अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दौड़ रही हैं एकाकी राहें...!

मन थक कर
बैठ गया है,
दौड़ रही हैं
एकाकी राहें!

सब हैं विकल
व्यथित से,
कौन भला
थामे बाहें!

कांप रहा है
कोमल हृदय,
सुन समय की
खामोश आहें!

ऐसे विचारशून्य
पल में,
अब क्या हम
जीवन थाहें!

गुजरेगी रात
तब शायद,
सूरज पुनः ले आएगा
नयी चाहें!

पर अभी तो-
मन थक कर
बैठ गया है,
दौड़ रही हैं
एकाकी राहें!

विचित्र लहर!

खुशबू का तो है
अंतहीन सफर
ठहरती है
हर दर पे वह मगर
बस एहसास की ही
अबूझी सी कहानी है,
चाहे जितना सहेज ले
गुजरता हुआ पहर!

हृदय में है
समाया हुआ जहर
सुधा की बात ही
करते हैं मगर
व्यवहारकुशलता की
आज यही निशानी है,
जाने इस दौर में चली
कैसी ये विचित्र लहर!

माना बड़ी ही
लंबी है डगर
थोड़ा विश्राम तो
कर ही लें मगर
यादों में संजो लें
कुछ जो बातें पुरानी है,
जाने फिर कब
लौट पाए इधर नजर!

प्रत्युत्तर में तू कब तक चुप रहने वाली है!

प्रतीक्षारत नयनों में
आशा की लाली है!
क्या हुआ जो दूर तक
फैली रात काली है!!

हम तुम्हें बहुत चाहते हैं,
ऐ! जिंदगी...
प्रत्युत्तर में तू कब तक
चुप रहने वाली है!
तुम्हे हंसना भी होगा
गाना भी होगा...
सुर ताल में बज रही
समय की ताली है!
सारे सितारे नयनों में
जो समा लिए...
आसमान का विस्तार
कितना खाली है!
तू झूम रही है धरा पर
तो देख...
कितना मंत्रमुग्ध सा
चमन का माली है!
मानव मस्तिष्क
जाने क्या ढूँढ रहा...
अंतरिक्ष की कैसी
परिकल्पनाएं पाली है!
हृदय अब भी तो
माटी से ही है जुड़ा...
चन्दन पुष्पों से सजी
पूजा की थाली है!

प्रतीक्षारत नयनों में
आशा की लाली है!
क्या हुआ जो दूर तक
फैली रात काली है!!

संकरी गलियों से चौड़ी सड़कों तक...!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कुछ पल ठहर
अपने मानव जीवन का
भान कर
ये जन्म हुआ किस अर्थ
जरा यह
ध्यान धर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कहाँ चले हो
अमृत कलश को
बिसार कर
जैसे मैं सबको छाया देता हूँ
वैसे ही, तू
निर्विकार सबसे प्यार कर
जड़ों से जुड़े रहे कदम
फिर विचरण हो
विस्तृत फ़लक तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
धरा को आने वाले
कल की खातिर तो
जरा इत्मीनान कर
कुछ परमार्थ की भी
बातें हो लें, न केवल
स्वार्थ का गान कर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

पथिक, तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पहले ही कदम पर
तुम नहीं कर सकते
गंतव्य के
सत्य का निर्धारण;
उस तक पहुँचने हेतु
मार्ग में
कई चढ़ाईयों को चढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

दुर्गम राहों पर
असीम दुविधाएं भी घेरेंगी
संभव है
विचलित हो आचरण;
पर किसी भी सूरत में
दोष
भाग्य पर नहीं मढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

कोमल एहसासों पर
आपदाएं भी चोट करेंगी
पर हो विजयी आस्था
किये हुए धैर्य धारण;
उपलब्धियों का मानक
स्वयं
अपने पुरुषार्थ से गढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

यही पूजन है!

खुले दिल से
सबका स्वागत हो
सबको स्थान मिले
हो सहर्ष दान...
विस्तार इतना हो-
जितना स्वयं
धरती आसमान...
यही पूजन है!

रहे प्रस्तुत सेवार्थ
जितनी जिसकी ताकत हो
सबके दिल हों खिले
इस अनुभूति को पहचान...
क्या गम क्या खुशी-
सब गले लगाएं
सबको अपना जान...
यही पूजन है!

बाँटीं जाएँ खुशियाँ
मौत जीवन का शरणागत हो
निर्द्वंद निर्भीक हों सिलसिले
उदित होते रहें दिनमान...
यह एहसास हो-
सब हैं एक
एक ही मालिक की संतान...
यही पूजन है!

"मैं" की लड़ाई थमेगी...!

