अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बात पुरानी हो गयी!

दो बूँदें गिरी आँखों से
और सारी कहानी हो गयी
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

फासले बढ़ते गए
जीवन चलता ही रहा
सूरज उदित हुआ रोज़
और रोज़ ढ़लता ही रहा

कहाँ से राहों में
इतने मोड़ आ गए
तुम मुड़ गए उन मोड़ों से
और हमें वही पुराने क्षण भा गए

उन्ही क्षणों की खातिर
कितना तरसते हैं
जब तब छाते हैं बदल
और खूब बरसते हैं

इन सब दायरों से फुर्सत पाकर
कभी घर आना
कई बातें होंगी
जितना चाहे बात बनाना

बर्फ की चट्टानें पिघल कर
बहता पानी हो गयीं
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

इस पुरानी बात को
फिर से जीना है
हमें लौट कर पीछे फिर से खुशियों को
प्याली में घोल कर पीना है

हो सके तो जल्दी लौटो
जीवन बीत रहा है
ये सामीप्य ज़रा ग्रहण के दौर में है
फासला जीत रहा है

तुम अपनी कहना
हम अपनी बात बोलेंगे
जितनी भी गांठें हैं
सब एक एक कर खोलेंगे

सबसे बड़ी बात
स्वयं को जानना है
जिस राह पर चल रहे हो
ज़रूरी उसको पहचानना है

ये अगर ज्ञात नहीं
फिर सारी सोच बेमानी हो गयी
हमने कही तुमने सुनी...
बात पुरानी हो गयी!

कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते...!

एक रोज़ उठी
बात एक मन में,
जीवन को एक जगह पर रख..
कुछ ऊपर उठकर,
हवाओं में हम रहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

अपने आप से ही
परे जाकर,
लम्बी यात्रा के बाद..
अपनी ही आत्मा संग,
कुछ देर बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

लगता है जैसे
रोज़ पुनरावृति हो रही,
आगे कहाँ बढ़ते है..
बस एक खम्भा है और बीत रही है जिंदगी,
उसी पर चढ़ते और उतरते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

बाहर भटक रहा है मन
तब.., जब विधाता ने सहेज रखे हैं,
सारे मोती अन्दर..
बाहर की यात्रा चल रही है.. चले,
कितना अच्छा होता गर भीतर भी टहलने को मचलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

सूर्योदय की बेला में
फैला चहुँ ओर है हर्ष,
उषाकाल के माधुर्य में किसने जाना..?
जीवन में अभावों का चरमोत्कर्ष,
अपने-पराये कितने आंसुओं संग हैं हम प्रतिपल बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

जीवन में छिपने-छिपाने का दस्तूर है
छिपते हैं हम औरों के गम से,
और छिपाते हैं सबसे अपने गम..
यहीं अगर शुरू हो जाए बांटने की परिपाटी,
तो सोचो, कितना हो आनंद.. फिर मिल कर हम सारे गम सहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

अंधियारी रातों का एक किनारा पकड़ कर
सुबहों की देहरी तक का सफ़र,
रोज़ आसानी से तय होता..
जीवन इतना नहीं विषम होता,
गर बीते दिनों में आस्था के मौसम न यूँ बदलते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

जो एक रिश्ता है इंसानियत का
वही अगर प्रार्थना होता.. गीत होता,
हर रूप में.. हर धूप में फिर संगीत होता..
ज़िन्दगी ख़ुशी ख़ुशी निकलती,
रोज़ मानवता के प्रतिमान न यूँ ढहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

चलो हमारे सपनों से कोई सरोकार नहीं
हमारी बातों पर ऐतबार नहीं,
पर फिर भी मेरी बातें गुननी ही होगी..
एक कविता तो आपको सुननी ही होगी
जिससे.. हम कह सकें, कोयल अमराई में गायी!
किसी ने सुनी.. और हमने कह सुनायी!!

हर हृदय की अबोली बात यही
संध्या बेला से यही अपेक्षा.. सपनों का प्रात यही
कि-
काश! बीतते न युग चुप ही चुप रहते,
जीवन को प्यार भरी दृष्टि से निरखते परखते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!

ये सार्वभौम सी सच्चाई है
हमने सुनी,
आपके भी हृदय से..
अभी-अभी यही आवाज़ आई है
तिलमिलाती धूप में छाँव को न तरसते!
अगर होते अंतस्तल में बादल, ऐसे में खूब बरसते!!

खुल जाती सारी गांठे.. भावों में बहते बहते
मिल जाते सारे उत्तर.. प्रश्नों को कहते कहते
मौन का संवाद भी खुल जाता तब
सारा दर्द बातों में घुल जाता तब
फिर होती भोर.. हम मस्त पवन सम बहते!
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते!!!

मेरे अभिन्न बने रहो...!

आजकल उदासी का मौसम है... अजीब है यह मौसम भी... कुछ निश्चित नहीं कब आएगा, कितनी अवधि रहेगा...? इस मौसम में आखें खूब बरस रही हैं... हर बारिस के बाद ज्यूँ वातावरण शांत हो जाता है, वैसे ही मुसलाधार बरसती हैं आँखें और फिर सारा उथल-पुथल शांत हो जाता है; फिर एक नयी पृष्ठभूमि तैयार होती है... और आँखें पुनः बरसने लगती हैं! ऐसा नहीं है कि इससे कोई परेशानी है... लेकिन कुछ अवकाश अवश्य चाहते है इन आंसुओं से...!
आंसुओं! अभी जाओ... कुछ घड़ी बाद आना... तनिक हम सुस्ता लें, फिर तुम्हें सजा लेंगे आँखों में... बरसना तब जितना जी चाहे! कविता से भिन्न तो तुम भी नहीं न... कविता ही तो हो... पीड़ा की सेज पर मग्न सोते हो और हमारी ऊँगली थाम हमें भी संग लिए हुए हो...! थोड़ी देर के लिए धूप सेंकने दो... फिर आना, जम कर बरसना पर अभी अकेला छोड़ दो! ये हर क्षण तुम्हारा साथ होना हमें असहज कर रहा है इधर... कहीं भी कभी भी चले आते हो... और बहती बूंदों को छुपाने के हमारे सारे उपक्रम असफल हो कर रह जाते हैं...
लेकिन तुम जाओगे भी कहाँ... मेरे पास ही तो मन लगता है तुम्हें और हम भी तो हंसती हुई ओस की बूंदों से तुम्हारी तुलना करते नहीं अघाते हैं... सो, रहो यहीं... मेरे ही पास... और बरसते रहो...! हे आंसुओं! मन प्राण अंतर सब सिक्त किये हुए मेरे अभिन्न बने रहो...

आंसू का आना
बरस जाना
हमें अभिभूत किये हुए है!

हर क्षण
कितने अनुभवी कण
आंसू सदेह जिए हुए है!

इन आंसुओं को बहने दो
संग मेरे ही रहने दो
जीवन को ये अर्थ दिए हुए है!

भीगे नयनों का पारावार
हर वक़्त सजा है बंदनवार
आ जाओ जब जी चाहे
तेरे लिए प्रतिपल
स्वागत में बाहें फैलाये हुए हैं!

आकर हृदय से लग जाओ
सूर्योदय की बेला है...
अब जग जाओ
आँचल में हम
अनंत किरणें सजाये हुए हैं!

आंसू और हंसी के बीच
क्या चुनना?
दोनों ही विम्ब
एक...
ज़रा गुनना...!

रोते रोते हँसना
और हँसते हँसते रोने में
हम शाम से ही अपने भीतर
एक सुबह बोये हुए हैं!
हम हँसते हँसते खूब रोये हुए हैं!!!

दुःख सुख!

