अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मुक्ति का सोपाण!

सूरज की
किरणों सा
स्निग्ध
चाँद की
चांदनी सा
सौम्य

धरा पर
हुआ अवतरित
वह
स्पर्श से परे
जाने उसके कितने
तह

फूलों की
खुशबू सा
सुवास
प्रकृति के
मुख पर
मंद मंद हास

प्रभु की
छवि सा
अभिराम
भक्ति है
मुक्ति का
सोपाण!

जब प्रेम मुखर होता है!

शब्द हो जाते हैं मौन
जब प्रेम मुखर होता है!
हर ऊँचाई होती है गौण
जब प्रेम शिखर होता है!

सारे दर्द जाते हैं बिसर
जब प्रेम सजग होता है!
गीत गुनगुनाते हैं अधर
जब प्रेम खग होता है!

हार लगती है जीत सी
जब प्रेम प्रखर होता है!
बातें सकल हो गीत सी
जब प्रेम स्वर होता है!

अद्भुत होती है अनुभूति
जब प्रेम जग होता है!
नाप ली जाती है सृष्टि
जब प्रेम पग होता है!

डूबने से बच पाया कौन
जब प्रेम सरोवर होता है!
शब्द हो जाते हैं मौन
जब प्रेम मुखर होता है!

सप्तरंग!

जिंदगी के कई रूप
कई रंग,
सब समेटते चले
यात्री अपने संग!

कभी नम आँखें
कभी उल्लास,
भावों में समाये
कई जुदा तरंग!

कभी थकान से
चूर हृदय,
तो कभी खिलती
कलियों सी उमंग!

राहों का है
खेल निराला,
कर देती है कितने
अजनबियों को संग!

जो नहीं है दृश्यमान
वह भी इसका अंग,
श्वेत स्वयं में
है समाये सप्तरंग!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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