अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सबकी एक सी पीर है...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

उस सीमा की तलाश व्यर्थ,
खोने-पाने के गणित से परे-
जब मन ही फ़कीर है...!

क्षितिज पर डूबता सूरज और
उगती हुई लाली पर क्या लिखें-
जब धरती पर छाई समस्याएं गंभीर है...!

क्षमता ऐसी,कि पर्वत लाँघ ले
हौसला ऐसा,कि सागर बाँध ले
फिर भी यहाँ कईयों से रूठी तकदीर है...!

मुक्त होना अगर चाहे-
तो बस पल भर की ही बात है,
हमारी अपनी सीमित सोच ही पाँव की जंजीर है...!

सकल कर्तव्यों के संपादन हेतु-
इसी पल उद्धत हों मन प्राण,
समय नहीं रूकने वाला,हर क्षण मिट ही रहा शरीर है...!

संग्रह की गयी सब उपलब्द्धियां
सारे सामान...यहीं रह जाने हैं
आवाजाही के इस चक्र में सबकी एक सी पीर है...!

भेद सारे यही समाप्त हों जाते हैं
उस दरबार के समक्ष-
सब याचक...सब फ़कीर हैं...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

जिंदगी कैसे कैसे... अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

बीत गया,
भले बीत गया...
पर टीस उसकी
आज भी रुला जाती है !

तुम्हारी अपनी सोच,
अपने तर्क तरीके है
हम ही ग़लत, अभागे है
हमे तो शीतलता जलाती है !

जब ढह रहे थे सारे संबल तब
काश ! तुमने हमारा पक्ष लिया होता
ऐ जिंदगी ! ये व्यथा-
हमें सदा सताती है !

आधारहीन नहीं हैं
हमारे कष्ट...हमारी शिकायतें
ये बात और है, कि-
तेरी हर शाम हमें लुभाती है !

तू जरा सा संवेदनशील होती
हमारी भावनाओं के प्रति
तो क्या बात होती,
ये बात हमे भावविभोर किये जाती है !

लाचार सी आँखों से
सपने जो दूर हुए
संबंधों की सकल सच्चाई
ओझल सी हुई जाती है !

क्या कहें...
किसे दोष दें...
उलझे हुए हैं सब लोग ...
साँसें बोझिल हुई जाती है !

अब जाना
सब मतलब के रिश्ते हैं
जिंदगी कैसे-कैसे
अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

पतझड़ की भी... मैं हो गयी सगी !

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

निद्रामग्न कलम में
जब सृजन की प्यास जगी,
शब्दों के संसार में..
भावनाएं विचरण करने लगी
बसंत भी जैसे था मेरा,
और पतझड़ की भी मैं हो गयी सगी
सभी स्तिथियाँ परिस्थितियाँ..
हो चली थी मिठास से पगी
तभी एक निर्मम आंधी आई..
और मैं रह गयी स्तब्ध ठगी

दिवस का अवसान
और सूरज की विदाई
अब लेने को उसकी जगह
उद्धत हुई दिया सलाई
जोड़ने बैठे शाम ढले हम
दिवस भर की कमाई
अंधियारे से बुझे मन को
चांदनी ने सूर्योदय की आस दिलाई
बाल अरुण की लालिमा
तब मन ही मन मुस्काई

फिर हो गयी भोर..
और जिंदगी पुनः चलने लगी
मृत्यु होगी अटल सत्य
पर जिंदगी ही अपनी, वह ही है सगी
कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे, चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी
और हो भी क्यों न, क्षीण हौसलों की..
सुप्त आत्मा है आज जगी

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

लेखनी है रमी... आज लिख डालो!

आँखों की सकल
नमी... आज लिख डालो!
आसमानी सपने छोड़
दूब जिसको है समर्पित
चरणों के नीचे वो ठोस
जमीं... आज लिख डालो!