बहुत बड़े सुख भी नहीं होते
और न ही
होता है
कोई पहाड़ सम दुःख
जो हमेशा के लिए
तोड़ डाले मन को

छोटे छोटे सुख ज्यूँ
मन को विभोर कर देते हैं
वैसे ही
छोटे छोटे दुःख भी
विचलित कर देते हैं हिय को
मगर केवल कुछ क्षण के लिए

कितने ही दुःख
हो सकते हैं
छोटे-बड़े अनुपातों में
जीवन
कितना कुछ सहता है
हर क्षण के आघातों में

दुःख कविता के खो जाने का
सबकुछ होते हुए भी
अकेला रह जाने का
दुःख स्वयं को व्यक्त न कर पाने का
दुःख घर न लौट पाने का
दुःख आने और जाने का

अब ये कौन निर्णय करेगा
ये दुःख छोटे हैं या बड़े...
राहों में कितने ही प्रश्न हैं खड़े
इस भवसागर में गम ही गम हैं केवल
सुख के भ्रम में
काहे मन रे तू पड़े

दुःख हर हृदय का मीत है
तनिक या ज्यादा दुःख की सबसे प्रीत है
बस अब करना यह है-
दुःख को उर्जा की ओर मोड़ना है
जीवन अध्याय समाप्त हो
उससे पहले नाम जप यज्ञ से मन प्राण जोड़ना है

कलयुग को मिला वरदान है यह
नाम संकीर्तन तार देगा
दुःख की शामों को ईश स्मरण संवार देगा
फिर दुःख ही सुख हो जाएगा
जीवन जब परमलक्ष्य को सम्मुख पायेगा!!!!

मरा-मरा कहते कहते... राम उच्चरित हो जाएगा!

जिस तरह कपड़े बुन लेता है
बड़ी महीनता से अनमोल सफल
वैसे रिश्ते नहीं बुने जाते
यहाँ नहीं होतीं राहें समतल

जुलाहे का हुनर
बुनता है सपनीले सुन्दर वस्त्र
इंसानी रिश्ते बुनने का
न कोई सिद्धांत न कोई अस्त्र

ये तरकीब क्या सिखलाएगा कोई जुलाहा
वो रिश्ते कहाँ बुनता है
पूछो दिल से अपने
ये दिल ही है जो विश्व वेदना की रागिनी सुनता है

झांको भीतर... सब जानता है मन
गांठें कैसे खुलती हैं
कुछ भ्रम हो तो हमसे जानो
संवेदनाओं की ज़िंदगियाँ मिलती जुलती हैं

हर रिश्ता जो बुन रहे हो
वो ईश्वर तक ले जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

जिस तरह से गीत बन जाते हैं
और कर जाते हैं नयन सजल
वैसे प्रार्थनाएं नहीं कही जातीं
यहाँ चाहिए ज़रा और हृदय विकल

गीतकार का हुनर
रचता है सुन्दर स्वर
प्रार्थनाएं नहीं रची जातीं मात्र हुनर से
यहाँ चाहिए कुछ और सच्चे पहर

ये तरकीब कोई सीखा नहीं सकता
क्यूंकि प्रार्थना में स्वर कहाँ होते हैं
हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठी चेतना के
मौन में संवाद छुपे होते हैं

हर सांस जब डूबकर
नाम उसका गाती है
ज़िन्दगी स्वार्थ के कारागार से
आज़ाद हुई जाती है

ऐसे में जीवन उद्देश्य ही
अभिराम बन जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

प्रार्थना जैसा ही निर्मल जो हर रिश्ता हो
तो जीवन ही एक यज्ञ होगा
होम होगा अहंकार
मूढ़ता तज हर इंसान विज्ञ होगा

मन की आखें खोल ज्यूँ
पूजा में शीश नवाते हैं
प्रार्थना के क्षणों में हम
बच्चों से भोले बन जाते हैं

यही आचरण जब जगत व्यवहार बन जाएगा
जीवन की कथा कुछ और होगी
अभी यूँ ही कट रहा है वक़्त
तब साँसों की निश्चित ठौर होगी

कोई बात निरुद्देश्य न कही जायेगी
पहचान सबकी होगी अनमोल
तब जियेंगे सब बन्दे
मन की सारी गिरहें खोल

प्रार्थना के क्षण जी लो
संकुचित मन की सीमाओं का विस्तार हो जाएगा
मरा-मरा कहते कहते
राम उच्चरित हो जाएगा!

बहुत दिन हुए...!

आज यूँ ही बैठे सोच रहे थे और यह एहसास हुआ कि कई महिनों से हम कुछ भूल रहे हैं... हम भूल रहे हैं कवितायेँ लिखना जो नियमतः हर पच्चीस तारिख को पतिपरमेश्वर :) सुशील जी को उपहारस्वरूप देते आये हैं... ये यूँ ही शुरू हुआ था... परिचय की शुरूआती बेला में उन कविताओं का एक अंतराल पर लिखा जाना और सौम्य सुशील सी मुस्कान का पारितोषिक उन कविताओं को मिलना बहुत सुखद एहसास थे...! कविता क्या क्या नहीं जोड़ देती... अनजान जुदा लोग हमराह बन जाते हैं... यही तो है जिंदगी और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का मूल आधार! २००८ नवम्बर में विदा हुए थे अपने घर से, साथ मेरे... मेरी कवितायेँ भी हो चली थीं... भूली बिसरी सी ही सही पर वे साथ थीं... और शब्दों से खेलने वाला यह अकिंचन उपहार भी देगा तो कविता का ही न... सो 'उन्हें' भी मिलती रहीं कवितायेँ... आज पन्ने पलटते हुए महसूस हुआ कि कितने ही पच्चीस तारीखों की कवितायेँ है ही नहीं... लिखी ही नहीं गयीं... क्यूँ? यही सब सोचते हुए आज हमने यह लिखा अपने उत्तर तराशते हुए... वो उत्तर जो हमें अपने आप को ही देने थे...! समय के साथ हृदय की आस्थाओं के परिवर्तित होने को स्वीकृति मिलना तो कहीं से मान्य नहीं है... परिवर्तन की लहर के बीच श्रद्धा विश्वास के पुष्प को तो बचाया ही जाना चाहिए निश्चित तौर पर... और ये लिखी जाने वाली कवितायेँ... प्रेम, श्रद्धा और विश्वास ही तो थे... उन्हें चलते रहना चाहिए जीवन यात्रा के साथ... कदम-कदम पर कदम-कदम को संबल देते हुए... तो, आज इस पच्चीस को इस अनुपम यात्रा में "अनुशील" पर प्रस्तुत है यह कविता:-


बहुत दिन हुए...
कुछ लिखा नहीं कागज़ पर
ज्यों,
शुरू में हर महीने
नियम से लिखा करते थे
हर पच्चीस तारीख़ को
मानों समेट रहे हों हम
चुपके से
टप-टप गिरती बूंदों का गान!
साथ गुजारे वक़्त की दास्तान!!

बहुत दिन हुए...
कुछ लिखा नहीं कागज़ पर
क्यों?
क्योंकि, शायद
आते जाते पलों में
बहुत कुछ है सहेजने को
कैसे सिमटती शब्दों में इतनी कोमलता
तभी तो,
मौन ही है एहसासों की पहचान!
साथ गुजारे वक़्त की दास्तान!!

बहुत दिन हुए...
कुछ लिखा नहीं कागज़ पर
ज्यों,
लिखते थे आपके लिए
पर देखिये हर क्षण हमारे बीच
कविता जैसा ही तो कुछ रच रहा है
धीरे धीरे सहज रूप से
एकाकार हो रहे हम हर पल
गा रहा हमारे बीच का सुनसान!
साथ गुजारे वक़्त की दास्तान!!

बहुत दिन हुए...
कुछ लिखा नहीं कागज़ पर
क्यों?
क्योंकि, हृदय
आकंठ डूबा हुआ प्रेम में
चुन रहा है अनछुए विम्ब
गढ़ी जा सके जिनसे, बिलकुल वैसी न भी तो
कुछ-कुछ
उस जैसी ही प्रीत का प्रतिमान!
साथ गुजारे वक़्त की दास्तान!!

