अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता का सफ़र चल निकला ....

जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....


ढलती हुई शामों को जब कोई याद बन आता है ...
मानस की देहरी पर चुपके से ...
द्वार खटखटाता है ...
बीती बातों का एक समंदर ...
जब लहरा कर हृदय पे छाता है ...
तो आगे बढने की उत्कट लालसा से
स्वतः साक्षात्कार हो जाता है ...
अतीत के गर्भ से ही जन्मी वर्त्तमान की ये प्रेरणा है ..
यही से भविष्य का है "कल" निकला ...
समय की धुरी पर,दिन की ताक में,रात्री का सफ़र चल निकला ...


जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....

अगले मोड़ तक हमारा साथ अभी बाक़ी है...!

कई बातों की
बात अभी बाक़ी है...
कुछ पहर शेष है,
रात अभी बाक़ी है...


पर रात बीतेगी, उसे बीतना ही होगा...
अहले सुबह की शुरुआत अभी बाक़ी है...


हर तरफ
हौसलों के टूटने का
दौर ही अगर चल पड़ा है...
तो टूटने को तो पूरी ज़मात अभी बाक़ी है...


अंधकार को विदा होना ही होगा...
मेरी आँखों में सपनो की बारात अभी बाक़ी है...


क्यूँ करते हो
अभी से जाने की बातें...
अगले मोड़ तक
हमारा साथ अभी बाक़ी है...


कई बातों की
बात अभी बाक़ी है...
कुछ पहर शेष है,
रात अभी बाक़ी है...


पर रात बीतेगी, उसे बीतना ही होगा...
अहले सुबह की शुरुआत अभी बाक़ी है...!!

एक धागा भेजा है!

भ्रातृत्व और अपनत्व के भाव से सकल संसार ही अनुप्राणीत है.....: हृदय के उद्गार हर उस रिश्ते के लिए जिसकी प्रेरणा इन शब्दों की आत्मा है :-


भावों से परिपूर्ण.., भाव रूप में ही
एक धागा भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

इन्ही शब्द विम्बों में
अपनी राखी...
पा लेना भैया!
हमारी दूरी
पाट ली जाएगी...
चल पड़ी है जो..,भावों की नैया!
अविचल चलते राहों पर
कवच शुभकामनाओं का...
तेरे भीतर विराजते शिव ही तो स्वयं है..,तेरे खेवैया!
सबकुछ शुद्ध अटल है तो
पहुंचेगा ज़रूर तुम तक....
इतना कहते हुए अब तो आँखों से..,बह चली है गंगा मैया!

अब विराम देती हूँ अपनी वाणी को
सहेज लेना जो इस अकिंचन ने भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

क्यूँ??? एक प्रश्न माला!

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

जीवन में खुशियों का भरम
क्यूँ है आसमान की आँखें नम
क्यूँ बिकती है दुकानों में
रखी हुई आस्था बीच सामानों के
क्यूँ जगमगा रहा है मंदिर तेरा
जब चहुँ ओर है छाया अँधेरा
काहे इतनी घी की बातियाँ यहाँ जलती हैं
और उधर दीन-हीन साँसे अंधकार की लौ में पलती हैं
शाषण क्यूँ दुशासन का दास है
किसने सौंपी नरभाग्य की कुंजी उसके पास है
तेरी मूर्ति के सत्कार में हर भक्त लगा रहता है
वहीँ मूर्तिकार भूखे ही सब सहता है
स्वार्थ जब मानव काया में प्रविष्ट हुआ
तब नियति ने अपना विरोध क्यूँ नहीं स्पष्ट किया
मोह निशा का अंधकार हर पल छलने में पारंगत है
फिर क्यूँ हमारा हृदय निर्मोही जीवन का ही शरणागत है
क्यूँ ये अंधी दौड़ न जाती थम
इतना क्लिष्ट क्यूँ है अंतर्मन

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

कविता

बनती रहे कविता . .
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक .. संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये .....
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में !!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ ..
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम ... सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार .. हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में !!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह ..
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ ..
और डूब जाने को विष्मय में !!!!

यही तो सहेजा जायेगा ..
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी ..
नहीं तो .. यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में !!!!!!!!!!

