अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पेड़ों पर उतरती शाम!


एक तस्वीर और तस्वीर के नीचे लिखी गयी दो पंक्तियाँ... शाम ढ़लने लगी.../पेड़ों पर उतरने लगी... और इन दो पंक्तियों के आगे अनायास लिखती चली गयी पंक्तियाँ, सब प्रस्तुत है एक साथ...!
इस सुन्दर तस्वीर और दो पंक्तियों के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद ललित भैया...:) इन दो पंक्तियों से आगे लिखी गयी
कोई कविता स्वप्न से स्मृति तक पर भविष्य में पढ़ने को अवश्य मिलेगी... इस आशा के साथ आपकी खिंची तस्वीर और पंक्तियों से प्रेरित एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं यहाँ...

शाम ढ़लने लगी
पेड़ों पर उतरने लगी
गोधूलि की बेला में
उदासी कुछ और सँवरने लगी

संध्याकाल में
जीवन के मोहजाल में
बहुत अखरी अपनी ख़ामोशी
रोया मन आंसू संभाल के

जिससे,
कोई सिसकी न सुने
ज़िंदगी से सांसें
हँसती हुई मिले!
जिससे,
आंसू से सींचे हिय में
कुछ चहकती
कलियाँ खिले!!

शाम ढ़ले
विश्रामरत
खुलती रही जीवन की
कई परत!
ऐसे ही उलझती
गयी पहेली
हर क्षण अपने अस्तित्व हेतु
संघर्षरत!!

ढ़लती शाम चलने लगी
पेड़ों पर उतरने लगी
क्या जाने आज ले आई हो कुछ सुकून
ऐसा सोच जड़ों के पास एक बाती जलने लगी

शाम ढ़लती रही
बाती जलती रही
फिर किरणों का आविर्भाव हुआ
सूरज ने शाम से कुछ बात कही-

'अब जा तू कल आना
कल फिर पेड़ों पर उतर जाना
अभी दिन भर मैं बात करूँगा पेड़ से
मुझे है उसे कुछ समझाना'

शाम समेटने लगी
अपने आप को
दे दिया स्थान
सूरज के ताप को

और
चलते हुए प्रण किया-
आज सूरज की बिदाई के बाद,
जब वह आएगी
उतरते हुए पेड़ों पर
प्यार से हाथ फेर जायेगी
सारे कष्ट-कंटक हर लेगी
और पेड़ के साथ मुस्कुराएगी!!!!

एक छोटे से पल में बड़े सत्य का आभास!

अक्सर मैं
हर छोटी बड़ी यात्रा में
कोई न कोई किताब पढ़ती ही हूँ...

और इधर तो
ऐसा नियमतः हो रहा है
पन्ने दर पन्ने गुज़रता रहता है वक़्त
और मंज़िल आ जाती है...

बस हो या ट्रेन
कुछ मिनटों की यात्रा हो
या कुछ एक घंटों की...
एक किताब हाथ में होती ही है

ऐसा इसलिए भी शायद
कि, मुझे लगता है
उनके बिना
बिलकुल अकेला हो जाएगा
मेरा एकांत...!

मंज़िल तो आएगी
पर उसतक पहुँचते हुए
जिस वक़्त से हो कर गुज़रना है
वह कैसे बीतेगा...?

ऐसे ही आज भी
मेरी हाथों में एक किताब थी
बहुत दूर नहीं जाना था
बस कुछ मिनटों की ही बात थी

एक पन्ना पलटते हुए
मैंने बाहर देखा...
खिड़की से खुलता था
जीवन का नया झरोखा!

गति के साथ
नज़ारे पीछे छूटते जाते थे
इतनी सुन्दरता थी बिखरी...
दृश्य आँखों में न समाते थे

ओह! इन्हें छोड़
क्यूँ मैं दूसरी दुनिया में डूबी थी?
ये ही हो सकते थे यात्रा के एकांत के साथी...
इनमें तो अनगिनत ख़ूबी थी!

जैसे ही
यह एहसास हुआ
एक सत्य का मानों
तत्क्षण ही आभास हुआ-

फैलाओ बाहें कितनी भी
सबकुछ नहीं हासिल होगा
दो बूँद धरा की आएगी हिस्से में
तो दूर खड़ा साहिल होगा

कितना ही समेटने की कोशिश करो
कुछ न कुछ तो है जो छूट जाता है
एक मानता है तो उनता ही प्यारा कोई
दूसरा पहलु रूठ जाता है
जीवन में जितनी मिलती हैं घड़ियाँ
उससे कहीं अधिक हर पल पीछे छूट जाता है

इसलिए ज़रूरी है
कि जीवन को
बस यूँ ही न लिया जाए
बड़ी सिद्दत से
हर एक पल को
जीया जाए

क्यूंकि इस धरती पर
कुछ अवधि के मेहमान हैं हम
इतना कुछ है करने को...
और वक़्त मिला है बेहद कम

नयनों में सिमटता रहे सौन्दर्य
और चहुँ ओर
हम सौन्दर्य ही बिखेरें
सुख दुःख से यूँ मिले
जैसे धरती हर रोज़ मिलती है सूरज से
सांझ-सवेरे

डूबता है
तो सागर की गोद में
उगता है तो सागर को कितने विम्ब दे जाता है
आज डूब गया पर सूरज फिर उदित हो आता है!

एक छोटे से पल में बड़े सत्य का आभास
सूक्ष्मता से बोल गया...
बंद थीं जो खिड़कियाँ उन्हें वह नन्हा सा पल
मेरी ख़ातिर खोल गया!!!

कुछ प्रश्नोत्तर स्वयं से...!

वैसे तो
कविता और आशा का
गहरा रिश्ता है
बात निराशा से शरू हो सकती है
पर आशा की किरण अंत में
अवश्य जगमगाती है!

कविता और ख़ुशी भी
पर्याय हो सकते हैं
पर
ऐसा क्यूँ है...,
दुःख की रागिनी ही
कविता में अक्सर गाती है?

बिखरे हैं गगन में इतने तारे
कैसे उन्हें...
दस उँगलियाँ पाए गिन?
ऐसे ही प्रश्नों के बीच
एक और बड़ा स्वाभाविक सा प्रश्न
उठ खड़ा हुआ एक दिन-

क्या कष्ट है तुम्हें
जो कवितायेँ लिखते हो?
ऐसा क्या है जो कह नहीं सकते किसी से
जो कागज़ों से कहते रहते हो?

अब...
क्या दे इसका उत्तर अक्षर
नश्वर जीवन के पोर पोर में
क्या नहीं है समाया आंसू का ही निर्झर?

इस आंसू के निर्झर को
क्यूँ तुम केवल दुःख कहते हो
होने दो बरसातें
क्यूँ ख़ुश होने का
यूँ ढ़ोंग किया करते हो

सुख दुःख केवल
दो पहलु हैं भावों के
तापते हैं किकुड़ते ठण्ड में जो...
हैं ये ताप उन अलावों के

बस संवेदनशील
हो मन
और भाव
हो प्रबल
तो सुख हो या दुःख
बह आएगा आखों से जल

फिर,
कविता कैसे पीछे रह जायेगी
अपना सारा ताम-झाम ले कर
आँगन में अनायास मुस्कुरायेगी

उनमे से ही
कोई एक मुस्कान लेकर
प्रस्तुत कर देना!
जिसमें आदि से अंत तक
केवल खुशियों की ही धूप खिली हो
ऐसी कोई कविता लिख देना!!

