अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अब तुझसे ज़िरह करे कौन!

मृत्यु की सी नीरवता है
मन बड़ा उदास है,
दूर खड़ा है जीवन
कहीं न कोई आस है...

अकारण ही
आँख बह रही है,
मौन हैं हम, लेकिन
कलम कह रही है...

ये क्या है?
जो हमसे लिखवाता है,
जीवन चलता रहता है
फिर, मन क्यूँ अकारण बैठ जाता है?

इन प्रश्नों के उत्तर में
हमारे पास है बस एक अर्थपूर्ण मौन
जो समझना है समझ ले, ऐ ज़िन्दगी...
अब तुझसे ज़िरह करे कौन!

धन्य वह जिसने शरणागतवत्सल को पहचाना है!

ये ऐसा ही फ़साना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

हैं यहाँ...

भांति भांति के लोग
भांति भांति के रोग
कलयुगी इस हवा में
निश्चित प्राण जायेंगे सूख

फिर भी गाये जा जो तराना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यहाँ पर...

कैसा रिश्ता कैसे नाते
जो आये सबको देखा जाते
धरती के हिस्से में है
जितनी छाया उतनी धूप

बस मन को भरमाना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यही हुआ है...

ऊपर का श्रृंगार रहा
रुखा सूखा उद्गार रहा
जीवन ऊपर ऊपर ही बीत गया
दिखा तो केवल बाहरी रूप

कुछ आत्मा से रिश्ता गहराना है
जीवन दुर्लभ प्रसाद है
इसको उसी रूप में अपनाना है

फिर राह ही राह है
धन्य वह जिसने
शरणागतवत्सल को पहचाना है!

ये सत्य भी तह लिया!

कविता के केंद्र में
कभी कोई एक व्यक्ति नहीं होता,
कविता भाव है...
और भाव तो विस्तार का नाम है!
वो और क्षितिज होते हैं
जहां उगती है कविता
उसका
तेजोमय धाम है!

एक के तार से
दूसरे के तार
जुड़ जाते हैं...
इस सदी से उस सदी तक
कविता में रच बस
भाव जीवित रह जाते हैं...

कविता
इतनी दिव्य होती है
कि उसकी सत्संगति का
लाभ मिल जाता है,
लिखने वाला
अपनी पीड़ा लिखने बैठता है और
सार्वभौम पीड़ा का
कोई अक्षर अनायास लिख जाता है!

ऐसे ही
कई सन्दर्भों में
बात ये जांची परखी
सच्ची है,
ये पल क्या जानेगा?
बीतना इसकी नियति
अभी उम्र इसकी
कच्ची है!

जब सफ़ेदी जायेगी
उसके बालों में
और ये पल जब
बीता कल हो जाएगा-
तब जानेगा
शब्दों का रहस्य
और फिर अपनी नासमझी पर
कल ये पल पछतायेगा...

चल समय!
आज तुझसे भी
कुछ ऐसे ही
हँसते रोते कह लिया,
तू बिना विचलित हुए-
कैसे चल देता है अपनी राह?
ये समझने के लिए अभी बहुत चलना है हमें...
ये सत्य भी तह लिया!

पीड़ा में मन मोद मनाए!

ये दुनिया ही ऐसी है
संवेदनशील हों अगर आप
तो कभी
सुखी नहीं रह सकते...
एक दर्द रिसता रहता है भीतर
एक ज्वाला में जलता रहता है मन
एक ऐसी पीर
जो आप किसी से कह नहीं सकते!

अगर प्रवृति जान ली अपनी
तो इसी में चतुर्दिक भलाई है
कि इस दर्द से
यारी कर ली जाए...
नहीं तो समस्यायों का विकराल रूप
सुरसा सम मुख खोले रहेगा
इसलिए,
आनंद ढूंढ़ कर पीड़ा में मन मोद मनाए!

किसी के पास उजाला नहीं है,
देना है तो देने के नाम
हर मोड़ पे लोग
केवल विशुद्ध तम ही देते हैं...
ख़ुशी का लबादा ओढ़े लोग
घुट रहे हैं भीतर भीतर,
क्या दे ऐसे अभाव में किसी को?
देते हैं तो केवल गम ही देते हैं!

मन मेरे!
छोड़ ये जग के फेरे
ये सदियों से ऐसा ही है
बदला है, बदलेगा...
आंसू तेरे अपने हैं, नीर बहा ले
और इस दोस्ती पे मान कर-
कभी नहीं पथरायेंगी तेरी आँखें
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा!

नयन हमारे बरसाती हैं!

धड़कनों का संगीत
सुनाई दे जाए
ऐसी नीरव शांति है यहाँ
कुछ शब्द हैं, हैं कुछ विचार
जन्म ले रही हर पल
मन में क्रांति है यहाँ

मेरा मन युद्धक्षेत्र बना हुआ है
लड़ रही हैं
दो परस्पर विरोधी शक्तियां
भरने में लगे हुए हैं उन्हें, जो
जीवन हर क्षण
दे जाता है रिक्तियां

अपने आप से लड़ते हुए
कवितायेँ
लिखी जाती हैं...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

जहां बैठ धूप में
सुखा लेते अपने आंसू
वो आँगन ही नहीं है
जहां नाच उठती
संग संग कुछ प्राकृत बूंदें
वो प्रांगन ही नहीं है

अब तो बस एक ओट है
जहां से झाँक कर
सूरज रौशनी दे जाता है
जो रिश्ते कभी प्रकट नहीं होते
उन रिश्तों का आकाश
सदा मुस्काता है

कविता
एक सामानांतर रेखा की तरह
चलती है संग
उसकी सदाशयता
हर बार
करती है दंग

मेरे गगन पर
खिलने वाले इन्द्रधनुष को
यह कविताओं का रंग बड़ा भाता है
स्वयं सतरंगी है वह
पर बड़ी मासूमियत से
इनपे रिझा जाता है

शायद ये इन्द्रधनुष की ही चाहत है
जो हमसे
कविता लिखवाती है...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

बस एक स्मरण!

शायद भूल गयी है
बात वो सारी...
जो चलना सीखते वक़्त
हम सबने सीखा था,
गिरते थे
फिर उठ कर
चलने का
हम सबमें सलीका था!

उस भोले-भाले उम्र में
न समझ थी,
न फ़लसफ़ों का ज्ञान था...
बस भोलापन था,
और शायद वही
सभी रटंत उक्तियों से महान था!

तभी तो,
बालपन में...
किसी के साथ नहीं घटित होता है
हतोत्साहित होना,
चलना नहीं आता है
सीखते हुए गिरते हैं
पर फिर पल में बिसर जाता है
छिले हुए घुटने के लिए रोना-धोना!

उठ कर नन्हें पग से
फिर ऊँगली थाम लेते हैं
कैसे नहीं होंगे पारंगत
बच्चे ये संकल्प ठान लेते हैं

फिर
यूँ ही गुज़रते हुए
समयचक्र
वो मासूमियत लील जाता है!
पढ़ता हुआ... बढ़ता हुआ
चलता हुआ... दौड़ता हुआ
एक रोज़ हारता है मन,
और भीतर से हिल जाता है!

निराशा के भंवर में फिर
राहें खो जाती हैं...
ज़िन्दगी फिर अचानक
सारे रंग त्याग स्याह हो जाती है...

तब बस एक स्मरण
उबारने को होता है हितकर
जानते हैं आप सभी... पर तब भी
हमसे फिर सुन लो, मित्रवर

एक भूली हुई बात बस
दुहरानी है कविता में
लिख जा रही है आज फिर
पर बात वही पुरानी है कविता में

आज भी सुख-दुःख की
ऊँगली थामे ही चलना है
गिरना है और
गिर कर पुनः संभालना है

सारा ज्ञान किनारे कर
बस चलना सीख रहे
एक बालक से
प्रेरणा लेनी है...
जीवन सतत संघर्ष है
जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

अंतराल!

जब शांत होती है वादियाँ
और मन बेचैन होता है
इच्छा होती है
किसी पुराने दोस्त से बात हो जाए

किसी पुराने दोस्त से बात होना
बात होना भर नहीं होता
बात करने से ज़्यादा
वह होता है
उन लम्हों को जीना-
जब सपनों से
ऊँची थी उड़ानें...
पल दर पल बाहों में होते थे
कितने ही तराने...
जब मोड़ से रस्तों के जुदा हो जाने की बात,
बेगानी थी!
आसपास जितने चेहरे थे,
सबसे पहचान पुरानी थी!

इच्छा होती है,
एक फ़ोन की दूरी पर जो बिंदु है
उससे सारी दूरियां क्षण में पाट ली जाए
इस अंतराल में जो कुछ घटा बीता है
सारी पीर बाँट ली जाए

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

लोग समय के साथ बदल जाते हैं...!

कुछ एक ऐसे विम्बों को याद करते हुए जो वक़्त के साथ बदल गए कुछ इस तरह कि विश्वास की जड़ें हिल गयी... आहत मन से लिखी एक पुरानी कविता स्वयं को ही सांत्वना देने के लिए सहेज लेते हैं यहाँ...!

