरफ उजला उजला... फिर वही बर्फ़ की चादर ओढ़े धरा!
मन का मौसम भी तो ऐसा ही होता है न... पल पल बदलता हुआ; ये कविता बस यूँ ही मन के मौसम से बाहरी वातावरण को जोड़ती हुई...

चले जाने के बाद लौट आया है
बर्फ़ के गिरते फाहों की शक्ल में
आसमान का रुदन

हो जाएगा
कुछ ही क्षणों में श्वेत
धरा का आँगन

मानों अपने आँचल में उसके सारे आंसू समेट
उसी एक रंग में रंगकर
निभा रही हो धरा कोई नेह भरा बंधन

मन कल्पना करने को स्वतंत्र है
लेकिन कोई और रूपक नहीं मिलता हमें इस बर्फ़ीली बारिश के लिए
इसे बस कह दे रहे हैं हम धरा-गगन का सम्मिलित क्रंदन

सूरज झाँका था सुबह सवेरे
हमारे मंत्रोच्चार के साथ ही लौट गया दबे क़दमों से
उसे शायद पता था आज आसमान का है रोने का मन

अब सभी ओर सफ़ेद ही सफ़ेद है
गिरते बर्फीले लफ्ज़ भी और तनहा ज़मीन भी
लालिमा से युक्त नहीं है अभी नभ फूल या चमन

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन

खिली खिली सी लगे चांदनी
दिख पाए अपनी समग्रता में सूरज की किरणें
वो दृष्टि दे जाता है रूदन!

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है...!

चलती जाती थी अंतहीन राहें
जीवन चलता जाता था
ये कैसी अद्भुत बात है
कभी स्वर... तो कभी मौन हमें रुलाता था!

एक ऐसा भी समय हुआ इस धरा पर
जब 'कथनी' का 'करनी' से नाता था
दिखती थी जितनी उज्जवल तस्वीर
अन्दर भी उतना ही तेज जगमगाता था!

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है
इस सच को स्वीकार अम्बर में बादल छाता था
'है' का अस्तित्व साकार करने को
तत्क्षण वह बरस जाता था!

भले दिन गुज़र गए भले ही
स्मृति में सबकुछ पूर्ववत मुस्काता था
ये 'आज' ही जाने कैसे हावी हो गयी निराशा...
कल तक चाहते थे और सौन्दर्य अवतरित हो जाता था

होगी फिर से शुरुआत अवश्य, आखिर जानते ही हैं
यहाँ झूठ हर क्षण भरमाता है.... भरमाता था
नयी रीत नहीं है... पुरानी प्रीत है यह
जीवन अब भी वैसे ही रुलाता है... कल जैसे रुलाता था!

खिली धूप के बाद की उदासी...!