अक्षरों का नर्तन!

नहीं लिखना चाहते हम
रोज़ एक कविता
पर ऐसा कुछ हो ही रहा है इधर
कि झड़ी लगी हुई है-
आंसुओं की...
जो आता तो है नमी बन कर
पर मेरी कलम को
सविता दे जाता है
मेरे एकांत को हर बार एक
नयी कविता दे जाता है-
बिना किसी लय ताल के
अपना ही मन गुनगुनाने के लिए
औरों के बहाने...
अपने ही मन को समझाने के लिए

वैसे तो कोरे कागज़ से भी
हमें बहुत प्यार है
पर...
अक्षरों का नर्तन
इधर
ध्यान आकृष्ट किये हुए है!
लिख जा रही हैं
कितनी ही
बातें...
मानों, आसमान का कद
मेरे सामने पड़ा
पृष्ठ लिए हुए है!!

एक प्यारी दोस्त, कविता और यादें...!

कल एक बहुत प्यारी दोस्त से अचानक बात हो गयी... काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगन में मेरी कितनी ही कवितायेँ सुनने वाली मेरी प्यारी दोस्त... हम दोनों एक दूसरे को 'आप' ही कहते थे... कल भी बात हुई तो ऐसा लगा जैसे कोई अंतराल आया ही नहीं हो बीच में... ये 'आप' भी वैसे का वैसे था पर आत्मीयता भी वैसी की वैसी थी... मंदिर की घंटियाँ, लाइब्रेरी, जीवन और कविता..., बहुत कुछ याद दिला गई कल की बातचीत... धन्यवाद रचिता!!!

कई बार देखा है
जब बहुत बहुत उदास होते हैं
बिलकुल अकेले होते हैं
तब कोई एक दोस्त
जुगनू सा चमकता हुआ आता है
अपनी दो बातों से
सारा कष्ट हर ले जाता है

अब तो ऐसा है
आशान्वित सा रहता है मन
जब
बहुत दुखी होता है
कि कोई बहुत अच्छी बात
होने वाली है
रोती आँखें हंस कर
फिर और रोने वाली है

किसी पुराने रचित छंद सा
अपना ही कोई
कुछ ऐसी बातें कह जाता है
कि
जीवन के प्रति अविश्वास
तुरंत ढ़ह जाता है

याद आने लगता है
माटी का दिया
जो कभी गंगा की लहरों में
प्रवाहित किया था
और देर तक निहारते रहे थे
कि देखें कहाँ तक जाता है
कहो क्या वो लम्हा
आपको भी याद आता है?

याद आती है
साथ बितायी कुछ एक
सुन्दर घड़ियाँ...
जिनके बलबूते
देखो वर्षों बाद भी मात्र चंद बातें कर के
हम जोड़ लेते हैं सुनहरे पलों की कितनी ही लड़ियाँ...

कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है

'आप' की औपचारिकताओं से ही
हम निकल
नहीं पाए थे
कि वक़्त बीत गया
जितनी कवितायेँ सुनी थी
आपने
वह सब वहीँ प्रांगन में
पीछे छूट गया

अब समेटेंगे हम
सबकुछ
धीरे धीरे!
उन अनमोल घड़ियों को
यहीं से जी लेंगे...
जो जी गयीं थीं गंगा तीरे!!

हृदय की भाषा को शायद ही शब्द मिले, फिर भी...

हृदय की भाषा को शायद ही शब्द मिले, फिर भी... एक प्रयास आभार व्यक्त करने का सभी पढ़ने वालों का, शब्दों से जगमग जग करने वालों का और आप सभी प्रेरणापुंज मित्रों का... जो निर्मल वचनों से सदा हमें आशीष देते रहते हैं...! माँ शारदे की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे!!!
आप सभी को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

लिखते हुए... पढ़ते हुए
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
कितने मोड़ ऐसे आये
जब सुस्ताना चाहते थे बढ़ते हुए

ज़िन्दगी ने अवसर ही नहीं दिया
जितना ही प्यार मिला
उतना ही मन मौन हो लिया
किन शब्दों में व्यक्त करता आभार
शब्दाशीशों के बदले...
क्या देता शब्दों का उपहार?

समेट लिया हो धरती और गगन
जैसे अक्षरों की बाहों में
ये दुर्लभ अनुभूति भी हुई
इन कंटकाकीर्ण राहों में
कि वो जो ऊपर बैठा है
वह सारी प्रार्थनाएं सुनता है
कल्पनातीत उमंगों से
मन-प्राण सींचता है

अब कैसे व्यक्त हो
उस परमशक्ति के प्रति आभार
मौन वंदना में ले लेते हैं
अनगिनत भाव आकार
प्रभु मेरा
फिर मुस्कुराता है
उसे तो
मौन समझना अच्छे से आता है

वैसे ही हम आप सबका
आभार व्यक्त करने से चूक जाते है
इतना उपकार रहा है
कि हम मूक हो जाते है
ये सब आप सबों की प्रेरणा है
जो हमसे लिखवाती है
माँ शारदे आपकी वाणी में विराज
मेरी कलम को आशीषती है

अब ऐसे दिव्य उपकार का
कैसे धन्यवाद करें!
कितने ही उज्जवल सन्देश हैं...
किन किन को अकिंचन याद करे!
हर भाव सुधा को हृदयंगम कर
हम लिखने लगे
आप सबों के आशीर्वाद से मेरे टूटे-फूटे शब्द भी
सुन्दर दिखने लगे

इस श्रेय के लिए
मन से सदा आभारी रहे हैं
आज शब्दों में
व्यक्त करते हैं
सभी का हृदय से आभार
माँ शारदे के आह्वान में
सदा जुटा रहे मन संसार!!!

एक पल की कविता हर पल के लिए...!

एक पल के लिए
एक पल की खातिर
एक पल में हमने
एक पल को
अपना बना लिया

अब विश्वास है
यह पल
हर मुश्किल का हल होगा
जैसा मेरा कल था
उससे सुन्दर
आने वाला कल होगा

और न भी हो तो
इस पल का विश्वास ही बहुत है
कई मुश्किल पलों पर भारी पड़ने के लिए
मेरी आखों की नमी
तैयार है
हर गम से लड़ने के लिए!

इस पल तुम ज़िन्दा हो!

पत्तों पर कुछ बूंदें हैं...
उन बूंदों में
जीवन है

कुछ आवाजें हैं
गूँज रहीं
क़दमों तले रौंदा गया जो
उस सूखे पात में भी जीवन है

जैसे ही यह महसूस किया
हवा कानों में कह गयी-

तुम
अपने अलावे
देख पा रही हो
बूंदों की सांसें
सूखे पत्तों का जीवन

इस
पल तुम ज़िन्दा हो!

हमेशा नहीं
संचित रह पायेगा
यह एहसास,
जीवन की विडम्बनाएं
तुम्हारी दृष्टि को
नहीं
देखने देगी हरी घास!
इसलिए, अभी
जब सौभाग्य से देख पा रही हो तो
इन्हें
स्मृतियों में गहरे पैठ जाने दो
यह संगीत... यह कलरव...
अपने भीतर
साँसों को गुनगुनाने दो

किसी

मृतप्राय से पल में...
महसूस करोगी यही सब
अपनी आखों के जल में...
तब ज़िन्दा होने का एहसास
जीवन दे देगा
स्मृतियों में से झाँक
कोई पल सारे दर्द हर लेगा

जो हैं ऐसे छोटे छोटे एहसास
उनकी माला बना ले...
काम आयेंगे!
जीवन में बनेंगे सहारा
जब पतझड़ के मौसम...
तुझे सतायेंगे!!