लोग समय के साथ बदल जाते हैं
इतना, कि-
ये यकीन कर पाना भी
नामुमकिन सा लगता है
कि एक समय रहा होगा
जब खूब बनी होगी,
किसी मोड़ पर तब
उलझन नहीं रही होगी!
कितनी कविताओं में
प्रेरणा बन मुस्कुराया होगा,
ये बदली सी वही बहार है
जिसने इतना रुलाया होगा!

यकीन हो न हो
पर ऐसा ही अक्सर होता है
जीवन तो हर रूप में
कोई न कोई धोखा है
और धोखा भी ऐसा कि-
आप झटक नहीं सकते
एक पराये निर्जीव वस्तु की तरह
पटक नहीं सकते
क्यूंकि अपने पतन की ओर
बढ़ने से पहले
वह आपके भीतर पैठ चुका होता है
जितना उसका दोष
उतना ही दोष आपके चयन का होता है

लेकिन,
इसका यह अर्थ नहीं
कि बाहें सिमट जायेंगी
आज भी बाहें फैलाये उमंगें खड़ी हैं
जिन्हें आना है आओ,
एक बार छलने का अवसर तुम्हारे पास सुरक्षित है
क्या होगा,
अधिक से अधिक
एक बार और विश्वास की सिरायें हिल जायेंगी...?

पर, फिर भी निश्चिंत रहो
समेट लेंगे हम अपने टूटे विश्वास को,
सिद्धांत वही रहेगा
सबका स्वागत है...
इस आँगन में सब आ सकते हैं
यहाँ का समीर सबके लिए एक सा बहेगा!

बस कुछ एक
नाज़ुक सी बातों का
एहसास रहे...
जिनका मान हमें है,
ऐसे कुछ यादों के सूखे पत्ते
तेरे भी पास रहे!!!

शब्दों के झुरमुट में...!

कुछ समय पहले लिखी गयी एक कविता आज यहाँ भी सहेज ली जाए...
तीन वर्ष हो गए उनके लिए कुछ कुछ यूँ ही कभी कभी लिखते हुए... अब शब्द पिरोने वाला उपहार भी दे तो क्या... शब्द ही न..:) और मज़े की बात है कि हठ करके वापस हम उनसे भी कुछ न कुछ लिखवा लेते हैं... मितभाषी अपने नाम के अनुरूप ही सुशील स्वाभाव वाले मेरे स्वामी क्या करें... हमको झेलने के सिवा!

वैसे तो
आभार व्यक्त करने जैसा कुछ
है नहीं हमारे बीच,
रिश्ता ही इतना प्रगाढ़ है
कि ऐसी किसी भी
औपचारिकता के लिए कोई जगह नहीं...

लेकिन
फिर भी आज हमें
व्यक्त करना है आभार
कहनी है बातें
इसी बहाने
दो चार

मेरी आधारहीन
बकवासें झेलते हो
मेरे कहने पर कुछ एक शब्दों से
तुम भी खेलते हो
हर एक तूफ़ान को
हँसते हुए झेल जाते हो
कोई भी दाव हो
उसी शालीनता से खेल जाते हो
कहाँ से लाते हो
इतना धीरज?
अँधेरी शाम हो जाते हैं हम
और तुम सदा रहते हो उगता सूरज!

मेरी ज़िन्दगी में
यूँ उगने का
शुक्रिया
हर जन्म में हों
हम अपने प्रिय की
प्रिया

सच कहते हो तुम
बिन बोले ही
मन की भाषा समझी जाती है
शब्दों के झुरमुट में
भावों की प्याली ही
खाली हो जाती है

जो कही न गयी
वह भी समझना
मौन समझते हैं हम भी
पर कभी कभी यूँ ही कहना
कि तुमसे प्यार करता हूँ
तेरी बेवकूफियों को सार कहता हूँ
इतने से ही भर जाएगा मेरा मन
झूम उठेगा मेरा गगन

कभी कभी मेरे लिए
ये बेवकूफ़ियां
तुम भी कर जाना
मौन समझते हैं हम भी
पर कभी
कह कर भी स्नेह जताना

उदारता से
हर बार देते हो
वैसे ही देते रहना क्षमादान
हम दोनों
मिल कर देख लेंगे
जीवन का घमासान!!!

ईश-व्यथा!

दिखता भले नहीं,
पर ईश्वर यहीं कहीं है!
ये दृश्य का दोष नहीं...
अगर हमारे पास दृष्टि ही नहीं है!

एक भोली सी
मुस्कान में वह है...
कभी महसूस हुई थी जिसमें,
उस ध्यान में वह है...

ज़िन्दा है वह
टूटती हुई सांसों में...
जाते वक़्त होती है जो,
उन अनुभूतियों के फांसो में...

छलकता है वह रोज़
किसी के आंसू बन कर...
मंदिर की सीढ़ियों पर बाट जोहता है
दीन दुखी जिज्ञासु बन कर...

उसकी जिज्ञासा यथावत
बनी ही रहती है
वो खड़ा है इधर फिर ये भक्तों की टोलियाँ
किसे पूजती रहती है

हर आत्मा में स्थित है वो
फिर, साक्षात् खड़े देवों को बिसार कर...
ये कहाँ जा रहा है हुजूम?
किसी प्रस्तर प्रतिमा को अपनी श्रद्धा का आधार कर...!

ईश्वर अचरज से देख रहा है...
मूर्ति पर सुशोभित पीताम्बर!
और इधर घूम रही है धरती अपनी समस्यायों के साथ अपनी धुरी पर
क्या करे? अकेला असहाय नीला अम्बर!

विवेकशील बना कर भेजा उसने...
पर हमारी बुद्धि शायद मंद है!
अन्दर देवालयों में पहुँच तो जाते हैं, पर
श्रद्धा विश्वास तो सब बाहर ही कहीं ताले में बंद है!

अब ईश्वर चुपचाप...
वहीँ सीढ़ियों पर बैठा देख रहा है,
अन्दर भीड़ लगी है...
और बाहर वह कंकड़ चुन कर पुनः उन्हें फेंक रहा है!

कोई तो आये...
भक्त और भगवान का मिलन हो!
चकाचौंध से दूर कोटि-कोटि आत्माएं प्रफुल्लित हो जाएँ...
ऐसी पूजा का चलन हो!

ईश्वर आशान्वित है-
तभी तो उसका रूप धर प्रकृति नाच रही है
मानों अपने ही लय में वह झूमती हुई
ईश-व्यथा बांच रही है...!

एक मोड़ आएगा ऐसा...!

कुछ एक रिश्तों के हँसते खिलते फूल
कुछ एक गुनगुनाती मस्तियां
तूफ़ानों में अडिग रहीं
उजड़ी भी तो फिर बस गयीं बस्तियां

गिरने के बाद उठ जाने का,
रोज़ दस्तूर निभाते जाते हैं
आँधियों में भी, हैं कुछ हौसले ऐसे
जो दीप जलाये जाते हैं

झुलसाने लगी जब धूप की गोद
आ गयीं तब बरसातें
सुबह की किरणें गायें फिर-
गुज़रनी थीं, गुज़र गयी रातें

बस एक के बाद एक क़दम
आश्वस्त हो बढ़ते रहें
मिल जायेंगी राहें
बस दुर्गम सीढ़ियाँ चढ़ते रहें

एक मोड़ आएगा ऐसा
जब ज़िन्दगी अलविदा कहेगी
पर उसके पहले कटिबद्ध है वह
क्षण दर क्षण साथ रहेगी

जब तक संग है जीवन
उत्सवधर्मी मन करता रहे मस्तियां
सत्कर्म से दीप्त हो आत्मा
जीवन के बाद भी जीती हैं कुछ हस्तियां

कुछ है जो बीत गया!

मौसम आने जाने हैं
कभी ग्रीष्म ऋतु आई
तो कभी शीत गया

कुछ पाकर कुछ खोकर
चिंतामग्न तो कभी चिंतनमग्न हो
गाता है मन कोई गीत नया

सच? क्या जीवन जीत गया
आज कुछ उदास है मन
कुछ है जो बीत गया

खिली खिली है कली
मगर उदास हैं पंखुड़ियाँ
बह रहीं हैं उन्मुक्त गगन में
मगर चुप सी हैं स्वर लहरियां
मुस्कुरा रही है चांदनी
पर गुम सी हैं पैंजनिया
दौड़ रही है विचारों की आंधी
पर जमी हुई हैं धमनियां

पात्र से जल रीत गया
बीतते पल के साथ
कुछ है जो बीत गया

हासिल है क्षण इतने सारे
गा सकता है मन
खिले हैं फूल उपवन उपवन
निर्जन ही पर वन
बँट कर हो गया सबका
फिर भी ढूंढ़े अपनापन
कैसी विडम्बना है, अपना होकर भी
अपना नहीं है जीवन

खिलते ही, फूलों का टूटना
सुनिश्चित हो जाता है
डाली से जुदा खुशबू का संगीत नया

मरूभूमि से मरघट तक
सन्नाटा ही सफ़र में है
आवाज़ों का दौर कबका है रीत गया

क्या? फिर काल जीत गया
उदास सी है शाम
कुछ है जो बीत गया

कविता तो बस ठहर गयी वहाँ!