" मेरे होने
न होने से
क्या अंतर है
पड़नेवाला!
वैसे ही तो
होता रहेगा
बारी बारी से
अँधेरा उजाला!
जिंदगी
एक पल के लिए भी
न थमेगी...
अगले ही क्षण
फिर
महफ़िल जमेगी! "

ये एहसास
जीते जी
हो जाये,
तो क्या कहना!
सुकून देगा
ठहरी हुई
संतप्त
जलधारा का बहना!
अहंकार
मिट जाएगा
"मैं" की लड़ाई थमेगी...
कुछ बादल बरसेंगे
फिर
निश्चित बात बनेगी!

आस का खग!

बर्फ की चादर
बिछी है
दूर तक राहों में
चलते चलते इनपर
हृदय कांप जाता है!

मौसम का बदलना तय था
तय थे ये काले सफ़ेद मंजर
फिर भी
आने वाली हरियाली को
आशान्वित मन भांप जाता है!

सूरज फिर से चमकेगा
फिर से धूप खिलेगी
इन विम्बों का
जीवन से
बड़ा ही गहरा नाता है!

विश्वास के सहारे
काट ली जाती हैं
दुर्गम राहें
आस का खग
अँधेरी बेला में भी गाता है!

चलते चलते ही तो सीखेंगे
सलीका चलने का
राहों में
गिरना और संभलना
हमें खूब भाता है!

कितने ही भेद छुपे हैं
मानव मन के भीतर
हृदय की गहराई
कहाँ कभी कोई
नाप पाता है!

अहर्निश चलते ही रहें
है यायावरी ही जीवन
कैसी चिंता जब हमें
राम नाम का
पावन जाप आता है!

जीवन!

धुंधले से
आसमान पर
टकटकी लगाये देखता
विश्वास है जीवन!
परिभाषा ढूँढने निकले हैं
और अपनी समग्रता में
हमारे ही पास है जीवन!

जितने इधर खड़े हैं
उन्हें लगता है,
यहाँ नहीं
उस पार है जीवन!
ये भ्रम की ही कहानी है
मृगतृष्णा का ही मिला जुला
सार है जीवन!

खोने पाने के
क्रम के बीच
नदी का सागर की ओर
प्रस्थान है जीवन!
रिश्तों को बुनते हुए
भाव औ’ भाषा का अनन्य
उत्थान है जीवन!

कहीं से विदाई
कहीं पर स्वागत
अन्यान्य कथाओं का
विस्तार है जीवन!
कोई भी भाव स्थायी नहीं
कभी जीत की खुशी
कभी हार है जीवन!

खो रही घड़ियों को
सप्रेम सहेजता
प्राणों में बसाता
प्रयास है जीवन!
परिभाषा ढूँढने निकले हैं
और अपनी समग्रता में
हमारे ही पास है जीवन!

जाने कितने मोड़...!

जीवन की
दुर्गम राह में
गाने हैं..
जाने
कौन कौन से गीत;
आने हैं..
जाने
कितने
मोड़!

चले
जा रहे हम
अनवरत..
रेत पर,
केवल
मिट जाने वाली
ही
निशानियाँ
छोड़!

कुछ छाप
ऐसे भी पड़ें
जो
अन्यान्य हृदयों की
सीमा से
हो कर जाते हों,
उन चिन्हों का
कहाँ कोई
जोड़!


सही हो
या हो गलत-
चाहे
राह कुछ भी हो
बस
मंजिल तक
पहुंचना है-
अच्छी नहीं यह बेतुकी
होड़!

मन
हो संतुष्ट सहज
परोपकार
बन जाए स्वभाव,
आये
सबके जीवन में
यह
चिरप्रतीक्षित पावन
मोड़!

जीवंत सत्य!

एक देशभक्त से हमने पूछा
बताओ तुम्हारा सपना क्या है... क्या सोचा करते हो
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करते हो

उसके रुंधे हुए गले से निकला चिरपरिचित स्वर
शरीर का मोह नहीं आत्मा है अमर
जहां हूँ वहाँ से दो कदम ही सही, आगे को बढ़ता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

दीवारों को गिरा कर दूरियां मिटानी है
मुझे नए समाज की कहानी बनानी है
इसलिए आशा का दीप जलाये, अहर्निश चलता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

भेद भाव की तलवारें जब मानवता को करती है लहुलूहान
एक दूसरे के सुख दुःख से जब पाता हूँ सबको अनजान
तब शून्य को निहारता, नीलगगन के तारे गिनता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

