अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता के आँगन में...!

हमेशा से अपनी रही होगी
तभी तो
इतनी जल्दी अपनी हो गयी,
एक स्मृति... एक चमक...
और फिर
सारी वेदना खो गयी

सुख दुःख की
परिभाषाएं
यहाँ भिन्न हैं,
अभिभूत था मन
कुछ इतना कि
आँख ख़ुशी-ख़ुशी रो गयी

हम कविता के
आँगन में
निकले जो,
सारा परिवेश हमारा हो आया
छंद की गरिमा
सारे कष्ट धो गयी

आओ यहाँ
देखो तो कौन है
जो लिखवा रहा है,
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी

चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी

कुछ बिसरे पल
खिलखिलाते आंसू बनकर
हाथ थामने चले आये,
अब सवेरा होगा
जग जायेगी धूप
अंधियारी रात सो गयी

हमेशा से अपनी रही होगी
तभी तो
इतनी जल्दी अपनी हो गयी,
एक स्मृति... एक चमक...
और फिर
सारी वेदना खो गयी

ज़िन्दगी दूर बहुत ले आई है घर से!

तीन वर्ष पूर्व आज के ही दिन हमारा विवाह हुआ था... इस विशेष दिन पर हम दोनों को अपने घर से इतनी दूर यहाँ स्वीडन में होना बहुत खल रहा है! एक कविता ऐसे ही कुछ भाव लिए, शब्द अवश्य मेरे हैं पर भाव हमारे... हम दोनों के!
'अनुशील' पर 'अनुपमा' और 'सुशील' के साझे मनोभाव की एक कविता-

यात्रा में हैं
चल रहें हैं हम
कभी खिली धूप
कभी धरती नम
ग़मगीन हुए कभी
कभी यूँ ही हरसे
क्या कहें
ज़िन्दगी दूर बहुत
ले आई है घर से!

भाव उमड़ रहे
अनगिनत हर पल
मुस्कानों की ओट से
बहता है आँखों का जल
कभी थमी झम-झम बूँदें
कभी मेघ जमकर बरसे
यूँ ही
टहनियों से टूट कर
कलियाँ कहती तरुवर से!

अन्दर जीवन है
भले ऊपर बर्फ़ गयी है जम
प्रकृति का अद्भुत खेल है ये
लीला इसकी सुन्दरतम
पतझड़ की रुत कभी
कभी हरियाली के जलसे
क्या कहें
ज़िन्दगी दूर बहुत
ले आई है घर से!

अथाह है सागर
सीमित पात्र हमारा
जीवन के आयाम कई
कोई मोड़ न आता दोबारा
जो पल छूट गए पीछे
उसको ही हम पल पल तरसे
सोचा
कुछ कह लें अपनी बात
इस सरपट बीत रहे पहर से!

यात्रा में हैं
चल रहें हैं हम
कभी खिली धूप
कभी धरती नम
ग़मगीन हुए कभी
कभी यूँ ही हरसे
क्या कहें
ज़िन्दगी दूर बहुत
ले आई है घर से!

निराश कविता में आस की पदचाप!

बात भले निराशा की हो कविता में पर आस का खग अपना गीत गा ही जाएगा... आस का दूसरा नाम ही तो कविता है!

हर वक़्त
नहीं कर सकते हम
आस की बातें,
कभी कभी
निराशा के सिवा
कोई रंग ही नहीं बचता है ज़िन्दगी में!
हमेशा नहीं हो सकती
केवल
चांदनी रातें,
कभी कभी
अन्धकार ही अन्धकार भी
सजता है ज़िन्दगी में!!

हमेशा
कविता भी नहीं
हो सकती साथ,
कभी कभी
मौन सा भी कुछ
रचता है ज़िन्दगी में!
हमेशा
नहीं रहता सबकुछ
हमारे हाथ,
कभी कभी
हमें वक़्त भी
आजमाता है ज़िन्दगी में!!

हर दिन नया है
हर सूर्योदय की
बात नयी,
परिवर्तन
हर क्षण
बसता है ज़िन्दगी में!
अपने आप में
ही मग्न
हर शाम गयी,
इसलिए ही
शायद
नीरसता है ज़िन्दगी में!!

खुद
बांटता नहीं कुछ
फिर उसे क्या मिले,
थोड़े से
नेह को इंसान
तरसता है ज़िन्दगी में!
मुरझाया हो मन
फिर
कैसे फूल खिले,
ज़रा तो
खबर हो
कितनी सरसता है ज़िन्दगी में!!

कितनी ही
कथा कहानी
है कितनी ही बातें,
बस उमंग ही न हो
फिर
क्या बचता है ज़िन्दगी में!
दिन जो
बीत गया है
बीत जायेंगी रातें,
ये आने
और चले जाने का सिलसिला
यूँ ही चलता है ज़िन्दगी में!!

गंगा के इस पावन तट पर!