कभी कभी मन में आता है
ये सब व्यर्थ है...
लिखना... पढ़ना
शब्दों के जाल जंजाल

जाने इस नश्वर जगत में
क्या पाने को
उद्धत हैं हम
किये जा रहे हैं कदम ताल

लिख कर क्या होना है
भाव सिसकता पड़ा रहेगा
और लोग पूछते रहेंगे
शब्दों द्वारा मात्र शब्द का ही हाल

फिर क्या वजह है?
क्यूँ न चाहते हुए भी,
लिखी जाती है कविता
है उलझा उलझा सा सवाल...

यूँ ही जूझते हुए
कुछ अवतरित सा हुआ
कहीं एक सूर्य
उदित सा हुआ :

कविता
तब लिखी जाती है,
जब उनकी अनिवार्यता को
कलम नकार नहीं पाती है...

न अपने लिए न औरों के लिए
लिखी जाती है वह जब उसके बिना-
एक सांस के बाद दूसरी सांस
सिलसिलेवार नहीं आती है...

उसका होना एक सांस से...
दूसरे सांस तक की यात्रा है
वह शव को शिव बनाने वाली
इकार की मात्रा है...

अपना मार्ग तय करना
उसे आता है,
निमित्त मात्र है लेखनी, लिखने वाले से बस उसका
माध्यम भर का नाता है!

उसका होना, उसका मार्ग, उसके पाठक
सब पूर्वनिर्धारित हैं
जीवन का दुःख से, दुःख का कविता से रिश्ता गहरा है
ये सत्य बड़े प्रचारित हैं

पर वास्तव में ये कौन जानता है
सुख दुःख की विभाजन रेखा है कहाँ!
जहाँ भाव मिले सरस सुकोमल सच्चे
कविता तो बस ठहर गयी वहाँ!!

चलते हैं कदम उधर ही, जिधर से जुड़े हृदय के तार हैं!

बाहें फैलाये
खड़ी है हरियाली
रास्ते हज़ार हैं!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

कई बार
अपना ही मन
हम पढ़ नहीं पाते है
कोई दिव्य शक्ति चुन लेती है
तब हमारे लिए राह
जिसे हम अक्सर पहचान नहीं पाते हैं

दुर्गम सुगम
प्रांतरों से गुज़रते हुए
ये विश्वास ज़रूरी है-
'जो होता है अच्छे के लिए ही होता है'
माने मन यह बात,
फिर हर हाल में सृजन की सम्भावना पूरी है

हंसी ख़ुशी
गुज़रे दिवा रात्रि
बहती जाती जीवनधार है!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

हमारा कोई स्वार्थ न हो
फिर भी सहृदयता को
बेवजह संदेह से देखा जाए...
ऐसा होता आया है यहाँ
तन कर चलता है अन्धकार,
बैठा प्रकाश नज़र झुकाए

पर ये सब
क्षणिक भ्रम सा है
इनसे आस्थाएं न प्रभावित हों
हौसलों की मीठी धूप से चमकें रेतीले कण
उनमें कई नन्हे नन्हे सूरज
तत्क्षण समाहित हों

ऐसे ही प्रकाशवृत्त में
पल रहे
जीवन के कई संस्कार हैं!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

आ कुछ पल आसमान में सितारे टांकें...!

कबतक गढ़ती रहेगी ये सांचे
आ, री! किस्मत दो घड़ी बैठ
आ कुछ हवाओं में घुली कथाएँ बांचें

यूँ कब तक दुविधाओं में डालती रहेगी
कुछ ठहर तो ले... सांस ले ले
आ कुछ पल आसमान में सितारे टांकें

वो आसमान कौन सा हो
वो सितारे किन ख़्वाबों से बुने हों
छोड़ा तुम पर... एक एक कर तू सब जाँचे

बस ये निर्णय मेरे लिए छोड़ दे
कि कहाँ से खिलेगी धूप और
कैसे होंगे खुशियों के ढ़ांचे

सब चुनाव तेरे होंगे, मान लिया
बस नमी बची रहे नयनों में
मेरी ताल पर आती जाती सांसें नाचे

इस मौसम से उस मौसम तक...!

मेरी उँगलियाँ पकड़ कर
चल रही थी बहार...
मानों उसे इस मौसम से
उस मौसम तक जाना हो,
जहाँ अठखेलियाँ करती हो
उपवन की डाली डाली...
जहाँ हर फूल के पास
मुस्कुराने का कोई एक बहाना हो!

बहार जानती थी...
उसने देखा था
कागज़ पर मेरी उँगलियों को
कुछ उकेरते हुए,
शब्दों की
मरूभूमि में
भावों की सुगंध
बिखेरते हुए...

वो जानती थी-
इस मौसम से
उस मौसम तक
एक कविता पहुंचा देती है,
आंसू
लिखती है लेखनी
और धूप ख़ुशी की
खिल जाती है!

ऐसा होता देख,
बहार...
ऊँगली थामने
चली आयी,
उसे इस मौसम से
उस मौसम तक जाना था
सारी राह वो निश्चिंत हो
गुनगुनायी गायी...

जाने कैसे
उसे ये विश्वास हो गया
कि मेरी ऊँगली थाम वह
आसानी से उस ओर पहुँच जायेगी
जैसे बहती है कविता
वैसे ही...
गम हों या ख़ुशी के,
आंसुओं संग बह जायेगी

साथ चल रही है,
अब वो जाने
और
उसका विश्वास!
इस मौसम से
उस मौसम तक जाने की,
जाने
कब पूरी हो उसकी आस...!!

एक टुकड़े का महीन सा भाग...!

एक टुकड़ा
निश्छल प्रेम का
हथेलियों के बीच दबाये
बच्चों सी मुस्कान लिए
बह रही थी
हवा सुहानी

रुक कर दो घड़ी मेरे पास
कुछ कानों में कह गयी
उस टुकड़े में से एक महीन सा भाग
मुझे सौंप गयी बयार
फिर हो गयी
ये बात पुरानी

विस्मरण की धूल से
ढंक कर
धुंधली हो गयी याद
पर सबसे अँधेरी और सबसे काली रातों में
उभर आती है
वह ही एक अकेली याद

जिसे हवा ने
मुझे दिया था
एक महीन सा भाग
अनमोल टुकड़े का
मेरी नन्ही हथेलियों में
रख दिया था

उस महीन से भाग से बड़ा
उससे वृहद्
कुछ भी नहीं मेरे पास
कहते हैं
मेरी बातें मीठी सी हैं...
मुझे नहीं पता जाने क्या है उनमें ख़ास!

शायद वही निश्छल प्रेम के टुकड़े का
वो महीन सा भाग
कहीं भीतर पैठ गया है
क्या बोलूं...
उड़ रहा है मौन मन
शब्द थक कर कहीं बैठ गया है!

ठीक जीवन की तरह...!

कुछ एक कवितायेँ
मेरे भीतर बंद पड़ी हैं
जिन्हें
मैं खुद भी नहीं पहचानती
पर मुझे एहसास है
उनके होने का
और
इंतज़ार भी
उनके प्राकट्य का

क्या पता...

जो बिछी जा रही है
पन्नों पर अभी
उन अक्षरों में ही
अव्यक्त सी व्यक्त हो जाए कविता

या फिर
उन बूंदों में खिल जाए
जो किसी उदास शाम को
नयनों से झरती है

ये भी तो हो सकता है
कहीं कोई अक्षर न हो
कोई शब्द कोई शिल्प नहीं
और घटित हो रही हो कविता-

ठीक जीवन की तरह...

खूब मन से जिया गया
कोई एक लम्हा
जब बीत जाता है...
तो, सारा जीवन
उस एक लम्हे में
सिमटा नज़र आता है...
अब उस लम्हे को कैसे कोई प्रस्तुत करे?
गिरता है एक बूँद नयन से
और मोती बन जाता है!

ये भी तो हो सकता है...
कहीं कोई कोरा एक कागज़ हो
और उसपर अक्षरों जैसा
कुछ भी न हो अंकित

बस पारखी एक नज़र हो
जो पढ़ ले कोरेपन को
जो भांप ले अर्थ सघन को
और खिल उठे कविता-

ठीक जीवन की तरह...

जिसे देखने के लिए
अलग ढ़ंग से
जिया जाता है...
ग़मों का घूँट भी
हंस कर
पीया जाता है...
अब ये हुनर कोई सिखाये भी तो कैसे?
किस तरह पहाड़ सी मुश्क़िलों को
हंस कर टाल दिया जाता है!

उलझा-उलझा जीवन, उलझे-उलझे हम!

हैं कुछ बातें...
जो हम कह नहीं पाए!
और जो कहा
सब व्यर्थ रहा...

हैं कुछ कार्य
जो हम कर नहीं पाए!
और जो किया जैसा किया
मानों हर पल हो व्यर्थ जिया...