आंसू... प्रार्थना और कविता!

आंसू... प्रार्थना और कविता- तीनों ही संबल हैं जीवन के! जब कुछ भी नहीं दिखता तब भी ये होते हैं साथ... हाथ थामने को... साथ चलने को... प्रेरित करने को... हमारे एकांत का गीत बनने को सदैव तत्पर!

नज़रिया
ही
स्थितियों को
दुरूह बनाता है
दृष्टि का फेर ही
कठिनता को
सरस भी करता है

हमेशा होना चाहिए
आशावादी ही
जानते हैं... पता है...
लेकिन क्या करें
मन निराश है, और इसमें
परिस्थितियों की नहीं कोई ख़ता है...

बस
हमारा तन्हा बैठ
रोने का मन है
आंसुओं में
महसूसना हमें
अपनापन है

नम आँखों से हम
प्रभु से
सब कह लेंगे
जो कर नहीं पाती प्रार्थनाएं
शायद
आंसू कर लेंगे

हो सकता है तब
फूल और काँटों के वितरण का
गणित समझ आ जायेगा
या फिर...
एक सीमा का अतिक्रमण कर
रूदन ही हास का प्रतिरूप हो जायेगा!

एक छोटा सा प्रयास किसी की मुस्कान के लिए!

मेरी छोटी बहन को
छोटी कवितायेँ पसंद है
सार और विस्तार में
समानताएं केवल चंद है

सार तो कुछ शब्दों में
समा जाता है
कितने सत्य को तो
मौन होकर ही कहा जाता है

कभी एक शब्द में
हो सकता है चमत्कार
कभी पूरी कथनी ही
हो सकती है निराधार

नियम से नहीं चलता
जीवन का स्वभाव ही उद्दंड है
मेरी छोटी बहन को
छोटी कवितायेँ पसंद है

जो उसे पसंद
वह हमें भी भाता है
अफ़सोस! हमें सुन्दर चित्र
गढ़ना नहीं आता है

फिर भी रोज़ करते हैं
रंगों पर ऐतबार
लो लम्बी हो गयी बात
फिर इस बार

जीवन है क्षणभंगुर...
फिरता निर्द्वंद है
मेरी छोटी बहन को
छोटी कवितायेँ पसंद है

कविता है तो जीवन है...!

आज भी कुछ कहने का मन है
कविता
है तो जीवन है...
होती होंगी बकवास ही ये कवितायेँ
लेकिन इनका लिखा जाना
या यूँ कहें...
इनका लिख जाना
जैसे अनिवार्य होता है किसी बेहद नाज़ुक से पल में-
जीवित रहने के लिए...
अनसुलझी सी पहेली
जो है ज़िन्दगी, उसको अपना कहने के लिए...
अपने ही मन को समझाने का उपक्रम करते हुए
औरों को समझाने का दम भरने के लिए...

कह नहीं सकते थे यूँ ही
लड़ रहे थे भीतर भीतर ही
किसी का मौन रुलाता था
किन्ही आँखों के आंसुओं का समंदर मेरी आँखों में उभर आता था
जीवन के मायने हर क्षण परिवर्तित हो जाते थे
बीते पल दूर होकर भी खूब सताते थे
मृत्यु और जीवन की अठखेलियाँ परेशान करती थीं
रोज़ बनती थी मान्यताएं और रोज़ ढहती थीं
किसी कठिन पल के मुकाबले अपनी रीढ़ सीधी रख सकें
घुट रहे क्षणों में साँसें जिंदा रख सकें
इसलिए हम बेतरतीब टूटी फूटी कवितायेँ लिखते हैं
जैसे हैं हम वैसे ही दीखते हैं

अपनी सीमित क्षमताओं से जो कह सके कहा
जो भी अच्छा था वो सब स्वयं कविता ने कहा
बस हमपर इतना उपकार हुआ
जब जब लिखा तब तब निस्तार हुआ
कविता शरू हुई विषाद से पर अंत होते होते समाधान लेती आई
हर बार खिल आई मुस्कुराती धूप जब जब आई रुलाई
इस तरह सिलसिला चलता रहा
अँधेरी रातों में कविता का सूरज पिघलता रहा
शब्दों में ढ़ालकर विसर्जित कर दी पीर
जब जब लिखी कविता हो गए कुछ धीर
बार बार गिरते हैं... उठते हैं... बढ़ते हैं... सीखते हैं
जैसे हैं हम वैसे ही दीखते हैं

अपने मुहावरे खुद गढ़ ले अभिव्यक्ति
जीवन के प्रति प्यार ही है जीवन की शक्ति
हर घड़ी बस ये प्यार बना रहे
जी ली जायेगी मुश्किलें जो आधार बना रहे
और ऐसे में भी गर सांस लेना दूभर जान पड़े
परिस्थितियां आकर सीधे लड़ भिड़ें
तो उस मुश्किल घड़ी में मुस्कुराना
किसी भूली बिसरी कविता की दो पंक्तियाँ मन ही मन गुनगुनाना
देखना एक नयी कविता रचने का उमंग सारे कष्ट भुला देगा
तुम्हारी उदास आँखों को लोरी गा कर गोद में सुला लेगा
ये भी ज़िन्दगी का ही अनोखा रूप है
जितनी प्यारी छाँव उतनी ही मनभावन धूप है

आज भी ऐसे ही खुद से बात करते हुए लिख रहे हैं
हर जाते हुए क्षण से कुछ सीख रहे हैं
कितना आत्मसात होता है ये देखना है!
कुछ अपना भी पुरुषार्थ है... सब विधि का लेख ना है!!

नयी भोर...!

एक हंसती मुस्कुराती भोर...
सारे दुर्गुणों से दूर शांत सौम्य भोर...
जीवन की हंसी और उदासी का
नये सिरे से स्वागत करती
नयी भोर...
नीले गगन और नीली धरती के बीच
गुम होते फासले की
प्रत्यक्षदर्शी भोर...

हाँ!
नीली धरती...
क्यूंकि-
उस बेला में विस्तृत जल की गोद में
चलती विशाल नैया से जो देखा...
वह केवल नीले रंग का ही विस्तार था
मेरी आँखों में रौशनी थी...
जीवन के प्रति ढ़ेर सारा प्यार था

नीले आकाश से गिरते
हलके बर्फ के फाहे और हम
तब सूर्योदय नहीं हुआ था
पर कहीं नहीं था तम
गुज़रते हुए कितने दृश्य
कैद हो जाते हैं
पर जो सबसे सुन्दर हैं
वो पल केवल स्मृतियों में रह जाते हैं

सबसे प्यारा जो पल था उसकी कोई तस्वीर नहीं
मिल कर बाँट न ली जाए ऐसी कोई पीर नहीं

गगन धरा का
दर्द बाँट लेता है
पवन ठिठुरती वादियों का सन्देश
सूरज के हाथ देता है
तभी तो
प्रगट हो आते हैं दिनमान
चमकते हैं बर्फ के मामूली कण
अनमोल हीरे के समान

यह अद्भुत छटा देख
पेड़ भावविभोर हो जाता है
अपना कष्ट
वह तत्काल भूल जाता है
ऐसे ही बीत जाता है ठिठुरता मौसम
और आ जाती है वासंती भोर
रंगों का मौसम खिल आता है
चारों ओर

बर्फ़ से आच्छादित
पेड़ को देखते हुए
नीले और उजले की महिमा से
मन प्राण सेंकते हुए
कुछ सोचते रहे तब तक
जबतक कि वह पेड़ ओझल नहीं हो गया
सन्देश छुपे हैं कितने सारे
मन इनमें ही खो गया

एक आता है
एक जाता है
मौसम का जीवन से
गहरा नाता है
एक का होना
दूसरे की महत्ता का प्रमाण है
जीवन कभी ओस तो कभी
आंसू का नाम है

हाथ फैलाये उस घड़ी को
गले से लगा लिया
नीला उजला जो कुछ था
सबकुछ ही हृदय में समा लिया
अब सुन्न हो चुकी हथेलियों को
जोड़ लिया
और प्रार्थना में यूँ ही कुछ
बोल लिया

आसमान ने सुनी होगी मेरी विनती....?
वे सुन्दर पल बेहिसाब थे... नहीं संभव थी उनकी गिनती!