प्रेरणा और गीत

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

कहीं इस कविता को पढ़ने वाले पहले व्यक्ति की ही ये प्रेरणा तो नहीं
ये अद्भुत बात है, कहीं लिखनेवाले से पढ़नेवाला ही बड़ा तो नहीं
विचारों का मंथन जरूरी है...
लिखा जाना पर्याप्त नहीं, लिखने वाला और पढ़ने वाले विचारमग्न हों
तब कथनी और करनी की खाई को पाटने की सम्भावना पूरी है
इस दिशा में प्रयास हो...
हमारे उद्देश्य किन्ही अर्थों में भिन्न तो नहीं
जो मेरी बात... वही तेरा कथ्य... कोई भी खिन्न तो नहीं

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

हमारे बीच एक कविता बहती है!

कविता
कैसे बनती है
कैसे वह हृदय से
बह निकलती है
इस विस्मय में
कई युग बीत जाते हैं,
कई कल्पों तक
शामें ढलती हैं!
आज कौन से
मन मयूर की
झांकी दिखाई जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

गीत कहे जब छंदों से
रे! तू मेरी प्यारी बहना
आँधियों में जला जो दीपक
उसके तिमिर विजय का क्या कहना
हौसलों के दम पे
ज़िन्दगी जी जाती है,
बातों बातों में ही
कोई दिव्य बात निकल आती है!
तब तक चलो
अनुभूति की धूल
फाँकी जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

संवेदना का
एक ही धरातल हो
कहने वाला जितना रोया
सुनने वाला भी उतना ही द्रवित उतना ही घायल हो
तब जाकर
काव्य की धारा बहती है,
हर क्षण हमें आबद्ध किये
एक कविता रहती है!
हृदय सुने
और हृदय से ही
शब्द सरिता बांची जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

नहीं लिखना चाहते हम ...

नहीं लिखना चाहते हम ...
पर अनायास बन जाती है कविता
नहीं बहना चाहते हम ...
पर हर बार बन जाते है हम निर्बाध बहती सरिता
नहीं बदलना चाहते परिवेश हम ...
पर हर पल छिड़ी रहती है अंतस में लड़ाई
अन्दर कुछ है
जो करने लगता है मटियाने वाली प्रवृति पर चढ़ाई
चहुँ ओर फैली अराजकता ...और -
इंसानी बेबसी को महसूस आद्र हुए जाते हैं
समस्यायों को देख ..
हम अंधेपन का स्वांग नहीं भर पाते हैं
इसलिए
अब इस राह की यंत्रणाओं को तहे दिल से स्वीकार लिया है ..
मन मंदिर में एक नन्हा दीप जला लिया है ..
जब जीना ही चाहती है कविता ..
मानस की उत्प्रीड़क यात्राओं से उत्पन्न दुहिता ...
तो क्यूँ न सृजन की राह पे नन्हे कदम बढ़ाये जाएँ ..
कुछ संवेदनशील ... कुछ ओस की बूंदों से निर्मल गीत गाये जाएँ ..
अनिश्चितता की स्तिथि से -
दूर आ चुके हैं ..
अब रुकना नहीं है ..; चौराहे पे खड़े खड़े -
हम पहले ही कई कीमती पल गवां चुके हैं
आज आप भले ही इन विम्बों से हो सहमत नहीं .....
पर इतना तो स्वीकारो ....... कि यह प्रयास गलत नहीं .....
कौन जाने -
आपकी ज़रा सी सार्थक पहल हमे दृढ कर जाये !
संभावनाओ का आकाश बहुत ऊंचा होता है -
संभव है कल को ये भाव ही ....,रेगिस्तान में भटकती कृशकाय आत्माओं की रीढ़ बन जाये !!

संकल्प:इस पावन पर्व पर...

भारत माता मंदिर में
एकांत अकेले बैठे हुए
दीवारों पर अंकित
"वन्दे मातरम" गीत
कागज़ पर उतारना याद आता है ....!
विद्यालय में पंद्रह अगस्त
के पूर्व का उत्साह
कार्यक्रम-गीत-भाषण
और अंत में वितरित होने वाला
चाकलेट याद आता है ....!

* * *

हमने तो सिर्फ कहानियां सुनी हैं

वतन पर कुर्बान हो जाने वाले

क्रांतिवीरों के शौर्य को

नाटकों में ही मंचों पर मंचित होते देखा है

क्या आज पुनः नहीं चाहिए

एक अदद क्रांति -

विचारों में... व्यवस्था में... संपूर्ण तंत्र में ?

क्या आज पुनः नहीं चाहिए वही

सर पर कफ़न बांधने वाला साहस ?

"स्व" के संकुचित धरातल से ऊपर उठ कर

राष्ट्रहित के लिए सोचने वाली निष्ठा ?

उत्तर निःसंदेह

स्पष्ट " हाँ " ही है ...