धीरता की प्रतिमूर्ति को मेरा मौन प्रणाम!


"कोई भी आता नहीं यहाँ

बस भूले-भटकों की ही आगत है

अब आप आये हैं तो आईये

मेरी मन मरुस्थली में

आपका स्वागत है!"


मन मरुस्थली कविता की ये अंतिम पंक्तियाँ... और अपनी भावाभिव्यक्ति को जोड़ कर ये भी सहेज ही लें... आज यहाँ अनुशील पर...! अब ये तो यात्रा है न... जो भाव आते जाएँ उन्हें अंकित होते जाना चाहिए. पन्ने पलटे जो यादों के तो बहुत कुछ संजोया मिला वहाँ... आज यहाँ भी लिख जाएँ... यात्रा में सुरक्षित हो जायेंगे ये अनमोल लम्हे भी. 

मन मरुस्थली की अंतिम चार पंक्तियाँ पढ़कर हम प्रवेश करने जा रहे थे आपके हृदय क्षेत्र में... कि तभी आपने टोका था..(याद है?) आपके शब्द कंठस्थ हैं हमें आज भी... आपने कहा था- "तुम्हारा स्वागत हर जगह है लेकिन मरुस्थल में नहीं... I don't want you to face the troubles of desert. You are to be part of the garden of my most beautiful moments." कविता की अंतिम पंक्तियों में हर आगत का स्वागत किया और हमें "ना" कह दिया... ये तो अच्छी बात नहीं! खैर, उन क्षणों में जो कविता लिखी गयी थी... आज प्रस्तुत है : :


तेरी मन मरुस्थली

तेरा हृदयधाम

दोनों को मेरा चरणस्पर्श प्रणाम!


हम भी

मरुस्थल की

कुछ सच्चाईयां जीते हैं,

जीवन की राह में

कितने ही भावपात्र हैं

जो बिलकुल ही रीते हैं!


दो न दो... बाँटो न बाँटों...

कुछ रजकण तेरी पीड़ा के

हैं मेरे भी नाम,

उनसे तो

अनायास ही हो गयी

अब मेरी पहचान!


अब ये दुराव क्यूँ हो भाई

रिश्तों के जंगल में हम सब खाली पाँव होते हैं,

यहाँ नहीं काम आती चतुराई!


इसलिए

चाहे वह सुन्दर भावों का बाग़ हो

या हो तपता हुआ रेगिस्तान,

यत्र, तत्र, सर्वत्र...

हमारी चेतना

परस्पर एक दूसरे की बाँहें सके थाम!


शब्दों की क्या बिसात

उनका यहाँ क्या काम?

धीरता की प्रतिमूर्ति को मेरा मौन प्रणाम!

स्वप्न से वास्तविकता तक का सफ़र!

स्वप्न से
वास्तविकता तक के
सफ़र के
बीच की कड़ी,
किरण और
अंधकार के मध्य
है बड़ी ही
सूक्ष्म सी
दिवार खड़ी!

कभी हंसने लगती है
स्नेहिल किरण
और
कभी अन्धकार
डंसने लगता है,
जीवन
सामान्य चल रहा होता है
और फिर एक ही
झटके में फंसने लगता है!

ये क्यूँ
इतने घुमावदार रस्ते हैं
क्यूँ हर कदम
एक नया आश्चर्य है,
अगले ही पल की
भावदशा का ज्ञान नहीं
सुख दुःख का लगता
बड़ा गहरा साहचर्य है!

हम मन के संकट
मन में समेटे
आंसू और हंसी की
गठजोड़ से परेशान हैं,
ये अंधेरों की फौज़
कब तक करेगी मौज
कहाँ गए... कबसे ही
छुपे हुए दिनमान हैं!

आँखों से
बहती है जलधारा...
प्रेमाश्रु
बहते जाते हैं,
जीवन की पगडंडियों पर
हौसलों के साथ
चले
वो पग याद आते हैं!

फिर उमड़ता है
सकल संताप
हर लेने का
पावन संकल्प,
ऐसा क्यूँ होता है कि कभी कभी
सारे दांव अपने पास रख लेती है
नियति हमें
नहीं देती कोई विकल्प!

निराश हताश
भटक रहे थे
यूँ ही
कविताओं में,
ढूंढ रहे थे
आंसुओं का ही कोई सगा
कल-कल बहती
सरिताओं में!

तभी,
अपने विराम की तरफ
बढ़ती कविता ने
स्वयं अपना अंत सुझाया...
मेरी आँखें पोंछी
और
रहस्य
कुछ यूँ समझाया-

धीरज धर
चलने दे जो है क्रम
इसी बीच
स्मृति के गलियारे से निकल
कोई स्वप्न अभिराम बन जायेगा...,
स्वप्न से
वास्तविकता तक के सफ़र को
फिर
विराम मिल जायेगा!!!

सूरज उगता नहीं यहाँ आजकल...

सूरज
उगता नहीं यहाँ आजकल
हृदयक्षितिज पर सूरज उगा रहे हैं
कुछ कवितायेँ अधूरी हैं...
आजकल
उनके बोल हमें जगा रहे हैं!

हँसना
हुआ नहीं कई दिनों से
आसमान संग बूंदों की झड़ी लगा रहे हैं
भींगने भिंगाने की सम्भावना पूरी है...
आजकल
हम भावभूमि पर सपने उगा रहे हैं!

अवकाश
है भी और नहीं भी
इन्हीं सबके बीच अमिट अक्षर सजा रहे हैं
सोच और सृजन के बीच लम्बी दूरी है...
वेदना का संगीत
हम मन वीणा पर बजा रहे हैं!

मौसम
बदलता है और बदलेगा
बिगड़े समीकरणों के बावजूद आस लगा रहे हैं
उम्मीद कायम रहे जीवन के लिए ज़रूरी है...
छाये अन्धकार को
हम पूरे मनोयोग से भगा रहे हैं!

सूरज
उगता नहीं यहाँ आजकल
हृदयक्षितिज पर सूरज उगा रहे हैं
कुछ कवितायेँ अधूरी हैं...
आजकल
उनके बोल हमें जगा रहे हैं!

कथ्य आपका... कलम मेरी!

तब हम नहीं जानते थे आपको...जब "स्वप्न से स्मृति तक" पर बैसाखियों से बड़ी ज़िन्दगी पहली बार पढ़ी थी... आपके इस कथ्य (यह रचना बहुत छोटी-सी और साधारण-सी है लेकिन इसकी हर पंक्ति मेरे जीवन का कोई ना कोई पहलू उजागर करती है। हर पंक्ति अपने आप में एक पूरी कहानी कहती है। केवल समझ सकने वाला एक संवेदनशील हृदय चाहिये। यहाँ जिन बैसाखियों की बात हो रही है वे सांकेतिक बैसाखियाँ (metaphoric) नहीं हैं बल्कि मेरी असली बैसाखियाँ हैं जो मेरे जीवन का हिस्सा हैं।) से मन बहुत दुखी हुआ था... यह मानने को तैयार ही नहीं था कि कविता में प्रयुक्त बैसाखी प्रतीकात्मक नहीं है... आज भी हम यही मानना चाहते हैं कि वे प्रतीकात्मक ही हैं... तब एक कविता लिखी थी अपनी तसल्ली के लिए... बैसाखी को प्रमाण सहित प्रतीकात्मक सिद्ध करने के लिए...


मेरे
हाथों में
जो बैसाखियाँ हैं...
उनका वजूद
केवल मेरी बाह्य परिस्थितियों का
चित्र खींचता है!
मेरी दृढ़ अन्तःस्थिति को
देख सको तो देखो
कितनी ही मंजिलों से आगे बढ़
शाश्वत भाव ही
अन्तःस्तल सींचता है!!