क्यूँ होते हैं लोग ऐसे... दुनिया इतनी बुरी क्यूँ है... हम किसी के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करते तो कोई क्यूँ बेवजह हमें कष्ट पहुंचता है... ये ऐसे सवाल हैं जो ज़िन्दगी हमेशा दागती रहती है! अभी कुछ ही दिन पूर्व बहुत सारी बेवजह की समस्यायों से मन व्यथित था, आज भी व्यथित है. ये सोच रहे हैं कि लोगों में इतनी हिम्मत क्यूँ नहीं कि जो कहना है वो सामने आकर कह सकें, बेतुके अनाम कमेंट्स करना ओछी मानसिकता नहीं तो और क्या है...? ये मेरी जगह है, यहाँ मैं कुछ एक सुकून के पल बिताती हूँ... 'अनुशील' पर होना मेरे लिए ऐसे कई प्रियजनों के संग होना है जो मुझे मेरी लेखनी की वजह से आज तक याद रखे हुए हैं... ये उन दोस्तों के लिए है जो कमेन्ट तो नहीं करते पर वे जब भी आते हैं यहाँ तो उनकी आहट महसूस हो जाती है मुझे...! यहाँ पर आकर अगर कोई अनामी असंगत टिपण्णी कर के जाता है तो मैं ही नहीं मेरे मित्र भी आहत होते हैं... ऐसी ही कुछ अनाम असंगतियों को रोकने के लिए comment moderation लागू किया! लेकिन, समस्याएं और व्यथित करने वाले तत्व पीछा छोड़ने वाले थोड़े ही न हैं... शायद दोष मेरा ही है... अगर ऐसा नहीं होता तो एक के बाद एक विचलित करने वाली बातें मुझ छोटी सी जान के साथ ही क्यूँ घटित होती और वो भी बिना किसी अंतराल के... एक के बाद एक!
*****
कल बड़े प्यार से एक बेहद प्यारी लड़की के लिए यूँ ही कुछ लिखा था... मन के किन्हीं तहों में खिलखिलाती हुई वह खुद कुछ लिख गयी थी... अशेष मुस्कानें, जिसे मैंने शब्द मात्र दिया था... सब अच्छा था, खुश थी मैं... अपनी व्यस्तताओं के बीच मुस्कुराने का अवकाश पाकर बहुत दिनों के बाद ज़रा सी व्यवस्थित थी मैं!
ऐसा नहीं है कि ऐसी कोई बड़ी विपत्ति आ गयी हो लेकिन मैं कद-काठी और शरीर से ही नहीं, मन-मिजाज़ और बुद्धि से भी बहुत छोटी हूँ... कृशकाय हूँ... बहुत जल्दी विचलित हो जाती हूँ. अगर बात मेरी होती तो रो-धो कर समाप्त कर देती, अपने मन को समझा देती, लेकिन यहाँ बात उसकी थी जिसे मैंने बड़े प्यार से कुछ एक शब्द भेंट किये थे और टिपण्णी करने वाले एक महानुभाव ने आकर सीधे सीधे उसके शिष्टाचार पर ही प्रश्न कर दिया...!
क्या कहूँ? कमेन्ट का आदान प्रदान अगर शिष्ट होने की शर्त है तो मैं भी अशिष्ट हूँ... क्यूंकि मैं भी हर जगह कमेन्ट के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं कर पाती हूँ... लेकिन ये शर्त मुझे हास्यास्पद लगती है.... और जहां तक पूजा का सवाल है उसकी शिष्टता पर शायद ही किसी को संदेह होगा... छह वर्षों से लगातार लिख रहीं हैं वे... मीडिया से जुड़ी हैं तो ब्लॉगिंग शिष्टाचार और अन्य पहलुओं से परिचित हैं ही...
अपनी राय रखने का हक सबको है लेकिन समय स्थान और स्थिति भी कोई चीज़ होती है... यह भी तो एक शिष्टाचार है! उम्र, अनुभव और ज्ञान में सभी मुझसे बहुत बड़े हैं... ये सब कहना मुझे अपनी अशिष्टता ही लग रही है लेकिन यह कहे बिना रहना भी मेरे लिए संभव नहीं...
मुझे पता है, पूजा अनुभवी है... आहत हुई भी होगी पिछली पोस्ट पर किये गए किसी के कमेन्ट और बेबुनियाद इलज़ाम से तो मुझे क्षमा कर देगी!

लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि सी!

