अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता का प्रादुर्भाव!

जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!

होते हैं जब शब्द विकल
बाँधने को वेदना सकल
तब घास पर, ओस की बूंदों सी
मिल जाती है कविता!

खिलता है जब कोई कमल
कल्याणार्थ पीता है जब कोई गरल
तब आस का अमृत पीकर, मानों
जी जाती है कविता!

ठोस पत्थर भी हो जाते हैं तरल
ये सच है.. जीना नहीं सरल
इस उहापोह में, मूंदी पलकों के बीच
खो जाती है कविता!

कठिन प्रश्नों के ढूँढने हैं हल
आज सृजित होने हैं आनेवाले कल
इस निश्चय की ज़मीन पर, सहजता से
खिल जाती है कविता!

जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!

वे आँखें आज भी नम है!

कितनी वेदनाएं
उलझी हैं दामन में
कितना कुछ सहा है
सदियों के आवागमन ने
कितनी संतप्त हैं
जिन्दगानियाँ
धरती पर फैली
चहुँ ओर परेशानियाँ
लेकिन जाने कैसे
इन सब को
कर परे
हमें समृद्धि का हुआ भ्रम है
धरती से दूर
चाँद की दूरी नापने का मन है!

जबतक न हो स्थापित
सुख समृद्धि का साम्राज्य
हर एक को हो
मूलभूत सुविधाएँ प्राप्य
तब तक कैसे कोई
आसमान में विचर सकता है
वसुंधरा पर रेंगते कीड़े सदृश इंसानों का
भविष्य यूँ कैसे संवर सकता है
आशा लेकिन कायम है
राहें बन कर रहेंगी
इसके लिए
ये ही प्रमाण क्या कम है
पथरा जाना चाहिए था जिन्हें
वे आँखें आज भी नम है!

संरचना!

एक सपना
आज हो गया
चकनाचूर
निर्जन...
अकेले
सभी से दूर

वर्षों से
हमारी आखों में
बसा वह सपना
सच होते होते
रूठ गया
एक सपना
फिर टूट गया

स्वस्थ्य समाज की
संरचना
का स्वप्न
अंधकार पर
प्रकाश की जीत
का स्वप्न
वास्तवीकता के कगार पर
जाकर लौट गया
एक सपना
फिर टूट गया

उसी पल...
हमने
टूटे हुए
सुनहरे स्वप्न
को समेटा
उसे
देने को
उचित आकार
तत्क्षण ही
शुरू हो गए
हमारे अनवरत प्रयास
अब नहीं होगा
जीवन मूल्यों में ह्रास
फैलेगा एक नूर
अब नहीं होगा
हमारा सपना चकनाचूर

एक सुगठित समाज की
संरचना का स्वप्न
ग़र फिर धराशायी होगा..
तब भी हम
घुटने नहीं टेकेंगे
नया ताना-बाना बुन कर
निकल पड़ेंगे
एक और
नया प्रयास
जरूर करेंगे

जब तक है
जिजीविषा...
तब तक
रहेगा जीवन
और
जब तक
है जीवन
तबतक
जन्म लेती रहेंगी
असंख्य संभावनाएं
शक्ति का अभ्युदय होगा
शांति की होगी स्थापना
परिवर्तन होगा,
जो मुट्ठी भर ही सही...
मगर
सच्चे लोगों के
प्रयास का फल होगा
और
स्वप्न से
वास्तवीकता तक के सफ़र को-
विराम मिल जायेगा!!!

सर्वव्यापी सूर्य!

आसमान के
दायरों में कैद नहीं,
सुबह बन
धरती पर प्रतिदिन
उतर आता हूँ मैं!

सूरज हूँ
जीवनदायी हैं किरणें मेरी,
आस विश्वास बन
शाम की उदासी में
बिखर जाता हूँ मैं!

मिटती है भले रौशनी
और छाता है अन्धकार,
पर क्षणिकता का सौंदर्य बन
डूबने के बाद हर रोज
संवर जाता हूँ मैं!

मुझे भी छाँव चाहिए
लाँघ सभी फांसलों को,
दिखे जो सुहाना दर कोई
तो वहाँ घड़ी दो घड़ी
ठहर जाता हूँ मैं!

आसमान के
दायरों में कैद नहीं,
सुबह बन
धरती पर प्रतिदिन
उतर आता हूँ मैं!

इंसानियत का आत्मकथ्य!

गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर
झेल सबकुछ
अब तक
अड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं
करें अट्टहास
गर्वित उनका
हर उच्छ्वास
अनजान
इस बात से, कि
नींव बन
पड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं
पाते तुम
दामन छुड़ा
हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे
बिसार दूं
इंसानियत की
कड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा
तुम्हारा विवेक
आये राह में
रोड़े अनेक
तब तब
कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से
लड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो
जब राह तुम
घेर लेते हैं
जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर
होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका
छड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी
खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो
इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही
स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे
बड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

जिंदगी क्या चीज़ है!

स्कूल के अंतिम दिनों में रचित एक कविता ...करीब १० वर्ष बीत गए हैं अब, पर आज भी याद आई तो नयी सी ही लगी!!!

बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!

जब घिरे हुए हों अंजानो से
तब पता चलता है
पहचाने चेहरों
के बीच होना क्या चीज़ है!
जगह छूटती है
तब एहसास होता है
अपने आसमान तले
अपनी ज़मीन
कितनी अज़ीज है!

दुःख से भारी हो मन
तब पता चलता है
मुस्कान का
खिल आना क्या चीज़ है!
आँखों में जो बूंदें है
उनका एहसास
हमें तमाम
खिलखिलाहटों से भी
अज़ीज है!

जब वेदनाएं
प्रबल हो उठती हैं
तब पता चलता है
बंदगी क्या चीज़ है!
हाथ जोड़े
घुटनों के ब़ल बैठ
"उसकी" आराधना में लीन-
ये छवि
चेतना को
सबसे अज़ीज है!