हम तीर्थ करने जाते हैं... मंदिर मस्जिद शिवालयों में शीश नवाते हैं... पर क्या हमारी हर तीर्थ यात्रा हमे मानसिक रूप से मुक्त कर पाती है? क्या हम हर पल जकड़े ही नहीं रहते अपने ही बनाये हुए जालों में? जब तक सांसारिक प्रपंचों से मुक्ति का बोध न हो... तब तक कैसी यात्रा... कैसा तीर्थ! कैसे धोये गंगा मैया भी हमारी कलुषता...
ये बस बड़े ही साधारण सी भावदशा में करीब पांच-छः साल पहले लिखी गयी कविता है... कुछ ही पंक्तियाँ याद रह गयीं हैं!
घाटों पर गंगा मैया की धार के सानिध्य में भी हर तरफ... हर जगह सांसारिकता को ही लिपटे देखा... ऐसे में मन बस कह उठा स्वयं को ही आह्वानित करते हुए-


आना सांसारिक प्रपंचों से बिलकुल निपट कर
गंगा के इस पावन तट पर

यहाँ की छटा है दिव्य
सकल रश्मियाँ आँचल में आ गयी सिमट कर
गंगा के इस पावन तट पर

मन कुछ और निर्मल हो गया
हवाएं गुजरी जो कुछ आत्मा से सट कर
गंगा के इस पावन तट पर

अपनी क्षुद्रता का एहसास और प्रबल हो गया
रजकणों से लिपट कर
गंगा के इस पावन तट पर

आरती की थाल सजी है
झूमता हुआ सा माहौल है सारे जहां से हट कर
गंगा के इस पावन तट पर

आखिर क्या हासिल कर लोगे
स्वार्थ का बेतुका गणितीय पहाड़ा रट कर
गंगा के इस पावन तट पर

आना सांसारिक प्रपंचों से बिलकुल निपट कर
गंगा के इस पावन तट पर

जिस तरह प्रकृति में हवा बहती है...!

कविता स्वतः स्फूर्त होती है और अगर यह बात सही है, तो यह भी एक सत्य है, कि कई दिन ऐसे भी बीत सकते हैं जब सृजन संभव ही न हो... कविता बहे ही न...!
प्रेरणा का अभाव या रचनाशीलता की जमीं का अकालग्रस्त होना... जो भी कारण हों, समय की शिला पर कितनी ही लकीरें हर क्षण खिंच रहीं हैं... मिट रहीं हैं... कौन जाने कविता कहाँ है... उजाले कहाँ हैं? ऐसे में दुरूह परिस्थितियों को स्वीकार कर ही दृढ़ अन्तःस्थिति के प्रयास से कुछ सज-संवर सकता है!
एक रचना डायरी के पुराने पन्ने से-


जिस तरह प्रकृति में
हवा बहती है
वैसे ही
कवि के अंतर में
कविता बहनी चाहिए!

प्रेरणा से ही
सृजन संभव है
जब न लिख सकें
तो कह सकें कि गति रुक गयी है
कम से कम
ये ईमानदारी...तो रहनी चाहिए!

विचारों की लौ से
करो रौशन
जहां को
ये क्या बेतुकी जिद लिए बैठे हो
कि, उजाला बिखेरने के लिए
वह्नि चाहिए!

एक जागरूक
सुनने वाला बैठा हो, तो-
तमाम लेखनकार्य छोड़
तुम्हें उससे
एक कविता
कहनी चाहिए!

जिस तरह प्रकृति में
हवा बहती है
वैसे ही
कवि के अंतर में
कविता बहनी चाहिए!

एक लहर की कहानी!

इतराती हुई
बह रही थी लहरों संग
सागर में एक लहर
सुनहरी धूप... मस्त पवन
सबका आनंद लेती हुई
ईठला रही थी हर पहर

तभी देखा उसने
किनारे से टकरा कर
लहरों को दम तोड़ते हुए
हर पल
मिटने की वृहद कथा में
नया अध्याय जोड़ते हुए

देख यह दृश्य
करुण,
लहर सहम गयी
चिंतित हो उठा हिय
मन शिथिल
उमंग सारी थम गयी

विचारमग्न देख उसे
पास से गुज़र रही लहर
कारण जानने को अकुलायी
आसन्न विपत्ति से
दुखी लहर ने तब
किनारे पर मिट रही लहरों की दशा दिखायी

यह देख
पास से गुज़र रही उस लहर ने
कुछ गुना
सागर का
तरंगित संगीत
मन ही मन सुना

फिर
स्मित मुस्कान के साथ
बोली-
बह रहे हैं संग
हम दोनों हैं
हमजोली

दुखी न हो
क्यूंकि न तुम लहर हो
न ही क्षण भर का किस्सा हो
ये मिटना
भ्रम है केवल
तुम तो सागर का हिस्सा हो!

क्या रखा है...किनारे में!

कई बार सोचा
कि बात हो
कोई भली सी
देने को सौगात हो
पर हमेशा यही हुआ
कभी अवसर नहीं
कभी अवकाश नहीं
कभी हम जल्दी में
कभी समय तुम्हारे पास नहीं

कई बार सोचा
कि साथ हो
कोई कली सी
खिलने वाली प्रात हो
पर हमेशा यही हुआ
कभी डगर नहीं
कभी तलुओं के नीचे नम घास नहीं
कभी हम जल्दी में
कभी समय तुम्हारे पास नहीं

कई बार सोचा
कि हाथों में हाथ हो
मौत की तरफ बढ़ते जीवन की कथा
कुछ दिव्य, हे नाथ! हो
पर हमेशा यही हुआ
कभी कदमों तले से धरती गुम
कभी मुट्ठी भर आकाश नहीं
कभी हम जल्दी में
कभी समय तुम्हारे पास नहीं

कई बार सोचा
कि बात हो
कोई भली सी
देने को सौगात हो
पर हमेशा यही हुआ
कभी अवसर नहीं
कभी अवकाश नहीं
कभी हम जल्दी में
कभी समय तुम्हारे पास नहीं

छोड़ कर
यह भाग दौड़
चलो आज बैठें
कुछ बात करें...
जीवन के बारे में!
मझधार में ही तो
सारे रहस्य छिपे हैं...
क्या रखा है...किनारे में!!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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