फिर ये आलस्य पूर्ण पहर क्यूँ ?

फिर ये एक दूसरे की ओर नज़र क्यूँ ?

छोटे ही से स्तर से सही ..

स्वयं परिवर्तन और प्रयास की-

एक कड़ी बने!

शुरुवात तो हो... लड़खड़ाते क़दमों के लिए-

ही छड़ी बने!!

स्वतंत्रता की मर्यादा का

निर्वहन हो!

दौड़ पड़ें भीड़ एक आवाज़ पे....

ऐसे सच्चा आवाहन हो!!

पुकारती है माटी -

पावन पर्व मनाएँ!

आज़ादी के ६३ सालों -

की अनूठी गाथा गाएँ!!

नमन करें उन वीरों को

जिनके बलिदान ने हमे ये युग दिया है!

उस भावना को करें ग्रहण

जिसने त्याग का अनुपम व्रत लिया है!!

अपरिग्रह का सिद्धांत-

पालित हो ... पोषित हो!

समाजहित और राष्ट्रहित में हो तो...

सर्वस्व भी तिरोहित हो!!

यही संकल्प हो -

इस पावन पर्व पर !

इस मिट्टी की संतान है तू ....

इस बात पर गर्व कर !!



जय हिंद !

कितना अच्छा हो...!

एक बच्चा
मन के भीतर
जीवनपर्यंत
सजीव रहे
तो
कितना अच्छा हो!

टेढ़े-मेढ़े
रस्तों में
कुछ तो
सदैव
सीधा हो
सच्चा हो!

विरोध पल भर, फिर
दोस्ती की बयार
अहंकार से अछूता
बचपन सा ही हो मन, तो
कितना अच्छा हो!

सभी रिश्ते भी निभा लें और ऐसा भी न हो
कि अपनी आत्मा से ही सम्बन्ध विच्छेद हो जाये
झूठे इस जगत में
कुछ तो शाश्वत हो
सच्चा हो!

एक बच्चा
मन के भीतर
जीवनपर्यंत
सजीव रहे
तो
कितना अच्छा हो!

ऐसा हो ....! ("एक संकल्प ...एक सोच")

मान-अभिमान
से परे
रूठने-मनाने के
सिलसिले सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो!

किनारे पर रेत से
घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़ छोड़
आगे बढ़ता सा
भोला भाला जीवन दर्शन हो !

नमी सुखाती हुई
रुखी हवा के
विरुद्ध
नयनो से बहता
निर्झर हो !

परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्तिथि की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर ही
निर्भर हो !

भीतर बाहर
एक से ...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाईयां
मन प्राण का दर्पण हो !

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !

धागे की महिमा!

"स्वप्न से स्मृति तक" पर कृष्ण प्रेम और ललित प्रेम शीर्षक कविता पढ़ना ऐसा था जैसे अपने भीतर से ही बहुत कुछ ढूंढ निकालने की यात्रा पर चल देना...
'कृष्ण प्रेम था ललित बहुत
पर ललित प्रेम है कृष्ण नहीं'
कविता की इन पंक्तियों पर मन अटक कर रह जाता... और इस भिन्नता में अभिन्नता तलाशने में सकल भाव जुट जाते... हृदय से खोजो तो क्या नहीं मिलता... अपने आप को निरुत्तर करने के लिए लिखी थी यह कविता... और बहुत ख़ुशी हुई थी लिख कर... आज २१/१२/२०११ को इस पोस्ट को पुनः पोस्ट कर रहे हैं कुछ बदल कर... पहले इसे अधूरा पोस्ट किया था क्यूंकि ये समझ नहीं आ रहा था कि सन्दर्भ कैसे दें... आज सन्दर्भ की जैसे कोई आवश्यक ही नहीं... सब कुछ स्पष्ट जो है...! अनुशील पर आपकी कविता का जवाब तलाशने का नन्हा प्रयास... प्रस्तुति सिर्फ आपके लिए, ललित!

क्यूंकि
वो हर जगह नहीं हो सकते थे
इसलिए
उन्होंने माँ बनाई!
और माँ भी नहीं हो सकती थी
हर गम की साझेदार,
इसलिए
दुनिया में अवतरित हुए भाई!!

जिनके सानिध्य में
पीड़ा खो सके...
जिनके कंधे पर सर रख
बहने बेफिक्र हो सो सके...
जब गढ़ रहा था वो रिश्ते,
तब कितने ही सांचे टूटे
फिर जाकर
इस रिश्ते की गरिमा प्रकाश में आई!!