हैं कुछ कदम...
जो हम चल नहीं पाए!
और जितना चले
सब बस यूँ ही रहा अम्बर तले...

हैं कुछ प्रश्न
जो हम हल नहीं कर पाए!
और जब भी तलाशा उत्तर
एक और प्रश्न खड़ा होकर कर गया निरुत्तर...

हैं कुछ उलझनें
जीवन आजन्म जिन्हें सुलझा ही न पाए!
जितना सुलझाने चले वह
उतना ही स्वयं उलझ जाए धागों की तरह...

यूँ ही उलझते हुए
उलझे उलझे जीवन की
कहानी,
जो सुननी हो...
जो कहनी हो
तो प्रेम पगा हिय हो
नमी ज़रा सी हो नयनों में
खड़े जहाँ हों कदम,
वह किसी और का आसमान नहीं
बल्कि अपनी धरणी हो!

एक पुस्तक, एक निर्णय और एक कविता...!


एक पुस्तक पढ़ी... Debra Adelaide की The household guide to dying... मौत की ओर बढ़ती कहानी जहां कैंसर से पीड़ित नायिका अपनी लिखी ढ़ेर सारी हॉउस होल्ड गाइड्स सीरिज़ की तर्ज़ पर लिखना चाहती है एक ऐसी ही क़िताब मृत्यु पर जिसमें वह अपना वास्तविक अनुभव लिखें मृत्यु की ओर बढ़ते हुए... और इस बात के लिए अपने प्रकाशक मित्र को मना भी लेती हैं! मौत की ओर बढ़ती हुई यह कथा वस्तुतः जीवन की ही कथा है...; अच्छी क़िताब है, रोई भी हंसी भी इसे पढ़ते हुए...
इसमें एक अध्याय है अंगदान पर... और फ्लैशबैक में एक घटना भी जहां नायिका अपने ब्रेन डेड बेटे का हृदय दान कर देती है एक नन्ही सी बच्ची के लिए... माँ की पेशोपेश और उस पल की व्यथा क़िताब समाप्त कर लेने के बाद भी रहती है पढ़ने वाले के साथ...! अब जब नायिका मौत की ओर बढ़ रही है... तो अंगदान का विषय उसके समक्ष प्रस्तुत होता है... डॉक्टर से मिलती है मगर जानलेवा बिमारी ने अंगों को कहाँ छोड़ा... डॉक्टर रहस्योद्घाटन करती हुई कहती है... Blood is probably the healthiest part of you, given how quickly the blood cells are renewed. But of course, she added, you can only donate blood while you're alive.... और नायिका लिखती है... After this consultation I gathered the collection of feeble, substandard organs and tissues that counted as my body and exited her rooms. I walked confidently for a woman whose every body part had just been rejected as unworthy....
लेकिन एक सुन्दर सार्थक सन्देश भी है इस अध्याय में जो हर जीने वाले को जानना चाहिए क्यूंकि मरना तो सबको है एक दिन! सन्देश कुछ यूँ है...
No one should assume they are too old or unhealthy to donate organs. Even those people who know they are dying may qualify, as successful transplants have been performed from all sorts of donors. The heart, kidneys, lungs, pancreas and liver might be debilitated by treatment or disease, but eye, bone and skin tissue may all be suitable for grafting and transplantation.
'The Postmortal Conditions'
इधर इस विषय को लेकर दशमलव पर भी आलेख पढ़ा... मन ही मन क्रियान्वयन का निश्चय भी और इन्ही भावों में कलम भी कुछ कहती चली गयी...

कुछ भी व्यर्थ नहीं होता...
और बिन प्रयोजन भी नहीं
जीवन खेल नहीं है...
और कोई बड़ा आयोजन भी नहीं

यहाँ अनदेखे अनचीन्हे टुकड़ों में
खिलती है ज़िन्दगी
भक्ति के रूप अनेक
होती है कई तरह से बन्दगी

एक रूप यह भी है
निष्कपट निर्विकार रहा जाए
बहुत कुछ नहीं दे सकते
तो कुछ कुछ टुकड़ों में ही दिया जाए

जब कोई वस्तु हमारे किसी काम की नहीं रह जाती
तब भी उसकी उपयोगिता शेष रहती है...
बीतते हम हैं...
उपयोगिताएं नहीं बीततीं हैं

इसलिए
ये कर्तव्य है हमारा
कि बीतने से पहले
न बीतने जैसा कुछ कर जाएँ

बहुत बड़ी बात नहीं है
समय रहते बस सोच भर लेना है
जाने कब बीत जाए वक़्त
मौत आये इससे पहले ज़िन्दगी का इंतज़ाम कर लेना है

वैसे ही जैसे अपने बचपन के खिलौने
बड़े होने पर बाँट दिए थे
जो पढ़ लीं क़िताबें
वो दोस्तों के हाथ दिए थे

एक बार मेरा काम हो गया तो वह तो
व्यर्थ पड़ा रहेगा न
उपयोग से चमकती रहेंगी खिलौनों की दुनिया
क़िताबों का पन्ना पलटता रहेगा न

बचपन में झुला था जिस पालने में
वह तो अब भी वैसा है
बचपन पीछे छूट गया
पर पालने का उमंग जैसा का तैसा है

क्यूँ न वह झुलाये
किसी और नन्ही सी जान को
दे कुछ उमंगें वह
किसी और प्राण को

यही तो सृष्टि का क्रम है
आते हैं हम और जाने की तैयारी में उसी क्षण से लग जाते हैं
विदा होते हैं,
आने वालों के लिए जगह खाली कर जाते हैं

ऐसा ही तो
होता है न
शाश्वत कुछ भी नहीं
हर रंग खोता है न

फिर भी,
कुछ है जो अपने हाथ में है...
हमारा विवेक
हमारे साथ में है

जितने कल-पुर्ज़े लगाये हैं उसने
वह व्यर्थ नहीं होता!
ये सच है, लाचार होता है...
मानव सर्वसमर्थ नहीं होता!

प्राणवायु निकल जाती है
जीवन समाप्त हो जाता है
पर धड़कनें फिर भी जिंदा रह सकती हैं
किसी और का हृदय बनकर

आँखें बंद हो जाती हैं
अँधेरा छा जाता है
पर दृष्टि फिर भी दृश्य देख सकती है
किसी और की आँखों का नूर बन कर

यूँ ही टुकड़ों-टुकड़ों में
मृत शरीर हो सकता है जीवनदायी
ये कुछ और नहीं है
यह कुदरत की करिश्माई

जाते हुए संचित कुछ तो ले नहीं जाते हैं
क्यूँ न ये सब भी दे जाएँ
साथ जाती है केवल कर्मों की गठरी
अंतिम यात्रा पर चलें बस यही एक गट्ठर उठाए!

जैसा कि तुम हमेशा करते हो!

जब
रात रात भर बैठ कर...
मैं कवितायेँ लिखती रहूँ

रात्रि की नीरवता में
गोते लगाते हुए,
पढ़े गए अंशों को
अपनी भाषा में
टटोलती रहूँ...
उनका
अनुवाद करती रहूँ

जिये गए
अनुभवों को
शब्दों में पिरोती रहूँ,

तब...
तुम अनुनाद करते हुए
मेरे
ही भीतर से...
झांकना,

अंक में
समेट कर मुझे...
सारी उर्जा-
भर देना मुझमें!

अश्रु बूंदों की तरह
तुम ही तो दृगों से
ढ़लते हो

घिर आना मीठी धूप बनकर
संवार लेना दृश्य हर बार...
जैसा
कि तुम हमेशा करते हो!

हाँ,
मेरे
आस-विश्वास!
जब सारे मंज़र उदास हों
कोई भी किरण नहीं पास हो

तब
तुम
थाम लेना मुझे...
निराशा के उस घोर
अन्धकार में भी,

किरण की
प्रतिछाया होने का
दम जो भरते हो

तुझ पर निर्भर है हर क्षण जीवन का
उबार लेना हर बार...
जैसा
कि तुम हमेशा करते हो!!

वह तू है!

जब मन बेचैन हो...
और इसमें सारी गलती
हमारी ही हो,
आंसू बह रहे हो नयनों से
हृदय रो रहा हो और इसकी वजह भी
हम स्वयं ही हों,
बोले जा रहे हों
जो मन में आये सो
और वो भी बिना किसी लिहाज़ के,
गलतियाँ ही
गलतियाँ
किये जा रहे हों...
तब भी,
जो हमसे मुख नहीं मोड़ता
वह तू है!

उड़ते ही
जा रहे हों
आसमानों में,
भूल कर
सारे जुड़ावों
एवं जड़ों को;
एक समय आता है
जब थक जाते हैं पंख
और ज़वाब दे देती है उमंग,
आसमानी उंचाईयों से
गिर पड़ती हैं
महत्वाकांक्षाएं...
तब
गोद में लेकर
जो सहलाता है टूटे अरमानों को
वह भू है!