कितने ही
प्रवाह में हो सरिता
चुन सारे कीचड़ कंकड़, अपनी
कमी... आज लिख डालो!

अपनी व्यथा
सागर की कथा
शब्दों के उलट-फेर में है
थमी... आज लिख डालो!

अपनी छोटी सी धरती
की कई गहन समस्यायों के
कारण कहीं न कहीं, खुद हैं
हमीं... आज लिख डालो!

जाने कल क्या हो
शायद आज ही कोई जगे-
अपनी बात सुन, लेखनी है
रमी... आज लिख डालो!

संवेदनशीलता पर बर्फ है
जमी... आज लिख डालो!
हवा का अट्टहास
और धरती की पीड़ा,
अश्रुधार से भीगे हृदय की
नमी... आज लिख डालो!

कलम आज तू मेरी सुनना...

कलम आज तू मेरी सुनना
सुन्दर ही सुन्दर सपने बुनना!

आये जब कोई बात अतुकान्त
क्रोध से जूझ रहा हो मन प्रान्त
तब शांत कर हृदय को...
राह में बिखरे सब कांटे चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

मरुस्थली में कैसी सिक्तता
जीवन में हर क्षण रिक्तता
ये सत्य गहन जानकर...
करना चिंतन.., गूढ़ अर्थ गुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

शब्द व्यथित, अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी, गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

संध्याबेला में प्रातपहर की यादें चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

दे जिंदगी, अगर ऐसी कोई सौगात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !

क्या सहेजूँ मैं,
सब तो यहीं रह जाता है...
जो चिता संग साथ जाये-
दे जिंदगी,
अगर ऐसी कोई सौगात हो !

आँचल में कांटे भी हों
फूल भी..
सुख दुःख की आंखमिचौनी में-
समदृष्टि अपनाये,
ऐसी अद्भूत बात हो !

साँसों की आवाजाही
कोमल से कुछ स्वर
धुंधली सी यादों की बरसात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

"कृष्णार्पनं अस्तु"

मनोरम छवि
प्रभु की..
ऐसा ही सुन्दर
जीवन का हर प्रभात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

बाल ग्वालों के
झूंड में..
कान्हा की उपस्थिति सा
आभास साथ हो !
कौन्तेय को जैसे
सन्निधि प्राप्त थी...
वैसे ही हमारे सर भी
केशव का हाथ हो !!

मुखरित
कर्म सन्देश बन..
अविरल बहती धारा से
सिंचित दिवारात हो !
सौम्य सी छवि
नयनो में बसी हो...
हिय में खिला सदा ही..
दिव्य प्रात हो !!

कृष्णार्पनं अस्तु
मंत्र से उत्प्रेरित सिंचित..
सकल क्रिया-क्लापों की
श्रेष्ठता की कभी न मात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

जीवन बीत रहा है...!

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

क्या सहेजें
क्या संभालें
पात्र से हर पल-
जल रीत रहा है!

ये कैसी उलटी
हवा चली है
राम पराजित-
रावण जीत रहा है!

भागते बादलों की
क्षणिक सफलता मात्र है यह
सत्य-संयम-सौंदर्य-
जहां में आशातीत रहा है!

चमकता हुआ
हर ग्रहण के बाद,
सूर्य का तेज..युगों से-
धरा का मीत रहा है !

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

.....कहो तो, अपना ऊर दिखलाऊं !