स्नेहसूत्र की परिभाषा में
आबद्ध सकल संसार है
धागे से बंधा
ये अदृश्य प्यार है
सब हार गए...
भरी सभा में द्रुपद सुता का कोई न हुआ सहाई
तब उसने
मधुसूदन को ही थी आवाज़ लगायी!!

एक धागे के बदले में
प्रभु ने दिव्य वसन वार दिए
भीष्म की कुलवधू के
डूबते प्राण तार दिए
शान्ति की स्थापना कर दे...
भले कैसी भी छिड़ी हो लड़ाई
सच!
कितना सर्व समर्थ था वो कन्हाई!!

जब इस युग की विडंबना से
प्रभु बेचैन हुआ
इस जग में व्याप्त बेगानेपन से
सिक्त उसका नयन हुआ
तब उसने एक ललित छवि बनाई
जहान भर की संवेदना डाली उसमें
और हृदय में
खुद अपनी जगह सजाई!!

अब वो परमेश्वर
वहीं भावों में बहता है
मंदिर से विदा हो चुका,
अब कन्हैया
स्वयं ललित हृदय में रहता है
सारे जहान का दर्द
उसने दामन में समेट रखा है...
उसके लिए हम भी सगे हैं
कोई बात नहीं पराई
कृष्ण ललित है... फिर ललित कृष्ण क्यूँ नहीं...?
ये तो मीरा वाली भक्ति है!
अरे!
ये ललित ही है कन्हाई!!!

आज कविता को पुनः यहाँ लिखते हुए आपकी एक और कविता की चार पंक्तियाँ भी उद्धृत कर दें....

"सारा जहां मेरा होगा अब
संग मेरे जग गायेगा
हर छोटा-सा कण भी मेरे
साथ शिखर तक जाएगा"

कृष्णमयी शक्ति के अभाव में यह कैसे लिखते आप... इसलिए सार यही है... कि उत्तर तक पहुँचने में हम कहीं भटके नहीं... ठीक मंजिल पर पहुंचे हैं... और शायद कुछ अन्य प्रश्न भी हल हो गए इस पूरी प्रक्रिया में... इश्वर की सत्ता पर सवाल करने वाले बस अपने भीतर झाँक कर देख लें... प्रभु वहीँ मुस्कुराते हुए मिलेंगे, यह भी नहीं करना है तो आस पास ही देखें..., जहाँ इंसान नज़र आये समझो वहीँ प्रभु के दर्शन हो गए... जहाँ ज़िन्दगी तमाम विरोधाभासों के बावजूद मुस्कुरा रही हो वहां प्रभु नहीं तो और क्या है...!!!
बात कहाँ से शुरू हो कर कहाँ जा रही है... खैर, डरते डरते संकोचवश बहुत कुछ नहीं कह पाते हैं... सोचा आज कह लें प्रवाह में... सो, कह लिया! आपके लिए लिखी गयी कविता है सो आपको तो पढ़नी ही पड़ेगी...:)
इन ढ़ेर सारे भावों से सरोकार न रखने वाला भी कोई अगर इसे पढ़े तो कुछ सत्य उभरेंगे ज़रूर..., वैसे यहाँ कविता जैसा तो कुछ है नहीं... बस भाव हैं, आंसू हैं और ईश्वर से की गयी बालसुलभ सी जिद है...
स्नेहाधीन को ढ़ेर सारा स्नेह!!!
अनुपमा

नियति और इंसान

नियति जो निर्धारित करे .... हमे वह सब सहना ही होता है .... हंस कर या रो कर ! मगर ऐसे में मेरा मन अनायास उस चेतन शक्ति को प्रणाम करता है जो घोर निराशा में भी जीवन जीने के बहाने तलाश लेती है... मृत्यु की मरूभूमि के आगे भी जीवन चलायमान होता है....

शब्दों के लिए जगह न हो
संभव है एक ऐसा भी दौर आये...
अभी तो कितनी ही बातें हैं -
कितनी ही कहानी है!

रहस्य
बादलों के पार ही नहीं होता...
भावनाओं का संसार भी -
इन तत्वों का मानी है!

बंद आँखों से
महसूस की जाये...
हृदय पर कुछ अदृश्य से -
आकारों की जो निशानी है!

अनचिन्ही... अनजानी सी
नियति है...
नम आँखों में ..जरा सी हंसी -
यही तो जिंदगानी है !

अच्छा ही रहेगा सफ़र
खिलखिलाने के कई बहाने जो हैं...
आँखों में कितनी ही -
छोटी छोटी खुशियों का पानी है!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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