सो,
जितना बटोर सकी
बटोर लायी स्मृतियाँ
और जितने भी शब्द मिले
लिख गयीं स्मृतियाँ
अब सब शब्दों में
कहाँ कहा जाता है
जब कहनी होती है सबसे प्यारी बात
तब मौन ही काम आता है!!!

नन्ही लौ और इंसान...!

अन्धकार भयावह है...
विस्तार लिए हुए है
रौशनी नन्ही सी है...
एक लौ में सिमटी हुई है

पर,
जब दोनों देखे जायेंगे
तब एक दूरी से
वह नन्ही लौ ही नज़र आएगी
और सिमटी हुई नन्ही सी लौ
अन्धकार पर भारी पड़ जायेगी!

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है

ज़िन्दगी
कुछ एक मूल सिद्धांतों पर भी
अगर अडिग रहे
प्रेम-दया-करुणा के भाव
मन में
सजग रहे
फिर,
जो एक
अप्राप्य सा लक्ष्य (?) जान पड़ता है-
इंसान होना!
दुर्लभ ही है
औरों
के आँसुओं को
अपनी आँखों से खोना...;
वह स्वतः ही
सहज हो जाएगा
नन्हा दीया जो बन गया मन
वह साक्षात् पुण्यधाम ब्रज हो जाएगा

इंसानियत की बाती के प्रज्वलित होते ही
यह दीये वाला चरित्र
साकार हो जाएगा
देखना यह कलयुग फिर
स्वयं ही सतयुग का
अवतार हो जाएगा!!!

हलकी सी हवा सी... रुई के फाहों सी है ज़िन्दगी!

चिंता और चिंतन के बीच लम्बा फासला है
चिंता से दूर चिंतन की धरणी पर पाँव धरना है
इस जहां की विडम्बनाएं... उस जहां का सुकून
दोनों दो बातें हैं स्वीकार तो दोनों को ही करना है

सारे प्रपंच सारे जोड़ घटाव यहीं रह जाने हैं
जब तक हैं तब तक सौम्यता का वरण करना है
जहाँ से चले थे... जहाँ तक चलेंगे
यही उद्देश्य रहे कि मरने से पहले नहीं मरना है

जीवन की दिवा-रात्री का संकट तो बना रहेगा
दृढ़प्रतिज्ञ हो अनवरत हमें विषमताओं से लड़ना है
कांटे हैं तो फूल भी होंगे बगिया में
ज़रा कुछ पहर बस आकंठ डूबे हुए पीड़ा को सहना है

हलकी सी हवा सी... रुई के फाहों सी है ज़िन्दगी
बिना मन में कोई भार लिए बस आनंद से रहना है
हम जोड़ लाते है विकार और सहेजते हैं भीतर
ऐसे सारे भेद त्यागना ही वस्तुतः भवसागर तरना है

कल से शुरू करेंगे ये सोच ही बेमानी है
कल कभी आता नहीं... जो है वह आज ही करना है
आज से जागे विवेक हो जाएँ विचार नेक
अत्यल्प समय है ' इसमें ही जीवन अमिय करना है

आत्ममंथन...?

जोड़ते हैं... जुड़ता भी है...
फिर टूट जाता है,
हमारा विश्वास हमसे
बारबार रूठ जाता है,
कोई एक किरकिरी आकर
सारा दृश्य बिगाड़ देती है
विद्रूपताओं का श्रोत किसी भी क्षण
बरबस फूट आता है!

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,
ये बदलते दृश्य सब
प्रभाव छोड़ते हैं अपना
अपने आप से रिश्ता कायम हो
ये तत्व ही अंततः काम आयेंगे!

सारे संशय की... सारे उलझन की
जड़ वास्तव में हम ही हैं,
ये जानते हुए भी हल से दूर...
दीन आँखें केवल नम ही हैं,
वह उलझनों को सुलझाने वाला
विवेक कहाँ खोया है?
उत्तर होने का सामर्थ्य रखते हुए भी
केवल प्रश्नों के तम ही हैं!

चलते चलते अनवरत प्रयास से
हर विसंगति का हल निकलेगा,
इसी बंजर धरती से
संभावनाओं का जल निकलेगा,
रहती नहीं देर तक
काली घटाएं आसमान में
यह आज का अन्धकार है प्रमाण
चमकता हुआ यहीं से कल निकलेगा!

कुछ भूले बिसरे पन्ने: २

कुछ भूले बिसरे पन्ने सहेज ही रहे हैं तो उन पन्नों को उनकी समग्रता में सहेज लिया जाये... यात्रा के पड़ाव के रूप में वे हमेशा प्रिय रहेंगे और समय बीतने के साथ शायद और प्रिय होते जायेंगे! अपने भाव... अपनी आशंकाओं... अपनी आशाओं को जिस तरह लिखा था अपरिचय के उस मोड़ पर वह पढ़ना अच्छा लगा इतने दिनों बाद...; अपरिचय का मोड़ ही तो था वह... इस नये देश से अपरिचित, नयी ज़िन्दगी से बिलकुल अनजान और जिसके साथ यहाँ आये थे वह भी तो तब हमारे लिए अनजान ही था... हम दोनों एक दूसरे के लिए अनजान ही थे... जान पहचान की पहली सीढ़ी पर कदम ही तो रखा था बस!!!

२७ अगस्त २००९ को लिखित पन्ने को भी यहाँ हु बहु लिख डालते हैं... हरे रंग की स्याही फीकी नहीं पड़ी है... हाँ, पहचान के रंग इन दो वर्षों में गहरा अवश्य गए हैं:

वातावरण में जिस तरह की शीतलता है वैसी ही शीतलता लोगों के व्यवहार में भी है; सभी चीज़ें व्यवस्थित... सूचना देने को तत्पर सा माहौल... सबकुछ अनुकूल जान पड़ता है! इन लम्हों को शब्दों में... तस्वीरों में कैद करते हुए आनेवाला समय निश्चित ही बढ़िया गुजरने वाला है, कम से कम आशा तो यही है! सभी अपनों से दूर सारा अपनापन एक दूसरे में तलाशते हुए दो लोग आत्मिक रूप से और करीब आ जायेंगे शायद... कौन जाने ये भी एक सुखद पहलु हो इस प्रवास का... इस वनवास का! फिर वही बात, मन अपने आप को विविध प्रकार तसल्ली देने के कितने बहाने निकाल लेता है न... और करे भी क्यूँ न, इतनी दूर इतना अकेला बैठ वह करे भी तो क्या करे... ऐसे अनर्गल प्रलाप के सिवा...! बकबक करते ही रहते हैं हम और सुशील अपने नाम के ही अनुरूप सुशील और शांत... अब तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि समय के साथ ऐसा भी हो कि शब्द मौन में समा जाए और मौन शब्दों से बातें करने लगे; एक बिन्दु पर समानता की पराकाष्ठा हो और वहीं दूसरी ओर विविधता का सौन्दर्य भी कायम रहे; दो बिंदु एक दूसरे के पूरक बनकर रहे बिना किसी आपसी प्रतिस्पर्धा के... तभी तो रिश्ते की नींव मज़बूत होती है... सम्बन्ध पुष्पित पल्लवित होते हैं! इस छोटी सी दुनिया की बड़ी बड़ी समस्याएं आपसी तालमेल से ही तो हल होती हैं...; जो हो, जीवन तो चलता ही रहता है, कहानी में मोड़ आते जाते रहते हैं पर गति नहीं रूकती क्यूंकि यात्रा तो अंतहीन है...! जीवन यात्रा में कितनी ही यात्राएं करते हैं हम और हमारी कितनी ही जीवन यात्राएं उस आकाशगंगा में चल रही अनंत यात्राओं का हिस्सा ही तो है...! ऐसे वृहद् सन्दर्भ में सोचें तो धरती के एक भाग से किसी और भाग तक की यात्रा उतनी बड़ी और भयानक भी नहीं कि नये स्थान पर पहुँच कर सहज न हुआ जा सके और वह भी तब जब अकेले नहीं आये हैं... सुशील हैं साथ! इससे ज्यादा विदेश तो शुरू शुरू में वाराणसी था हमारे लिए जब २००१ में वहां पढ़ने गए थे... जमशेदपुर लौट आने की बेचैनी में ही पूरा साल बिता था... फिर रहना ही पड़ा तो वहाँ भी देखते देखते ६ साल निकल गए...! उससे तो स्थिति आज ठीक ही है... क्यूंकि यहाँ कोई तो साथ आया है या ऐसे कहें तो ज्यादा सही रहेगा कि हम किसी के साथ आये हैं! साथ साथ चलते हुए समझ भी विकसित होगी... बिना कहे बातें संप्रेषित हो जाएँ, वो वक़्त भी आएगा... ज़रूर आएगा, क्यूंकि यात्रा तो अंतहीन है... एक मंज़िल से दूसरे की ओर! आज मंज़िल नज़र आने वाला बिन्दु किसी नयी मंज़िल हेतु पड़ाव मात्र है... यही जीवन की सच्चाई है क्यूंकि गति का दूसरा नाम ही जीवन है!

*****

कुछ और पन्ने हैं उन्हें भी सहेज लेंगे यूँ ही... देखें तो हरे रंग की वह स्याही, जो मेरे घर से मेरे साथ आई थी यहाँ, और क्या क्या कह चुकी है...

*****
आज पुनः जब देख रहे हैं
उन पलों को
एक दूरी से
तो एहसास यह
साथ है
कि
बीत रही है
घड़ियाँ भले
पर मन में अंकित
हर बात है!

किस विधि हम मन को मनाते हैं
कैसे कैसे तर्कों से
मन को बहलाते हैं
आज भी याद हमें वो
विदाई वाली प्रात है
कि
बीत गए वो पल करके हमें विदा
पर हमारे संग आज भी
उस पल के आसुओं की
सौगात है!

घर से विदा हुए तो घर सा ही घर मिला
रे मन! अब दो परिवार तुम्हारे हैं
ये सुन्दर प्रतिफल मिला
कुछ नहीं छिना तेरा,
अरे! ये तो सुन्दर समृद्ध प्रभात है
कि
जहां एक मात-पिता और मिले
और साथ ही अब तो संग तेरे
हर पल
तेरा नाथ है!

*****

मन की गति निराली है... कैसे कैसे तर्क गढ़ कर समझा लेती है खुद को!!!

कुछ भूले बिसरे पन्ने!

२५ अगस्त' २००९ को लिखे गए कुछ पन्ने हाथ आ गए... पढ़ा उन्हें... सहेजने का मन हुआ उन पन्नों को और पढ़ते हुए वो भाव फिर से जी गए हम जब यहाँ स्वीडन आये हफ्ते भर बीते थे बस... दिनचर्या व्यवस्थित नहीं हो पायी थी... सुशील तो आते ही व्यस्त हो गए थे अपने लैब में लेकिन हमारे पास तब बहुत सा खाली वक़्त था... मन में विभिन्न चिंताएं थीं अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर... समय के साथ वह सब दो एक महीने में व्यवस्थित हो गया... और पीछे कागजों के ढ़ेर में रह गए वो पन्ने जो अपने घर और अपनी धरती से तुरंत तुरंत दूर हुई बिटिया ने लिखे थे... आज उन पन्नों को पढ़ते हुए बड़ी सिद्दत से यह एहसास हो रहा है कि समय कितनी जल्दी बीत जाता है... दो साल से अधिक हो गए... हरे रंग की स्याही बिलकुल फीकी नहीं पड़ी है और न ही हरे रंग की स्याही से लिखे गए भाव ही फीके पड़े हैं!!!

हरे अक्षरों को यहाँ हु बहु छाप रहे हैं... हरापन बना रहे इन काले अक्षरों में भी... यात्रा के पड़ाव के रूप में संचित, यही आशा है:

आसमान तो एक ही है... लेकिन जगह बदलते ही आसमान के रंग भी बदल जाते हैं। धरती के विभिन्न कोणों से कितना अलग अलग दीखता होगा न आसमान! यहाँ बहुत साफ़ नज़र आती है नभ की विशालता... बादलों का समूह बिलकुल खिड़की से चिपका हुआ सा जान पड़ता है; दूर दूर तक हरियाली... शांत वातावरण... स्वच्छ परिदृश्य... सबकुछ परिष्कृत सा... लगता है मानों यह देश बाँध कर रख लेगा मन को अपने सीमाक्षेत्र में, अपनी छोटी सी दुनिया तो कुछ समय के लिए बस ही गयी है यहाँ अपना भारत अपने साथ समेटे हुए!
आसमान में भागते बादलों की तरह ही यहाँ लोग भी हर क्षण भागते हुए ही दीखते हैं लेकिन एक सुन्दर निश्चिन्तता है उनके चेहरे पर... भले कदमों की गति हर वक़्त किसी गंतव्य की ओर केन्द्रित भाग ही रही होती है... आसपास से अनजान; अपने आप में मग्न लोग... अच्छे हैं लोग... आते जाते मुस्कुरा लेते हैं... पहचान की पहली और आख़िरी सीढ़ी यही एक मात्र अभिवादन!
अकेलापन तो है यहाँ, स्वाभाविक भी है..., पर उदास होने की ज़रूरत नहीं... अकेलापन कहाँ नहीं होता! आदमी हर वक़्त अकेला ही होता है... अपने विचारों के झुरमुट में अकेला... सौ लोगों की भीड़ में बीसियों अपनों के बीच अकेला...; अकेलेपन का अनुभव और एकाकीपन की महिमा के क्या कहने!
बैठे सोच रहे हैं कि जब तक समय, स्थान और योग्यता के अनुरूप कुछ करने का सुअवसर मिले... तब तक विचारों की चित्रकारी चलती रहेगी... और शायद भविष्य में व्यस्त होने के बावजूद भी यह नहीं रुकेगी क्यूंकि धरती पर रंग भरने का प्रयास करने वाले इस मूढ़ को तो अब नीलगगन का विस्तृत कैनवास भी मिल गया है...! विचारों की चित्रकारी चलती रहेगी... भाव भाषा में आबद्ध होते रहेंगे और इस तरह जीवन के कुछ एकाकी पल कलमबद्ध हो जायेंगे! कुछ भी व्यर्थ नहीं होता... जीवन कुछ न कुछ उद्देश्य लेकर ही सांस ले रहा है; हमेशा भौतिक उपलब्द्धि ही मायने रखे ऐसा तो नहीं है... हृदयगत बातें कहीं अधिक दूरी तय करती हैं; किसी की उपलब्द्धि में उसके साथ खड़े होना... उसकी छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना... उसके लिए घर लौटने की वजह होना... किसी के लिए उसके अपार्टमेन्ट को घर बनाने वाली कड़ी होना... अपना परिवार अपना सबकुछ पीछे छोड़ किसी का सबकुछ होना- ये सब भी तो काम ही है शायद सबसे बड़ा और सबसे विशिष्ट! जीवन के रंग किस तरह बदलते हैं... जन्म का आँगन पल भर में छूट जाता है और बेटियां परायी हो जाती हैं... जीवन की आपाधापी में यह ख्याल ही नहीं रहता कि कब प्राथमिकताएं बदल गयीं... कब घर छूट गया और अनजानी डगर ही सदा के लिए अपनी हो गयी... ये सब कब क्यूँ हो जाता है किसे ज्ञात; अपने पीछे आभास मात्र छोड़ जाता है आकलन के लिए...!
*****