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

झर झर झरते पानी में
इतनी शीतलता झलकती है
माटी की सौंधी खुशबू से
मेरी हृदय धरित्री महकती है

समेट सकूँ ऐसे दुर्लभ उपहार
इतना बड़ा आँचल कहाँ से लाऊं
ऐसी समृद्धि से प्रतिपल सुगन्धित है
शब्दों में कैसे यह भाव कह पाऊं

नीड़ का निर्माण करती..उड़ती है
आह्लादित हो चहकती है
चिड़िया आसमान की होती हुई भी
धरा से सच्चा प्रेम करती है

ऐसी व्यवहारिकता..ऐसा अनुशासन
कैसे अपने मानव समाज में पाऊं
इतना मीठा...इतना कोमल-
कलरव सी तान..कैसे गीतों में लाऊं

इश्वर का ही विम्ब सर्वत्र है
परमात्म शक्ति हर कण में बसती है
हर डाली उसकी कलाकारी...
मानवता को आशीषती रहती है

इन आशीर्वादों के योग्य बन सकें
ऐसी पात्रता कहाँ से लाऊं
सब की एक ही व्यथा है
कहो तो,अपना ऊर दिखलाऊं

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

रचनात्मक गति साक्षात आराध्य है....

बिना किसी जोड़-घटाओ या कृत्रिम साज संवार के..
जो अभिव्यक्त हो , वो काव्य है !
नियमावलियों से गणित चलता है..
रचनात्मकता कहाँ इन परिधियों को प्राप्य है !

मानसिक यात्राओं की यंत्रणाएँ झेलने का साहस हो,तो-
कठिन पड़ावों की सकल विडम्बनायें स्वयं श्रमसाध्य हैं !
लिखती हुई कलम क्या जाने..
विम्बों को जोड़ती उसकी गति साक्षात आराध्य है !
चल पड़ती है तरंगें विचार गंगा की..
जिसे सहेजने को इस अकिंचन की लेखनी बाध्य है !

बिना किसी जोड़-घटाओ या कृत्रिम साज संवार के..
जो अभिव्यक्त हो , वो काव्य है !
नियमावलियों से गणित चलता है..
रचनात्मकता कहाँ इन परिधियों को प्राप्य है !

जड़ों में ही तो... प्राण बसा है !

मैंने अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर कई छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ मैं
हर शब्द बुनती हूँ, कि
मिटा न पाए उसकी क्रूरता
भले निर्मम समय हर रचना पर हँसा है!

क्या लिख लेंगे नया हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अंतस्तल रचा है!
ऊपर की ओर बढती लता है
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी सुनहरी मंजिल भी-
आखिर जीवन अपने आप में प्रेरक एक नशा है!


आँच (आँच-37 चक्रव्यूह से आगे) की समीक्षा में सुझाये गए परिवर्तनों के बाद सचमुच समृद्ध हुई है कविता!
कविता पर इस स्नेह वर्षा हेतु आचार्य परशुराम राय जी के प्रति आभार सहित पुनः पोस्ट कर रहे हैं यहाँ...


अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ
हर शब्द बुनती हूँ-
मिटा न पाए क्रूरता
भले निर्मम जगत हर रचना पर हँसा है!

नया लिख लेंगे क्या हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अन्तस रचा है!
ऊपर की ओर बढ़ती लता
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी मंजिल भी-
आखिर जीवन स्वयं में प्रेरक एक नशा है!

सच्ची एक कलम चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

बरसे तो ऐसा बरसे, कि अंतस्तल भिगो जाये...
धरा की ख़ामोशी को समझने वाला गगन चाहिए!

परहित की खातिर स्वहित का मोह बिसार दे...
सार्थक जीवन यज्ञ को स्वार्थ का हवन चाहिए!

सुनने वाले का मन-प्राण बाँध सके जो...
ऐसी विचारों की प्रगल्भता औ' भावनाएं सघन चाहिए!

दृढ़ता ऐसी कि स्तिथियाँ-परिस्थितियाँ डिगा पाए न...
समस्यायों की भूमि पर रोपे अंगद से चरण चाहिए!

होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ!