एक भोली भाली भली सी... प्यारी सी लड़की... अपनी खिलखिलाहट से अँधेरा रौशन कर देने वाली लड़की... अपनी उदासी से हवाओं को भी उदासी का ही कोई नगमा डूब कर गाने को प्रेरित कर देने वाली लड़की... अपने विशुद्ध पागलपन में कुछ कुछ मेरे जैसी लेकिन अपनी विशिष्टताओं में केवल और केवल अपने जैसी, अकेली और अनूठी लड़की... कलम से हर बार चमत्कृत कर देने वाली रचनात्मकता का प्रतिबिम्ब- मेरे लिए यही तो है न परिचय लहरें वाली पूजा का!
बहुत दिनों से इस प्यारी सी लड़की के लिए बहुत कुछ लिखने का मन था... लेकिन जो हम करना चाहते हैं जो हम कहना चाहते हैं वह हमेशा हो ऐसा संभव तो नहीं... पता नहीं आज भी लिख जाएगा वह कुछ या नहीं या लिख भी गया तो प्रेषित हो पायेगा या नहीं...
एक दिन यूँ ही ढ़ेर सारी उदासी घेरे हुए थी... कोई ऐसा नहीं था जिससे बात की जाए... जिसके पास बस यूँ ही फ़ोन घुमा दिया जाए तभी कहीं से एक हवा के झोंके सी वह आई और परिचय का गहरा रंग लगाती हुई उड़ गयी...! तारीख़ भी कुछ ऐसी ही थी... कभी कभार आने वाली... २९ फ़रवरी! लेकिन उस दिन पहली बार बात करते हुए ही ये एहसास पक्का हो गया कि ये रंग अब हमेशा रहेगा मेरे जीवन में! लहरें आती जाती ये सुदूर तट अवश्य छूती रहेंगी और प्रतिविम्ब सा कुछ कुछ हर बार किनारों को लौटते हुए देती जायेंगी!
बहुत सारी यहाँ वहाँ की बातों के बीच उसकी खनकती हुई आवाज़ मेरी निधि बन गयी और एक प्यारी सी दोस्त से पुराना सा परिचय जान पड़ा भले बात पहली बार हुई हो...! कुछ एक परिचय ऐसे ही होते हैं, उनका होना ऐसा होता है जैसे नीरव अन्धकार में चमकता एक ध्रुवतारा! रिश्ते, भाव और एहसासों का आकाश ऐसा ही होता है... कल्पना सा सुन्दर पर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर कड़ी
धूप में खिलखिलाता हुआ भी... तभी तो इनसे बड़ा सत्य कुछ और नहीं होता!
बात करते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रहे हैं...
पूजा, देखना कहीं किसी दिन ढ़ेर सारी डार्क चोक्लेट्स के साथ तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देने न पहुँच जायें... जितनी दूर हैं ऐसा संभव तो नहीं जान पड़ता लेकिन कौन जाने सच भी हो जाए... आखिर संभावनाओं का नाम ही तो जीवन है!

मिलते ही लगा, कि
अपनी है
जीवन इसकी आखों में
अर्थ नया पाता है!
'लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि'
देख इसे
शब्द स्वयं
संवर जाता है!!

काश!

कहीं
किसी
भाषा में
कोई तो शब्द ऐसा होता
जो यहाँ के भाव
जस का तस
वहाँ तक पहुंचा देता
पर ये खेद की बात है,
ऐसा होता नहीं है...

शब्दों
की अपनी सीमाएं हैं...
अपने बंधन हैं...
और जब यूँ चलते हैं शब्द
एक स्थान से अपने गंतव्य की ओर
तो मार्ग में
और भी अन्य ध्वनियाँ
साथ हो लेती हैं,
या कभी कभी
ऐसा भी होता है-
कुछ ध्वनियाँ छिटक जाती हैं
मूल शब्द से;
अपनी समग्रता में तो शब्द
नहीं ही पहुँचते हैं
मंजिल तक!

सम्प्रेषण
की सारी समस्याएं
और इन समस्यायों से
जन्म लेने वाली
अन्य भिन्न समस्याएं...
जाने
क्या
उपचार है इसका?

शब्द
अपना काम करें,
पर शब्द और भाषा से परे भी
एक ज़मीन हो...
जहाँ मौन में बात हो जाए...
आपसी समझ और सहजता की वह निधि हो
जो हर कठिन परिस्थिति में
समाधान लेकर अवतरित हो पाए...
काश!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है...!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

उच्चरित होते ही
प्राण सहित
अस्तित्व में आ जाता है शब्द
इसलिए जब बोलें,
तो सोच समझ कर बोलें!
दे जब भी
अवसर
ये भागती हुई ज़िन्दगी
तब बिना एक भी पल गवाएं
मन की गांठें खोलें!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

सब नाज़ुक से तार हैं
टूटन से
इनकार नहीं
टूट जाये, तो
हौसलों को फिर से जोड़ें!
राह में आने वाले
रोड़े पत्थर से
जो आहत हों
तो हृदय कुञ्ज की
विश्वासी कलियों को निचोड़ें!