जब ये हवाएं
सबकुछ
सुखा ले जाती हैं
तब पता चलता है
पाँव तले
घास की नमी क्या चीज़ है!
जब रोने का मन हो..
तो, रो लेना दोस्तों
हंसने की कोशिश में
रोये जा रहे हैं हम,
ये सोच,
कि अपनी तो है,
पर-
हर मोड़ पे जिंदगी
कितनी जुदा-जुदा
कितनी अजीब है!

बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!

ऐसी एक शाम आये...!

भीड़ में
बीत रही है जिंदगी,
अपनी मुलाकात
खुद से हो
ऐसी एक शाम आये...

कोई लिखता नहीं अब
पर फिर भी चाहे मन,
सुन्दर भावों से
सुसज्जित एक पत्र
जिंदगी के भी नाम आये...

सहेजते हैं कितने ही
कहे अनकहे आशीष,
सारी शुभकामनायें
सकल प्रार्थनाएं
दुर्गम यात्रा में काम आये...

भटकते हैं
मन के अंधियारों में,
पार कर निर्विघ्न सब
पहुँचें गंतव्य तक
अनूठा उज्जवल धाम आये...

बहुत उत्पात
मचा लिया रावण ने,
अब तो आतंरिक संघर्ष में
हो धराशायी वह
शुभसंकल्प सा हृदय में राम आये...

भीड़ में
बीत रही है जिंदगी,
अपनी मुलाकात
खुद से हो
ऐसी एक शाम आये...

एक अंतहीन मौन!

रह जाता है
एक अंतहीन मौन!

इंसान
चला जाता है
मगर
अपने पीछे
छोड़ जाता है
अनगिनत यादें
अपार शून्य
असह्य वेदना
और
एक अंतहीन मौन

जिंदगी
चलती चली जाती है
लांघते
अनगिनत फासले
पार करते हुए
कई पड़ाव
और
अंतिम क्षण में
हो जाती हैं
सारी बातें गौण

चक्र यह
यूँ ही चलता है
राही राह बदलता है
रह जाती हैं राहें
चलने वाला तो
चल ही देता है;
पूर्वनिर्धारित
इस घटनाचक्र का
जाने
है नियंता कौन

रह जाता है
एक अंतहीन मौन!

एक बूंद जो बिछड़े सागर से...!

एक बूंद जो बिछड़े
सागर से,
तो सागर
कुछ नहीं खोता है;
पर जो सागर है
बूंद बूंद से ही तो-
वो सागर होता है!
तुम्हें
एक कदम बढ़ाना है,
मैं भी-
अपनी शक्ति भर चलूंगी,
छोटे-छोटे प्रयोगों में ही
वृहद् सत्य
उजागर होता है!

हर इकाई की
अपनी महत्ता है,
तलवार से
किसी मायने में
कम नहीं,
भले ही
नन्ही सुई का
अस्तित्व छोटा है!

याद करें वो दोहा
जिसमें-
रहीम ने गाया था
बड़े को देख
लघु को न बीसारें
ये मर्म बतलाया था;
सुई का काम
तलवार नहीं कर सकती!
नदियों के बिना..
धारों के बिना..
परिष्कारों के बिना..
शब्द सरिता
नहीं झर सकती!

इसलिए,
महत्व सबका है
ये स्वीकारना होगा!
हमें
अपने हिस्से का
कर्त्तव्य
जी कर दिखलाना होगा!
तब
बात बदलेगी!
बहस के आगे
सरल कर्मों की
ज्योत जलेगी!

चलो..
अब चलना शुरू करें
देखें..
आगे क्या होता है!
हर इकाई की
अपनी महत्ता है,
तलवार से
किसी मायने में
कम नहीं,
भले ही
नन्ही सुई का
अस्तित्व छोटा है!

एक बूंद जो बिछड़े
सागर से.......
.............

पंछी आयेंगे...!

पेड़
राह देखते हैं,
पंछियों का-
पंछी आयेंगे...

वे गुनगुनायेंगे
मधुर स्वर-
गीतों का लेकर
शांत निर्जन राहों को,
जीवन दे जायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

वीरान पड़ी डाली
फिर से
आबाद होगी
वो नीड़
यहाँ बनायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

मौसम बदलेगा
बहार फिर आएगी
धरती की खातिर
नीलगगन का
संदेशा लायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

ये समय
निकल जायेगा
उदास पलों से मुक्त कर,
सहेजी खुशियाँ
दे जायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

ओस बन
कोमल पंखुड़ियों पर
आशा की
किरणों संग
झिलमिलायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

दिए तो जल रहे हैं
रौशन हो
दिल का भी अँधियारा
फिर कोई शाश्वत-
दिवाली मनायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

पेड़
राह देखते हैं,
पंछियों का-
पंछी आयेंगे...

रास्ते का पत्थर!

रास्ते औ'
रिश्ते की
बात करें!
थोडा चलें..
चलते हुए
आज रात करें!
चले जो राह पकड़े हम
मिटते रहे कितने ही भरम
हमने जाना
मोड़ से आगे तक
राहें जाती हैं!
हमारी चेतना
बेवजह
निराश हो
आधी राह से
लौट आती है!
चलते जाने से ही
हल
निकलेगा!
संवेदना जागृत होगी..
पत्थर का भी
हिय
पिघलेगा!

हाँ,
पत्थर से याद आया,
रास्ते में
एक पत्थर था पड़ा हुआ
जाने
कब से था
वह
वहाँ अड़ा हुआ
आने जाने वाले राही
किनारा कर
निकल जाते थे
तो कुछ
ठोकर खा
संभल जाते थे
बीचों-बीच
पड़ा वह पत्थर
हर बार
आशा खोता था!
उसके लिए स्वयं
राह से
हटना भी कहाँ मुमकिन
वहाँ पड़ा
वह
ह़र चोटिल राही के दुःख से
रोता था!