कविता श्रृंखला की तरह ही तो होती है...बात शुरु होती है...शब्द तरंगित होते हैं...नितांत अकेलेपन से,पर अकेलेपन की बात करते हुए ये शब्द क्या हमे अकेला रहने देते हैं...कदापि नहीं! सृजन के इस संसार में आत्माएं एक दूसरे से आबद्ध हैं, यहाँ ऐसा होता है कि एक के दर्द से दूसरा रोता है ; ऐसी ही भावदशा में यह कविता लिखी गयी थी...एकाकी विम्बों के साथ वार्ता की संभावनाएं तलाशते हुए-


यहाँ पर
सांसारिक बातों के
पग-पग पर झमेलें हैं..
इस डगर में
हम सब तनहा हैं,
हम सब अकेले हैं..
चलो अकेलेपन में
सृजन की
अनोखी घड़ियाँ जी जाएँ
कुछ उलझनें
मिल कर
हल की जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

जीवन
जितना अपना लगता है
वह उतना ही पराया भी..
वक़्त वक़्त की बात है
कभी तो साथ छोड़ जाता है
अपना ही साया भी..
इस सच की रौशनी में
साथ-प्रेम की
कुछ व्याख्याएं जी जाएँ
कुछ देर सवेरा हो
रौशनी की बातें हों
हम दीपक की लौ सा जल जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

आशा निराशा से लड़ती कविता
हमारी शक्ति
हमारा विश्वास है..
अकेलेपन की रागिनी न होकर
ये तो
अपराजित प्रकाश है..
इस प्रकाश में
कितने अपने लगते हैं सब
चलो सारे भाव छंदों में सी जाएँ
जिंदगी जो है,
जैसी भी है..हमें क्या!
एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

यादें...

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

वो तोतले लबों का गायन
प्यार भरी नज़रों ने किये जो रिश्ते कायम
वो ठोकर खाकर गिरना
और चखना सफलता का स्वाद भी,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो रिमझिम बरसता सावन
वो अपना भीगा-भीगा दामन
जिंदगी अपनी प्रेयसी ....
हम ही इसके मजनू भी ..... फरहाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो पाप-पुण्य का खेल पुरातन
कभी मन के राम पे जो पड़ा भरी रावण
वो संघर्ष की सनातन बेला -
और जीतने का उन्माद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो झूमती हुई कलियाँ ... वो आँगन
वो पीछे छूटा घर ... वो यादों में बसा प्रांगन
यही हमारी पूंजी है -
और यही हमारी जायदाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

सुख-दुःख का बारी-बारी से आगमन
पतझड़ भी है सगा उसका .... जिसे हम कहते हैं सावन
जीना है गुलशन को..
गम नहीं गर कुछ कलियाँ हो जाएँ बर्बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

त्याग से ही आभूषित जीवन कानन है
आज फिर मचा हुआ ये कैसा आनन-फानन है
सहर्ष त्याग दें खुद को लक्ष्य की खातिर ,
हरियाली छाये इसके लिए बनना पड़ता है कुछ को खाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

स्वार्थ का कर चोला धारण
क्यों ये चौपायों सा आचरण
अरे!करें कुछ ऐसे कर्म जो दीप्त करे ... राहें आजीवन
और शायद जीवन के बाद भी ...
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत...

संसार यूँ रचित ही है ,कि .. सारे सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं.... महसूस करें तो अनायास ही अनुभूति होती है कि जड़ चेतन कई वस्तुओं से .... लोगों से... हम किस गहराई से जुड़े हैं.... !!!
जब रिश्ते टूट रहे हों ... बिखराव सहज ही नज़र आता हो तब यूँ प्राकृतिक विम्बों से जुड़ा हुआ महसूस करना सुन्दर अनुभूति है.... ;ऐसे ही कुछ पंक्तियाँ....


गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

सौहार्द प्रेम की अनोखी पहचान लिये...
अधरो पे खिला मनामोहक एक गीत
मेरे दामन मे एक फूल था केवल...
कैसे बनती माला...कैसे एकाकी होती जीत
तभी एक पावन स्पर्श हुआ...
साथ हो चली अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत

गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

वो पास मेरे आया...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

मेरी भाव भंगिमा में
जाने उसने क्या पाया ...
बोल उठा अनायास ही-
'क्यूँ चिंता में डूबी है काया ...
काहे घेरे हुए है तुझे
मिथ्या जगत की माया ...
अंतस्तल की दुनिया में
नहीं है कोई दुरूह साया ...
स्वयं से सामंजस्य बिठाना
क्यूँ नहीं फिर तुझको भाया ...
जा समेट अपने आप को
न कर व्यर्थ वक़्त ज़ाया ...!'
मैंने उसी पल चेतन शक्ति को-
बड़ी विनम्रता से शीश नवाया ...
आत्मद्वार को आहिस्ते से
खटखटाया ...
फिर इस अद्भुत यात्रा का
चित्र सम्मुख हो आया ...
जीवन का मीठापन.. शीतलता.. भगवन..
ऱब.. सब तब मन के भीतर पाया ...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

निज भाषा के प्रति

निज भाषा में हो व्यक्त व्यथा,
निज भाषा उत्थान हित हो स्व जीवन कथा!
ऐसा पावन भाव जगे..
हम ही तो हैं भाव भाषा के सगे..!
हिंद का गौरव हिंद का पर्याय,
हिंदी से पगा हमारी अभिव्यक्ति का हर अध्याय!
कौन नहीं जो भरे इस बात पर हामी..
हृदय तो है निश्छल भावों का अनुगामी....!
भाषा की परिधि में और उससे परे भी,
कष्ट-कंटकों में विवेकपूर्ण चरण धरे ही..
बढ़ें चुनौतियों को कर स्वीकार ,
हिंदी सर्व समर्थ है,तभी तो सह जाती है उपेक्षा की मार!
जीवट के साथ मुस्कुराने का नाम है
हिंदी हमारे राष्ट्र की शान है !
हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर आओ हृदय जोड़ें
चलो आज परदे का भ्रम तोड़ें ...!
सारी खिड़कियाँ ...सभी दरवाज़े खोलें
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़े हो गर्वपूर्वक हिंदी बोलें!!

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्ते औ' जीवन

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

एक बार जो
औरों के दुःख से रोना सीख लिया-
तो जीवन का
ध्येय सफल हो जाता है !

रस्ते के काँटों का भान रहे
पुष्प बिछाने का ध्यान रहे-
फिर सारा निज कष्ट
सरल हो जाता है !

रिश्ते...
सहज स्फुरित है जो,
उनका
अनंत से गहरा नाता है !

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

कुछ एक लुप्तप्राय सी खुशियाँ ....

नन्ही सी गौरैया
जितने दाने चुगती है
उससे कहीं अधिक
आँगन में
खुशी बिखेर जाती है !
आज जब
ये खुशियाँ
लुप्तप्राय सी हैं ,
तो गौरैया ...
बहुत याद आती है !!
अब शायद
होगा उनका
काव्य-कविताओं में ही
आना-जाना
यह बात अनायास
रुला जाती है !!!
आने वाली पीढ़ी
क्या पायेगी हमसे..?
जरा सोचें-
प्रकृतिस्थ बातें,
कैसे हमसे
हर पल दूर
हुई जाती है ???
हमारे आँगन में
आज
गौरैया
क्यूँ नहीं गाती है ?

आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

अम्बर की गोद में बिखरी चंदा की चांदनी ...
ज्यूँ अंधकार पे विजय पाती है
अनगिनत बिखरे तारों के बीच केवल एक अकेला चाँद जब अपनी चांदनी के साथ होता है -
तो कितने ही बुझे उम्मीदों की ज्योति जग जाती है

वैसे ही अगर साथ हो हम
तो हर अन्धकार से लड़ लेंगे
धरती माँ का सारा दर्द -
हम अपने हिय में भर लेंगे

फिर देखना -
कैसे नहीं छूमंतर होता है ये दुनियावी दर्द का व्यापार
जब दीप बन कर जल रहा हो... आंसू के मोती सा निर्मल -
आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

अलविदा....

