अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ये ऐसा ही चलन है...!

बड़े यत्न से संभाला था
एक कतरा सपनों का
आँखें खुली
और
वह
खो गया

पल पल सरकता जीवन
बंजर सी भावभूमि पर
जाने कितने
आस के
बीज
बो गया

निरंतर भागती राहों में
कितनी ही स्मृतियों को
बड़ी कुशलता से
समय
धीरे धीरे
धो गया

ये ऐसा ही चलन है
कभी दर्द उभरा
तो कभी हिय में
चुपके से
वह
सो गया

बरस कर मिट गया
पर विशिष्ट उसकी कहानी है
बादल
बिछड़ा जो आसमान से
तो धरा का
हो गया

ये बात न विस्मृत हो!

मामूली सी ज़रूरतें हैं
ज़िन्दा रहने के लिए,
संग्रह की धुन में
ये बात
न विस्मृत हो!

एक ही तो है जीवन
अपना कहने के लिए,
जितना हो सके
उतना ही
फ़लक विस्तृत हो!

सुवासित हवा तो तत्पर है
निरंतर बहने के लिए,
सुसुप्त हृदय का
तार तो
पहले झंकृत हो!

सपनों को चाहिए हौसला
निर्विघ्न पलने के लिए,
शब्दों का संकल्प
कर्मरूप में
आज उद्धृत हो!

जीवन की सुबह होती ही है
अंततः ढ़लने के लिए,
बढ़ता हुआ
हर कदम
सभ्य सुसंस्कृत हो!

लम्बा बहुत है रास्ता
आगे चलने के लिए,
जीवन रहते कभी भी
आस्था
न मृत हो!

है दर्द तो मरहम भी है
पीर हरने के लिए,
शर्त इतनी सी है
संवेदनाओं का संसार
न विकृत हो!

कितने ही गरल हैं
धरा को श्रीहीन करने के लिए,
उनके विरुद्ध डटकर खड़ा
जगमगाता वह
तत्व अमृत हो!

कुछ नन्हे से अवलंब हैं
भवसागर तरने के लिए,
विशिष्ट की तलाश में
ये बात
न विस्मृत हो!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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