मिल जायेगा अमिय भाव जो शुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

वो इत्र
इकठ्ठा हो जायेगा
जो हवाओं को महका देगा
ऐसे में
कुछ विशिष्ट से बीज बोयें!
काँटों और फूलों का
मेल ही तो है
ये दुनिया
इसे विपत्ति मान कर
भला क्यूँ रोयें!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

एक गीत सुनते हुए...!

जीवन के कई रंग होते हैं... कई पड़ाव होते हैं, कई मोड़ों से गुजरती है ज़िन्दगी... कभी तेज तो कभी मद्धम और एक ऐसा भी पल आता है जब अध्याय बदलता है. इस जीवन से उस जीवन का फासला पल में तय हो जाता है और मन अटका रह जाता है बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशता हुआ! इस पार से उस पार जाना हमेशा आसान नहीं होता..., कहीं से विदाई ही तो कहीं पर स्वागत का शंखनाद है- लेकिन भावों का संसार इन वाक्यांशों से नहीं बनता... यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलती है शहनाई की धुन पर...! बचपन के आँगन को छोड़ते हुए यह दर्द सहती आई हैं बेटियां... अपने अंश को विदा करते हुए मात पिता अकथ पीड़ा महसूस करते आये हैं सदा से... और विदा करा कर ले जाने वालों की भी आँखें नम होती आयीं हैं सदा से ही... विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी, गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई भी सुबकने लगते हैं और यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता है कि इसकी कल्पना मात्र से मन विचलित सा होने लगता है.

कितना अजीब है न... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!

इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे न भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है न?

ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा इसी आशा के साथ आज अनुशील पर प्रस्तुत हैं मेरे बिखरे से शब्द...!

***

आज (२६. ७. २०१३) इस पन्ने तक आना हुआ पुनः, उन भावों को फिर से जीया…, सबकुछ यथावत याद हो आया… आपकी प्रेरणा से इस पोस्ट का लिखा जाना… उसके बाद आपका भी उसी रोज़ इस गीत के विषय में लिखना… तथ्य और कथ्य दोनों लिहाज़ से समृद्ध आलेख

***

आहटें सुनाई देती हैं… उस आहट का शुक्रिया जिसका यहाँ आना मुझे इतने समय बाद इस पन्ने तक ले आया और दशमलव के उस पन्ने तक भी ले गया जिसका लिंक आज यहाँ भी सहेज ले रहे हैं!

सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं...!

आज मेरे छोटे भाई का जन्मदिन है...
उपहारों को चुनते हुए... बुनते हुए... यूँ लिख गयी भावनाएं...
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, ब्रज वल्लभ :))

बादलों के देश से
खूब सारी किरणें इकट्ठी की
और उन्हें तुम्हारा पता बताया...
बताना तो...
वे तुम तक पहुंची या नहीं?

खिलखिलाते फूलों की मुस्कान से कहा-
वे तेरे चेहरे पर खिल जाए
यह अनुरोध किये बड़ा वक़्त हुआ...
बताना तो...
तेरे मुख पर वह खिली या नहीं?

इतनी दूरी से
सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं
यादों की गलियों के पत्थर से हम खेल रहे हैं...
बताना तो...
ये आवाजें तुम तक पहुंची या नहीं?

लम्बी दूरी तय करनी है न
सो बड़े सवेरे ही चल पड़ी थीं यहाँ से
शुभकामनाओं की... आशीषों की नाव
बताना तो...
अब तक पहुंची या नहीं?

'यश', 'कीर्ति' और 'सफलता' से कहा
कि तुम्हारे द्वार जाए
पता है?
एक स्वर में सब क्या बोले...?
'हम रहते हैं वहीँ...'!!!