कहते हैं, हम स्वर्ग में रहना कहते हैं या नरक में , इसका निर्णय हमें स्वयं करना है!
अपने कदमो तले की धरती और सर पर मुट्ठी भर आकाश की दुनिया .... जो हमारी है , उसे अपनी शक्तियों से स्वर्ग बनाने का दायित्व भी हमारा ही है ! ऐसी ही किसी भावदशा में ये कुछ पंक्तियाँ लिखी थी कभी .... आज स्मरण हो आयीं !


अलविदा....
काँटों से पाटी हुई दुनिया
हम तो चले बसाने लहलहाती हुई दुनिया!
जिस पड़ाव से ...
आत्मा स्नेहसूत्र में... अनायास बंध जाये
अलविदा कहते हुए भी दिल जिसे अलविदा कभी न कह पाये-
ऐसी सुन्दर ... खिलखिलाती हुई दुनिया !!
हो लो साथ हमारे ...
हम दिखायेंगे तुम्हे ,
स्वर्ग को भी अपने चरणों में झुकाती हुई दुनिया !!!

मीलों चलना है अभी!

हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
लिखने बैठते हैं जब भी हम
तो कचोटने लगता है गम ही गम
कभी भूख से बिलखती आत्माओं का दर्द रुला देता है
तो कभी कहीं किसी के झुके कन्धों का बोझ मुस्कुरा देता है
हम बेबसी को काव्यात्मक वैभव की वस्तु नहीं बना सकते
अश्रु ढलते दृगों की तस्वीर हम दीवारों पे नहीं सजा सकते
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
विस्तार का दौर है यह
कथनी और करनी में फर्क की आखिर क्या है वजह
यह सोच कर हृदय द्रवित होता है
हमारी संवेदना का रथ अक्सर बिन पहियों का ही क्यूँ होता है
श्रृंखला में कड़ी जोड़ने को प्रयासरत हैं
शब्दों के मायाजाल से मुक्ति हेतु मौन की महिमा के शरणागत हैं
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
कविता जीवन का सेतु है
सुख दुःख में तठष्ट रहने हेतु है
पर फिर भी मुझे मात्र कविता लिखने के लिए कविता नहीं लिखनी है
अंतर के श्रोतों को प्रगट कर जीवन के ध्येय की गरिमा ही सिंचनी है
पहले जरा सुधरने-सुधारने दो आसपास बिखरी विकृत छवि
अगर ये ध्येय सफल होता है तब ही है कोई सफल कवि
इसलिए-
कुछ एक पंक्तियाँ पढ़ कर मत कह देना मुझे कवि!
अभी तो शुरुआत हुई है...मीलों चलना है अभी!!

गुरु कृपा की छाँव में!

गुरु कृपा की छाँव में
कोई काँटा चुभता ही नहीं पाँव में!
लक्ष्य साधने की राह में,
शुरू होती है यात्रा श्रद्धा की थाह में!

सिद्धांतों की रौशनी... सत्कर्मों के दीप,
जीवन की संध्या हर घड़ी आ रही समीप!

इससे पहले कि दिन ढ़ले,
हम राह के काँटे समेटते चले,
फिर शिक्षा हो सार्थक,
गुरु कृपा से बनें पथ प्रदर्शक!

राह दिखाने वाली दृष्टि
सर्वथा पूज्य हो,
प्रभुकृपा होती है तभी
जब गुरुकृपा से परिपूर्ण जीवन स्तुत्य हो!

अध्ययन-अध्यापन की
गौरवशाली परंपरा के स्तम्भ हों,
जीवन की पाठशाला के विद्यार्थियों में
लेशमात्र भी न दंभ हो!

यहाँ सीखने सीखाने की
परिपाटी हो
निर्माण हेतु मिले जो,
वो निर्मल स्वच्छ माटी हो!