जरा सा हाथ लगा कर
हमने
पत्थर को
किनारे कर दिया!
कोई गुजरा पास से हमारे
उसकी मदद से
हमने
वह भार उठा
किनारे को धर दिया!

फिर वेदना से सिक्त हिय ने
पत्थर की बात सुनी
पत्थर के उदगार सुने
कुछ बात गुनी-
"सिर्फ एक सोच-
एक चाह चाहिए
रास्ता खुद बन जायेगा,
बस दृढ़ता को
एक ठहराव चाहिए
मेरे बाद भी
कोई आएगा
बेचारा अनजाना
शायद ठोकर खाएगा
इसलिए
समस्या का
निदान करता चलूँ
आने वाले के लिए
राह कुछ
आसान करता चलूँ-
इतना सोचे बिना
जो आगे बढ़ गया
वह आगत
सभी
सुखद संभावनाओं को
दगा दे गया"

ये थे
पाषाण हिय के
उदगार!
आँखों में
नमी की कमी
रुला रही थी बारम्बार!
आश्चर्य!
चारों ओर
संवेदनहीनता
है छायी!
ऐसे में
पत्थर का हिय सोचा
संवेदना की
ज्योत जलायी!

सच!
है पात्रता
तभी तो
चोट वह खाता है
नियति द्वारा
क्या खूब
तराशा जाता है
और उसी पत्थर का अंश
मूर्ति की आत्मा हो जाता है!
खो कर अपना "निज"
पत्थर देवरूप बन जाता है!
.....देवरूप बन जाता है!

भावों की धरती... अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

बादलों से
आच्छादित
है भावविभोर अम्बर,
और
सत्यनिष्ठ
सहनशील धरा है!

विडम्बना ही है-
अंतर अकालग्रस्त
और बाहर,
कृत्रिम संसाधनों से
सज्जित
सबकुछ हरा भरा है!

मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!

चलता ही रहता है शोरगुल
खामोशी..
बोल न पाती है,
हमने खोये हैं मनभावन शब्द
भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

पेड़ अद्भुत दानी है!

पेड़ की व्यथा, मानव हृदय की ही तो व्यथा है.... वातावरण के प्रभावों को झेलते हुए आखिर उसके मन में भी तो आता होगा कि बिना उससे हरेपन की उम्मीद लगाये कोई उसे स्नेहपूर्ण छाँव दे, उसकी सूखी डाली पर आस का पंछी गाता रहे, ऐसी कोई व्यवस्था हो नियति के द्वारा..... कौन जाने!

चिर प्रतीक्षा
में लीन,
हृदय के उदगार!
पेड़
अद्भुत दानी है,
करता ही रहा उपकार!

स्थिरचित्त क्या डिगेगा
जगत करे
कुछ भी व्यवहार!
कालचक्र की क्रूरता असह्य,
अब भी
पेड़ से है दूर बहार!

धैर्य की
और कितनी परीक्षा होगी,
कब तक करे वह इंतज़ार!
पर अविचलित
अटल खड़ा वह,
आस की महिमा है अपार!

देख रहा है जाने कबसे
आने-जाने वाले
राही भिन्न प्रकार!
छाँव देते दिल बहलाते
सह रहा,
कितने ही निर्मम प्रहार!

फिर भी
अविचलित,
करता ही रहा उपकार!
शायद कोई सहृदय
साथ हो ले
हो जाये स्वप्न साकार!

दुनिया में सहृदयता
अब भी शेष है
है कुछ बातों में सार!
प्रमाणित हो यह, जब-
पेड़ को बिना शर्त
मिले वसुधा का प्यार!

कोई तो समझे
पेड़ की व्यथा को
इतना कृतघ्न क्यों है संसार!
पेड़
अद्भुत दानी है,
करता ही रहा उपकार!

जीवन संगीत!

जीवन की
विचित्र
ही है रीत!
दुःख दर्द ही जैसे
हों मानव के
सच्चे मीत!
सौहार्द प्रेम की
अनोखी
पहचान लिये,
अधरों पे खिला
मनामोहक
एक गीत!
मेरे दामन में
एक
फूल था केवल,
कैसे बनती माला
कैसे
एकाकी होती जीत!
तभी सहृदयता का
पावन
स्पर्श हुआ,
साथ हो चली
अन्जान विम्बों से
स्फुरित होती प्रीत!
संबंधों का सार छुपा है
साथ बढ़ते
क़दमों में,
अब भी
सांस लेते हैं
कुछ रिश्ते पुनीत!
अविरल बहती धारा में
प्रतिपल
मुखरित जीवन संगीत!

इंसानी फ़ितरतों में घुला इतना जहर क्यूँ है!

जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!

खो गयी बीते शाम ही
सारी खुशबू,
पंखुड़ियों का-
ऐसा क्षणिक..
सफ़र क्यूँ है!

आसमान छत है
और जमीन ही ठिकाना है,
ठिठुरती रूहों पे-
बरपता..
ऐसा कहर क्यूँ है!

झूम रही हैं लताएँ
जाने किस ख़ुशी से,
मेरे आँगन में-
ठहरा..
ये उदास पहर क्यूँ है!

सुना है फैली हुई
अमन की बस्ती है यहाँ,
नफरतों के लिए-
बदनाम..
फिर ये शहर क्यूँ है!

हर आँख में पानी
रोता हुआ हर दिल,
फिर पास से गुजरता-
सूखा..
ये नहर क्यूँ है!

हर पल
हार ही तो रहें हैं जिंदगी,
फिर बेवजह-
जश्न की..
ये लहर क्यूँ है!

हवाओं में
गाते परिंदों की ताने घुली है,
इंसानी फ़ितरतों में-
घुला..
इतना जहर क्यूँ है!

जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!

कृतज्ञ लेखनी!

