अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

प्रेरणा!

हताशा से
व्याकुल मन
अपनी अपूर्णता..
महसूस कर
अशांत था,
उद्विग्न हृदय की
गांठें खोलना
नहीं सरल..
सामने प्रस्तुत
सकल वृतांत था;
व्याकुलता
प्राणों का तेज
हर रही थी,
बुद्धि चकित
भाव विस्मित
जिंदगी जाने क्या
भेद कह रही थी;
आँखों के रस्ते
सारा दर्द
बहने वाला था,
कब तक छुप वह
हृदय की कंदराओं में
रहने वाला था;
तभी-
तभी... जाने कहाँ से
कोई प्रेरणा आई,
और
कविता
मेरे सिरहाने रखे पन्ने पर
अनायास उतर आई;
लगा मानों
घास की नमी ने
मेरे पाँव को हो छुआ
कुछ कहने की
स्थिति न रही
गला था रुंधा हुआ
अगले ही पल-
मैंने साफ़ शब्दों में
उस छुअन को
प्रेरणा से
जोड़ दिया था..!
उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!!

44 टिप्पणियाँ:

mridula pradhan 29 अक्तूबर 2011 को 4:45 pm  

behad sunder......bhawbhini.

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" 29 अक्तूबर 2011 को 5:18 pm  

bhaav poorn
"उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!!"
aur kisee kee aavashyaktaa bhee kahaan rahtee ,
jab man aur dil ko apnaa mil jaataa

अरुण चन्द्र रॉय 29 अक्तूबर 2011 को 5:30 pm  

बहुत गंभीर कविता... अंतिम पंक्तियाँ उद्वेलित कर देती हैं...

कुमार राधारमण 29 अक्तूबर 2011 को 5:34 pm  

Kuchh hai jo hamen sanchaalit karta hai.Hota to vah hamesha hai hamare saath,magar nitant ekant ke kshanon men hamen vah bahut saaf mahsoos hota hai.

जयकृष्ण राय तुषार 29 अक्तूबर 2011 को 6:43 pm  

बहुत ही उत्कृष्ट और अच्छी कविता |

ana 29 अक्तूबर 2011 को 7:08 pm  

utkrushta rachana....bhavpoorna

मनोज कुमार 29 अक्तूबर 2011 को 7:12 pm  

‘वह’ जो प्रेरणा देता है और प्रेरित करता है तभी तो सृजन होता है।

Human 29 अक्तूबर 2011 को 7:14 pm  

बहुत अच्छा भावान्वेषण,उत्कृष्ट रचना ।

Rajesh Kumari 29 अक्तूबर 2011 को 7:37 pm  

bahut umdaa rachna.

virendra 29 अक्तूबर 2011 को 8:21 pm  

anupama ji
sundar saargarbhit srijan ke liye badhaayee .
prerdaa bhaavmayee kavitaayee .jyoti parv shubh ho

harishjharia 29 अक्तूबर 2011 को 8:36 pm  

हताशा से
व्याकुल मन
अपनी अपूर्णता..
महसूस कर
अशांत था,

Excellent feelings... just great...
Please read: “Patthar kii Ibaarat”... http://harishjhariasblog.blogspot.com/2009/12/blog-post.html

संगीता पुरी 29 अक्तूबर 2011 को 9:15 pm  

अच्‍छी रचना !!

सहज साहित्य 30 अक्तूबर 2011 को 12:36 am  

अनुपमा जी ये पंक्तियाँ दिल को छू गई -मैंने साफ़ शब्दों में
उस छुअन को
प्रेरणा से
जोड़ दिया था..!
उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 30 अक्तूबर 2011 को 4:39 am  

मन से उपजी सशक्त अभिव्यक्ति.

विशाल 30 अक्तूबर 2011 को 5:10 am  

उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!!


बहुत खूब .
द्वंद्व के पलों का बहुत खूब चित्रण किया है आपने.

निर्मला कपिला 30 अक्तूबर 2011 को 5:14 am  

मन के भावों का सुन्दर चित्रण। बधाई।

abhi 30 अक्तूबर 2011 को 5:21 am  

दरअसल पिछले पोस्ट में जो टिपण्णी मैंने दी थी वो मुझे इस पोस्ट में देना था लेकिन थोडा कन्फ्यूजन की वजह से वहाँ पोस्ट हो गया..

वैसे वो कविता भी दीपों की तरह ही खूबसूरत है और ये वाली भी :)

रश्मि प्रभा... 30 अक्तूबर 2011 को 5:40 am  

कविता
मेरे सिरहाने रखे पन्ने पर
अनायास उतर आई;
लगा मानों
घास की नमी ने
मेरे पाँव को हो छुआ......main us nami ko mahsoos ker rahi hun

Dr.R.Ramkumar 30 अक्तूबर 2011 को 6:18 am  

उद्विग्न हृदय की
गांठें खोलना
नहीं सरल..



अनुपमा जी!
यह बड़ा रहस्यात्मक है...दर्द भी गूंगे का गुड़ होता है...गुड़ हमेशा मीठा ही नही होता..पकाने पकाने पर निर्भर करता है।

वन्दना 30 अक्तूबर 2011 को 8:30 am  

बेहद गहन विचारो का समावेश्।

Udan Tashtari 30 अक्तूबर 2011 को 12:52 pm  

अति सुन्दर...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 30 अक्तूबर 2011 को 1:04 pm  

बहुत सुन्दर रचना....
एकदम कोमल डूब सी....
सादर....