सांसारिक मापदंड
जो भी हो,
क्या आँक पायेंगे वो मुझे...
जगत का मिथ्या दर्प ही
जिन्हें प्रतिपल खींचता है!
मैं पर्वत सा अटल खड़ा हूँ
धारा सा निश्छल बहता हूँ
समस्यायों का पानी ही
निर्झर बन
मेरी धरती का हिय सींचता है!!

अकेला हूँ...
हमराही भी होगा साथ एक दिन
जिसे जीवन का साझा ध्येय
अनायास ही
मुझ अकिंचन तक खींचता है!
वो है कहीं
जिसके इंतज़ार में
हृदय मेरा
सपनों को
आंसुओं से सींचता है!!

अनगिनत क़दमों से मैं ही चलता हूँ...
ये मैं ही गति बन
कितनी ही रगों में दौड़ रहा हूँ
विशेष वरदान है प्राप्त मुझे
श्रेष्ठतम ही मुझे अपनी ओर खींचता है!
श्रेष्ठता के प्रतिमान गढ़ता हुआ
निकल जाऊँगा आगे
बैसाखियाँ प्रतीकात्मक ही रह जायेंगी
ये दैवीय हौसला है
जो मेरे उड़ानों को सींचता है!!

मेरे हाथों में
जो बैसाखियाँ हैं...
उनका वजूद
केवल मेरी बाह्य परिस्थितियों का
चित्र खींचता है!
मेरी दृढ़ अन्तःस्थिति को
देख सको तो देखो
कितनी ही मंजिलों से आगे बढ़
शाश्वत भाव ही
अन्तःस्तल सींचता है!!

अनवरत चलती हैं राहें..!

टेढ़े मेढ़े जीवनपथ पर
नियति
है थामे सबकी बाहें..
संध्या और सवेरे के
आवागमन से बेखबर
अनवरत चलती हैं राहें..!

मन उदास है
जाने कहाँ खोया है
अब वजह कैसे थाहें..
पीले पत्ते पतझड़ के
और उनके हृदय में
शाश्वत हरेपन की चाहें..!

धूप छांव के खेल में
आस की ज्योति
है थामे सबकी बाहें..
संध्या और सवेरे के
आवागमन से बेखबर
अनवरत चलती हैं राहें..!

धारा बहती ही जाती है!

खिलते फूलों की
मुस्कान
हर रोज़
ढ़लती हुई शाम
हमें साथ होने का
मर्म बताती है,
नम आँखों को भी
क्या खूब हँसाती है!

आस्था से सिंचित
मन प्राण
हृदय मंदिर में
जो है धाम
लौ के हौसले की
गाथा गाती है,
हमे आबद्ध करती हुई
धारा बहती ही जाती है!

ये धारा
निर्विघ्न बहे
सबको
अपना सगा कहे
ऐसे भाव किनारों पर
जब संध्या दीप जलाती है,
कोई अनुपम सी बात
लेखनी की शोभा बन जाती है!

कहने का आभास मात्र है
हमने नहीं हैं छन्द कहे
वो जो सर्वव्याप्त है
सबपर उसकी कृपा रहे
सभी बात तर्क से
हल कहाँ हो पाती है,
शाश्वत वही छन्द
श्रद्धा की रागिनी जिन्हें गूँथ-गूँथ कर गाती है!

हम भी कवि नहीं हैं...!

स्वप्न से स्मृति तक पर एक कथन है आपका... "कविता मेरी अभिव्यक्ति है... लेकिन मैं कवि नहीं हूँ", इसी कथन ने लिखवाई थी हमसे यह कविता...!
कविता क्या होती है... कवि किसे कहते हैं... ये सब बड़े बड़े विषय हैं... हम केवल इतना जानते हैं कि जीवन को निष्ठा से जीना ही कविता है... कविता को जीना, कविता लिखे जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कर्म है...! कविता को जीना और फिर उनका लिखा जाना ही रचनाशीलता के आयाम होने चाहिए और जितनी कवितायेँ हमने पढ़ीं
स्वप्न से स्मृति तक पर... सबने ही स्पष्ट किया कि भोगा हुआ यथार्थ लिखा गया है... इसलिए लिखनेवाला कवि ही है... और उसके मुखारविंद से निकलने वाली हर बात ही कविता है...!
हो सकता है यह सब आपके प्रति हमारा स्नेहातिरेक बोल रहा हो... लेकिन इन बातों को असत्य भी तो नहीं कहा जा सकता... है न?


क्या कहें हम... इस कथ्य के बाद
चले हैं बहुत हम भी...
पर हमें नहीं यात्रा का कोई ऐसा विम्ब याद
जो स्वयं पर्याय उजाला हो
जो ललित सा उज्जवल हो निराला हो

अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा छू आते हो
और फिर भी खुद को कवि नहीं बताते हो
क्या देगी कोई कविता वो एहसास
जो तुम अनायास कह जाते हो

बाँटो न बाँटो... देखना
हम तुम्हारा मौन भी पहचान लेंगे
तुम भी हमें "सत्य" जानोगे
और हम अपने सबसे अपनों में तुम्हारा नाम लेंगे

"हे! जगदीश्वर... हे! कृष्ण"
वाली प्रार्थना नहीं है झूठ
तुम्हारा हाथ है हमारे सर पर
कविता अब हमसे कैसे सकती है रूठ?

हम भी कवि नहीं हैं
पर रेगिस्तान में जल की आस जगाते हैं!
वो सच है... सुन्दर है... वो भोग हुआ यथार्थ है-
अपने भैया की कविता को
हम यूँ ही नहीं सबसे बड़ा बताते हैं!!

चाँद ने कहा...!

चाँद को भेदते रहे
कमान से निकले तीर
धरती पर फैली विषमताओं से द्रवित हो
भर आये उसकी आखों में नीर

तीर पर तीर चलाता रहा ज़माना
पर क्षितीज पार नियमतः उसका आना
बड़ी सूक्ष्मता से कह गया-

जब तक लेखनी की आत्मा जिन्दा है
तब तक निशाना बनने को तैयार हूँ!
घोर अंधकार में भी जो अपना वजूद मिटने नहीं देती-
आखिर मैं उस चांदनी का यार हूँ!!

हृदय की पुकार!

जमीं ही नहीं
अंतस्तल भी
भिगो जाए
हृदय की पुकार है
नभ में अब तो
ऐसी बदरी छाए

कितने ही
बनावटीपन से
गुजर रहा है यह दौर
कुछ तो मौलिक हो
अब कुछ सरल आकर्षण
हमे लुभाए

जीवन की
आपा-धापी में
अवकाश नहीं मिलने वाला
व्यस्तता के
इन क्षणों में मन
कोई गीत पुराना गाए

नया भी
वहीं से सृजित होगा
बादलों के बीच से
सूर्य उदित होगा
जीवन में अब तो
प्रकाश झिलमिलाए

शिकायतों से
भरी पड़ी है
दुनिया सारी
सार यही
जो है
उसमें ही मोद मनाए

जमीं ही नहीं
अंतस्तल भी
भिगो जाए
हृदय की पुकार है
नभ में अब तो
ऐसी बदरी छाए

क्या यहाँ तेरा...क्या यहाँ मेरा!

जिंदगी
देख रही है

सांझ सवेरा

कितने ही
आते जाते
लम्हों का घेरा
सबकुछ होना
पल में ओझल
क्या यहाँ तेरा...
क्या यहाँ मेरा!

खेल
चल रहा है
हर क्षण अद्भुत
सुख दुःख की
आवाजाही का
है लगा हुआ फेरा
निरंतर
बदलता परिदृश्य है
क्या यहाँ तेरा...
क्या यहाँ मेरा!

चुप
बैठी थी
एकाकीपन की चिड़ियाँ
हमने
कुछ स्मृतियों का दाना
दे बिखेरा
स्मृतियाँ ही तो
रह जाती हैं
क्या यहाँ तेरा...
क्या यहाँ मेरा!