कलियों के मौसम में
बिसार देते हैं
तुझे हम,
खुशियों के दौर में
तुझे अपनी चेतना के धरातल से
गायब ही कर देते हैं,
जब सुगन्धित बयार बहती है
तो उस आनंद में
तुझे विस्मृत कर
जाते हैं,
और काँटों से सामना होते ही...
सुमिरन शुरू हो जाता है तेरे नाम का,
अपने स्वार्थ के लिए!
फिर भी...
तू तार देता है
आखिर तू तो तू है!

तमाम ख़ामियों के बावजूद
जो हमसे मुख नहीं मोड़ता
वह तू है!

मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

यूँ ही खेल खेल में लिख गयी थी कभी एक कविता एक प्रश्न से प्रेरित होकर... आज यह कविता जाने कैसे याद हो आई...!
बी.एच.यू के केन्द्रीय पुस्तकालय में नियम से जाते थे हम... वहाँ मेरे बगल में अक्सर एक शोध छात्रा बैठा करती थीं... पढ़ते पढ़ते ऊब कर हम कुछ देर के लिए आपस में बातें कर लिया करते थे... धीरे-धीरे कुछ एक कवितायेँ भी उन्होंने सुनी हमसे फिर यूँ ही कह दिया, अरे यार! कोई प्रेम कविता सुनाओ... इतनी कविताओं में तुमने कोई भी ऐसी कविता नहीं लिखी क्या?
ये लिखा था फिर हमने...
आज बाँट लें यहाँ भी!

मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती

कहाँ है प्रेम
जीवन के
संत्रासों में?
कहाँ है
वह मीठी सुगंध
स्वार्थ के पाशों में?

हमारे व्यवहारों...
हमारे व्यभिचारों से...
प्रताड़ित,
मानवता है चीखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

गिरता है लहू
नयनों के
ओट से
ज़माना है तोलता
सबकुछ केवल
नोट से

अपरिग्रह का सिद्धांत सिरमौर था,
संचय था
तो केवल दान के लिए
चन्द सिक्कों की ख़ातिर अब बिक जाती है आत्मा,
बस सांस ले रहे हैं लोग
वो तत्व ही लुप्त है जो चाहिए प्राण के लिए

टूटते संबंधों की सीलन,
खूंटियों पे
टंगे रिश्ते,
इस अँधेरी गली में
मार डाले गए
जो कुछ एक थे फ़रिश्ते!

इस
कातरता में
पशुता की सारी सीमाएं लांघ जाने की
भयावह तत्परता में
कहाँ है कोमलता...?
कहाँ है जीवन का स्पर्श...?
कहाँ है जिजीविषा...?
कहाँ है निराश माहौल के विरुद्ध हमारा साझा संघर्ष...?
दिखा सको तो दिखाओ
मुझे तो वो रौशनी कहीं नहीं दिखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

हर एक बीज
जो अंकुरित होता है
वह प्रेम है!

बर्फ़ीले मौसम में
कहीं दबी कोई एक हरी घास दिख जाती है तो वह
प्रेम की ऊष्मा का ही कमाल है,
समस्त उदासियों का कारण
और उनका निदान भी
प्रेम की ही ढ़ाल है!

मौसम कितना भी भयावह हो
गीत गाये जा सकते हैं
पर, वे गीत हों संघर्ष के उद्घोष के
फिर होंगे अधिकारी हम
उस कोमल संरचना के
जहां उपयुक्त होगा माहौल
प्रेम से कोमल भावों के
अंकन हेतु!

लेकिन,
तब तक
कुछ न होगा
जबतक
मनु की सन्ततियां
अपनी भूलों से कुछ नहीं सीखतीं
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

दिखा सको तो दिखाओ
मुझे तो वो रौशनी कहीं नहीं दिखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

अनंत से नाता जोड़ ले!

संवेदनशील है अगर मन
तो फिर...
दुखों का अंत नहीं,
और अगर संवेदनहीन है मन
फिर सच्चे सुख की
अनुभूति भी संभव नहीं!
इसलिए,
सुख दुःख की
विभाजन रेखा का
गणित सुलझाना छोड़ दे!
बन जा एक सागर
और...
सब नदियों का रुख
अपनी ओर मोड़ ले!!

जिस धार की इच्छा हो
आकर सागर के गले लग जाए...
और अपना सारा गम बिसार दे,
कर सकता है तू भी ऐसा बस चाह ले
और संपर्क में आने वाली
जिंदगियों को संवार दे!
किसी की खातिर
कुछ करने को
सर्वसमर्थ होना पड़ता है-
ये मिथक तोड़ दे!
अपने हाथों से
किसी के आंसू पोंछ
और...
अनंत से नाता जोड़ ले!!

यहाँ
इतना उलझा उलझा है सबकुछ
सुलझन की सम्भावना अदृश्य,
कच्चा पक्का हर अनुभव है
किसकी माने...
कौन सी राह है उज्जवल सूर्य सदृश्य?
लघुता में ही सौन्दर्य छिपा है
कण में व्यापते हैं ईश्वर
दूब धरती से चिपकी हुई खुश है
तू भी सारे भ्रम तोड़ दे!
बन जा एक सागर
और...
सब नदियों का रुख
अपनी ओर मोड़ ले!!

अद्भुत होगा फिर सूरज का निकलना!

उजली
बर्फ़ बिछी राहों पर
चलते हुए...
तारों भरे
नीले आसमान पर
पूर्ण चन्द्र देखना
ऐसा था, जैसे-
नींद में
सपनों की ज़मीन पर चलना!

एहसासों के
शून्य में
घिरकर...
निहारना
दूर स्थित
बिंदु को
ऐसा था, जैसे-
क्षितिज से
बेहिसाब बातें करना!

ऐसी अनुभूतियाँ
कोई लिखना भी चाहे
तो...
कहाँ संभव है?
हैं तो ये दृश्य
सबके लिए
पर किसी किसी की किस्मत में होता है
प्रकृति को करीब से महसूस करना!

महत्व जान लिया
तो
अमूल्य है यह...
नहीं तो
सब
बेकार है
सौभाग्य होगा, तो आँखों पर
पट्टी ही पड़ी रहेगी... नहीं दिखेगा, भले ही-
पास बह रहा हो परमानन्द का झरना!

सारा कोलाहल
बंद हो और हम
अपने पास हों...
तब
उस दुर्लभ
नीरवता में
भौतिक लाभ हानि को
ताख पे रख कर
हो कुछ कदम अपने ही संग चलना!

फिर,
सुबह की किरणों में
और ही बात होगी...
उषाकाल का
सौन्दर्य ही
कुछ और होगा
पंछी नए सुर में गायेंगे
अद्भुत होगा
फिर सूरज का निकलना!

इस सा कोई नृत्य नहीं!

क्या अजीब है
न्याय ऊपर वाले का
जिसे सामर्थ्य दिया
उसे नहीं दिया दिल
और जिसके पास
मुक्तहस्त लुटाने की चाहत है
उसके पास
हा! सामर्थ्य नहीं

एक जगह फूल ही फूल
खिले हैं राहों में
और वहीँ दूसरी ओर
केवल बिछे हैं कांटे
क्या राज़ है इसके पीछे,
भेद का-
होता कभी
प्राकट्य नहीं

जीवन रहते
मूल्य नहीं
मरने के बाद
मान दिया जाता है
ये कैसी है रीत
ज़माने की?
कि जिसका कोई
औचित्य नहीं

जीवन
एक पहेली है
न इसका हल...
न इसकी काट...
बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के
अपनी ताल पर नचाती है
इस सा
कोई नृत्य नहीं!!!

अतीत, वर्तमान और भविष्य!

अतीत बीत कर भी बीतता नहीं है
बार बार वह झांकता है
जाने कहाँ से झरोखे ढूंढ़ लेता है
और वर्तमान को निश्चिंत नहीं होने देता

वर्तमान क्या कम घिरा है समस्यायों से?
जो अतीत भी कष्ट बढ़ाने चला आता है...
कितने भी दरवाज़े बंद करो,
वह सूक्ष्म छिद्रों से प्रवेश कर जाता है!

अगर, केवल यही एक बात होती
तो भी क्या गम था!
पर वर्तमान के हिस्से-
इम्तहान नहीं कम था!

अतीत तो अतीत, भविष्य भी आकर
खड़ा हो जाता है...
एक पल ही तो है वर्तमान
अतीत और भविष्य दोनों का बोझ उठाता है...

अतीत के कष्ट ओझल नहीं होते
भविष्य की चिंताएं भी उसे सताती हैं
क्या करे वर्तमान? घुलते-घुलते
हर एक घड़ी अतीत हो जाती है

अतीत के गम और भविष्य की चिंताएं,
चलो सब करें स्थगित!
कुछ करें वर्तमान की ख़ातिर,
क्यूँ हो वो इतना व्यथित...!

बीते कल और आने वाले कल के बीच में
पिसता हुआ आज!
इसी क्षण सुनें हम
वक़्त की स्पष्ट आवाज़-

जीने के लिए केवल यही एक पल है
भले आगे लम्बी पड़ी हो ज़िन्दगी...
शीश नवाना है तो उसके लिए यही क्षण उपयुक्त है
इसी पल को जीने में निहित है बंदगी!!

कुछ भी शाश्वत नहीं है...!