मेरी क्या बिसात थी..!
कविता ने
मेरा वरण किया..
जब नीरवता में खोयी-
चेतना को घेरे हुए
काली रात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

शब्द
थिरकने लगे-
कहीं से
हो रही
स्नेहमयी बरसात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

मेरा कुछ भी नहीं..
केवल
प्रेरणा का प्रताप है-
प्रेरक हौसले की ही
यह सौगात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

शब्दों ने
व्यक्त होने को
मेरी लेखनी चुनी,
स्याही धन्य, आज-
कोई अनन्य सी बात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

एक सुखद परिवर्तन हो!

ज्ञान चक्षु से
दृश्य का अवलोकन हो!
आशा का दीपक जलता रहे,
यही हृदय के भावों का प्रयोजन हो!!

ये विस्मरण का दौर है-
हम भूल रहे है अपनी संस्कृतियों को
नवीनता के साथ-साथ,
गौरवपूर्ण मूल्यों का भी संवर्धन हो!!

आने वाली सन्ततियाँ-
इस युग को भी नमन करे
इस युग के हम कर्णधारों द्वारा,
ऐसा भी कुछ समायोजन हो!!

जीवन भर लगी रहेगी-
दिवा-रात्री की आवाजाही
तन्द्रा भंग हो..कुछ लोग तो जागें,
आज संध्या से पहले एक सुखद परिवर्तन हो!!

ज्ञान चक्षु से
दृश्य का अवलोकन हो!
आशा का दीपक जलता रहे,
यही हृदय के भावों का प्रयोजन हो!!

सत्य की ओर!

तोतली बोली का बयान
क्या कहेगा कविता
कोई मुझ सा अनजान!
पर फिर भी,
अगर सम्भावना नजर आती है
मुझमें कविता के प्रस्फुटन की-
आस दिख जाती है
तो, ईश्वर कृपा से..
तुलसी मीरा के देश की
यह बिटिया,
किसी छंद में
उतार लाएगी-
सकल दिव्य रश्मियाँ,
उस प्रकाश से
आलोकित होगी शाम!
आखिर तो,
अंतिम सत्य है ही राम नाम!
बड़े सत्य की
मंजिल तक पहुँचने हेतु-
पार करते हैं,
कितने ही छोटे-छोटे सत्यों के-
ताल..तलैया..नदिया..सेतु,
तब जाकर बात प्रगट हो पाती है!
परम सत्य के दिग्दर्शन से-
स्वतः
यात्रा की सारी थकान
मिट जाती है!
ऐसा अद्भुत संयोग
हम सबके जीवन में आये..
बुझने से पहले
लौ एक बार अवश्य,
माहौल प्रकाशित कर जाये..
तो..ही ये जीवन सार्थक है!
अपनी-अपनी चाल से
सब बढ़े सत्य की ओर-
हम स्वयं ही
अपनी राह रोके खड़े हैं..
कोई और नहीं बाधक है!!

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

दोस्ती अत्यंत सुन्दर रिश्ता है...सखा भाव में ही तो सारे भावों की धाराएँ आकर तिरोहित हो जाती हैं! एक द्वन्द से घिरी कविता.., जो रिश्तों को दोस्ती का नाम देना तो चाहती है पर ठिठक जाती है! स्वार्थ के रिश्तों को आखिर दोस्ती का नाम कैसे दे दिया जाये...; दोस्ती तो कृष्ण-सुदामा के अद्भुत रिश्ते को ही कहते हैं! है न....

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
कृष्ण-सुदामा की
अद्भुत मैत्री की झाँकी
कहाँ मिलेगी आज...
उस भाव से भिन्न
अगर है कुछ,
उससे,
कमतर अगर है कुछ,
तो-
उसे दोस्ती-
कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
जो दिव्य प्रतिमान
हैं विद्यमान
उनके अनुरूप कहाँ हैं
संबंधों की गरिमा...
कहाँ शुद्ध है हमारा आचरण,
संवरे न विचार
सरल न हो हृदय
तो-
शब्दों के व्यूह मात्र को-
प्रार्थना कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

ऐ जिंदगी! हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

तेरी राह के काटों को
तहे दिल से स्वीकारा है..
तेरी बेबसी को हौसले के साथ जिया है
तेरा हर रंग हमे प्यारा है..,
तमाम विरोधाभाषों के बावजूद-
सपनों के अम्बर पे
इन्द्रधनुष सा खिलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हर ओर छिड़ी है
स्वार्थ की लड़ाई..
क्यूँ है ये विरोध
क्यूँ रूठा है भाई से भाई..,
इस वेदना से तड़पते हुए-
अश्रु बूंदों को दृगों से
नित ढ़लते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कभी कुछ तो कभी कुछ और में
उलझा हुआ..
वक़्त की मार झेलते हुए
कुछ कुछ झुका हुआ..,
बढ़ते हुए अनजान क्षितिज की ओर-
धूप-छाँव का खेल
निरंतर चलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कई उद्देश्य हैं
हासिल करने को..
कोई नहीं है
हृदय की पीर हरने को..,
ऐसे में चाँद तारों की परवाह किये बिना-
एक नन्हे फूल को
अपने आँचल में समेटते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

भागते समय की
धार पे..
किसी शाम को
बैठ किसी किनार पे..,
आशा-निराशा का ताना-बाना बुनते हुए-
दिवस भर का...जीवन भर का
आंकड़ा जोड़ते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

लोग रिश्तों का
दम भरते हैं..
साथ और प्रेम की
व्याख्या करते हैं..,
मगर श्मशान की नीरवता में-
मरने वाले के साथ
कहाँ किसी को मरते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हर दिवस के बाद
सांझ का आना..
और सांझ का
रात्री में परिवर्तित हो जाना..,
कई बार चलते हुए राहों में-
हमने "राम नाम सत्य है" को
उच्चरित होते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हमारी बाहें थाम
सत्य का दिग्दर्शन कराना..
थकी हारी आत्मा के लिए
तू संजीवनी बन जाना..,
घोर निराशा के अन्धकार में-
अद्भुत ज्योति सा
खिलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कविता कोश को मेरा शत शत नमन!