मेरे सिरहाने एक मुट्ठी रौशनी हर रोज़ पड़ी मिलती है...!

जब मैं रोती हूँ
और, ऐसा अक्सर होता है
तब अलग अलग कारणों से
सभी, या तो समझाते हैं
नाराज़ होते हैं
डांटते हैं
अपनी खीझ ज़ाहिर करते हैं
और फिर यह सब यूँ प्रभावित करता है मुझे, कि-
अपने रोने पर रोना आता है
कोई रंग नहीं भाता है

हाँ! फूल कुम्हला जाते हैं
आँखों की नमी से
धुंधली हो जाती है
आसमानी छटा,
और कई बार तो
आसमान मेरे संग
बेमौसम रोने भी लगता है
हो जाती है बारिश...
बादल का कोई टुकड़ा यूँ ही छाता है
और मेरी ज़मीन पर बरस जाता है

ये
यूँ ही होता होगा
कुछ कुछ भ्रम सा...
लेकिन, सोचो तो!
कितना ज़रूरी है यह एहसास
जिंदा रहने के लिए-
साथ खड़े हो कर
साथ रोने की
सहभागिता भी कोई निभाता है
ईश्वर मेरी ख़ातिर प्रकृति का रूप धर कर आता है

मेरे सिरहाने
एक मुट्ठी रौशनी
हर रोज़ पड़ी मिलती है
ये बात और है, कि
अँधेरा भी खूब सताता है...
चलो कोई बात नहीं,
बाती को जलने से काम
अँधेरा मिटेगा या नहीं
ये निर्णय करने वाला
केवल वही विधाता है!

आती रहना मेरी ओर!

टूटता है कोई सपना
छूटती है कोई डोर
अँधेरा रौशन हो जाता है
फिर खिल आती है भोर

कहीं से छिटक कर कभी
ख़ुशी आ जाती है मेरी ओर
गम का क्या? उनका तो...
न कोई ओर न छोर

सांध्य लालिमा क्षितिज पर
मचाये हुए है शोर
उन्हें महसूसते हो रहे हैं
मन-प्राण भावविभोर

ये प्रकृति...
कितने रंगों को समाये,
आंदोलित किये हुए है
पोर-पोर;
हे प्रकृति! ऐसे ही अपने महात्म्य से
प्रभावित करती रहना...
कभी हम बढ़ेंगे, कभी तुम दो कदम बढ़ाना
आती रहना मेरी ओर!

भक्ति का रंग!

रंगों में रंग जाने का दौर गया
अब कोई किसी रंग में नहीं रंगता
सब ओर दिखावे का बोलबाला है
लेकिन सबको ये रंग नहीं जमता...

सतरंगी सुषमा है बाहर बाहर
अन्दर तो युद्ध ही है ठनता
होलिका का अर्थ तब तक समर्थ नहीं होता
जब तक कोई प्रह्लाद नहीं बनता...

हिरन्यकश्यप का अहंकारी हठ
और होलिका की विशिष्ट क्षमता
नन्हे बालक की भक्ति के आगे बौने हो गए
और जीत गयी प्रभु की ममता...

इस दिव्य सन्देश को आत्मसात कर
भक्ति के पावन रंग में जो मन है रमता
उसे रंगों की शालीनता भावविभोर कर देती है
फिर तो ये उत्सव नहीं कभी थमता...

ये खेल है निराला...!

ढ़ेर सारे रंगों में
एक पक्का रंग है-
उदासी का रंग

इस रंग से
खुशियाँ कब से
लड़ रहीं हैं जंग

और यह है कि
निर्विकार भाव से
सब गुनता रहता है,
विश्वास का एक
पक्का धागा लेकर
जीवन की कड़ियाँ बुनता रहता है...

एक फीकी सी
बुनावट
उभरती है,
खुशियों के भड़कीले सितारे जहां जड़े हुए हैं
उन बिन्दुओं पर
ठहरती है...