कुछ भी शाश्वत नहीं है...

दोस्ती नहीं
तो दुश्मनी भी नहीं

प्यार नहीं
तो तकरार भी नहीं

ख़ुशी नहीं
तो आंसू भी नहीं

जीवन का पल नहीं
तो मौत की उलझन भी नहीं

कुछ भी शाश्वत नहीं है...

जब कुछ हमेशा के लिए है ही नहीं
फिर कैसी परेशानी

उधेड़-बुन में फंसे रहना
ये ही है सबसे बड़ी नादानी

अरे! पल पल में बदलना जिसकी नियति है
उसकी क्या परवाह करना!

चाँद तारे सूरज मुझसे बतियाते हैं
बहता है मेरे भीतर शाश्वत एक झरना!!

अपरिभाषित अनाम सा रंग!

पन्नों पर
कुछ बूंदें गिरी थीं
आँखों से...
हँसते हुए,
कुछ फूल भी झरे थे
क़िताबों में

फिर,
मैं भूल गयी
उस हँसी को...
और
वह आंसू भी
विस्मृत हो गया

क्या जाने!
पलटते हुए
उन पन्नों को...
क्या पाया मैंने?
और वो क्या था-
जो मुझसे खो गया

तभी
खोने पाने की सीमा से परे
कुछ जाना मैंने
हँसी भी नहीं...
आंसू भी नहीं...
कुछ मिला-जुला सा थाहा मैंने

पन्नों के भीतर ही भीतर
जाने कब?
मिल
गए दोनों-
वह आंसू की बूँद
और
वे हँसी की पंखुड़ियाँ भी

और एक बड़ा महीन...
अपरिभाषित अनाम सा
रंग उभरा!
किस नाम से पुकारूं उसे?
सोचती रही...
फिर उसे ही कह दिया कविता!!

जीवन जितना क्लिष्ट है, कविता मेरी उतनी ही सरल!

गरल को
लिखते हैं गरल!
जीवन जितना क्लिष्ट है,
कविता मेरी
उतनी ही सरल!

सब भेद
कैसे खुल जाएँ?
कुछ रहस्य भी हों प्रकृति में
दो तत्व आपस में
घुल जाएँ!

क्या... कैसे...
कब... क्यूँ...?
इन प्रश्नों से परे चलता है जीवन
नियति चलाती है
उसे ज्यूँ!

जहां थककर बैठ जाती है
बुद्धि की शक्ति
वहाँ से शुरू होता है उजाला...
वहीँ से शुरू होती है
भक्ति!

ठोस दर्द पिघल कर
हो जाता है तरल!
जीवन जितना क्लिष्ट है,
कविता मेरी
उतनी ही सरल!

तारों के आकाश का
एक हिस्सा...
मेरी धरती के लिए खुलकर बरसा,
झूमती बूंदों ने सुनाया यह
सुन्दर किस्सा!

फिर, हरी हो गयीं पत्तियां
हरी हो गयीं बूंदें!
ये खुली आँखों से नहीं दीखता है,
देखा यह सब मैंने
आँखें मूंदे!

ये सच में होता है, नहीं यह-
कोरी कल्पना!
आसमान की चादर पर सपनों की कशीदेकारी है,
वही रह रह कर खिल जाती है
बन इन्द्रधनुषी अल्पना!

मन आनंदातिरेक से भर उठे, तो आँखें-
हो जाती हैं सजल!
जीवन जितना क्लिष्ट है,
कविता मेरी
उतनी ही सरल!

चाँद चलता रहा साथ मेरे मगर!

व्याकुल था मन
उमड़ रहा था भीतर खारे पानी का
एक समंदर!
विश्वास, आस्था और नेह
सब लुप्त से थे,
चाँद चलता रहा साथ मेरे मगर!!

मन के उस घमाशान में
शीतलता बनकर
उतरी चांदनी!
कठिन डगर में बिछ गयी
बनकर प्यार की
सुमधुर रागिनी!

मन... विचारों से-
जूझता रहा, वह सत्य का
अनुमोदन करती रही!
सोयी हुई
उत्कृष्टता का, चांदनी...
उद्बोधन करती रही-

चुप्पी अगर साधनी हो
मौन अगर अपनाना हो,
तो ये भीतर पहले जागे!
वाणी का तप स्वयं ही
अपनी राह पकड़ लेगा,
उस एक भाव के आगे!

मन विचारों में
क्या कुछ नहीं तौलता हुआ
लीन रहा...
कोलाहल
कुछ क्षण के लिए
क्षीण रहा...

मेरी इच्छा के बिना
कोई कैसे मेरी शांति
नष्ट कर सकता है?
जब तक मैं न चाहूँ
कोई कैसे मेरे अंतर में
प्रविष्ट कर सकता है?

मैंने अवसर दिया तो
विकारों का हौसला बढ़ा...
मेरे प्रश्रय ने ही मेरे भीतर
कटु स्मृतियों को है गढ़ा...
अब होगा परिवर्तन, मैंने आज
समस्त दोष अपने मत्थे है मढ़ा!

औरों के गुण दोष न आँक
जब अपने भीतर के अवगुण को
हम पहचानते हैं...
तब सच्ची यात्रा शुरू होती है
चलते सब हैं, पर गति के मायने
सब कहाँ जानते हैं?

पूर्ण चाँद को देख गगन में
अपने भीतर झाँका मन...
चाँद के दाग उज्जवल हो उठे
बन गया वह मेरा दर्पण...
और अब मुझे स्पष्ट दिख रहा था
अपने भीतर का कानन...

वहाँ झाड़ू-बुहारू कर लूं
वही है अपना असली गेह...
वही अपना घर!
राह में किनारा करते गए
कितने ही विम्ब...
चाँद चलता रहा साथ मेरे मगर!!

वह मन के हर कोने में व्याप्त हो!

दुखी रहते हैं
क्यूंकि भूल नहीं पाते हैं
क्रोधित होता है मन
और सब रस्ते खो जाते हैं
सोचते हैं...
फिर खुद को ही समझाते हैं
वो ज्ञान चक्षु ( ? ) है ही नहीं
अपने पास...
तिकड़म इस जहान के
हम समझ नहीं पाते हैं!

बेकार की बातों को
भुलाने की कला सीख रहे हैं
बोलते हैं तो सब बिगड़ जाता है...
अपना मन हम अब लिख रहे हैं
सारे भाव विचार...
पंक्तियों में दिख रहे हैं
कविता ही करेगी समाधान
जुड़ जायेगी हमसे और अन्दर की सारी
कटुता को त्यागना सीखा देगी
सीखा रही है वह... हम सीख रहे हैं!

जो सुन्दर है उसे गुनना छोड़
बेवजह की बातें बुनते जाते हैं
शान्ति की तलाश में
सकल संसार घूम आते हैं
फिर भी...
उसे ढूंढ़ नहीं पाते हैं
छोटे से जीवन में पालते हैं
कितना सारा वैमनस्य
बड़ी बड़ी बातें करते हैं
और छोटे छोटे सत्य नकार जाते हैं!

अब कविता का यह विस्तृत आँगन ही
शरणागत का कल्याण करे
करे कुछ ऐसी व्यवस्था-
धरा का धैर्य हमें प्राप्त हो!
मन मंदिर में केवल 'उसकी' मूरत हो
जो कुछ अन्य है ज़मा वहाँ-
उसका अस्तित्व इसी क्षण समाप्त हो!
हर कण में है बसा हुआ जो
उसके आभास से आत्मा आंदोलित हो उठे-
वह मन के हर कोने में व्याप्त हो!!

यूँ मिलते हुए, देखा है कभी दो जीवन?

अपनी हथेलियों में
कुछ बूंदें समेट कर
ले आई हूँ,
पत्तों पर से
उन्हें उठाते हुए...
नमी से भींग गया
मेरा मन!

उन बूंदों में
कलम की नोक डुबो कर
सोख ली कुछ आशाएं,
सहर्ष ही बूंदों ने नोक को
विश्वस्तता भी दी;
कहाँ होता है...?
इस जहान में
ऐसा अपनापन!

कलम भी खुश थी
ओस से मिलकर...
ओस भी खुश थी
स्याही में घुलकर...
मिलकर दोनों तत्व
कुछ नया रचेंगे!
शब्दों के रूप में हँसेंगी
बूंदें खुलकर...

झूमेगा परिदृश्य
जब...
एक दिव्य ध्येय की खातिर
ओस और कलम के नोक की-
अद्भुत मैत्री की कथा
गायेगा
बहता पवन!

यूँ मिलते हुए
देखा है कभी दो जीवन?

ये मेरी यात्रा है...!

ये मेरी यात्रा है...
अच्छी या बुरी...
जैसी भी है ये मेरी अपनी है...
यहाँ जो जैसा है लिखता चला जाए...;

चाहे
हो अनुभूतियों की आंधी...
भावों की मरूभूमि...
या फिर जीवन की पेचीदगियां-
लिखी जाए
वह अपनी पूरी रुखड़ाहट के साथ!

खिल आये कुछ कलियाँ...
अपनी विमुक्त खिलखिलाहट के साथ...!