कविता कोश(www.kavitakosh.org)से मेरा परिचय कुछ दिनों पूर्व हुआ.... यह बड़ी ही सुन्दर परिकल्पना के तहत सृजित है; इसके संस्थापक बधाई के पात्र हैं.... निस्वार्थ भाव और सच्ची निष्ठा से ही ऐसे यज्ञ संभव हैं!
कुछ पंक्तियाँ इस अमूल्य धरोहर के प्रति:-

सकल काव्य पुष्पों का सार्थक संचयन!
कविता कोश की परिकल्पना को नमन!!

असंख्य मोतियों को पिरो कर
बनायी एक माला!
साहित्याकाश पर चमकता हुआ
सात्विक श्रम का उजाला!
ये अक्षय अमित
आशाओं की कहानी है!
"कविता कोश"
अद्वितीय संकल्पों की निशानी है!

जुड़ते रहें स्तम्भ, लगी रहे लगन!
कविता कोश को मेरा शत शत नमन!!

जो कह जाते हैं.. सब अनायास है!

स्वयं से ही प्रश्न करती और स्वयं ही उत्तर तलाशती कविता:-

क्या गम है तुम्हें,
क्यूँ तेरी कवितायेँ उदास हैं?

इतने आशीष..
इतनी सुखद संभावनाएं,
सब तो तेरे पास है!

तुम्हें खो जाना चाहिए..
सुनहरे प्रेमपूर्ण छंदों में,
तेरे क़दमों तले कितनी नर्म घास है!

क्या गम है तुम्हें,
क्यूँ तेरी कवितायेँ उदास हैं?

.............................

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

क्या दे इसका उत्तर कविता,
जब उसके पास केवल..
चन्द लम्हों की ही सांस है!

पास घिरे बादल हैं,
और कितने ही पहचाने..
अपने से, विम्ब उदास हैं!

धरा की गोद में,
प्रतिपल खेलती है विडम्बनायें..
राम के प्रारब्ध में वनवास है!

फिर, कैसे हँसे कविता,
हाँ, आशान्वित ज़रूर है वह..
गाती गुनगुनाती उसकी आस है!

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

सिर्फ मुस्कराहट ही होनी थी,
जिस डाल की पहचान..
उसके हिस्से में खंडित प्रकाश है!

जग में क्यूँ ऐसे वितरित हैं,
अन्यायपूर्ण विधान..
विधि! यह तो तेरी शक्ति का उपहास है!

असमय मुरझाई,
कलियों का अनकहा दर्द..
चमन के पास है!

नहीं व्यक्त होती हैं,
सायास भावनाएं..
जो कह जाते हैं.. सब अनायास है!

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

एक आशान्वित परिकल्पना!

कुछ बातें हैं,जो कविता की आत्मा होती हैं; अपनी निराशाओं..अपनी टूटती अभिलाषाओं को देख..टूटते मन को सँभालने का प्रयास ही तो है कविता..
औरों को समझाने का बहाना लेकर खुद को ही समझाने और टटोलने का नाम ही तो है कविता..! कुछ दिन हुए एक रचना पढ़ी थी- रंगों जैसे लोग की तलाश में कवि ने सारी मार्मिकता को जैसे पिरो डाला था; सच अब लोग रंगों से नहीं होते .... मिल कर भी कहाँ मिलते हैं..व्यस्तता के बीच समय कहाँ है जो रंगों की बात की जाए..रंगों सा हुआ जाये! पर जाने कैसे रंगों जैसे लोग... नहीं होते के भाव से हमारी चेतना रंगों की तरह कैसे मिल गयी और हमने लिखी एक कविता इस भाव के साथ, कि भले न होते हों रंगों से लोग अब..लेकिन क्यूँ ये आस छोड़ी जाए, कि रंगों की तरह मिलकर एक हो जाने वाली बात आज भी उतनी ही सही है जितनी कभी रही होगी!
आखिर ये दुनिया चल रही है तो ऐसे ही कुछ स्पर्श..ऐसे ही कुछ अनचिन्हे मेलों के बलबूते पर ....


स्वयं को समझती... समझाती हुई एक भावदशा:-


हे! संवेदनशील मित्र..
हे! आदरणीय भ्राता..
सच है, आज के युग में
मात्र भ्रम ही है प्रगट हो आता..


मगर युगों के संस्कार भी
सांस ले रहें हैं
जो हमसे..तुमसे
यह कह रहें हैं-
स्वार्थ के कारागार से निकल
आत्मा मुक्त होगी...
मेरी वाणी
मेरे हमसाये की चेतना से संयुक्त होगी...


और होगी
एक दिव्य सफ़र की शुरुआत
कब तक आखिर
रूठा रहेगा प्रभात
रौशनी में...
युगों के सम्बन्ध स्पष्ट होंगे
छूमंतर...
हिय के सारे कष्ट होंगे


अवश्य कोई
तुम्हारे स्वप्न की बाहें थाम चलेगा...
"मैं"..."तुम" नहीं
बल्कि "हम" का सूरज चमकेगा...
रंगों के मेल सा
कुछ अघटित घटेगा...
अप्रतिम सुषमा से हृदयधाम चमक उठेगा...


आत्मा-परमात्मा के मिलन सी
कोई अद्भुत बात
चकित कर दे तुझे
आज की रात
फिर रंगों के मिलने की
गरिमा पहचानोगे...
प्रभुकृपा से कुछ अद्भुत विश्वास
मन की कंदराओं में पालोगे...


तब तक आशान्वित परिकल्पनाएं
हो तेरी त्राता..
हे! संवेदनशील मित्र..
हे! आदरणीय भ्राता..

मेरी अभिलाषा!