और
फिर बढ़ जाती है
आगे,
ये खेल है निराला
और वैसे ही
निराले हैं धागे...

उदासी की
सपाट ज़मीन पर
कुछ रंग बिरंगे फूल खिलें
विपत्तियाँ तो उगी हुई हैं ही
अब कुछ
सहज सरल से विम्ब मिलें

मृत्यु से पहले
सीखें हम
जीने का ढ़ंग

जिस तरह साया चलता है
वैसे ही रहे
जीवित रहते जीवन का संग!

सपने बुनने के बहाने...!

हमने
कुछ पन्ने पलटे यूँ ही...
रंगों की शामें खिल उठीं,
पर बहुत कुछ बुरा भी हुआ
कुछ बादल बरसे
कुछ नज़्में रुठीं!

फिर
धूल झाड़कर सहेजे सपने...
रूठी नज़्मों को धूप दिखाया,
अवांछित सब कुछ
काट छाँट कर
पुनः शब्दों को सजाया!

हाँ, जारी रहा
चोट को भुलाने का असफल उपक्रम...
एक दीया कहीं पर बुझ गया,
खिलने को खिलते रहे पुष्प
पर कष्ट भी अपने चरम पर था
समस्त निराशाओं से मन समय रहते जूझ गया!

बस
इसी बात पर आंसू पोंछे...
कुछ कतरों को सी लिया,
सपने बुनने के बहाने
कुछ चुन बिन कर इकठ्ठा किया
और एक सत्य शाश्वत जी लिया!

सत्य, शिव और सुन्दर!

एक समंदर है
हर इंसान के अंतस्तल में,
उबड़ खाबड़ भूमि है
तो नरमी भी है यहाँ वहाँ समतल में!

बस
किनारे से चलते हुए...
भीतर तक जाना है,
वहीँ जहाँ गहराई है
सत्य और शिव का ठिकाना है!

हम
स्वयं खुद से
दूर रहते हैं आजीवन,
आत्मा से पहचान का
नहीं आता कोई मौसम...

भीड़
में रहकर
भीड़ के हो जाते हैं,
हम चले थे पाने खुद को
पर भंवर में खो जाते हैं!

जितना
चलते हैं धरती पर
सूक्ष्म क़दमों से उतना भीतर चलना है,
आत्मा के द्वार पर दस्तक दे पायें
तब तक गिरना और संभलना है...

यही
हमारी आपकी सबकी
पहचान है,
ईश्वर क्या है? हममें आपमें हम सब में
बसा हुआ भगवान है!

जिस
दिन शरीर में रहकर शरीर से परे
आत्मा स्वयं को मानेंगे हम,
उस दिन मुस्कुराएंगे दिनमान
भाग जाएगा हृदय का तम...

जीव ही शिव है
जीवन ही पूजा है
परिक्रमारत प्रतीत होती
फिर हर डगर!

जिसकी जैसी दृष्टि होगी
वह वैसी दुनिया पायेगा,
आभासी है यह जग
जो जैसा सोचेगा वह वैसा हो जाएगा!

अपनी
दुनिया... अपनी धरती पर
अपने अपने स्वर्ग और नर्क रचते हैं हम,
हृदय कुञ्ज में कोलाहल है
और मन में बसते हैं कितने ही तम!

माटी
की काया में
जबतक है जगमग प्राण,
मन मस्तिष्क में
है चलना यही विधान...

तर्क...
बुद्धि... मस्तिष्क की
और मन की चंचलता-
सबसे श्रेष्ठ... सबसे परे
है हृदय की सरलता

बस
यह प्रतिमान साथ हो
फिर सत्य सारे मूर्त हैं,
जुड़ाव की प्रक्रिया की
पहली यह शर्त है!

मन
बुद्धि प्राण से बना यह शरीर
जिस दिन आत्मा को पहचानेगा...
उस दिन वह
जीवन की महिमा को जानेगा!

और
हो जाएगा
सत्य, शिव और सुन्दर
खोज जिसे रहे हैं बाहर
विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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