व्यवस्था की ईटें भ्रष्ट आचरणों की नींव पर खड़ी है
स्वप्न और वास्तविकता के बीच की खाई बहुत बड़ी है
इसे पाटने हेतु, निरंतर शक्ति से बढ़कर प्रयत्न करता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

उसकी बातें सुन हमारा मन क्रंदन कर उठा
आखिर हम भी तो इसी व्यवस्था के शिकार हैं
उस वीर की तरह अनीति देखने को लाचार हैं
फिर भी उसमें और हममें बहुत अंतर है
वह अपना सबकुछ कर देता है न्योछावर
और हम करते हैं स्वार्थ का व्यापार
हमारी भी आँखें नम हैं, पर नूर नहीं चमकता
क्यूँकि-
हम जान पर खेलने का जोख़िम नहीं उठाते!!!

जीवन के महोत्सव में...!

जीवन के
महोत्सव में
कोई जूझता अँधेरा कोना
रौशन कर आयें!

तय करने हैं
फासले बहुत
कृतसंकल्प हो अब
आलस्य दूर भगायें!

पथिकों की सहुलियत हेतु
हमारी चेतना
घर की चौखट के बाहर
एक दीप जलाये!

तन्द्रा भंग हो
जीवन के उमंग में
सजगता घुले
सहज से कुछ दृश्य सजायें!

समय के चक्र में
हैं तिरोहित सारे भाव
कुछ शाश्वत तत्व भी समाहित हों
अब तो दुन्दुभी हमें जगाये!

पथिकों की सहूलियत हेतु
हमारी चेतना
घर की चौखट के बाहर
एक दीप जलाये!

प्रश्नों में ही है निहित उत्तर!

प्रश्नों के
तिमिर व्यूह से
हमारी चेतना बन
उबारेगा,
दीप प्रज्वलित कर
हृदय में
ढ़ाल उत्तर के साँचें में
स्वयं हमें संवारेगा!

इसके लिए
संवेदनाओं के
चरमोत्कर्ष तक
जाना होगा,
इश्वर को
जानने के लिए
ईश्वरीय छवि
हो जाना होगा!

सारे उत्तर
प्रश्नों में
निहित
मिल जायेंगे,
उसकी कृपा होगी
तो
समस्यायों से हल
निकल आयेंगे!

सूर्योपासना!

विश्वास
श्रद्धा
कृतज्ञता
है उसके प्रति अपार
सूर्योपासना
है पावन त्योहार!

असीम आस्था
कठिन तप
सात्विक
है व्यवहार
दिनमणि का कृपापात्र
है सकल संसार!

तन
मन
वातावरण
हो शुद्ध, है यही सार
प्रकृति के प्रति आस्था
है जीवन का आधार!

पर्व
पूजा
प्रार्थना
हैं मानव संस्कार
पुष्पित पल्लवित इनसे
है वसुंधरा परिवार!

इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

मौसम आने जाने हैं
बादल छट जायेंगे
अश्रु बूंदों के बीच से
इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

बस कुछ पल का है विरोध
सारे भेद मिट जायेंगे
जीवन देता है अवसर
सब बिछड़े मिल जायेंगे!

इस भीड़ को एक कड़ी सा
जोड़ते चले जायेंगे
और कहीं एक कड़ी बन
इस भीड़ में मिल जायेंगे!

विशिष्ट होने की चाह कैसी
शिष्ट बुलबुलों सा खो जायेंगे
ओजस्वी शब्दों में समाहित हो
कविता में मिल जायेंगे!

मौसम आने जाने हैं
बादल छट जायेंगे
अश्रु बूंदों के बीच से
इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं!

एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती
जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती!

चलते हुए कितने ही दीप जलते हैं
सुन्दर सपने.. हृदयों में पलते हैं
साझे सपनों का इन्द्रधनुष है खिला देती
अठखेलियाँ करती हवा लौ को है हिला देती!

वसुधा की गोद में क्या क्या खेल चलते हैं
समय निर्धारित है अवसान का.. फिर भी हम मचलते हैं
क्षणिकता के सौंदर्य को कीर्ति है दिला देती
जलती हुई दीपमालिका बुझी आस है खिला देती!

यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
गंतव्य स्पष्ट हो तो संकल्पशक्ति जीत है दिला देती
जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती!

जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती
एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती!

दीपों के मद्धिम प्रकाश में...!

आवाजों की गूँज में
मौन की भाषा पहचानी जाये!
दीपों के मद्धिम प्रकाश में
अदृश्य सी दुनिया ज़रा जानी जाये!