कविता कभी कभी नितांत निजी वेदना की अभिव्यक्ति होती है, लेकिन कलम की नोक से आगे का उनका संसार वृहद् होता है। कविता की सार्थकता तभी है जब वह निज वेदना का सीमित धरातल छोड़ कर आगे की ओर अग्रसर हो... हर एक पढ़ने वाले को वह अपनी बात लगे... लिखने वाले के भाव और शब्द बह कर पढ़ने वाले की अनुभूतियों का अंश बन जाये!
यही सब बातें बादलों की तरह मानसपटल पर छाई हुई है, शायद एक कविता बरसे फुहारों की तरह... आंसू की तरह, और आद्र करे उन अन्तस्तलों को जो स्वयं इस कविता की प्रेरणा है! और फिर प्रेरणा का रूप तो शब्दों से परे है... साँसों के गीत के साथ जुड़ी है प्रेरणा; भला उसे क्या नाम देना...!




आँखों में आंसू लिए
मेरी कलम चल रही है,
वेदना
धरा-अम्बर की गोद में
बेफिक्र टहल रही है,
ऐसे में
कुछ अन्तर को
छू जाता है...
एकाकी हृदय
अनायास
सुकून पाता है...
और फिर
मौन निकलती है राहें!
थामें
उत्कट अभिलाषाओ की बाहें!!


मेरी यह अभिलाषा, कि
श्वेत छंद गाये जायें
जो कुछ भी
है विशुद्ध उज्जवल
वे छवियां प्रकाश में आयें
मेरी यह अभिलाषा, कि
किरणें बिखरे
दूर तलक
उसकी सीमा
धरती ही नहीं
प्रकाशित करे वह पूर्ण फ़लक
मेरी यह अभिलाषा, कि
मरूभूमि में भी
मृदुल छन्द जायें गाये
राहगीरों की खातिर
घर की चौखट के बाहर भी...
हमारी चेतना एक दीप जलाये


बातें कितनी ही सार भरी
हिय में मचल रही है
हमेशा से
कवितायेँ ही हमारी
नितांत निजी वेदनाओं का हल रही है
ऐसे में
सरिता का बहना
स्वतः हो आता है
जो है पढ़ता
बात कवि की, वह उसे
अपनी बात बताता है
और फिर ऐसे में हम
कैसी-कैसी गहराई को थाहें!
विश्व वेदना की बात चली हो
निज सुख की मिट गयी हो चाहें!!


मेरी यह अभिलाषा, कि
कविता मुक्तकंठ गाये
अंधियारे में
प्रेरक आत्माएं
प्रकाश पुंज बन जाये
मेरी यह अभिलाषा, कि
सृजन की राह में
कभी न जाये चेतना थक
उसकी सीमा निजता से वृहद्...
पहुंचे वह आत्मिक छोर से
भीड़ के शोर तक
मेरी यह अभिलाषा, कि
शब्दों की सच्चाई से
कोलाहल थम जाये
ह़र सच्चे गीत की
प्राण-प्रतिष्ठा हो, तेरा गीत
जरा हम भी तो गुनगुनायें


आँखों में आंसू लिए
मेरी कलम चल रही है,
वेदना
धरा-अम्बर की गोद में
बेफिक्र टहल रही है,
ऐसे में
कुछ अन्तर को
छू जाता है...
एकाकी हृदय
अनायास
सुकून पाता है...
और फिर
मौन निकलती है राहें!
थामें
उत्कट अभिलाषाओ की बाहें!!

चन्द लम्हों की साँसे...कुछ मूक आवाजें!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

चमन की वादियों में
आंसू के मोती झरते हैं,
"वन्दे मातरम" से...
"वनडे मातरम" तक के
बारे में सोच
वे रोया करते हैं;
एक सूत्र में आबद्ध कर देते थे,
कहाँ गए वो धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

भोग-विलास हेतु
लगी हुई कतारें हैं,
बाज़ार और
घर के बीच की-
हा! कहाँ गयी
वो दीवारें हैं;
भाई की कलाई से विलुप्त
आज राखी के धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;
उस दौर को इस दौर से जोड़ रहे
अदृस्य से धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

परिवर्तन शाश्वत है...!

स्तब्धकारी
निराशा की
सीमा ही नहीं है!
कहती है
वीरान पड़ी डाली
जीना ही नहीं है!

पर अनभिज्ञ है वह,
इस तथ्य से-
मौसम परिवर्तन के साथ,
वह फिर हरी भरी हो जायेगी!
निर्जन मौन आज है,
पर कल हवा पुनः गुनगुनायेगी!

निराशा का यह अन्धकार ही,
आने वाली बहार का-
सूचक और सर्जक है,
आशा की कली न मुरझायेगी!
हरेपन की सुषमा जल्दी ही,
पुनः लौट आयेगी!

ये कैसा हठ कि
अभिलाषाओं का अमृत
पीना ही नहीं है!
कहती है
वीरान पड़ी डाली
जीना ही नहीं है!

जिजीविषा के मंत्र से,
प्रेरित हो-
डाली की व्यथित मनोदशा,
स्वतः परिवर्तित हो जायेगी!
एक बार अन्तःचक्षु जो खुल गए,
सारी गाँठ खुल जायेगी!

फिर पत्तियों के बिछोह से,
मर्माहत डाली-
कुछ तो संयत होगी,
परिवर्तन को हंसती हुई अपनायेगी!
बनी रहेगी ठूंठ मगर,
आत्महंता नहीं कहायेगी!

जीवनपथ पर
संभावनाओं की
सीमा ही नहीं है!
सार्थक हो कुछ,
मात्र जीने के लिए जीना तो
जीना ही नहीं है!

काटों के बीच खिली कली स्वयं ही सन्देश है!

दर्द के देश में
मौन परिवेश में
सहनशक्ति की परीक्षा
अभी शेष है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

निर्मम हवाओं से
लड़ती लौ को
नहीं किसी से द्वेष है
प्रारब्ध से कोई
शिकायत ही नहीं
लुप्त सकल क्लेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

दुर्गम प्रदेश में
परिस्थितियों के वेश में
परखने को भक्त की निष्ठा
आता स्वयं सर्वेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

गहराई को मापने
की प्रक्रिया कुछ जटिल
कुछ विशेष है
जीवन में
सुख दुःख के विधान का
स्वाभाविक समावेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

प्रतीक्षारत नयनों में आशा अथाह है...!