कुछ
भाव तरंगें
हैं बुनी हुई
जैसे हो
गगन पर
इन्द्रधनुष उकेरा
सौंदर्य बस यह
पल भर का
क्या यहाँ तेरा...
क्या यहाँ मेरा!

ऐसे ही
बरसता है
बादल घनेरा
धरा पर
डाले
बूंदों का डेरा
परिवर्तित होता है
नित स्वरुप
क्या यहाँ तेरा...
क्या यहाँ मेरा!

भ्रम का ही साम्राज्य है!

साथ है
चोली दामन सा
जीवन और साँसें
अविभाज्य हैं
एक सत्य है इंसानियत
इसके आगे
सारे तर्क वितर्क
त्याज्य हैं!

विधाता ने
कोई भेद न किया
फिर क्यूँ यहाँ
बाँटने की ही परिपाटी है
अलग अलग क्यारी में
फूल खिले हैं
पर जो सींचती है उन्हें
वो तो एक ही माटी है!

निजी स्वार्थों के
वशीभूत हो
यहाँ समस्त नियम
बनाये जाते हैं
समष्टि की बात
नहीं करता कोई
अपने अपने सुरों में
सभी अपना गीत गाते हैं!

हो रही है प्रगति
लेकिन वृहद रूप में
भ्रम का ही
साम्राज्य है
एक सत्य है इंसानियत
इसके आगे
सारे तर्क वितर्क
त्याज्य हैं!

डूबता सूर्य!

वह
हर दृष्टि से
पूज्य है
चाहे
सूरज ऊग रहा हो
या डूब रहा हो!


वर्तमान का ही
महत्व है
बीता कल
चाहे
कितना भी
खूब रहा हो!


अपने हरेपन के लिए
फिर भी
पहचाना जायेगा
भले वो एक
नन्हा सा
दूब रहा हो!


वह
हर दृष्टि से
पूज्य है
चाहे
सूरज ऊग रहा हो
या डूब रहा हो!
***
आज इस पुरानी रचना को यूँ मिला आशीर्वचन तो कहीं क्षितिज पर कोई नया सूरज खिल उठा...!
" भारत एक ऐसा देश है, जो इस मुहावरे को गलत साबित करता है, की उगते सूरज को ही प्रणाम किया जाता है... हमारे यहाँ पहले डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं, ततपश्चात उगते हुए सूर्य को...
मानव स्वार्थ से मानव वृत मे पीछे पीछे चलता है, और विलुप्त होता है... सूर्य अकेला जलता है, सृष्टि के निमित, सो पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है... ... ... !! " ~ SC ~
इस अप्रतिम उद्गार के लिए आभार सुरेश जी!

बरस रही हैं स्नेहिल बूंदें..!

हंसती हुई सी
आँसुओं की..
या शायद
ओस की बूंदें..
कविता लिख गयी बस
हम तो केवल
कुछ सोच रहे थे
आँखें मूंदे..

भावनाएं उमड़ आयीं
कागज़ पे..
कुछ बादल से शब्द
सिमट आये मेरे आँचल में..
अब इन बादलों से शब्द के पीछे से
अर्थ का सूरज तभी निकलेगा
जब औरों के दुःख से रोये मन
और गला भी रुंधे..

अपनी खुशियों की खातिर
चलते है हम..
जरा कुछ देर
औरों की खुशियाँ तराशते जागें..
संवेदना जो जग जाये तो
उज्जवल
सवेरा ही सवेरा है
उस एक भाव के आगे..

अपना दुःख
तिरोहित हो जाता है..
अपनी वेदना
मन भूल जाता है..
दुःख सुख बस
क्षणिक स्थितियां हैं मन की
डूबता है रोज़ तो क्या
पर हर रोज़ सूरज
ऊग भी तो आता है..

कुछ विस्तार हो
पल रहे सपने साकार हों..
यूँ सिमटे हुए
नहीं चलता है जीवन..
ये जागने की बेला है
जागें और जगाएं
संभावनाएं नित ले रही हैं जन्म
बरस रही हैं स्नेहिल बूंदें..

हंसती हुई सी
आँसुओं की..
या शायद
ओस की बूंदें..
कविता लिख गयी बस
हम तो केवल
कुछ सोच रहे थे
आँखें मूंदे..

उजागर कर दे सारे सत्य... ऐसी एक सूक्ति चाहिए!

सारा हलाहल पी
वो नीलकंठ कहलाये
फिर यहाँ हर कोई हृदय में
विष संजोने का हठ क्यूँ करता जाये
पी हलाहल त्राण दे मनुष्यता को
ऐसी पावन शक्ति चाहिए!
सुधा ही वितरित करें जनों में
ऐसी अनूठी भक्ति चाहिए!

दानवता और देवत्व में
संघर्ष सनातन होता आये
मन में ही तो बसते दोनों
हम चाहें तो निश्चित समाधान हो जाये
आसुरी प्रवृत्तियों को जीतने की
सच्ची सफल युक्ति चाहिए!
उजागर कर दे सारे सत्य
ऐसी एक सूक्ति चाहिए!

अविरल गंगा भावों की
मतभिन्नता के चट्टानों से जो टकराये
राहों की विडम्बनाओं से आहत
राही का विवेक हर क्षण भरमाता ही जाये
ऐसे में सुन्दर समाधान बने जो
ऐसी पावन शक्ति चाहिए!
सुधा ही वितरित करें जनों में
ऐसी अनूठी भक्ति चाहिए!

" नाता " की यात्रा...