बाहर ही बाहर भागता जीवन
अन्दर थोड़ा प्रवेश करे
इस आपाधापी से दूर
कुछ तो अतिविशेष करे
जिससे समृद्धि का पुष्प
हृदयांगन में भी खिले
ऐसी हो सुषमा जैसे क्षितिज पर
हों धरती और गगन मिले
तमाम कल्पनाओं को तो
टिमटिमाती लौ में ही हैं आकार मिले
जीवन की राहों में
सकल भाव साकार मिले

दीपों के मद्धिम प्रकाश की
महिमा सहज ही मानी जाये!
आवाजों की गूँज में
मौन की भाषा पहचानी जाये!

फिर मने दिवाली...!

निर्वासन भोग कर
लौट आये प्रभु
तो मनी दिवाली
दीपों वाली!!!

आज हैं हृदयांगन
से निर्वासित वो
आनन है खाली!
ये कैसी दिवाली!!!

मन मिले नहीं हैं
दरिद्रता से है ग्रस्त
चमन का माली!
ये कैसी दिवाली!!!

कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!

स्वार्थ के कारागार में
कैद है आत्मा और
जिद है हमने पाली
ये कैसी दिवाली!!!

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

दिया और बाती!

दिया और बाती
का संयोग
जगत की
सबसे
अनुपम घटना है!

प्रज्वलित
हो जाये जो
फिर तो
अन्धकार को
निश्चित हटना है!

संयुक्त हो
दीप
अपनी बाती से
जीवनपाठ
अकेले नहीं रटना है!

अब घटित हो
जो न हुआ अबतक
प्रगट हो जाये
अब, जो अबतक
केवल कल्पना है!

दिया और बाती
का संयोग
जगत की
सबसे
अनुपम घटना है!

ये अब जाने कौन!

बर्फ की
परतों के नीचे
दबी होती है..
ज्यूँ
पतझड़ में गिरी पत्तियां,
वैसे ही
मन की तहों में
दबे होते हैं
विचार..
कवितायेँ और
अनेकानेक तथ्य;
जब
प्रकाशित होना हो
उन्हें,
तो सारी तहें
हो जाती हैं गौण!
और
कविता बोल पड़ती है,
हो जाते हैं हम मौन!
कैसे आई
कहाँ से आई
ये अब जाने कौन!

जितने हों
दीप रौशन
राहों में..
जितनी
प्रखर हों शक्तियां,
उतनी ही कंटकाकीर्ण
होती हैं राहें
कठिन होते हैं
इम्तहान..
क्लिष्ट होता है
जीवन का आत्मकथ्य;
संवारती है
कष्ट देकर नियति हमें,
जलता है
तभी तो
विशिष्ट है दीप गौण!
स्पष्ट है
उसका संघर्ष
सारे कष्ट क्लेश मौन!
अपरिमेय प्रकाश के
आलोक में कितनी दिव्यता
ये अब जाने कौन!

दीप और इंसान!

ऊँचे पर्वत पर है जो दीप
अपनी लौ के कारण
बड़ी दूर से नजर आता है!

जलती है बाती
अन्धकार को भेदना
उसे खूब भाता है!

अपने उज्जवल प्रकाशवृत्त
की महिमा से सबका
वह आत्मीय बन जाता है!

दूर से आने वाले
अनजाने राही का मन
लौ संग गीत गाता है!

...............

यह माटी की काया भी
जो रौशन हो सत्कर्मों से
तो दीप सा जगमगाएगी!

जले जो सद्भावों की लौ
तो खिल जायेगा चमन
रौशनी दूर तक जाएगी!

औरों के दुःख से रोये
ऐसे अश्रुविग्लित नयनों की
सुषमा मुस्काएगी!

अनंत आत्माएं श्रृंखलाबद्ध हो
गीत प्रेम के गाये तो
दीपावली रोज़ हो जाएगी!

हमारे ही अन्दर है भगवान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

अकेले नहीं
जल सकता दीप,
जबतक
बाती न हो समीप;
दिया और बाती का संयोग
है वरदान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

सामना करती है
सहजता से डटकर,
नहीं आई है वह
कोई कृत्रिम पाठ रटकर;
अँधेरे से लड़ती हुई
लौ का संघर्ष है महान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

माहौल प्रकाशित हो
जलना जरूरी है,
सुवासित होने की
सम्भावना फिर पूरी है;
संघर्षरत भाव ही तो हैं
जीवन की पहचान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

घर बाहर सब दिव्य
रौशन हो,
हर कोने में उल्लास का
मौसम हो;
जगमग हो दिवाली
हो हर्षित हर इंसान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

यहाँ वहाँ
क्या ढूंढ रहे हो,
सच से
आँखें मूँद रहे हो;
सोयी आत्मा जागे
हमारे ही अन्दर है भगवान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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