गुरु का समुचित आदर हो
हमारे भीतर सदैव एक जागरूक विद्यार्थी सादर हो

ये लगन ही उच्च स्थान दिलाती है,
अद्भुत रूपों में गुरुकृपा फलित हो जाती है!

और प्रताप ऐसा, कि...
खिल जाती हैं सुवासित कलियाँ-
मन के भोले भाले गाँव में;
गुरु कृपा की छाँव में
कोई काँटा चुभता ही नहीं पाँव में!!

जल श्रोतों की खोज!

"ठाकुर का कुआँ"
प्रेमचंद की कहानी का
वह गाँव
कुछ कुछ सजीव होता है !
जब बात उठती है जल श्रोतों की
तो भरी भीड़ की
प्यास के आगे
बूंदों का अभाव सजीव होता है !

कहाँ है जल...
यहाँ तो
केवल
प्यासी आत्माएं खड़ी हैं
कौन बताएगा
कि
आखिर कैसे
जीवन "शव" से "शिव" होता है?!!!

अभाव के संकट से ...
कैसे उबरा जाये ...
मिलते हैं प्रभु तभी... जब
उन तक पहुचने का संकल्प अतीव होता है !
प्रकृति छेड़-छाड़ से तंग आ चुकी है ...
सुख रहे हैं जलश्रोत
मनुष्यता का यूँ तार तार हुआ जाना ...
क्या चेतन जगत
इस कदर निर्जीव होता है?!!!

हम समस्यायों और प्रश्नों से
वैसे ही घिरे हुए हैं ...
जिस तरह
किसी जलश्रोत को घेरे भीड़ खड़ी हो
समाधान भी होगा जरूर....
आखिर
हममे से ही तो कोई
दृढ उत्तर सा सजीव होता है!

एक अकेला सरल सा उत्तर
सारे प्रश्नों का हल होगा ....
हौसले की बात हो...
पानी का क्या ...
अरे! क्या हर पल
हमारी आँखों में ही नहीं
उनका अक्स आंसू बन कर
सजीव होता है ?!!!

अश्रु ढलते दृगों को
हास से परिचीत कराना है
झिलमिल बूंदों से ही
तो इन्द्रधनुषी संसार सजीव होता है !
ज़रा सी संवेदना जागे...
एक दुसरे के सुख दुःख के प्रति सरोकार हो
जीवन इन छोटे छोटे उपादानो से ही तो
सांस लेता है... चलता है ... सजीव होता है !

सफ़र

सफ़र में होंगी
रूकावटे...
राह में होंगी
तमाम मुश्किलें!
सच है!कांटो की
उपस्थिति भी महसूस होगी
जरूरी तो नहीं
हर पल
फूल ही फूल खिलें!!

विरोधाभास भी होंगे
मतभेद भी होगा...
चांदनी
हर निशा को
शायद ही मिले!
टहनियां टूटती हो
तो टूटें...
पत्ते भी पीले हों...
पर जडें कभी न हिलें!!

साथ होने के लिए
साथ हंसने
साथ रोने के लिए
बिंदु-दर-बिंदु समानता
कहाँ जरूरी है!
सागर की कलकल...
पवन की हलचल-
दोनों दो बातें हैं
पर उनमे कहाँ कोई दूरी है!!

आपके ही आसपास से
प्रेरणा हवा में तैरती
हम तक आती है
ऐसे में लिख जाते हैं शब्द:
आपकी प्रेरणा के बिना-
हर कविता मेरी अधूरी है!
जब तक प्रेरक एक भी सांस बाकी है...
तब तक सृजन की
संभावनाएं पूरी हैं!!

हे!मित्रों!
ऐसे ही
हमारा
साथ-साथ
चलना हो!
आपकी
स्नेह भरी छाँव में
हमारा...
गिरना और सम्हलना हो!!

