अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पढ़ते हुए...!

कितने
काम अधूरे से
कितने रंग बिखरे हैं
उजले.. काले.. भूरे से
आज यहाँ कल कहीं
कितना विचित्र है
जीवन भी
अस्त व्यस्त पड़ा है
मात्र कमरा ही नहीं
मन भी
जिसे ज़रुरत है
त्वरित सहेजने की
सजाने की
पुकार है
गूंज रही
व्यवस्थित किये जाने की
पर
इन सबके बीच
कितना सुन्दर है
सबकुछ स्थगित कर
पढ़ना...
और खो जाना एक अलग सी दुनिया में
जहां लिखने वाले का संसार
अपना सा लगे
आँखें नित
एक स्वप्न देखती हुई जगे
कितना नम सा
एहसास है यह
खुद को ही
समझने की तरह
कि-
देश काल परिस्थितियों से परे
भावनाओं का
अपना ही गणित है
सबकी रगों में बह रहा
एक ही शोणित है
अनुभूति की धरती पर
खिले शब्दों की फसल
अपना मार्ग स्वयं तय करती है
एक बार जो खिल गयी
एक बार जो लिख गयी
वह ध्वनि सदा संगीतमय रहती है
किसी की हो
कहीं की हो
पर अनुभूतियाँ तो हैं पहचानी
दर्द भिन्न हों
कारण जुदा हों
पर एक ही तो है आँखों का पानी
भाषा
अलग हो सकती है
भाव एक ही होते हैं
हर घड़ी हम
जितना पाते हैं
उससे कहीं अधिक खोते हैं
खो रहे जो बिंदु हैं
उनसे तत्व निचोड़
मुट्ठी भर धूप खिलानी है
अपने अपने एकांत से
हर एक का स्नेहिल नाता है
ये सबकी ही पहचानी है
ऐसे ही चलते हुए
अनायास ही
हो जाती है पूरी यात्रा
अब चाहे वो जीवन की हो
कविता की हो
या हो शव को शिव बनाने वाली इकार की मात्रा...!

प्रेरणा!

हताशा से
व्याकुल मन
अपनी अपूर्णता..
महसूस कर
अशांत था,
उद्विग्न हृदय की
गांठें खोलना
नहीं सरल..
सामने प्रस्तुत
सकल वृतांत था;
व्याकुलता
प्राणों का तेज
हर रही थी,
बुद्धि चकित
भाव विस्मित
जिंदगी जाने क्या
भेद कह रही थी;
आँखों के रस्ते
सारा दर्द
बहने वाला था,
कब तक छुप वह
हृदय की कंदराओं में
रहने वाला था;
तभी-
तभी... जाने कहाँ से
कोई प्रेरणा आई,
और
कविता
मेरे सिरहाने रखे पन्ने पर
अनायास उतर आई;
लगा मानों
घास की नमी ने
मेरे पाँव को हो छुआ
कुछ कहने की
स्थिति न रही
गला था रुंधा हुआ
अगले ही पल-
मैंने साफ़ शब्दों में
उस छुअन को
प्रेरणा से
जोड़ दिया था..!
उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!!

जल रहा है दीप!

ये सोचे बिना
कि
कितना कारगर है वह
अन्धकार के विरुद्ध
निष्ठा से लड़ रहा है दीप
..........जल रहा है दीप

ले रही हैं
इम्तहान
बहती हुई हवाएं
उनकी मंशा
चुपके से पढ़ रहा है दीप
.........जल रहा है दीप

अपनी नन्ही सी
लौ से
कितने ही
उज्जवल कीर्तिमान
निरंतर गढ़ रहा है दीप
........जल रहा है दीप

राहगीरों को
राह दिखाता हुआ
त्यागमूर्ती बन
मौन तपस्वी सा
सीढ़ियाँ चढ़ रहा है दीप
........जल रहा है दीप

ये सोचे बिना
कि
कितना कारगर है वह
अन्धकार के विरुद्ध
निष्ठा से लड़ रहा है दीप
..........जल रहा है दीप

यह जीवन की कहानी है!

एक एहसास
जिसने
बांधे रखा है
जीवन को
उसकी
जय गानी है!