आज १९ तारीख है... नाता को छपे हुए पूरे बारह वर्ष बीत गए... बारह वर्ष पुरानी वह कविता है... तो उतनी ही पुरानी हमारी पहचान भी है... है न, राकेश भैया?
१९ दिसम्बर १९९९ को प्रभात खबर में नाता का छपना कोई विशेष बात नहीं थी... लेकिन बाद के घटनाक्रम कुछ ऐसे थे कि यह तिथि हमें याद रह गयी... हमारे यहाँ हिन्दुस्तान और रांची एक्सप्रेस आता था तब... इसलिए छपी कविता का ज्ञान तब हुआ जब पापा को कॉलेज में किसी ने बताया... कॉलेज के पुस्तकालय से ही पापा पेपर लाये थे कुछ दिनों के बाद! हमने अपनी कविता के साथ अन्य कविताओं को भी सहेज कर रखा था... लेकिन आज वो मेरे पास नहीं है...! किसी ने एक रेल यात्रा में रात भर हमसे खूब बातें की... कवितायेँ सुनी... अपनी बातें सुनाई... हम दोनों बहनों को बनारस उतरना था... और उसे कानपुर तक जाना था..., हम लोग जमशेदपुर से चले थे और वह खड़गपुर से! अलग अलग जगहों से चले थे... अलग अलग जगह के लिए लेकिन यात्रा भर साथ हो लिए... आज भी याद है, हमलोग जब बनारस में उतरे तब उसकी आखें भीगी थीं... जाने क्यूँ! शायद, उस छोटी सी कविता की वह एकमात्र प्रति हमने उसे दे दी थी इसलिए...! फिर कभी उस नेक बच्चे से न भेट हुई न बात... २००४ बहुत पुरानी बात नहीं है... लेकिन उस ज़माने में फ़ोन मोबाइल इन्टरनेट जैसी संपर्क सुविधाएं इतनी प्रचलित जो नहीं थी...! नाम उसका शायद आज याद नहीं हमें... लेकिन उसकी हर बात याद है... हम दोनों बहनों को साथ देख कर... और हम दोनों से इतनी सारी बातें कर के वह इतना ही बोला था... आपलोग कितने लकी हो... मैं अकेला हूँ... मेरे कोई भाई बहन नहीं हैं... मित्र कानपुर में पढ़ रहे हैं इसलिए कानपुर में ही पढ़ रहा हूँ... वरना खड़गपुर में ही पढ़ सकता था..., और भी बहुत सारी बातें... !
खैर, हम आज बस नाता की यात्रा के बारे में सोच रहे थे और अभिभूत हो रहे थे कि कितने नाते रचती गयी वह एक कविता मेरे लिए! छपना बड़ी बात नहीं थी, बड़ी बात है 'रिश्ते' जो बुन गयी कविता... कविता तो आज हमें कुछ ठीक ठीक याद भी नहीं... अनुशील पर भूली बिसरी कविताओं को सहेजते हुए कभी उसे भी लिखा है पिछले पन्नों में कहीं...!
वो रिश्ता जो लिखने वाले और पाठकों के बीच होता है... कौन बड़ा है ये बात कोई नहीं जान सकता... लिखने वाले के शब्द या सुनने वाले की ग्राह्यता... इसीलिए तो कविता को ईश्वरीय वरदान कहा जाता है... या तो होती है या नहीं होती... अभ्यास से गणित मज़बूत हो सकता है... कविता नहीं... कविता तो होती है... या फिर नहीं होती! ये पढ़ने वाले की महानता है कि वह लिखनेवाले को विशिष्ट होने का गौरव प्रदान करता है... और जो विशिष्ट होने का गौरव प्रदान करे उससे श्रेष्ठ भला कौन? नाता के बारे में बात करते हुए जाने क्या क्या बोले जा रहे हैं... यह कोई व्यवस्थित लेख नहीं है... यादें हैं... यात्रा है, और भई! यात्रा तो ऐसे ही होती है... अव्यवस्थित... बहते पानी की तरह निर्मल...!!! पढ़ रहें हैं अगर आप तो इसे बस भावुक बहाव की तरह ही लेना... कविता के विषय में कोई टिका टिपण्णी नहीं है यह... मेरे आंसू हैं और आंसू से मर्यादा की कैसी उम्मीद, वो तो बह आते हैं बस कहीं भी कभी भी... हंसी बनावटी हो सकती है, आंसू बनावटी नहीं होते! कविता के बारे में बात करने की न तो हमें समझ है, न औकात ही... हम तो भाव लिखते हैं... एक भावुक इंसान है बस... कुछ एक प्रेरणाएं रही हैं, कि शब्द से खेलते रहे... अपनी तोतली बोली से कुछ भी कहते रहे बस...! कविता मेरी झोली में आ गिरी कहीं से... बस मेरे आँचल में जो सिमटा वह यहाँ बिखेर दिया, अच्छा बुरा जो भी है... जिसने लिखवाया उसका.. हमें क्या, हमने तो बस लिखा... महत्व तो लिखवाने वाले का है न? ओह! आंसू भी न, क्या क्या कहलवाए चले जाते हैं... !
खैर, वह कविता भी लिखते चलें जो हमें इसलिए प्रिय है क्यूंकि जो रिश्ते इस कविता की वजह से जुड़े, वे हमें प्रिय हैं... सारे छोटे बड़े रास्ते ज्यूँ अंतिम सत्य तक ले जाते हैं, वैसे ही सारे रिश्तों को जीते हुए इंसान की यात्रा भी तो परमेश्वर से अपने रिश्ते को महसूस करने की खातिर ही है... तो चलिए सभी स्नेहिल रिश्ते नातों को जीते हुए आत्मा परमात्मा के सम्बन्ध को आँखें मूँद कर महसूस करते हैं...
इससे पहले, चाहें तो ये कविता पढ़ लें:)

" नाता "

रिश्तों के बियाबान जंगल में..
एक नाता ऐसा भी है.. जो समयसीमा में कैद नहीं
सदियों का कालचक्र जिसमे स्वयं निहित है
जुड़ जाने पे यह रिश्ता मोक्ष तक ले जाता है.. ऐसा सर्वविदित है
फिर भी यह नाता क्यूँ विस्मृत है?
शब्दों में नहीं समा सकता आत्मा-परमात्मा का चिर सम्बन्ध!
ये वो दुर्लभ अनुभव है.. नहीं प्राप्त कर सकते जिसे लोग मदान्ध!!

ललित, आपके लिए...


बहुत कुछ लिखा हमने
जब आप हमें मिले
हमारी छूट गयी कविताओं की ज़मीन पर
कई ललित एहसास खिले

लेकिन क्या आप जानते हैं...?

आपसे मिलने के पूर्व भी जितना कुछ लिखा था
उनमें भी आप ही विद्यमान थे
अब ये कैसे संभव है...
अरे भई, 'सत्य', 'सुन्दर', 'ध्रुव', 'कृष्ण'- ये भी तो आपके ही नाम थे
संयोगवश नहीं मिले हो बंधू...
ये तो निर्धारित घटनाक्रम था
'ललित प्रेम' और 'कृष्ण प्रेम' का भिन्न होना
ये मात्र आपकी दृष्टि का भ्रम था!

वह सुदर्शन चक्रधारी अपनी शक्तियां
आपकी लेखनी को दे रहा था...
नटनागर स्वयं आपकी
नैया खे रहा था!
ये देख कैसे नहीं अभिभूत होते हम...?
हमें तो शरणागत होना ही था!
विराट प्रभु का रूप सब देख नहीं पाते हैं...
हम पर हुई कृपा... हमें तो आपके पावन चरण को धोना ही था!!

सो,
हमने शब्दों के जल से ललित पाँव पखार लिए
कुछ दिव्य अक्षर देवों से हमने उधार लिए
तब जाकर यह लिख पाए हैं
हमारी आखों में अब भी बादल छाये हैं
कुछ बूंदों का अर्घ्य चढ़ा कर
हम मूक हुए जाते हैं...
मेरे ललित भैया
मेरे लिए स्वयं प्रभु का रूप हुए जाते हैं!!!

ज़िंदगी की तपती हुई ज़मीं पर...!

बोलने से
दूरियां बढ़ती हैं
निकटता में
शब्द बहुत कम होते हैं!

बिना कहे ही
समझ ली जाए बात
ऐसे रिश्ते
कम होते हैं!

ज़िंदगी की
तपती हुई ज़मीं पर
कुछ हिस्से ही
नम होते हैं!

मिटा नहीं सकती
समय की धार
ऐसे भी कुछ
गम होते हैं!

पहले कदम और
मंज़िल के बीच
जाने कहाँ
हम होते हैं!

प्रकाश के पार्श्व में
निर्भीक खड़े
ऐसे भी कुछ
तम होते हैं!

राह चुनने का
समुचित विकल्प मिले
ऐसे अवसर
कम होते हैं!

दूरी
बढ़ती ही जाती है
फासले कब
कम होते हैं!

गुम हो गया इंसान!

बढ़ते हुए
उस पाषाण युग से
इस आधुनिक युग तक
मुश्किलों पर विजय पाता हुआ
बढ़ता ही रहा संधान!

घर्षण से
आग की उत्पत्ति हुई
कई बदलाव आये
उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहा
सुविधाओं का इंतजाम!

समय बीतता रहा...
प्रगति पथ पर-
दूर निकल आई दुनिया
ऐसा भी दिन आएगा,
था किसे अनुमान...?

सजते सजते
सज गए सारे सामान
और,
और... रूह समेत
कहीं गुम हो गया इंसान!

मेरी कविता!

टूटे हुए
तारों से
तान छेड़ने का
बिखरा प्रयास है...
मेरी कविता!

जिंदगी को
उसकी समग्रता में
ढूढ़ निकालने का
संजोया आस है...
मेरी कविता!

ऊँचे ही ऊँचे
उड़ते
पंछी का
धरती-आकाश है...
मेरी कविता!

जिनकी नज़रें हैं
सिर्फ सितारों पे
मिट्टी से उनके भी
सम्बन्ध का सारांश है...
मेरी कविता!

होने पर भी
न होने का
सुन्दर
आभास है...
मेरी कविता!

अन्धकार
भगाने का
अनोखा
अंदाज़ है...
मेरी कविता!

जीवन की
व्यस्तताओं से चुराया
चन्द पलों का
अवकाश है...
मेरी कविता!