"मेरे सुख दुःख से
सरोकार रखने वाला
होता कोई एक प्यारा साथी!
काश..होता कोई ऐसा
जिसे मेरी-
अटपटी भाषा आती!
कहने को...
समझने को परस्पर
मौन ही होता पर्याप्त,
जीवन में
कितने मनोरम होते तब
सूर्योदय औ' सूर्यास्त!
सह जाते सारी पीड़ाएँ
कर देते
परिस्थितियों को परास्त,
हर लेने को
सारी विषमता
उसका स्पर्श ही होता पर्याप्त,
जीवन में
कितने मनोरम होते तब
सूर्योदय औ' सूर्यास्त!"
.............

ये,
हर हृदय की
अनकही सी चाह है!
रिक्तता के बोध से
जन्मी करुण आह है!
दुविधाओं से घिरी
अकेली जीवन राह है!
चिरप्रतीक्षित खुशियों को,
आना ही होगा
प्रतीक्षारत नयनों में-
आशा जो अथाह है!
धरती पर,
किसी न किसी को तो ज़रूर
आसमानी बादलों के-
अरमानों की थाह है!
खोने पाने के
गणित से अनभिज्ञ-
मन तो बेपरवाह है!
साये की सन्निद्धि,
हर हृदय की
अनकही सी चाह है!

सजल नयन..!

एक कविता सजल नयनों की मुस्कान में विम्बित इन्द्रधनुषी सुषमा के लिए, सपनों के अम्बर पर आस विश्वास के सितारों के लिए, जीवन के अधूरे वाक्यांशों की व्यथा के नाम....

"सजल नयन"

अधूरे सपने
जगमगाते हैं नयनों में
सच होने को मचलते हैं
उनके मन-प्राण
पर जाने क्या है,
जो आस को-
हर बार झूठलाता है
सपना...
सच होते-होते...
रह जाता है!

ऐसी नीरस बेला में भी
दूब आस की उगी रहे चमनों में
आज भले हो निर्जन
पर नहीं रहेगी वाटिका सुनसान;
कोंपले फुंट ही आएँगी,
अद्भुत आस का खग-
अँधेरी बेला में भी गाता है
भले मिलते-मिलते...
हर रोज़, अम्बर...
धरती से जुदा हो जाता है!

उमड़ते हैं
भाव सागर नयनों में
आंसू बन बह जाने को मचलते हैं
उनके मन प्राण
पर पलकों में बंद कर
अश्रुबुन्दों को-
सजल नयन, मुस्कुराता है
सपना...
सच होते-होते...
रह जाता है!

बादलों का सहोदर!

बादल किसी से कुछ नहीं लेते..... उनका तो एकमात्र ध्येय है बस छाना और बरस जाना.... स्नेहमयी बूंदों से आद्र कर जाना सबों को! यूँ ही यह कविता कुछ रोज़ पहले लिख गयी थी.... मेरी कलम से! मुझे बादलों का सहोदर जो मिला..... तो मैंने जाना, बादल की व्यथा को, और उसके भावों से साम्य स्थापित करते हुए..., बादलों के सहोदर ने, मुझसे यह कविता लिखवा दी! आज ऐसी ही एक स्नेह भरी बारिश ने मेरे इस सृजन संसार (इस ब्लॉग) को नीले रंग की सुषमा से भर दिया....
मन अभिभूत हो तो शब्द मौन हो जाते हैं.....!!!
बादलों की बातें करते हुए ललित भैया की प्रेरणा से यह रचना अस्तित्व में आई थी...., आज उन्ही के द्वारा नए रूप में सजाये गए "अनुशील ...एक अनुपम यात्रा" पर सबसे पहले उन्ही की प्रेरणा से लिखी एक कविता.....

"बादलों का सहोदर"

बादल अपनी व्यथा-
उनसे कहते हैं...
वो पीर लिए हृदय में-
हँसते हुए सबकुछ सहते हैं...

और अगर यह कहूं-
तो न बादल ही मानेंगे,
न आप ही कभी जान पाओगे
कि दोनों के भाव
मेरी आँखों से निरंतर बहते हैं-
कभी आंसू तो कभी प्रार्थना बनकर
कभी सांसारिक विरक्ति
तो कभी याचना बनकर
कोई क्या पहचानेगा-
कि भावनाओं का तार
कैसे रिश्ते जोड़ जाता है
तेरा दर्द-
अनजाना होकर भी
क्यूँ (?) मुझे यहाँ रुलाता है!

जैसे बादल-
तेरे अपने हैं...
वैसे ही दूर क्षितिज पर तैरते-
मेरे भी कुछ सपने हैं...
मेरा भी-
छाए हुए बादलों से सरोकार है...
हृदयहीन नहीं हैं,
सुशील हृदया की आँखों में भी-
बादलों सा एक संसार है...
कौन कहाँ कैसे जगह पाता है
मीलों लम्बी दूरी है फिर...
क्यूँ (?) मुझे सबकुछ स्पष्ट नज़र आता है!


सभी भ्रांतियों से परे-
कथा कहनी है...
पेड़ क्या जाने-
कितना रोई टूट कर,
वो जो एक टहनी है...
बहनें कहाँ जड़ों संग रह पाती हैं...
जहां जन्मी...वहाँ से परे
दुनिया अलग बसाती हैं...
वैसे ही जैसे-
बादल जन्मते है कहीं...
हो जाते है कहीं के...
और बरसते हैं कहीं
फिर भी हृदय तो
बचपन के आँगन के लिए
रोता है न...
बादल बिना सोचे,
धरती की आद्रता की खातिर
अपना वजूद खोता है न...
सब विम्ब जुड़े हुए से हैं;
गर जुड़े नहीं हैं तो,
"जल की आस ... सागर सा हृदय"
क्यूँ (?) मुझे यूँ उद्वेलित कर जाता है!