ये मेरी यात्रा है...
जहां गिरने की पूरी छूट है मुझे...
यहाँ पारदर्शी है सच...
बस जैसा है वैसा ही दीखता चला जाए...;

बादल
क्यूँ...?
चुप-चाप बस छाये रहे...
अरे! बरसे वो,
तो बरसे
अपनी पूरी गड़गड़ाहट के साथ!

खिल आये कुछ कलियाँ...
अपनी विमुक्त खिलखिलाहट के साथ...!

ये मेरी यात्रा है...
जहां कुछ पंछी हैं चहक रहे...
एक पेड़ है मौन खड़ा...
जल बस कलकल बहता जाए...;

कभी
नयन से...
कभी कलम के रस्ते होकर...
भागें हैं यहाँ से विडम्बनाएं-
अपना ताम-झाम समेट
पूरी हड़बड़ाहट के साथ!

खिल आये कुछ कलियाँ...
अपनी विमुक्त खिलखिलाहट के साथ...!

उज्जवल, स्याह और उनके बीच के घुले मिले रंग!

ये हमारा स्नेह है,
ये हमारी भावना है
जो किसी को
देवतुल्य समझ लेती है!
वरना इंसान का
इंसान होना ही
नामुमकिन सा है
इस दौर में
ये तो हमारी नादानी है
जो फिर भी
आधारहीन भावों में
उलझ लेती है!!

कुछ समय ही ऐसा होता है,
कि-
प्रतिकूलताएं एक संग
जुट जाती हैं!
एक एक कर तो
निपट लेता सबसे मन
पर ऐसा कहाँ होता है,
आती है
तो सारी विपत्तियां
आपस में गठबंधन कर,
एक ही साथ आती हैं!!

उज्जवल और स्याह
दोनों ही सच्चाइयों को
हम अपने जीवनकाल में
जीते हैं!
सब अच्छा अच्छा ही
कैसे होगा?
भाँती भाँती के लोग
हैं भाँती भाँती के 'सच' यहाँ
सुधा की आस में
जलते हैं... चलते हैं
और सारी राह हम गरल ही
पीते हैं!!

राहों में मिले कंटकों को
जो फूल बनाकर
स्मृतियों में बसा ले,
वह धैर्य क्यूँ मेरे पास नहीं?
इतना चलने पर भी सीखा,
कब सीखेंगे?
कि रस्तों को रिश्तों का
मान नहीं दिया जाता
बहुत तोड़ते हैं रिश्ते,
कुछ इतना कि-
रहता है अपना आप ही
अपने पास नहीं!!

चलो, फिर भी
समेट कर सारी टूटन,
स्याह और सफ़ेद के बीच के
मिले जुले रंगों को निहारा जाए!
आप ही दिखेगी कोई किरण
अचानक से,
कुहांसे के बीच से चाँद
हल्का सा झांकेगा...
और, उस छवि के साथ
चलते हुए आज ही
कष्टकर स्मृतियों का बक्सा
धारा में बहाया जाए!!

अब कोई गीत नया गाया जाए...
अब कोई गीत नया गाया जाए...

मेरी कविता मुझसे बोली...!

देख, तू रोती हुई ही
अच्छी लगती है
रोती रहा कर

जो कष्ट कंटक संजो कर
दिल में रख छोड़े हैं
उन्हें मुख से न कहा कर

जहां से आगे की कोई राह
नज़र न आती हो
वहां भी शीतल बयार सी बहा कर

पता है बहुत कठिन है यह
पर कोशिश करने से पहले
"नहीं होगा" न कहा कर

तू अपनी तमाम असफलताओं
के बावजूद "अनुपम" है
खुद को हीन न कहा कर

गिरती हो तो इसकी जिम्मेदारी
स्वयं लेना सीखो, जिनसे खायी ठोकर
उन पत्थरों को दोषी न कहा कर

देखना, फिर आएगी एक लहर
और ले जायेगी तट से
सारी विसंगतियां बहा कर

सब जानते हैं प्रभु
उनके पास जाकर
तकलीफ़ें न कहा कर

देख, तू रोती हुई ही
अच्छी लगती है
रोती रहा कर

एकालाप... यूँ ही!

रिसता रहा कतरा कतरा आंसू
और कुछ न बोला मौन
तेरी व्यथा तेरी अपनी है
तुम्हारे बीच अब आये कौन
कौन है ऐसा धैर्यवान जो तेरी खातिर
तुझ अधीर के साथ चलेगा
विस्फोट तो होना ही है
कब तक वह कल पर टलेगा

आंसू तेरे अपने हैं ही
अब ज़रा मौन भी अपना ले
चुप रहना भी श्रेयस्कर है
वाणी का आसरा हर बार अब ना ले
बहुत कठिन है डगर आगे
हृदय अभी और जलेगा
ठोकरों से आगे के लिए सीख लिया तो
रे मन! निर्मल धारा सम तू भी बहेगा

अपनी गति कुछ धीमी कर
और तज सारे स्वर मौन में बात कर
जीवन बस भाग रहा है
आज तू ठहर रे मन! भागते हुए न रात कर
ये जो बेला है ये नहीं आएगी लौट कर
कब तक इसे यूँ ही खोता रहेगा
जीवन में कई समर अभी शेष हैं
उठ! जाग! कब तक तू सोता रहेगा

अनामिकाएं ही होते हैं हम...!

मेरी छोटी बहन का नाम अनामिका है... फेसबुक पर हमें एक और छोटी बहन मिली उसकी हमनाम!
कुछ दिन पूर्व उसके जन्मदिन पर( २४ जनवरी को ) उपहारस्वरूप एक कविता लिखी थी उसके लिए... आज प्रस्तुत है यहाँ...:)

जिसका कोई नाम नहीं
वह ही तो है अनामिका
वाह!
नाम तुम्हारा
कितना उज्जवल है
जिस पात्र में डालो
वैसा ही ले ले आकार
ऐसा तो केवल जल...
हाँ! गंगा जल है!!!

बेटियां ऐसी ही तो होती हैं...
अनामिकाएं...!
घर की दहलीज पार करते ही
नाम बदल जाते हैं!
विधाता ने कुछ यूँ बनाया है
उखाड़े जाते हैं अपनी धरती से
और
दूसरी धरती के
अपने हो जाते हैं!!

चीनी पानी की तरह
घुल जाता है
नए परिवेश से वजूद!
अनामिकाएं ही होते हैं हम
कितने ही नामों के
बावजूद!

प्यार से सजाती रहना
ये जीवन के अनमोल क्षण
खिलखिलाना इतना कि-
खिल जाए मेरा भी मन
इस विशेष दिन पर
तुम्हें क्या दें उपहार
बस इन शब्दों में पा लेना
अपने लिए अप्रतिम प्यार!!!

सच्ची! याद तो आओगे!

अभी बर्फ़ की बारिश का आनंद लेते हुए क्लास से लौटे... और खिड़की से उसी बारिश को निहारते हुए अपने देश  की सैर पर निकल गया मन... फिर लौटा, तो मैंने सोचा कि स्टॉकहोम  से ही कुछ बातें कर लें...! बस बात करते हुए… लिख गया यह, तो सहेज भी लिया जाए :: 


इतना तो है
कि अब घर जैसा कुछ कुछ
मैंने तुम्हें भी बना लिया है
अपनी परिधि में!
या यूँ कहें
तुमने मुझे अपनी गोद में
एक घर जैसी अनुभूति दे दी है
समय के साथ...!


तुम्हारी मुट्ठी भर ज़मीं पर
मैं अपने भारत के साथ खड़ी हूँ
इसलिए अपनी ज़मीं से दूर हो कर भी
अब तक यहाँ टिकी हूँ
लेकिन, इतना तो है...
कल जब लौट जाऊँगी अपने देश
तो तुम यादों में ज़रूर जगमगाओगे
सच्ची! याद तो आओगे!


याद आएगा वह सब कुछ
जो तेरी धरती पर पाया मैंने
और वह भी,
जो दे सकना तुम्हारी क्षमता से परे था...!
सब मिलकर लुभाएगा
तुम्हारे यहाँ गुज़ारे वक़्त को कल बढ़िया ही कहा जाएगा
जब जब कल कल धार बहेगी
तुम्हारे देश की भाषा की ही कथा कहेगी


बहुत कुछ अच्छा सा
जुड़ता गया
लेकिन कुछ है
जो सिर्फ मेरे देश की शान है!
तू हो सकता है
राह में मिला
मेरा सबसे प्यारा दोस्त
पर मेरा देश मेरी जान है!!


यहाँ तुम्हारे गगन के नीचे
बहुत हरापन देखा...
और मौसम के साथ सुन्दर धरा को
बर्फ़ के फाहों का बनते मरुस्थल देखा-
बहुत कुछ जो जादू सा था
पर फिर भी कुछ ऐसा था
जहां मेरा देश मेरी नज़र में
सदा तुमसे ऊँचे पायदान पर रहा
मत भूलना, तुम्हारे यहाँ अकेले ही
मैंने हमेशा पतझड़ को है सहा!