बीतते समय की
भीड़ में
दो चार पल
जो याद रहे
वही
असल जिंदगानी है!

जब तक साँसे हैं
तब तक लिखी जाएँगी
नए ढंग से
कही गयी हर बार
पर बात वही
पुरानी है!

जीवन में क्या पाना है
क्या कीर्तिमान
हासिल करने हैं?
साथ हो अपनों का
फिर सारी मंजिलें
बेमानी हैं!

वो भी निकल आएगा
जिसे कहते हैं रास्ता
सिंची जाएगी धरती
आसमान की आँखों में
अभी बहुत
पानी है!

सपनों के अम्बर पर
टिमटिमाते जो
अनगिनत तारे
अंधियारी रातों में वो
आशा की
निशानी हैं!

आज हैं
जाने कल क्या हो
निश्चित
कुछ नहीं यहाँ
दुनिया
आनी-जानी है!

बुझा दीप तो
जली फिर से ज्योत
मौत है
केवल एक अन्तराल
यह
जीवन की कहानी है!

पीड़ा अंतर्ध्यान हो गयी!

एक और दिवस गुजरा
और शाम हो गयी!
प्रार्थनारत हृदय की भावनाएं
सहज ही
सहर्ष स्वयं श्याम हो गयी!

अंतिम बेला में
खुल जाते हैं सारे फंदे
पथरीली
मन की राहें
वृन्दावन धाम हो गयी!

अब सोचता है चैतन्य हृदय
क्या कब कैसे घटित हुआ
कि, बीते दिनों
आस्था
बिकता हुआ सामान हो गयी!

ये कैसी चमक है अद्भुत
हम तक आ रही है
चेतना के धरातल पर
सकल छवियाँ
अभिराम हो गयी!

इंसानियत से अनुप्राणित
रिश्ता है हमारा
जो तेरा दुःख वही मेरा दर्द
मौन को महसूस करें अब
बातें तो तमाम हो गयी!

हृदय से जुड़े हैं
फिर भेद ही कहाँ है
तेरे प्रारब्ध की
कई अश्रुलड़ियाँ
आज मेरे नाम हो गयी!

जाने कब खो जाये
बुलबुला ही तो है जीवन
इस क्षणिकता को
महसूस किया ज्यों
पीड़ा अंतर्ध्यान हो गयी!

एक और दिवस गुजरा
और शाम हो गयी!
प्रार्थनारत हृदय की भावनाएं
सहज ही
सहर्ष स्वयं श्याम हो गयी!

ऐसे ही किसी एक पल में...!

टूट रहा था
अँधेरे का व्यूह
सब साफ़ साफ़ दिख रहा था
जैसे
सफ़ेद कागज़ पर कोई
अदृश्य सी वेदना लिख रहा था
ऐसे ही
किसी एक पल में
कविता बह आई आँखों के जल में

आज जो
खो जाते हैं सपने
उन्हें ढूंढते हैं हम आने वाले कल में

स्वतः स्फूर्त
जो भाव हैं
उनकी जोड़ न नभ में है न थल में

कैसे फैले
चहुँओर उजियारा
सुख है मात्र इसी एक प्रश्न के हल में

ऐसे ही
किसी एक पल में
कविता बह आई आँखों के जल में

छूट रहा था
इस छोर का किनारा
सामने जल ही जल दिख रहा था
जैसे
जीवन की उलझन पर कोई
उलझी सी एक कथा लिख रहा था
ऐसे ही
किसी एक पल में
कविता बह आई आँखों के जल में

बड़े से बड़े
परिवर्तन की नींव
होती है एक छोटे से दृढ़ पहल में

आस की
एक नन्हीं सी किरण
परिदृश्य बदल देती है एक पल में

सुख को
ढूंढते हैं हम पर
धीरे से बैठ जाती है वेदना बगल में

ऐसे ही
किसी एक पल में
कविता बह आई आँखों के जल में

रूठ रहा था
सितारों का समूह
आसमान खाली सा दिख रहा था
जैसे
स्वागत गान के साथ ही कोई
विदाई का गीत भी लिख रहा था
ऐसे ही
किसी एक पल में
कविता बह आई आँखों के जल में

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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