आये हुए एक सप्ताह बीत गया... धरती की गोद से नम आँखें लिए उड़ान भरी... बादलों के बीच से होते हुए... बादलों के बहुत ऊपर से धरती को उसी प्रकार देखा जैसे आसमान को निहारते आये थे धरती से...; आसमान तो अब भी दूर था... पर यहाँ से धरती भी बड़ी दूर थी! ऊँचाई से सबकुछ बहुत छोटा नज़र आता है... या यूँ कहें कुछ भी नज़र नहीं आता है...; दूरी तय कर के पुनः धरती की गोद में आ गए... अपनी जगह पर वापस! लेकिन, ये स्थान अपना कहाँ है... ये तो दूसरा देश है... दूसरी दुनिया जहां पंछी कुछ दिनों के लिए अपना घोंसला बसाने आये हैं... दो दूर देश के पंछी जो साथ हैं और अब हमेशा साथ ही रहेंगे; प्यार से तिनका तिनका जोड़ कर धरोहर सहेजेंगे... कुछ विशिष्ट हासिल करेंगे...: वापस संभावनाओं का आकाश साथ लिए जो उड़ना है!
*****

धुंधली सी सुबह... खिड़की के कांच पर पानी की बूँदें... धुंए की तरह उड़ते हुए आकृतिहीन बादल... ये है स्टाकहोम की एक भींगी भोर...; भींगी धरती... भींगा गगन... भींगी हरियाली की तरोताजा मुस्कान से भावविभोर आत्मा ही जानती है कि भींगना क्या होता है... बेख़ौफ़ टहलना क्या होता है... आसमान से झरते अमृत को अपने आप में समाहित कर लेना क्या होता है...!!! बारहवीं मंजिल में स्थित अपने अपार्टमेन्ट के कमरे की खिड़की से आसमान इतना करीब से महसूस करना भींगने से कम नहीं है...; हृदय की गहराइयों में प्रविष्ट यह नमी क्या हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रह जायेगी... बूंदें, पानी, बादल... सब तो एक ही हैं बस रूप परिवर्तन विविधता को जन्म देता है! मेरे देश की धरती पर बरसने वाले मेघ भी तो इन मेघों जैसे ही हैं...!
अजीब है, इतनी दूर बैठ कर मेरा मन मेघों में समानता ढूंढ रहा है... बूंदों में वही टिपटिप धून सुन रहा है... और फ़ोन पर कही गयी पापा की बात याद कर हंस भी रहा है और रो भी रहा है... पापा कह रहे थे... कि उन्हें अब भी नहीं लगता कि हमें विदा कर दिया है... उन्हें अब भी ऐसा ही लगता है जैसे होस्टल भेजा है और छुट्टियों में बेटी वापस आ जाएगी... ये बातें याद करते हैं तो पतिदेव की सांत्वना मुस्कान ला देती है... वे हमें सांत्वना देते हुए कहते हैं कि वो भी तो अपने घर से दूर हैं... जैसे मेरा घर छूटा, वैसे ही यहाँ आने की वजह से उनका घर भी तो छूटा तो चलो बात बराबर हो गयी...:) सच! मन की उड़ान भी अजीब होती है... कैसे कैसे तर्क ढूंढ लेता है समझने समझाने के लिए क्लिष्ट नियमों का संकट और सच.....


बादलों के शहर की सैर
अपने कमरे के झरोखे से
आँखों में पलते सपने
कुछ बिरले अनोखे से

मुट्ठी में कर ली गयी हो बंद
किरणें कुछ धोखे से
चल पड़ी जो विचारों की आंधी
तो न रुकेगी किसी के रोके से

बादलों के शहर की सैर
अपने कमरे के झरोखे से
...........................!

जीवन-मृत्यु!

मृत्यु पर
एक पुस्तक पढ़ती हुई
जीवन के बारे में
सोचती रही...

कैसे इस ओर से उस ओर
हो जाता है प्रस्थान
चल देती है आत्मा
इस धाम से उस धाम

शरीर यहाँ पंचत्व में
विलीन हो जाता है
नियति के हाथों
इंसान कितना दीन हो जाता है

पूर्व निर्धारित घटनाक्रमों के आधार पर
बस अभिनय ही तो करना है
फिर क्यूँ किसी से बैर भाव
चलें ख़ुशी से जितना लिखा हुआ चलना है

पुरुषार्थ
भाग्य बदल देता है
दृढ़ता का सूर्य
हमारी जीवन धरा को रौशनी देता है

उस सूर्य के
प्रकाश में
लीन रहे जो सदा
सत्प्रयास में

उसके जीवन का हर पहर
सत्कर्मों में व्यस्त हो जाता है
चमकता है उसका तेज तब भी
जब जीवन का सूर्य अस्त हो जाता है

जीवन के बाद भी एक जीवन है
जो अपनों की यादों में हम जीते हैं
चक्रवत चल रहा समय है...
आते है फिर वही जो पल भर पहले बीते हैं

उस पल का ध्यान जो हर पल रहे
जब न रहेंगे हम
जब औरों के लिए छोड़ जायेंगे
केवल यादों के मौसम

तब कितने ही क्षणिक जीवन के संताप
क्षण में मिट जायेंगे
जो मिली है ज़िन्दगी
हम उसमें झूमेंगे, नाचेंगे और गायेंगे

जीवन के महोत्सव का आनंद
मन विभोर कर देगा
तब एक विलक्षण जादू
हर निराश शाम को भोर कर देगा

जीवन मृत्यु के बीच की
सूक्ष्म लकीर का ज्ञान रहेगा
तो आजीवन जीवन के प्रति
आभार और सम्मान रहेगा

ये मृत्यु ही है
जो जीवन को विशिष्ट बनाती है
क्षणिकता के सौन्दर्य का
हमको भान कराती है

महत्व उसका ही है
जो खो जाता है
और खोने से पहले संभावनाओं के
अगणित बीज बो जाता है

मिटने का अधिकार
अमरत्व से कहीं श्रेष्ठ है
औ' जीवन अपनी निकृष्टतम दशा में भी
मृत्यु से ज्येष्ठ है

एक घट लगा रहे और उसमें
राम नाम का मोती भरता जाए
स्मित मुस्कान के साथ घर लौटने का सुकून हो मुख पर
जब जीवन हाथ छुड़ाए...!