अनचिन्हे
भावों की
मूक
आवाज़ है...
मेरी कविता!

दीवारों पर
लिखा मिटाया
अधूरा
वाक्यांश है...
मेरी कविता!

विचारों को
जीवन देना है
आती जाती
सांस है...
मेरी कविता!

खेल रही
पंखुड़ियों से
पर जाने क्यूँ
उदास है...
मेरी कविता!

अपने अनुभव की
छोटी सी भूमि पर लटका
बादलों का घुलता-पिघलता
उच्छ्वास है...
मेरी कविता!

कोई नहीं
होता जब
तब भी
होती पास है...
मेरी कविता!

जीवन के
उत्कृष्ट
कुछ प्रेरक पलों का
दिव्यांश है...
मेरी कविता!

नित
घटित होती
परीक्षाओं का
प्राप्तांक है...
मेरी कविता!

रुदन जब कर जाता है
एक सीमा का अतिक्रमण
तब खिल आने वाली
हास है...
मेरी कविता!

अब तक आया नहीं चलना
मुझे राहों पे
कभी कभी लगता है
बकवास है...
मेरी कविता!

जितना स्नेह
मिल जाता है
उसका तो बस
शतांश है...
मेरी कविता!

टूटे हुए
तारों से
तान छेड़ने का
बिखरा प्रयास है...
मेरी कविता!

दो किनारे!

कुछ भी कर लें मूल स्वभाव नहीं बदलता... किनारों का स्वभाव है- एक नदी का हिस्सा होते हुए भी... अलग अलग ही चलते हैं..., और यही सौन्दर्य भी है शायद... रिश्तों के संसार का... भावों के संसार का!
एक भावदशा जो कुछ यूँ उतर आई कविता में-

नदी भाव की
बहती जाती थी
दो किनारों के मध्य
मौन के बीच
गूंज जाता था
शब्दों का अर्घ्य

कई कई रूपों में
बरसती थी
प्रश्नों की बौछार
उत्तर ज्ञात
फिर भी लेते थे
अनगिनत प्रश्न आकार

एक किनारा कहता
जो स्पष्ट है
उसकी कैसी पुष्टि
एक है भाग्य हमारा
जुदा कहाँ
अपनी सृष्टि
दूजा किनारा
अपनी बात
दुहराता था
कह पाओ तो कह दो
सुनना
उसको भाता था

क्षितिज पर
उड़ रहे थे
अरमान पंख पसारे
दूर दौड़ाई दृष्टि
तो देखा
मिल रहे थे किनारे

प्रश्नों की बूंदें
शब्दों के बुलबुले
सब थे मौन
ये क्षणिक भ्रम था
या दो किनारों की सच्चाई
ये अब जाने कौन

महसूस किया
उन
एकाकार किनारों को
आत्मसात किया
नदिया की
बहती धारों को

एक बूँद
ओस की
उतर गयी भीतर
नमी
हृदय की
हो गयी तर

बीत रहे
समय की ललाट पर
अनुभूति के नगीने जड़े थे
नदी के दो किनारे
फिर एक बार
अलग अलग खड़े थे!

आँचल में उसके सिमटा है संसार!

प्यार...
बूँद ओस की
स्निग्ध किरण सूरज की
चमके जिससे सारा संसार
धरा पर बोया बीज है प्यार!

प्यार...
मस्ती पवन की
गति जीवन की
जो है सबका आधार
साँसों का संगीत है प्यार!

प्यार...
बात मौन की
प्रभावी कथा रूह की
महिमा जिसकी अपार
खुली आखों का स्वप्न है प्यार!

प्यार...
मुस्कान खिलती कली की
धूल पूजा वाली गली की
जहां हमने जाना अपने होने का सार
रूहानी मासूमियत का नाम है प्यार!

प्यार...
सौम्यता चांदनी की
मधुरता वाणी की
और जीत से जहां कहीं ऊँची होती है हार
त्याग की पराकाष्ठा को कहते हैं प्यार!

प्यार...
नहीं मोहताज परिभाषाओं की
नहीं कोई आस पा जाने की
क्योंकि आँचल में उसके सिमटा है संसार
जोड़ रहा जो हमको तुमको वो सूत्र है प्यार!

जीवनाधार!

एक पुरानी कविता... तीज व्रत के आसपास पिछले वर्ष लिखा था इसे....; इतने दिनों के बाद आज मेरी प्यारी दोस्त श्वेता ने इसे पुनः पढ़ा... और कहा कि आज फिर एक बार उसकी आखें नम हो गयीं इसे पढ़कर... हमने भी इसे पुनः पढ़ा और आँखें हमारी भी नम हुई; सोचा यहाँ अनुशील पर अपनी इस कविता को भी लिख दें... संकलित हो जायेगी यात्रा में... जब इच्छा होगी मुड़ कर यह पन्ना पलटकर रो लेंगे... हँस लेंगे...!
धन्यवाद श्वेता, मेरी इस भूली बिसरी कविता को याद दिलाने के लिए!

दूर हैं तुमसे?
तो क्या...
मन में गंगा की धार समेट लाये हैं!
सारा प्यार...
समस्त जीवनाधार
समेट लाये हैं!

हमारी किस्मत की तरह...
ऐ! माटी...
तू भी हर पल
साथ है...
तीज की पूजा हेतु
गौरी-गणेश बनाने को
हम कुछ रजकणों से संस्कार
समेट लाये हैं!

सावन की फुहारें...
तो हैं यहाँ...
पर भोले बाबा को
अर्पित होने वाले
बेलपत्र कहाँ हैं...?
सावन से जुडी...
इन पावन यादों का
पारावार समेट लाये हैं!

भाव-भाषा...
सब तो वही है...
अपने हृदय में
सबकुछ तो संजोया पूर्ववत ही है...
इस आपाधापी में...
सुकून हेतु
कुछ कोमल
रचनात्मक सरोकार समेट लाये हैं!

दूर हैं तुमसे?
तो क्या...
मन में गंगा की धार समेट लाये हैं!
सारा प्यार...
समस्त जीवनाधार
समेट लाये हैं!

जब न रहेंगे हम, रह जायेंगे अक्षर ही!

ये लिख दें... वो लिख दें
मन में आता है सब लिख दें
जब न रहेंगे हम
रह जायेंगे अक्षर ही-
जीवन की गंगा में
बहती धारा पर रब लिख दें

नभ लिख दें... थल लिख दें
अंतस के भाव सकल लिख दें
सेज नहीं सुख की
है जीवन एक समर ही-
संघर्ष की शामों में
हौसलों में अनल लिख दें

ममता लिख दें... प्यार लिख दें
मुक़म्मल गीत दो चार लिख दें
गुनगुनाये जिसे हृदय भी
न केवल अधर ही-
आओ अपने दम पर
अन्धकार की हार लिख दें

आवाज़ लिख दें... ख़ामोशी लिख दें
इंसानियत की फिर ताजपोशी लिख दें
सिसकती मानवता
त्राण पाए इस पहर ही-
दे रही जो सन्देश
हवा की वह सरगोशी लिख दें

मृत्यु लिख दें... साँसे लिख दें
धुक धुक चलती आसें लिख दें
संजीवनी है आशा
है संभावनाओं का समंदर ही-
इसकी दो बूँद मिलाकर स्याही में
सारी प्यासें लिख दें

आंसू लिख दें... पानी लिख दें
तुलसी लिख दें मीरा दीवानी लिख दें
निकले जो
हो वह भक्त हृदय का स्वर ही-
उस स्वर की गूँज में
बीते युग की कहानी लिख दें

सतयुग लिख दें... द्वापर लिख दें
प्रमाण मांगते कलयुग में नटनागर लिख दें
युग कालखंड का मोहताज नहीं
है वह अपने अन्दर ही-
अपनी भावभूमि पर
सतयुग का विस्तृत सागर लिख दें

ये लिख दें... वो लिख दें
मन में आता है सब लिख दें
जब न रहेंगे हम
रह जायेंगे अक्षर ही-
जीवन की गंगा में
बहती धारा पर रब लिख दें

आंसू चुनते किसी मोड़ पर मिलो कभी हमको!

भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

रौशनी को
ढूंढना चाहते हो
तो समझो
घेरे हुए तम को!
आत्मा के प्रकाश से
उज्जवल होगा परिवेश
तोड़ो इस
प्रतिपल बढ़ते
अन्धकार के भ्रम को!!

ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!

चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
'गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

तुम्हारे जन्मदिन पर...

आज मेरे छोटे भाई का जन्मदिन है... सोचा था उसकी ही लिखी कोई कविता पोस्ट करेंगे इस विशेष दिन पर... लेकिन संपर्क ही नहीं हो पाया... फ़ोन लगा भी तो बात नहीं हो पायी... स्काइप पर बात करने का अवसर ही न मिल पाया... उसकी ऑफिस की व्यस्तता... और आज तो वह यात्रा में है... मुंबई से जमशेदपुर के लिए चला है... जन्मदिन तो ट्रेन में ही बीतने वाला है!!!


चलो आज नहीं तो
कल ही सही...
तुम्हारी कविताओं से
मिलेंगे,
ढ़ेर सारा स्नेह
और थोड़े से आंसुओं से
मन आँगन
सींचेंगे!

तब समय कहाँ था
उन पन्नों को
पलटने का,
वो दौर था
कितनी ही यादों को
समेटने का!
मेरी विदाई में
व्यस्त जो था सारा घर...
बीत गए तबसे
कितने ही पहर...
आज
इस दूर देश में बैठ
हर क्षण
विदाई के आंसू रोते हैं,
लेकिन फिर तुम्हारी बात
स्मरण हो आती है...
'दूर हैं तो क्या-
भावरूप में हम संग ही होते हैं!'
ये बात
बार बार हमें
भंवर से तारती है,
मेरी राहों को
ज़रा और
संवारती है!
कितने बड़े हो गए न
हम!
पर बीत कर भी न बीता
बचपन!
तुम्हारा बात बात पर
आश्वस्त करना भाता है,
सच! आज भी हमें
राहों में चलना नहीं आता है...
यूँ ही हमें
पग पग पर
सँभालते रहना,
गायत्री मन्त्र के उच्चारण सा शुद्ध सात्विक
चन्दन की सुगंध लेकर
हो तेरा निरंतर बहना!!

राहों में फूलों का खिलना
यूँ ही बना रहे...
कष्ट कंटक कुछ हो अगर
वो सब मेरे यहाँ रहे!
ये छोटी सी मनोकामना है
और यही आशीष भी
जन्मदिन का उपहार
ये शब्दाशीश ही...

जानते हैं... शब्दाशीश कह कर जो उपहार तुम्हें दे रहे हैं, वह कोई कविता नहीं है... बस कुछ बातें हैं... शुभयात्रा कहनी थी तुम्हें... जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं प्रेषित करनी थी... सो अनुशील ने यह अवसर दे दिया हमें... समय निकाल कर अपनी कुछ कवितायेँ भेजना हमें... ठीक है? जमशेदपुर पहुँचो फिर फ़ोन करते हैं...:)

ओ पेड़... क्या कहूँ!

यूँ ही एक छोटी सी यात्रा में ट्रेन की खिड़की से झांकते हुए कुछ याद करती रही... कुछ सोचती रही... पेंसिल और कागज़ साथ थे... कुछ लिखा भी...! खिड़की से बाहर देखते हुए दृश्यों को उलटी दिशा में भागते हुए महसूस किया.... पेड़ भी भाग रहे थे... छूट रहे थे पीछे... काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कैम्पस में स्थित विश्वनाथ मंदिर के प्रांगन में खड़ा पेड़ याद हो आया... वह भी तो पीछे छूट गया है... इन छूट रहे दृश्यों की तरह...! इसके साथ पेड़ से अद्भुत व्यक्तित्व वाले लोग भी कागज़ पर उतर आये और उनके लिए मेरी प्रार्थनारत भावनाएं भी... पेड़ सा होना आसान नहीं हैं... लेकिन सौभाग्य है कि मैं जानती हूँ ऐसे सर्वप्रिय योद्धाओं को भी...! इसी सबसे गुनी गुथी अपने बेहद आत्मीय पेड़ को समर्पित एक बालसुलभ तोतली सी रचना-

ओ पेड़... क्या कहूँ

ट्रेन की खिड़की से
बाहर झाँक रही हूँ
यात्रा में हूँ... अब तक के
पड़ावों को आँक रही हूँ
कितना कुछ है जो
छूट रहा है हर पल
बीतते वक़्त की कमीज़ पर
कुछ भाव टाँक रही हूँ

ओ पेड़... तुम मुझे
भागते हुए लग रहे हो
ये क्या, क्यूँ मेरी दृष्टि को
यूँ ठग रहे हो
जबकि ये मैं ही हूँ
जो भाग रही हूँ, लेकिन सच कहूँ-
एक स्थान पर स्थित होते हुए भी
कितनी ही यात्राओं में तुम मेरा पग रहे हो

मुझे ऐसा लगता है
मानों तुम ही यात्रारत हो
एक ही स्थान पर अडिग खड़े
कर्म में निरत हो
यह जानते हुए भी कि
कोई उदास रागिनी मेरे भीतर ही है बज रही
मुझे ऐसा लगता है
जैसे उदास तुम्हारी भी सूरत हो

तुम्हारी डालियों को
लहलहाते देखा है
समय लिखता नित
भाग्य का नया लेखा है
यह जानकार भी कि
पथिक के साथ नहीं चलते तुम
नेह का धागा बाँध
जीवन के विविध तापों को हमने संग संग सेंका है

रिश्ता है ज़रूर
अकारण नहीं ये बातें होती थी
मुझे याद है
तेरी छाँव में बैठ मैं अक्सर रोती थी
परिस्थितिजन्य कष्टों की
सारी वेदना
तेरी निकटता में
आंसुओं में पिरोती थी

आज जब दिख रहे हैं
यात्रा में ये छूटते पेड़ सारे
याद आ रहे हो तुम
जो छूट गए विश्वनाथ मंदिर किनारे
छूट कर भी नहीं छूटते
कुछ विम्ब जीवन में
भले ले जाएँ कहीं भी
किस्मत के सितारे

ओ पेड़...
क्या कहूँ
सदा तेरी ख़ुशी के लिए
मैं प्रार्थनारत रहूँ
और मिले जो
अभीष्ट तुम्हे
बन कर ख़ुशी के आंसू
तेरे नयनों से बहूँ

ओ पेड़... क्या कहूँ

जीते जी हम क्यूँ(?)रोज मरते हैं!

इश्वर की लीला
अपरम्पार है
जो बह रही है
कैसी अद्भुत धार है
चेहरे पर
मुस्कान लिए
जीवन जय करते हैं
हौसले की धूप खिली है
और सरिता की आँखों से
मोती झरते हैं!

आँखों से छलकता
असीम प्यार है
कैसी अनोखी
यह बयार है
अंगारों पर
पूर्ण कौशल के साथ
चरण धरते हैं
पीर से भरा हृदय है
और बादल औरों की
पीर हरते हैं!

पीड़ा के प्रवाह में
ईश-स्मरण साकार है
तटों को बांधे हुए
मझधार है
जीवन नौका खेते हुए
सुख-दुःख की
मार सहते हैं
बिखरते हुए तटों पे
लहर कितनी ही
कथा कहते हैं!

इन कथाओं में
अद्भुत सार है
आने-जाने की महिमा
अपरम्पार है
जब तक हैं धरा पर
चलो जल कर
राहें रोशन करते हैं
जियें यूँ कि
जीना-मरना सब सार्थक हो जाए
जीते जी हम क्यूँ(?)रोज मरते हैं!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