सब भाग रहे हैं...,
मिलने के लिए भी
पहले से
ख़बर करनी पड़ती है!
हमारे यहाँ…,
अपनों तक जाने की राह
औपचारिकताओं की ऊँगली
नहीं पकड़ती है!


सबकुछ
बड़ा भला है
पर तुम्हारे यहाँ के परिवार की परिभाषा ने
हर आगंतुक को यहाँ छला है;
मात पिता का बच्चों पर
अधिकार नहीं
बुरा न मानना, व्यक्तिवादी संस्कृति पर
अपना है ऐतबार नहीं!


बहुत सुन्दर है
वातावरण यहाँ...
पर तुम्हारे यहाँ
श्वेत श्याम ही जीवन है
अच्छा है यह भी...
पर कभी कभी
मेरा रंगों से खेलने का भी
करता मन है!


तुम्हारे यहाँ
कांच की चूड़ियाँ नहीं मिलतीं
मेहँदी तो मिली, पर उदासीन सी है वह...
जाने क्यूँ हथेलियों पर नहीं खिलती?
शिकायत न समझना...
बस बता रही हूँ...
मैं जहां से आई हूँ
वहाँ की खुशबू बस जता रही हूँ...


पर आश्वस्त रहो...
कल जब लौट जाऊँगी
तब भी तुम्हें याद करूंगी
अपने अपनों से
तुम्हारे सौगातों की
बात करूंगी!

जीवन का वरदान!

जब मेरा मन उदास होता है
तो उदासी चाहती है
कि,
शब्द उसे गले लगा लें...!
कोई मौन दयालु हो जाए
और,
वाणी को वहीँ से श्रोत मिले
ऐसा श्रोत-
जिसमें शब्द तो हों
पर मौन वाली शीतलता भी हो
पूरी शांति हो और वहीँ कहीं
हंसती हुई चपलता भी हो
ऐसा कुछ दुर्लभ संयोग बनता है, तो-
बहती है भाव सरिता
मेरे मन की बात हो जाती है
कितने हृदयों की कविता!

ऐसी कविता-
जो मेरी होकर भी मेरी नहीं होती
जो पढ़ता है उसे
वह है उसके ही आंसू रोती
उसका दर्द सहेज कर अपने हिय में
उसे त्राण दे जाती है
जिसने लिखा उसकी तो जीवन दायिनी है ही
जिसने पढ़ा उसका भी प्राण हो जाती है!

एक बार उच्चरित हो गए
फिर
शब्द कभी मरते नहीं...
भावों के संसार की संजीवनी हैं...
ये सच है, ठोस धरातल पर ऐसा कोई ठोस समाधान
वे करते नहीं...

इसलिए
बार बार उनके औचित्य पर
प्रश्न खड़ा होता है
पर ये तो बताओ...
क्या कुछ भी
संवेदना से बड़ा होता है?

संवेदना के दो शब्द...
जो उबार लेते हैं,
मृत्यु के लिए आकुल मन को
समय रहते संभाल लेते हैं!
ये शब्द ही हैं...
जो जीवन से विमुख नहीं होने देते
प्रेरक इतने कि दुःख की रात्री में भी
सुख की आस नहीं खोते!

इसलिए,
शब्दों से विश्वास
अगर उठने लगे
तो स्मरण करना
किसी के कहे हुए
दो मीठे बोल...
और टटोलना अन्दर किसी कोने में
उन दो बोलों ने
कितनी गहरी पैठ जमाई है
तब जानोगे उनकी अहमियत
जब देखोगे
उन्हें विशुद्ध भावों में तोल...

कविता भूखे की भूख
नहीं हरती
कविता बीमार को
ठीक नहीं करती
कविता अपनी सार्थकता का
कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं देती
कविता किसी ज़रुरत मंद को
दान नहीं देती

लेकिन, ये सोचो
हंसती है तुम्हारे साथ
तुम्हारे साथ रोती है
कैसी भी डगर हो
तुम्हें
अकेला नहीं होने देती है

और क्या चाहिए इस जग को प्रमाण
शब्द, संवेदना, कविता हैं जीवन का वरदान!!!

तेरी... मेरी... हम सबकी तकदीर!

एक पुरानी गली है
यादों की...
जहां बचपन खुलकर गाता था
दो बूंदें
जमकर पिघली थीं
हर रंग बड़ा सुहाता था

फिर समय ने
करवट ली...
और गली वह पीछे छूट गयी
पिरोई थी
एक माला हमने
वह मोती-मोती टूट गयी

हर क्षण
बदलते हैं हम...
ये सोच कर हैरान हैं
चेहरा तक
अपना नहीं
हम परिवर्तन के हमनाम हैं

जो गुज़रे ज़माने की तसवीरें हैं
उसमें वक़्त के साथ खो चुका...
एक मुस्कुराता हुआ बच्चा है
समय के बहाव में बदलती हुई लकीरें हैं
बस चेहरे से परे जो दिल है
शायद, वह ही शाश्वत है... सच्चा है

हर क्षण का लेखा जोखा हो तो
उभरेगी एक अनूठी...
अनजानी सी तस्वीर
बीतते जाना ही है
तेरी... मेरी...
हम सबकी तकदीर!!!

उस डोर का क्या हुआ?

जैसे
तेरा आशीर्वाद
फलीभूत होता है
वैसे ही
मेरी प्रार्थनाएं
फलीभूत हों,
कुछ एक गांठें
जो हमने
बुन ली हैं
ईश्वर करे
वह सब
मूलतः झूठ हो!

जब आँख खुले
तो
दृश्य सहज ही
सुन्दर...
न्यारा और
प्यारा भी लगे,
चाहे
किसी कारणवश
रोती हुई सोये
पर
पहली किरण के साथ
आँखें हंसती हुई जगे!

टटोलो
स्वयं को सँभालने का हुनर
तुम्हारे पास ही होगा...
अच्छा ये बताओ, आस्था की एक डोर
तुम्हारे पाले थी
उस डोर का क्या हुआ?
अगर,
जो जैसा है
सब कुछ
ठीक ही है
तो क्या भ्रम है
ये उठता हुआ धुआं!

शब्दों की तरंगें
और भावों के
आदान प्रदान से
कंटकाकीर्ण राहों की
कलियाँ
अभिभूत हों,
जैसे
तेरा आशीर्वाद
फलीभूत होता है
वैसे ही
मेरी प्रार्थनाएं
फलीभूत हों!!!

कुछ जीवंत सांसें...!

सांस लेते हुए दिन भर में
कुछ सांसें हम
जी भी लेते हैं

जीवन की गहराई से
परिचय अभी अधूरा है
इसलिए
हम कोई नया दर्द बुनकर
हर रोज़ कोई नया अफ़साना
कह लेते हैं

कल जो था
वह आज नए रूप में
आँखों को नज़र आता है
जितना समझना चाहते हैं
उतना ही जीवन
और उलझ जाता है

जीवन की कविता...
जो लिख सकते हैं
लिखें
हमें तो
भावों से उलझना ही
भाता है

और इसी में
कुछ एक सांसें
जीवंत हो उठती हैं
सुना है आँखें
सारी कथा कहतीं हैं-

इस गहराई को समझने के लिए
ज्ञानचक्षु तो बाद में
पहले चेतन मन चाहिए
जो बरस जाता हो
देख धरा का गम वो
कृपालु गगन चाहिए!!!

ऐ चाँद, तेरे बहाने...!

कभी यूँ हो
कि,
चाँद का सौंदर्य देखने वाली आँखें
उससे सामीप्य की कल्पना करे

और,
उस सामीप्य में...
निहारे चाँद की झुर्रियां
दर्द और तनहाइयों के छिद्रों को
महसूस करे
उसकी तलहटी पर खड़े होकर...
देखे वो मंज़र
जो,
यहाँ इस धरती से खड़े हो कर नहीं दीखते!
ज़रा रूमानियत से निकल कर
झांके चाँद के दिल में
और...
जीवन का वास्तविक मूल्यांकन
वहीँ से शुरू हो!!!

यहाँ से जो दीखता है
चमकीला
वह भी दुखी है;
आकंठ डूबा है किसी ऐसे ख्याल में
जिसपर-
उसका कोई इख़्तियार नहीं
बाँट सके जो उसका गम
ऐसा कोई भाव संसार नहीं
सूर्य के परिवार का कोई सदस्य
उसका हमराज़ नहीं है
वो तारों के बीच भी अकेला ही है...
और ये सब जानते हैं, ये कोई राज़ नहीं है

दूर से देखने पर सब सुखी लगते हैं
पास जाओ तो सबके पास वही तराने हैं
ये गम सबका हमसाया है
और सब के सब इस सच से अनजाने हैं

ऐ चाँद! तेरे बहाने कुछ कह कर
खुद को ही समझाना था...
जीवन का किस्सा हर रोज़
वही पुराना था...
अश्कों को पलकों में रखकर
कुछ कह लिया!
बहती रही अपनी रफ़्तार से ज़िन्दगी
विकल्प क्या था मन भी संग उसके हो लिया!!!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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