हे! जगदीश्वर .... हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
केवल इतनी शक्ति दो कि हम दर्द सबका समझ सकें ..
क्या पीड़ा है ...क्या दारुण व्यथा, सब खुलकर तुझसे कह सकें ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरे भक्तों की परिधि में मेरा भी एक नाम रहे ..
इतना तो करना प्रभु ...कि आ जाना सुदर्शन लेकर जब अकेली गम की शाम रहे ..

हे! जगदीश्वर...हे! कृष्ण
तेरी लीला से भिन्न कुछ भी नहीं, ये समझा दे ..
सकल आत्माओं की समस्त व्यथा मेरे भीतर आज जगा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरी छवि अभिराम है, फिर आँखों में मेरे रूप अनंत क्यूँ नहीं ..
मुट्ठी में मेरे केवल पतझड़ ...सावन या बसंत क्यूँ नहीं ..

हे! जगदीश्वर....हे! कष्ण
तुम कहवा रहे हो हमसे प्रभु ...प्रज्ञा को यह आभास हो ..
तुम तक पहुँचने का ...अच्युत मेरा प्रयास हो ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
देखना शक्ति तुम्हारी नए आयाम पायेगी ..
भक्ति का प्रसाद दे दो ...आत्मा तेजपूर्ण प्रकाशमय हो जायेगी ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
सभी प्रार्थनारत हैं, मेरी भी विनती सुनना ..
आशीषों का हाथ हमारे सर हो ...हो हमारा काम औरों की राह के कांटे चुनना ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
जो भी शक्ति दी ...उसका हमको भान करा दे ..
जो भूल गया है इस चक्र में पड़कर ...वो पावन ध्येय ध्यान धरा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
आत्मविश्वास की वह धारा निकले जिससे ...ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो जाये ..
थोडा तो कमाल दिखा प्रभु.. ये कलयुग बैठा है कबसे तेरी दयालुता पर नजर टिकाये ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

नाता

यह रचना एक दशक पूर्व कभी लिखी गयी थी ... आज भी कई भाव जुड़े हैं इस कविता से!


" नाता "

रिश्तों के बियाबान जंगल में ..
एक नाता ऐसा भी है .. जो समयसीमा में कैद नहीं
सदियों का कालचक्र जिसमे स्वयं निहित है
जुड़ जाने पे यह रिश्ता मोक्ष तक ले जाता है .. ऐसा सर्वविदित है
फिर भी यह नाता क्यूँ विस्मृत है ?
शब्दों में नहीं समा सकता आत्मा-परमात्मा का चिर सम्बन्ध !!!!!
ये वो दुर्लभ अनुभव है .. नहीं प्राप्त कर सकते जिसे लोग मदान्ध!!!!!

शब्द रचे कुछ सस्वर!

कृष्ण भक्ति की धारा में
शब्द रचे कुछ सस्वर!
जीवन की क्या बिसात
ये माटी तो है नश्वर!!

एक एक मोती पिरोकर
एक माला भावों वाली!
हमने भी मुरलीवाले के चरणों में
अर्पित कर डाली!!

सकल काँटों को कर विस्मृत
पुष्प का तेज हुआ प्रखर!
प्रभु गुण के गान से
धन्य हुए अधर!!

ऐसी ही बातें हो
मधुरता हो बांसुरी वाली!
भक्ति भाव के पुष्पों से
लहलहाए डाली डाली!!

स्वार्थ के कारागार से
आत्मा मुक्त हो इसी पहर!
आज से कलुषता विलुप्त हो जाये
ऐसी चले लहर!!

राधा-मीरा सा प्रेम
भक्ति चैतन्य महाप्रभु वाली!
भाव सुधा का प्याला औ'
झूमती हुई हृदयकुञ्ज की हर डाली!!

ऐसा अद्भुत हो वातावरण
तो कालचक्र भी जाये ठहर!
कृष्ण भक्ति की धारा में
शब्द रचे कुछ सस्वर!!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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