मत विचलित हो रे मन!

तुम्हारी तमाम ख़ामियों के बावजूद
जो तुम्हें चाहता है
जो तुम्हारे हर एक आंसू का
मूल्य जानता है
वह स्थितियां परिस्थितियां उपस्थित कर
केवल तुम्हें थाहता है
मत विचलित हो रे मन!
वह तुम्हें सचमुच बहुत मानता है

तुम्हारे मन की सारी बातें
सकल चिंताएं उसे ज्ञात है
जीवन की अंधियारी रातों का
वह एक मात्र प्रात है
जब कोई नहीं है साथ
तब उस एकाकीपन में भी वह साथ है
मत विचलित हो रे मन!
तेरे सर हर क्षण विधाता का हाथ है

जीवन में हर क्षण हर मोड़ पर
क्या क्या नहीं मांगते तुम
आजीवन बस भक्ति भाव वाली ही ऋचाएं
नहीं बांचते तुम
सब कुछ का परिक्षण कर लेते हो
अपना भीतर ही नहीं जांचते तुम
मत विचलित हो रे मन!
ये सब अनुभूतियों की धूल हो फांकते तुम

जो जैसे हो रहा है उसे होने दे
परमसत्ता का ध्यान कर
कुछ उच्च उद्देश्य लिए तू जन्मा है
इस बात का भान कर
जीवन में जितना हो सके
तन मन धन से दान कर
मत विचलित हो रे मन!
मानव जन्म पर मान कर

बस दृष्टि ज़रा बदलेगी तो देखना
दृश्य बदल जाने हैं
ज़रा चिंतन का क्षेत्र विशाल कर ले
परिदृश्य बदल जाने हैं
मानों तो सब अपने हैं वरना हर रिश्ते की अपनी सीमा है
सभी यहाँ बेगाने हैं
मत विचलित हो रे मन!
यही तो मज़ा है, इस निष्ठुर जगत के फिर भी हम दीवाने हैं!!!

आस ने फिर अपना रूप विस्तार किया...!

पसरी हुई ख़ामोशी को मन में उतार लिया
सांस लेते क्षणों को फिर से पुकार लिया
हमने खोले सब दरवाज़े सभी खिड़कियाँ
हवाओं संग आते जीवन का सत्कार किया

मन को समझाने का उपक्रम विविध प्रकार किया
नहीं होंगे क्रोध के वशीभूत प्रण ये बारम्बार किया
हर बार हार ही जाते हैं और स्वाभाव जीत जाता है
लगता है बेवजह ही दायरे का विस्तार किया

विश्वास पर ही जीवन हमने आधार किया
अपने नन्हे सपनों पर हर बार ऐतबार किया
पर सपनों का क्या वे तो टूट ही होते हैं
इस टूटन में आस ने फिर अपना रूप विस्तार किया

विश्वास टूटा ठोकर खाए फिर भी पुल को पार किया
इंसानों से निराश हो पत्थर में संवेदना का संचार किया
अब पत्थर हमसे बातें करता है हमारी बातें सुनता है
उसने इस अकिंचन का सहर्ष ही उद्धार किया

पसरी हुई ख़ामोशी को मन में उतार लिया
सांस लेते क्षणों को फिर से पुकार लिया
हमने खोले सब दरवाज़े सभी खिड़कियाँ
हवाओं संग आते जीवन का सत्कार किया

जीवन मुट्ठी भर रेत नहीं, है वह गगन का विस्तार!

पीड़ा का विस्तार
कितना छोटा है संसार
सत्य झांक रहा है सितारों के बीच से
चल रहा था, चल रहा है झूठ का व्यापार

नाव की पतवार
संबल है मझधार
जीवन की दुर्गम सुगम राहों पर
होती रहती है, प्रभु की महिमा साकार

जीत हो या हो हार
जगमगाता रहे सौहार्द प्यार
खुली हुई बाहों से सबका स्वागात हो
जीवन मुट्ठी भर रेत नहीं, है वह गगन का विस्तार

जुड़े रहें तार
हो जायेगी नदिया पार
भवसागर के सारे ताप झेल कर
धवल परिपक्व, हो जाएगा मन संसार

जीवन का सार
नयनों से बहती धार
हो भजन के स्वर में सराबोर
न रहे अलौकिक आनंद का पारावार

जीवन के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतज़ार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार

हलकी पतली सफ़ेद बर्फ की चादर पर चलना...!

हलकी पतली सफ़ेद बर्फ की चादर पर चलना
जीवन को ज़रा और पास से छूकर निकलना
मेरी पहले से ही नम आखों को और नमी दे गया
निरुद्देश्य टहलना उलझे भावों को धवल ज़मीं दे गया

सोच का एक सिरा पकड़ कर दूसरे बिंदु तक गयी मैं
ठोकर मिलती रही है... इनके लिए नहीं नयी मैं
रोड़े पत्थर इंसानों की शक्ल में भी राहों में मिलते हैं
और कुछ ऐसे भी जिनसे मिल मन प्राण खिलते हैं

राहों में कौन साथ चलता है यह उतना नहीं ज़रूरी
राह कहाँ ले जाती है यह बात मर्मसहित ज्ञात हो पूरी
लक्ष्य का ज्ञान हो तो राह निकल आती है
रोड़े अटकाते हैं जो उनसे कहीं बड़ी विश्वासों की पाती है

चल रही थी ठण्ड में मन हल्का करने के लिए
कुछ सफ़ेद चमकते कण बर्फ के मुट्ठी में भरने के लिए
मन में भी जम जाती ऐसी बर्फ हो जाता सब शून्य नगण्य
कितना अच्छा होता गर हो जाती पल भर को ज़िन्दगी अरण्य

जहां निष्कंटक कुछ दूर तक राह जाती
बिना विद्रूपताओं के ज़िन्दगी कुछ देर हंसती हंसाती
कुछ भोलेपन से भाव को ही महत्त्व मिलता
भाषा व्याकरण की पेचीदगियों के बीच से कोई सुमन खिलता

इंसान का इंसान होना सहज होता
गणित हर रिश्ते में प्रवेश करता हुआ कुछ असहज होता
और बेधड़क उसे अपनाने से कतराते हम
जोड़ घटाव के समीकरण हर बात में नहीं दुहराते हम

चलते हुए क्या क्या सोच रही थी
मैं थी भी और कहीं नहीं थी
आसमान का चाँद मेरे साथ चल रहा था
बादलों का एक टुकड़ा हर क्षण बदल रहा था

इसी तरह चलती हुई थक गयी तो लौट आई घर
हर पल रहता है मन में अपनों को खोने का डर
यह जीवन की विडम्बना है
अपने आप से लड़ते हुए ही जीवन भर चलना है

मेरी पहले से ही नम आखों को और नमी दे गया
उलझे भावों का आकाश अभी अभी मुझे ठोस ज़मीं दे गया
सच, अच्छा होता है...
हलकी पतली सफ़ेद बर्फ की चादर पर चलना
जीवन को ज़रा और पास से छूकर निकलना

चिर परिचिता लेखनी!