Anupam karn 30 अक्तूबर 2011 को 2:40 pm  

उसके आने से पहले-
मैंने
कविता को नहीं..
कविता ने
मुझको
छोड़ दिया था..!

अत्यंत सहज व् प्रेरक!

ऋता शेखर 'मधु' 30 अक्तूबर 2011 को 2:48 pm  

कविता
मेरे सिरहाने रखे पन्ने पर
अनायास उतर आई;
लगा मानों
घास की नमी ने
मेरे पाँव को हो छुआ.

भाव भरे एहसास...बहुत ही सुन्दर!
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार|

M VERMA 30 अक्तूबर 2011 को 3:14 pm  

अंतर्द्वन्द मय रचना

mahendra verma 31 अक्तूबर 2011 को 3:10 am  

कविता
मेरे सिरहाने रखे पन्ने पर
अनायास उतर आई,
लगा मानों
घास की नमी ने
मेरे पाँव को हो छुआ

लाजवाब पंक्तियां...
प्रभावशाली कविता।

Patali-The-Village 31 अक्तूबर 2011 को 4:53 am  

बहुत ही उत्कृष्ट और अच्छी कविता |

Babli 31 अक्तूबर 2011 को 9:07 am  

बुद्धि चकित
भाव विस्मित
जिंदगी जाने क्या
भेद कह रही थी;
आँखों के रस्ते
सारा दर्द
बहने वाला था...
बहुत सुन्दर और भावपूर्ण पंक्तियाँ! बेहद ख़ूबसूरत! बधाई!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 31 अक्तूबर 2011 को 9:07 am  

उत्कृष्ट रचना.. सुन्दर भाव...

udaya veer singh 31 अक्तूबर 2011 को 5:08 pm  

अनायास ही
हो जाती है पूरी यात्रा
अब चाहे वो जीवन की हो
कविता की हो
या हो शव को शिव बनाने वाली इकार की मात्रा...!
आज फिर एक ऐसे ब्लॉग से रूबरू हुआ ,जिसको पढ़ा तो लगा अपना सा , मन पढ़ने की जिद करता रहा . फिर पढ़ा ,कुछ ही ऐसे रचनाकार हैं ,जिन्हें अच्छा लगता है .....कुशल शिल्पी द्वारा प्रशंसनीय शिल्प . बहुत -२ शुभकामनाएं आपको जी /

sushma 'आहुति' 1 नवंबर 2011 को 4:11 am  

गहन अभिवयक्ति....

Rewa 1 नवंबर 2011 को 5:20 am  

wah bahut khoob...har shabd dil par asar karta hai....

Anita 1 नवंबर 2011 को 9:28 am  

बहुत सुंदर अहसास... कवि दर्द को एक सुंदर आकार दे देता है...या कहें कविता स्वयं ही दर्द में ढल जाती है जब हम उसे मुक्त कर देते है...

s.chandrasekhar.india 1 नवंबर 2011 को 10:30 am  

उत्कृष्ट रचनात्मकता ..

Maheshwari kaneri 1 नवंबर 2011 को 12:32 pm  

बेहद गहन विचार और सुंदर अहसास...

रचना दीक्षित 1 नवंबर 2011 को 3:58 pm  

क्या कहूँ पढ़ने के बाद सोचने लगी हूँ कि क्या है ये जीवन, दर्द और फिर भी उसे एक नहीं अनेक बार जीने इच्छा.
आभार

Vibha Rani Shrivastava 1 नवंबर 2011 को 5:24 pm  

कितना सुन्दर है
सबकुछ स्थगित कर
पढ़ना...
और खो जाना एक अलग सी दुनिया में
जहां लिखने वाले का संसार
अपना सा लगे
आँखें नित
एक स्वप्न देखती हुई जगे
कितना नम सा
एहसास है यह
खुद को ही
समझने की तरह
बेहद सुंदर अहसास, प्रेरित अभिव्यक्ति....!!

Sunil Kumar 3 नवंबर 2011 को 7:53 am  

खुबसूरत अहसास और उनको खुबसूरत अल्फ़ाज दिए है , बधाई

amrendra "amar" 3 नवंबर 2011 को 9:17 am  

बेहद सुंदर अहसास,खूबसूरत प्रस्तुति , आभार .

प्रेम सरोवर 4 नवंबर 2011 को 4:24 pm  

सुंदर मन की सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

अमित श्रीवास्तव 6 नवंबर 2011 को 5:56 pm  

nice..
beautiful...
excellent.....

डॉ. जेन्नी शबनम 6 नवंबर 2011 को 6:09 pm  

saargarbhit rachna, bhaav ka bahut gahan vistaar. badhai.

रोली पाठक 8 नवंबर 2011 को 12:38 pm  

अदभुत.........मर्म-स्पर्शीय..

Surendra shukla" Bhramar"5 13 नवंबर 2011 को 12:49 pm  

बहुत ही प्यारी ..सुन्दर सन्देश देती नायाब रचना ..बधाई हो अनुपमा जी ..आप की लेखनी यों ही चमत्कार करती रहे
भ्रमर ५
अनुभूति की धरती पर
खिले शब्दों की फसल
अपना मार्ग स्वयं तय करती है
एक बार जो खिल गयी
एक बार जो लिख गयी
वह ध्वनि सदा संगीतमय रहती है

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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