बादल मेरा भी सगा है...
और जाने क्यूँ
मुझे अभी अभी ऐसा लगा है...
कि आपके हृदय की बात,
मुझ तक है आयी
आशीषों से भरी वाणी ने
मुझको आवाज़ लगायी:
"बादल...तू और मैं-
ये सब जाने दे!
जीवन के इस महासमर में
गीत तराने गाने दे!"
कविता-कहानी, कर के-
यह सब परे...
जीवन की-
व्यवहारगत सच्चाईयों को
जब हम टटोलने लगे...
तब मन बहुत रोया
तेरे दर्द का कोई बीज-
शायद विधाता ने,
मेरे भीतर भी है बोया
तभी तो ये जुड़ाव है...
भैया! आपके नेह की अनुपम यह नाव है!

और क्या बोलूं
बादलों के सहोदर से!
मेरी सारी खुशियाँ, उन्हें दे डालो
इस राखी पर...यही याचना है, गिरिधर से!

(२१/८/२०१०)

एक भावयात्रा...प्रकृति की गोद में..!

नीला अम्बर नीला समंदर
सुनहरे बादल सुरीली लहर

झिलमिल करती..
किरणों की चादर,
झुका धरती की ओर
गगन सादर,
जल तरंगों में-
बहते पल
चहुँ ओर फैली-
शांति निश्छल
सागर की लहरों की
झंकार
सृष्टी हो जैसे
नीले रंग का विस्तार
किनारे विलीन...
न आदि न अंत,
क्षितिज की सीमा तक
आशाएं अनंत,
वहाँ जरूर मिलते होंगे..
धरती गगन
ये सोच आह्लादित है हम,
मन ही मन
चहुँ ओर अथाह
जल ही जल
किनारों सी विलुप्त, मानों
चाहें सकल
विस्मित किये हुए हैं,
लोक दृश्यमान
जल थल औ'नभ के-
रिश्तों का विधान
है यह सृष्टी
अद्भुत रहस्यमय !
समाये हुए कितने अचरज..
कितना विस्मय !!

विस्मित नयनों में भी
एक समंदर है,
एक दिव्यलोक-
सबके अन्दर है,
भावनाओं की लहरें..
हृदय किनारों से टकराती है
बादल से हृदय सीमायें..
आच्छादित हुई जाती है
जल के विस्तार पर-
संस्कार की किरणें पड़ती है,
परिस्थितियों से-
आत्मशक्ति निरंतर लड़ती है,
कभी अथाह तो कभी-
क्षितिज सी रम्य,
हृदयप्रदेश की-
बातें हैं अगम्य,
उन्ही गहराईयों से आते हैं,
कैसे कैसे निर्देश
अनसुना कर जिसे, हम तकते हैं
जाने क्या निर्निमेष
इसी तरह हो जाता है..
दिवस का अवसान,
सागर की गोद में
अदृश्य हो जाते हैं दिनमान,
आंतरिक स्वर दब जाते हैं
कोलाहल में,
कभी विस्तृत सागर..
तो कभी निर्जन मरुस्थल में,
बीतने में जीवन को-
लगते ही कितने पल हैं !
आज हैं..और अगले ही क्षण,
हम बीता हुआ कल हैं !!

क्षणिकता के इस सौंदर्य को,
सरसता से जो जीना हो
जितनी भी मिली, उस जीवनामृत को
सहजता से जो पीना हो
तो ज़रा रफ़्तार
धीमी हो
वाणी ज़रा
भावभीनी हो
ईशनाम के संकीर्तन से
गूंजती हो हवाएं
रामनाम का संग्रह कर ले,
सूरज डूबा जाए
अस्ताचलगामी सूर्य की
मनोहारी छवि
भर ले अपने दामन में,
अब विदा हुए रवि
लो, अब तो-
शाम हो चली है
जिंदगी कितनी निर्मोही-
औ' छली है
मृत्यु के कगार पर
अकेला छोड़ आती है
किसी अनचिन्हे क्षण
मुँह मोड़ जाती है;
कहाँ से चले थे..
और कहाँ चले आये
कलम की यात्रा भी
कैसे-कैसे रंग सजाये
कभी नीले रंग की सुषमा,
कभी श्याम संसार !
युगों युगों से सत्कर्म ही है
जगत का आधार !!

नीला अम्बर नीला समंदर
सुनहरे बादल सुरीली लहर

खोज ईशतत्व की: एक बालसुलभ प्रयास...!

जीवन के इस
महासमर में,
गति का ही गणित है!
एक ही रूप में वो-
विद्यमान सबके भीतर
धमनियों में जैसे बह रहा शोणित है!

राम ही
रहीम,
वही गीता वही कुरान!
फिर क्यूँ बाँट रहा-
दिव्य शक्ति को
टुकड़ों में इंसान!

वही मसीह की
करुण प्रार्थना,
वही पैगम्बर!
वही धरती की
सहनशीलता-
वही विशाल अम्बर!

नानक की
वाणी है वो,
ह़र भक्त की पहचान वही!
नाम अलग,
दर्शन भिन्न-
पर एक ही है सबका हरि!

परमशक्ति की
परिभाषा नहीं होती,
उसे महसूस किया जाता है!
बहस का औचित्य नहीं-
उसकी सत्ता को
स्वयं जिया जाता है!

इश्वर को पहचानने के लिए,
हमें खुद ईश्वरीय छवि में
ढलना होगा!
अपनी पीड़ा भूल-
औरो का कष्ट हरते हुए
कुछ दूर चलना होगा!

फिर देखना! वह जो भी है-
राम-रहीम-जेसुस या नानक,
स्वयं प्रकट हो जाएगा!
वो तड़प जगाएं भीतर,
फिर तो भक्त के द्वार-
कन्हैया दौड़ा चला आएगा!

जीवन के इस
महासमर में,
गति का ही गणित है!
एक ही रूप में वो-
विद्यमान सबके भीतर
धमनियों में जैसे बह रहा शोणित है!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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