जीवन का खेल ही निराला है...
विरोधाभासों से लबालब भरा प्याला है...
चलो कैसे चलते हो, देखूं तो तेरा धैर्य
हर कदम नियति ने प्रश्नों को ही उछाला है...

हम जीवन का जाना देख रहे हैं...
हर क्षण विकटताओं का आना देख रहे हैं...
संबल केवल इतना ही, इन सबके बीच
हम प्रभु का मुस्कुराना भी देख रहे हैं...

मानस की उत्प्रीड़क यात्राओं से उत्पन्न दुहिता...
कविता रही सदा संग यह मेरी जीवन सरिता...
कलम की नोख न सूखे, चलता रहे भाव प्रवाह
लेखनी बनी रहे यूँ ही मेरी चिर परिचिता...

श्वेत छंद सुमधुर गाती रहे मन की रागिनी...
सुख दुःख की आवाजाही में आस रहे सहभागिनी...
जीत लेंगे हर मुश्किल, आस-विश्वास के अनूठे हथियार से
वाणी और विनायक की कृपा रहे... आशीष दें सिंहवाहिनी!!!

ऐ जिंदगी!

शांति...
मन की शांति जो अवरुद्ध हो तो
इंसान बड़ा निरीह हो जाता है...
अकारण पीड़ा झेलता है
बेवजह ही आंसू बहाता है...

बहती धाराओं में कुछ शांति के कण
मिल गए हैं
हम बेचैन हैं पर इस ऋतू में बूंदों संग
खिल गए हैं

कुछ शब्दों के साथ
खेल रहे हैं
अपने संतोष की खातिर
अपने आपसे ही बोल रहे हैं

प्रभु! क्यूँ दुनिया ऐसी है
सरलता को अपशब्द कहे जाते हैं
बिसार दी जाती हैं मर्यादाएं
रिश्ते खूंटियों पर टंग कर रह जाते हैं

सहज जुड़ाव के प्रति संदेह
बेईमानों के बीच ईमानदारी का ख़बर हो जाना
भ्रम में जीते लोगों का
हा! अचानक सुधा से जहर हो जाना

कहते हैं ऐसी ही है दुनिया
इसे दिल से न लगाना
आखिर क्यूँ इतना मुश्किल है
इंसान का इंसान बन पाना?!!

क्यूँ सच को सच कहने में
इतना डरता है नर...?
क्यूँ नैतिकताएं फिर रही है
आज होकर बेघर...?

ऐसे ही कितने प्रश्न से
घिरा हुआ है मानस
जीवन का हर मोड़ अलग,चलना है लिए हुए
हर आसन्न विपत्ति को झेलने का साहस

समाधान को निकले थे
पर प्रश्न सजाते चले गए...!
हम अपनी वैचारिक यात्राओं को
प्रश्नचिन्ह बनाते चले गए...!!

हो सके तो ऐ जिंदगी!
तू उत्तर लिखना...
आज हमें सारी क्लिष्टता छोड़
अपने सरलतम रूप में दिखना...

बस यूँ ही...!

हम राह देख रहे हैं
खुशियों! हमारे द्वार आओ
प्रगट हो कर साक्षात्
मुस्कानों के बंदरवार सजाओ

नमी बहुत देर से
अटकी पड़ी है नयनों के कोरों में
धूप बन कर खिल आओ
किसी रोज़ मेरी धरती के पोरों में

सभी बुलाते हैं तुझको
सभी को है नेह तुझसे
बस कुछ घड़ी मेरे आँगन में ठहरना
फिर चल देना अपनी राह खुद से

स्वप्न देख रहे हैं हम
तेरे आगमन का
दे दे ये मौका समय
आये यह भी मोड़ जीवन का

फिर तेरे संग कुछ कदम
चलने का एहसास सहेज लेंगे
हम भी तुम्हें अपने आँगन से
कभी न भूलने वाले पल देंगे

सृजन की सम्भावना
से ओतप्रोत
यह यात्रा ले आये कुछ उज्जवल राहें
फूटे कोई अदृश्य श्रोत

तेरी यात्रा फिर एक
ठोस पड़ाव पाए
मेरे घर से मेरी खुशियाँ
ढ़ेरों खुशियाँ लेकर जाए

आओगे न...?
खुशियों ज़रूर आना
सब अँधेरे एक एक कर
रौशन कर जाना!!!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण


एक कविता जिसे कुछ कुछ बदल कर प्रार्थना रूप में यहाँ अनुशील पर प्रस्तुत किया था... सितम्बर २०१० में, आज पुनः उसी कविता को उसके मूल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं... यह प्रार्थना लिखी गयी थी अपने प्रिय भैया की प्रेरणा से उन्ही के लिए किसी बेहद दिव्य से क्षण में... "दिव्य" इसलिए कि इस कविता को पढ़कर लिखी गयी उनकी प्रतिक्रिया ने आजतक हमें बाँध रखा है... संबल के उस अनूठे धागे से... जहां निराशा के बेहद निराश क्षणों में भी उठ कर चल पड़ने की आशा प्रज्वलित हो जाती है!
इस कविता को ढूंढ निकालना और उसके मूल रूप में यहाँ सहेज लेना आज जैसे बड़ा अनिवार्य सा लग रहा है... शायद इसलिए कि पन्ने पलटते हुए पुनः जी सकें वो सृजन के सुन्दरतम पल जब आंसुओं के बीच से इन्द्रधनुष सी कविता निकली थी... और इसी तरह उन पलों को पुनः जीते हुए अपने लिए जोड़ लें कुछ सुकून... अर्पित कर लें कुछ मौन प्रार्थनाएं श्री कृष्ण के चरणों में...!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
केवल इतनी शक्ति दो कि हम दर्द उनका समझ सकें
क्या पीड़ा... क्या दारुण व्यथा...,
वो खुलकर हमसे कह सकें!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
उनके अपनों की परिधि में मेरा भी एक नाम रहे
इतना तो करना प्रभु कि आ जाना सुदर्शन लेकर
जब अकेली गम की शाम रहे!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
ललित प्रेम और कृष्ण प्रेम में अंतर कुछ भी नहीं, ये समझा दे
मेरे भैया की सारी वेदना
मेरे भीतर आज जगा दे!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
कृष्ण का रूप ललित... फिर ललित कृष्ण क्यूँ नहीं...?
मुट्ठी में मेरे केवल पतझड़...
सावन या बसंत क्यूँ नहीं...?

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
आप कहवा रहे हो हमसे प्रभु, सुनने वाले को यह आभास हो
मेरे भैया का सारा गम
अब हमारे पास हो!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
देखना शक्ति तुम्हारी नये आयाम पाएगी
उन्हें अपनी रश्मियाँ दे दो... कीर्ति तुम्हारी इस कलयुग में
और ललित हो जायेगी!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
वो भी प्रार्थनारत हैं मेरे लिए, पर पहले तू मेरी विनती सुनना
आशीषों का हाथ हमारे सर पर हो...
हो हमारा काम उनकी राह के कांटे चुनना!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
जो अनुपम शक्ति दी... उसका उन्हें भान करा दे
जो विस्मृत हो चला है परिस्थितियों के कुचक्र में...
वो पावन ध्येय ध्यान धरा दे!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण
आत्मविश्वास की वह धारा निकले, जिससे ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो जाए
थोड़ा तो कमाल दिखा प्रभु...
ये कलयुग कबसे बैठा है तेरी दयालुता पर नज़र टिकाये!

हे! जगदीश्वर हे! कृष्ण

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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"
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